तमिलनाडु चुनाव: सीएए पर अन्नाद्रमुक का यूटर्न, मोदी सरकार पर दबाव बनाएगी पार्टी

तमिलनाडु के उप मुख्यमंत्री ओ पनीरसेल्वम (बाएं) और मुख्यमंत्री ई पलानीस्वामी

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    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में बीजेपी की सहयोगी पार्टी अन्नाद्रमुक ने विवादास्पद नागरिकता संशोधन क़ानून पर अपना स्टैंड बदल लिया है.

दो साल पहले अन्नाद्रमुक ने राज्यसभा में नागरिकता संशोधन क़ानून का समर्थन किया था.

अपने घोषणापत्र में अन्नाद्रमुक ने स्पष्ट रूप से लिखा है कि वो नागरिकता संशोधन क़ानून पर पीछे हटने के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाती रहेगी.

इससे राज्य में उसके जूनियर पार्टनर बीजेपी में नाराज़गी का माहौल तो है, लेकिन उसके निशाने पर गठबंधन साझीदार अन्नाद्रमुक के बजाय द्रमुक ज़्यादा दिख रही है.

बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव और तमिलनाडु के प्रभारी सीटी रवि ने कहा, "द्रमुक के एमके स्टालिन कहते हैं कि उनकी पार्टी नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई जारी रखेगी. स्टालिन एक ऐसे क़ानून का विरोध कर रहे हैं, जो पाकिस्तान और दूसरे देशों से आने वाले दबे-कुचले हिंदुओं, सिखों और ईसाइयों को नागरिकता प्रदान करेगा. स्टालिन या कोई भी इसका विरोध कर सकते हैं लेकिन नागरिकता संशोधन क़ानून वापस नहीं लिया जाएगा."

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तमिलनाडु चुनाव

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नागरिकता संशोधन क़ानून का मुद्दा

लेकिन तमिलनाडु के मुख्यमंत्री इडापड्डी पलानीस्वामी ने अन्नाद्रमुक के रुख़ का बचाव करते हुए सोमवार को पत्रकारों से कहा, "अन्नाद्रमुक की सरकार अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देने वाली सरकार है. हमने घोषणा की है कि हम नागरिकता संशोधन क़ानून को वापस लेने के लिए केंद्र पर ज़ोर देंगे. अन्नाद्रमुक अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा करने वाली एकमात्र पार्टी है. हम इस बात को लेकर केंद्र सरकार पर दबाव बनाएँगे."

11 दिसंबर, 2019 को नागरिकता संशोधन क़ानून पर जब राज्यसभा में वोटिंग हो रही थी, तो अन्नाद्रमुक के सभी 11 सांसदों ने इसका समर्थन किया था.

अन्नाद्रमुक के समर्थन के बूते नागरिकता संशोधन क़ानून को राज्यसभा में 125 वोट मिले थे.

जनता दल यूनाइटेड, शिरोमणि अकाली दल, बीजू जनता दल, तेलुगूदेसम पार्टी, जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस और कुछ निर्दलीय सांसदों ने नागरिकता संशोधन क़ानून के पक्ष में वोट किया था.

बीबीसी से बातचीत में राजनीतिक विश्लेषक सुमंथ पी रमण कहते हैं, "ये केवल चुनावी स्टंट है. एक दिन पहले द्रमुक ने कहा था कि वो श्रीलंका के शरणार्थियों को नागरिकता संशोधन क़ानून में वर्णित देशों की सूची में शामिल करने की माँग करेंगे. अगले दिन वे इससे पीछे हट गए क्योंकि किसी ने उन्हें ध्यान दिलाया कि द्रमुक ने नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध किया है. दोनों ही पार्टियाँ चुनावी स्टंट कर रही हैं."

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असम में दूसरा स्टैंड

लेकिन असम में नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध कर रहे गठबंधन साझीदार को लेकर बीजेपी का रुख़ तमिलनाडु से उलट है.

ताज्जुब की बात ये भी है कि पूर्वोत्तर राज्य असम में बीजेपी ने अपने गठबंधन साझीदार बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट से रिश्ता तोड़ लिया है, क्योंकि बीपीएफ़ ने नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध किया था.

बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के प्रवीण बोरा ने कहते हैं, "जब हमने नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध किया, तो उन्होंने हमें छोड़ दिया और एक दूसरी बोडो पार्टी के साथ गठजोड़ कर लिया."

लेकिन बीजेपी को तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक जैसा मज़बूत साझीदार नहीं मिल सकता.

अपने घोषणापत्र में अन्नाद्रमुक ने महिलाओं को हर महीने भत्ता, प्रत्येक परिवार से एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी, एक साल का मातृत्व अवकाश, श्रीलंका से आए शरणार्थियों को दोहरी नागरिकता, कॉलेज में पढ़ने वाले छात्रों को मुफ़्त टूजी डेटा और साथ में हर साल छह गैस सिलिंडर फ़्री में देने का वादा भी किया है.

राजनीतिक विश्लेषक सुमंथ पी रमण ने कहते हैं, "कल्पना कीजिए कि इन भत्तों और हरेक परिवार से एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी देने पर हर महीने कितना सरकारी ख़र्च बढ़ेगा. ये सब केवल वोट पाने के लिए किया जा रहा है. सत्ता में आने के बाद उनका क्या रुख़ होगा, ये सब देखेंगे."

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