बीजेपी के लिए तमिलनाडु की राजनीति अब भी दूर की कौड़ी क्यों- नज़रिया

बीजेपी तमिलनाडु

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    • Author, बद्री शेषाद्री
    • पदनाम, राजनीतिक विश्लेषक

रजनीकांत राजनीतिक पार्टी बनाएं या नहीं लेकिन मीडिया और राजनीतिक दलों के बीच उनके हर क़दम की चर्चा होती रहती है.

वैसे उन्होंने राजनीतिक पार्टी बनाने से इनकार किया है लेकिन मेरा निजी तौर पर मानना है कि अगर वो पार्टी भी बना लेते और पूरे राज्य में प्रचार कर लेते तो भी वे तमिलनाडु के राजनीतिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण बदलाव नहीं ला पाते.

रजनीकांत में भारत की राजनीति में पकड़ बनाने की कला नहीं है. हालांकि, कमल हासन के पास भी इस तरह की क़ाबिलियत नहीं है लेकिन ये ध्यान देने वाली बात है कि मीडिया में चर्चित शक्तिशाली रजनीकांत के पास भी ये हुनर नहीं है.

रजनीकांत की एमजी रामाचंद्रन (एमजीआर) और एनटी रामाराव (एनटीआर) से तुलना करना ठीक नहीं है.

एमजीआर एक मज़बूत विचारधारा वाली पहले से बढ़ रही राजनीतिक पार्टी से जुड़े थे और उसकी सफलता के लिए उन्होंने काम किया. वे पहले विधायक बने और फिर उसके बाद अपनी राजनीतिक पार्टी बनाई.

द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (डीएमके) की मजबूत नींव धीरे-धीरे एमजीआर की पार्टी को आधार देने लगी.

वहीं, जब तेलुगू सुपरस्टार एनटीआर ने तेलुगू देशम पार्टी की शुरुआत की थी तब आंध्र प्रदेश की राजनीति में एक मज़बूत विपक्ष की कमी थी.

एनटीआर ने आरोप लगाया था कि राजीव गांधी ने तेलुगू अस्मिता पर हमला किया है, उसकी छवि ख़राब की है और वो इसे बदलना चाहते हैं. लोगों ने उन्हें बढ़चढ़कर समर्थन दिया.

रजनीकांत की तस्वीर

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मौजूदा स्थितियां अलग

लेकिन, अब तमिलनाडु में स्थितियां अलग हैं. रजनीकांत की सेहत और उम्र उनका साथ नहीं दे रही है. यहां तक कि उन्होंने अपने प्रशंसकों को अपना फ़ैसला भी ख़ुद नहीं सुनाया.

तमिलनाडु की राजनीति में विचारधारा को लेकर उलझन होना सामान्य बात है. लेकिन, अपनी योजना को लेकर उलझन होना सामान्य नहीं है.

हो सकता है कि रजनीकांत के आसपास मौजूद कुछ लोगों ने उन्हें मुख्यमंत्री बनने का सपना दिखाया होगा, ठीक उसी तरह जैसे कि वो किसी फ़िल्म में सिर्फ़ एक गाने से ही लखपति बन जाते हैं.

उन्होंने ना सिर्फ़ ख़ुद इस बात पर भरोसा किया बल्कि अपने प्रशंसकों को भी ये सपना दिखाया और अब हर कोई निराश है.

बीजेपी का झंडा लहराते हुए एक शख़्स

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कब हुई बीजेपी की एंट्री

एक पार्टी को अपनी विचारधाराओं, अपनी ताक़त, नेताओं और कार्यकर्ताओं पर विश्वास करना चाहिए. किसी को अचानक आसमान से टपकाना और चुनाव जीतने के लिए उसका इस्तेमाल करना आसान नहीं है.

भारत में ऐसा कहीं भी नहीं हुआ. ये सही है कि फ़िल्म जगत से जुड़े लोग अपने पीछे भीड़ लेकर आते हैं. लेकिन, बीजेपी को लगता है कि रजनीकांत सिर्फ़ भीड़ नहीं बल्कि वोट भी लेकर आएंगे.

इसलिए बीजेपी उन्हें बार-बार निमंत्रण दे रही है.

लेकिन, रजनीकांत थोड़े हिचकिचा रहे हैं. उन्हें चिंता है कि बीजेपी के साथ आने से उनका भग्वाकरण हो जाएगा. कई लोग उन्हें उनके भाषणों के आधार पर बीजेपी की बी टीम भी कहते आए हैं.

ऐसा लगता है कि रजनीकांत भले ही बीजेपी में शामिल होने से इनकार कर देते लेकिन बीजेपी रजनीकांत की पार्टी से गठबंधन करने के लिए तैयार थी. हालांकि, ये सपना भी अब टूट गया है.

इसलिए रजनीकांत से बीजेपी को समर्थन देने के लिए कहा जा रहा है. वहीं, एआईडीएमके भी कमल हासन का समर्थन मांग सकती है.

बीजेपी का चुनाव चिन्ह कमल

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बीजेपी की तमिलनाडु में स्थिति

ये बीजेपी के लिए एक सबक है. बीजेपी तमिलनाडु में एक छोटी-सी पार्टी है, इसमें कुछ ग़लत भी नहीं है. कई लोग कहते हैं कि बीजेपी की हालत ऐसी है कि उसकी प्रतिस्पर्धा किसी बड़ी राजनीतिक पार्टी से नहीं बल्कि नोटा (NOTA) में पड़ने वाले मतों से है.

लेकिन, ये सही नहीं है. बीजेपी का वोट बैंक लगातार बढ़ रहा है. मेरा अनुमान है कि बीजेपी तमिलनाडु में तीसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है. हालांकि, पार्टी अभी इतनी बड़ी नहीं हुई है कि वो अकेले चुनाव लड़ सके और कुछ सीटें जीत सके.

भाजपा को तमिलनाडु में मज़बूत होना है तो सदस्यों की संख्या बढ़ानी होगी. लेकिन, रजनीकांत जैसे लोग इसमें मदद नहीं कर पाएंगे. मुझे लगता है कि रजनीकांत आने वाले चुनाव में किसी पार्टी का समर्थन नहीं करेंगे.

1996 में अपनी आवाज़ उठाने के लिए रजनीकांत के पास कई कारण थे पर वो कारण अब नहीं रहे. बीजेपी ये बात नहीं समझती है. ये बताता है कि बीजेपी अभी तक तमिलनाडु की राजनीति को नहीं समझ पाई है.

बीजेपी ख़ुद को डीएमके का वैचारिक विरोधी बताती है. डीएमके ने भी अपनी इसी तरह की छवि पेश की है. इस स्थिति में, बीजेपी का एकमात्र लक्ष्य एआईएडीएमके के साथ गठबंधन करके डीएमके को हराना होना चाहिए.

लेकिन, बीजेपी का ऐसा कोई मक़सद नज़र नहीं आता. वो मुख्यमंत्री पलानीसामी पर कई तरह से दबाव डालती रहती है, जिसमें मुख्यमंत्री उम्मीदवार चुनने का मसला भी शामिल है. इस तरह का दबाव एआईएडीएमके और बीजेपी दोनों को नुक़सान पहुंचा सकता है.

(इस लेख में अभिव्यक्त विचार लेखक के अपने हैं और ये बीबीसी के विचार का किसी भी तरह प्रतिनिधित्व नहीं करते.)

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