अन्नाद्रमुक को क्यों है मोदी के मार्गदर्शन की ज़रूरत?

- Author, शेखर अय्यर
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
तमिलनाडु में सत्ता की होड़ में लगे दो गुटों के तीन बड़े खिलाड़ियों- मुख्यमंत्री ई पलानीस्वामी, पूर्व मुख्यमंत्री ओ पनीरसेल्वम और वीके शशिकला के भतीजे टीटी दिनाकरण के बीच चल रहा संघर्ष राज्य सरकार की स्थिरता के लिए ख़तरा बन गया है.
ये संघर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अच्छी मित्र रहीं अन्नाद्रमुक सुप्रीमो जयललिता की अचानक हुई मौत के बाद से चल रही है.
मोदी का मानना है कि इस लड़ाई से सिर्फ़ और सिर्फ़ विपक्ष का फ़ायदा होगा. ख़ासकर डीएमके और इसके सहयोगियों का. इतना ही नहीं, अपनी ख़राब तबियत के बाद भी जयललिता ने जो जनादेश हासिल किया था ये उसका भी अपमान है.
गौरतलब है कि सत्ता में वापसी के सात महीने बाद दिसंबर 2016 में जयललिता का निधन हो गया था.
प्रधानमंत्री मोदी ने सोचा होगा कि नए चुनाव से किसी को फ़ायदा नहीं होगा. इसलिए उन्होंने आपस में उलझे एआईएडीएमके नेताओं को सुलह करने और जयललिता को मिले जनादेश का सम्मान करने की सलाह दी.
रजनीकांत बनाम कमल हासन
जयललिता की मौत के बाद से सुपरस्टार रजनीकांत और कमल हासन जैसे फिल्मी कलाकारों ने राजनीति में प्रवेश करने की अपनी इच्छा का संकेत दिया है. बीजेपी रजनीकांत के सक्रिय राजनीति में शामिल होने पर ज़ोर दे रही है तो कमल हासन सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक के ख़िलाफ़ ही खुल कर सामने आए हैं.
कुछ दिन पहले, कमल हासन ने डीएमके नेता एमके स्टालिन के साथ मंच साझा किया था, जिससे ये स्पष्ट हो गया कि वो भाजपा-अन्नाद्रमुक विरोधी शक्तियों के साथ हैं.
दिलचस्प बात यह है कि तमिल सिनेमा में अपने करियर की शुरुआत लगभग एक साथ करने वाले कमल हासन और रजनीकांत पुराने प्रतिद्वंद्वी हैं. अब ये प्रतिद्वंद्विता उनकी राजनीतिक योजनाओं में भी सामने आ रही है.

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मोदी ने दी सलाह
कमल हासन भूल नहीं सकते, जब जयललिता मुख्यमंत्री थीं तो उन्हें कुछ कड़वे अनुभव मिले थे. उनकी बड़े बजट की फ़िल्म 'विश्वरूपम' को कुछ मुस्लिम समूहों के विरोध का सामना करना पड़ा था और उनका मानना है कि इस विरोध प्रदर्शन के पीछे अन्नाद्रमुक का हाथ था.
स्टालिन की ही तरह कमल हासन भी ये मानते हैं कि अन्नाद्रमुक कई हिस्सों में टूट जाएगा और आज नहीं तो कल विधानसभा चुनाव होंगे.
लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सीधे मिली सलाह के बाद पलानीस्वामी और पनीरसेल्वम ने दोनों गुटों के विलय की कोशिशों को फिर से शुरू करना ही बेहतर समझा.
माना जा रहा है कि पनीरसेल्वम और पलानीस्वामी को मोदी ने यह "दोस्ताना सलाह" हाल में उनकी अलग अलग बैठकों के दौरान दी थी.

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पनीरसेल्वम की शर्तें
दोनों नेताओं से मोदी की मुलाकात के बाद चेन्नई में अचानक राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ गईं. बागी गुट की ओर एक कदम बढ़ाने का संकेत देते हुए, पलानीस्वामी समूह ने टीटीवी दिनाकरण की तरफ़ से हाल ही में की गई पार्टी की नियुक्तियों की घोषणाओं को निरस्त कर दिया.
दिनाकरण को शशिकला ने उपमहासचिव बनाया था और इसके बाद से ही दिनाकरण को अन्नाद्रमुक के वरिष्ठ नेताओं से चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, वो भी तब जब शशिकला खुद आय से अधिक संपत्ति के मामले में फ़िलहाल बेंगलुरु की जेल में बंद हैं.
पिछले साल दिसंबर में जयललिता की मौत से ठीक पहले उन तक पहुंच को नियंत्रित करने का आरोप दोनों ही गुट शशिकला पर लगाते हैं. जयललिता के इलाज और देखभाल में शशिकला की भूमिका को लेकर भी इन गुटों में संदेह बना हुआ है.

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दिनाकरण और शशिकला को पार्टी से बेदखल किए जाने का प्रस्ताव फिलहाल रोक लिया गया है. हालांकि विलय के लिए पनीरसेल्वम गुट की यही प्रमुख शर्त है.
जब 11 अगस्त को नए उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू के शपथ ग्रहण समारोह में पलानीस्वामी और पनीरसेल्वम पहुंचे तो अटकलें थी कि विलय में आ रही कठिनाइयों को वो आपसी चर्चा से सुलझा सकते हैं.
प्रधानमंत्री ने दोनों नेताओं से राज्य सरकार की राजनीतिक स्थिरता को ध्यान में रखने की सलाह दी और कहा कि उन्हें जयललिता के निधन के बाद अस्थिरता की भावना को लंबा नहीं खींचना चाहिए.
दिलचस्प है कि अभी अगले चुनाव के लिए चार साल बाकी हैं और कोई भी धड़ा फ़िलहाल किसी नए चुनाव के लिए तैयार नहीं है.
इसके अलावा, उनका राजनीतिक भविष्य अधर में लटक गया है क्योंकि चुनाव आयोग ने उनके विभाजन को तो मान्यता दी लेकिन दोनों गुटों के दावे के बाद एआईएडीएमके के चुनावी चिह्न "दो पत्तियों" को ज़ब्त कर लिया.

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बीजेपी की राजनीति
बीजेपी की रुचि यह सुनिश्चित करने में है कि संयुक्त एआईएडीएमके संसद में अहम मसलों पर एनडीए सरकार का समर्थन करे और साथ ही भगवा पार्टी को तमिलनाडु में खुद को संगठित करना का मौका भी मिले.
वो केंद्र सरकार में अन्नाद्रमुक के प्रवेश के स्वागत का रास्ता भी बना सकती है. साथ ही, पार्टी पदाधिकारियों का कहना है कि बीजेपी राज्य में अभी विधानसभा चुनाव को टालना भी चाहती है, क्योंकि वो वहां बमुश्किल वोट हासिल करने की स्थिति में है.
विलय के बाद दोनों गुट इस समझौते पर भी पहुंच सकते हैं कि मिलकर चुनाव आयोग से चुनाव चिह्न को वापस मांगा जाए.
लेकिन इसके लिए दोनों पक्षों को फॉर्मूला तैयार करने की ज़रूरत है जो पलानीस्वामी और पनीरसेल्वम के हितों का ख़्याल रखे.

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पनीरसेल्वम उपमुख्यमंत्री बनेंगे?
पलानीस्वामी मुख्यमंत्री का पद छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं. यह भी कहा जा रहा है कि पनीरसेल्वम को उपमुख्यमंत्री का पद ऑफ़र किया गया है. यह प्रस्ताव 6 दिसंबर 2016 से 16 फरवरी 2017 तक राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके पनीरसेल्वम को स्वीकार नहीं है.
वार्ताकार वैकल्पिक प्रस्तावों को भी सामने लाए हैं जिसमें से एक में पनीरसेल्वम को पार्टी के कार्यकारी महासचिव और पलानीस्वामी को मुख्यमंत्री पद पर बनाए रखने की बात कही गई है.
इसका मतलब होगा कि पलानीस्वामी सरकार चलाएंगे और पनीरसेल्वम पार्टी.
इसके अलावा, अगर पनीरसेल्वम उपमुख्यमंत्री बनने के लिए राज़ी हो जाते हैं तो उनके पास कुछ महत्वपूर्ण विभागों के पोर्टफ़ोलियो आ सकते हैं. पनीरसेल्वम की प्रमुख मांगों में से एक जयललिता की मौत की जांच सीबीआई को सौंपना और दूसरी चेन्नई के उनके घर 'वेद निलयम' पर नियंत्रण है .
पलानीस्वामी ने यह घोषणा की है कि घर को स्मारक में तब्दील कर दिया जाएगा और जयललिता को सही इलाज मिला था या नहीं इसकी जांच एक सेवानिवृत जज से कराई जाएगी.

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सुलह में दिनाकरण बनेंगे अड़चन
पलानीस्वामी की सरकार की इन घोषणाओं के बावजूद पनीरसेल्वम के समर्थक विलय के लिए तैयार नहीं हुए हैं.
विलय को लेकर पलानीस्वामी के रास्ते में दिनाकरण रोड़ अटका सकते हैं क्योंकि दिनाकरण ने शशिकला का समर्थन कर रहे 37 विधायकों के बूते सरकार गिराने की धमकी दी है.
वर्तमान में सरकार के पास 123 विधायक हैं और विधानसभा में बहुमत के लिए 118 विधायक ज़रूरी होते हैं.
लेकिन अगर पलानीस्वामी और पनीरसेल्वम में सुलह हो गई तो उन्हें दिनाकरण के ख़तरे को टालने के लिए भी तैयार रहना होगा.
दोनों को साथ मिलकर ये सुनिश्चित करना होगा कि अन्नाद्रमुक के विधायक एकजुट रहें और एआईएडीएमके की सरकार केंद्र की एनडीए सरकार की कृपादृष्टि के साथ चलती रहे.
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