अंतरराष्ट्रीय शोध-अध्ययन पर सरकारी रोक-टोक से भारत छवि निखरेगी या बिगड़ेगी?

नरेंद्र मोदी

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    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
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पिछले महीने भारत सरकार ने संशोधित दिशानिर्देश जारी किए हैं जिसे लेकर शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और विद्वानों के बीच बहस शुरू हो गई है और इसकी आवाज़ विदेश में भी गूँज रही है.

इस नए सरकारी निर्देश के मुताबिक़ सरकारी विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों को अंतरराष्ट्रीय वेबिनार, ऑनलाइन सेमिनार और भारत की सुरक्षा से संबंधित विषयों पर कांफ्रेंस में विदेशी विद्वानों को बुलाने से पहले विदेश मंत्रालय से मंज़ूरी लेनी पड़ेगी.

सरकार का कहना है कि ऐसा देश की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए किया गया है.

निर्देश के मुताबिक़, हर उस विषय पर सेमिनार करने से पहले अनुमति लेनी पड़ेगी जिसका संबंध सरकार की नज़रों में 'देश की सुरक्षा और दूसरे संवेदनशील अंदरूनी मामलों' से है.

राजनीतिक मुद्दों पर कोई आयोजन करने से पहले अनुमति लेने की व्यवस्था पहले से ही है, लेकिन अकादमिक मामलों में ऐसा पहली बार किया गया है.

पिछले महीने इस निर्देश को लागू कर दिया गया. विदेशी संस्थानों में शोध कर रहे लोग, विद्वान और प्रोफेसर इस सरकारी फ़ैसले की आलोचना कर रहे हैं और कह रहे हैं कि इससे शैक्षिक स्वतंत्रता को ख़तरा पैदा हो गया है.

कई जानकारों का कहना है कि भारत की छवि को बचाने के मकसद से उठाए गए इस कदम से दरअसल एक लोकतांत्रिक देश के रूप में विदेश में देश की छवि पर इसका बुरा असर भी हो सकता है.

अमेरिका में रट्गर्स यूनिवर्सिटी में इतिहास की प्रोफ़ेसर ऑड्रे ट्रुश्के भारतीय इतिहास की एक विशेषज्ञ हैं और 2017 औरंगज़ेब पर आई उनकी किताब के बाद से वो भारत के अकादमिक हलकों में एक जानी-पहचानी हस्ती बन गई हैं.

उन्होंने सरकार के इस क़दम की कड़ी आलोचना की. उन्होंने ने बीबीसी से कहा, "वर्चुअल शैक्षिक इवेंट्स पर नए प्रतिबंध यह दर्शाते हैं कि भारतीय राज्य कमज़ोर, भयभीत और सत्तावादी है. एक समय था जब स्वतंत्र दुनिया को लगता था कि भारत कई लोकतांत्रिक मूल्यों के मामले में उनकी ही तरह है. लेकिन मुझे लगता है कि कई लोग अब इस पर दोबारा विचार कर रहे हैं"

विदेश मंत्रालय के परामर्श से शिक्षा मंत्रालय ने 15 जनवरी को संशोधित दिशानिर्देश जारी किए थे और वे तत्काल लागू हो गए.

भारत में अकादमिक समुदाय के भीतर भी मायूसी का संकेत हैं, इसे कई विद्वान की आधिकारिक सेंसरशिप के प्रयास के रूप में देख रहे हैं.

नरेंद्र मोदी

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मामले का दूसरा पक्ष

थिंक टैंक 'इंडिया फ़ाउंडेशन' के निदेशक आलोक बंसल कहते हैं कि सियासी मुद्दों पर ये निर्देश सरकारी संस्थाओं पर हमेशा से लागू रहे हैं. उनके अनुसार इसमें कोई नई बात नहीं है.

दिशानिर्देशों में संशोधन से आलोक बसंल पूरी तरह वाकिफ़ नहीं थे, लेकिन उनका मानना है कि "इसकी ज़रूरत इसलिए पड़ी क्योंकि कुछ अवसर पर भारत विरोधी एजेंडा वाले लोग सम्मेलनों में शामिल होते हैं, अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देशों में कुछ ऐसे तत्व हैं जो कश्मीर जैसे मुद्दे को ऐसे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में उठाने की कोशिश करते हैं."

बंसल कहते हैं, "कई ऐसे प्रोफ़ेसर हैं जो संवेदनशील मामलों पर भारत विरोधी माहौल बनाते हैं, निहित स्वार्थों से प्रेरित होकर भारत की आलोचना करने वाले इन लोगों की फंडिंग ऐसे देशों और ऐसे संस्थानों के ज़रिए होती है जो भारत का अहित चाहते हैं. इस निर्देश का मकसद ये है कि ऐसे लोग भारतीय अकादमिक संस्थानों पर असर न डाल सकें."

दिशानिर्देशों के अनुसार, ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति देते समय, सरकार सुनिश्चित करेगी कि विषय देश के पूर्वोत्तर राज्यों से संबंधित नहीं है जो उग्रवाद के लंबे इतिहास के कारण संवेदनशील माना जाता है और विषय केंद्र-शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और लद्दाख क्षेत्र से संबंधित नहीं है, जहाँ पिछले साल भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच झड़प हुई थी.

अगर इन विषयों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर के वेबिनार या सेमिनार हों तो सरकारी यूनिवर्सिटियों और संस्थाओं को विदेश मंत्रालय से इजाज़त लेनी होगी, इसके अलावा, वेबिनार या सेमिनार में भाग लेने वाले सभी विदेशी विद्वानों के नाम भी विदेश मंत्रालय से मंज़ूर कराने होंगे.

कार्टून

भारत की चिंता

लंदन की वेस्टमिंस्टर यूनिवर्सिटी की डॉक्टर निताशा कौल कहती हैं, "शैक्षिक स्वतंत्रता पर अंकुश लगाना, एक लोकतंत्र के रूप में, भारत की घरेलू वास्तविकता के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय छवि को भी प्रभावित करता है."

उनका तर्क ये है कि "सुरक्षा और आंतरिक मुद्दों पर बातचीत को सीमित करने का कदम आज की ऑनलाइन दुनिया में समझ में नहीं आता है."

वो कहती हैं, "फिर भी, वर्तमान सरकार ने हाल के वर्षों में असंतुष्टों को जेल भेजकर, सिविल सोसाइटी पर अंकुश लगाकर और बोलने की आज़ादी के ख़िलाफ़ कदम उठाकर लोकतंत्र के प्रति अवमानना के अलावा कुछ नहीं दिखाया है."

"यह शर्म की बात है कि दुनिया भर में सबसे अधिक विश्वविद्यालयों वाले देश में स्वतंत्र सोच और संवाद जैसे शैक्षिक सिद्धांतों को ताक पर रखा जा रहा है."

कार्टून

इस तरह के निर्देश चीन के बारे में पहले ही आ चुके थे. साल 2019 में यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यूजीसी) ने सरकारी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के लिए गाइडलाइंस जारी की थीं जिनके अनुसार इन्हें चीन की संस्थाओं से सहयोग करने से पहले गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय से अनुमति लेनी पड़ेगी.

जिन भारतीय संस्थानों ने इन गाइडलाइंस के जारी किए जाने से पहले से ही चीनी संस्थाओं से सहयोग कर रखा है उनसे कहा गया कि उन्हें गृह मंत्रालय से इसके लिए अनुमति हासिल करनी चाहिए और अनुमति मिलने से पहले किसी तरह की साझा गतिविधि नहीं करनी चाहिए.

दिलचस्प बात ये है कि ये निर्देश एक अक्टूबर को जारी किया गया था और 11-12 अक्टूबर को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच दक्षिण भारत में बैठक होनी थी. उस समय दोनों नेताओं के बीच संबंध बहुत मैत्रीपूर्ण दिख रहे थे.

ताज़ा निर्देश के बारे में विद्वान कहते हैं कि इससे यह निश्चित रूप से स्वतंत्र और स्पष्ट चर्चाओं पर प्रभाव पड़ेगा, इसके अलावा इससे भारतीय संस्थाओं, शोधकर्ताओं और विद्वानों के काम करने और आगे बढ़ने में रुकावट आएगी.

डॉक्टर निताशा कौल कहती हैं कि हांगकांग में चीनी राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की तरह इस तरीके से भारत में और भारत से संबंधित विदेशी विद्वानों के बीच सेल्फ़-सेंसरशिप को बढ़ावा मिलेगा.

डॉक्टर कौल का मानना है कि इस प्रकार विचारों और अनुसंधानों के निष्कर्षों के ईमानदार और स्पष्ट आदान-प्रदान पर रोक लगेगी.

नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग

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'भारत की अकादमिक अहमियत घटेगी'

प्रोफ़ेसर ऑड्रे ट्रुश्के औरंगज़ेब पर क़िताब लिखने के बाद भारत में विवादास्पद हो गईं और जब वो 2018 में हैदराबाद में एक सम्मेलन में बोलने के लिए खड़ी हुईं तो उन्हें बोलने नहीं दिया गया.

वो कहती हैं, "इन प्रतिबंधों का एक असर ये होगा कि अकादमिक दुनिया में भारत की अहमियत घटेगी और वो और अलग-थलग हो जाएगा."

कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी में इतिहासकार संजय सुब्रह्मण्यन ने एक भारतीय पत्रिका से कहा, "ये संशोधित गाइडलाइंस एक ग़लती है. इनसे भारत को कोई श्रेय नहीं मिलेगा, भारत के स्कॉलर्स अधिक दबाव में होंगे, भारत के बाहर काम करने वाले स्कॉलर्स को भारत में काम करने से हतोत्साहित किया जाएगा, जिस तरह से ईरान में लिया जा रहा है."

शिकागो यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर हेरल्ड गिंसबर्ग भारत में लोकतंत्र का सालों से अध्ययन करते आ रहे हैं और भारत के कई राज्यों और शहरों का दौरा करते रहे हैं.

उनका कहना है, "ये लोकतंत्र की भावना के विपरीत है."

वो हैरान हैं कि भारतीय मीडिया में इस पर चर्चा क्यों नहीं हो रही है. वो कहते हैं, "मीडिया और अकादमी वालों को डराने और दबाने की कोशिश लोकतंत्र के खिलाफ है और इसे ख़त्म करना ज़रूरी है"

थियानमेन स्क्वायर

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चीन का दबाव

प्रोफ़ेसर ऑड्रे ट्रुश्के को डर इस बात का है कि इन गाइडलाइंस के कारण भारत के विषयों पर काम करने वाले विदेशी स्कॉलर्स की भारत में रुचि धीरे-धीरे कम हो जाएगी. वे कहती हैं, "दीर्घकालिक रूप से, यह स्थिति पूरी तरह से लोगों को भारत से संबंधित विषयों का अध्ययन करने से दूर कर देगी."

डॉक्टर निताशा कौल के अनुसार भारत सरकार का नया क़दम इसके इस दावे के ख़िलाफ़ जाएगा कि वो भारत को विश्वस्तरीय शिक्षा का केंद्र बनाना चाहती है, क्योंकि ऐसा दुनिया भर के शिक्षण संस्थानों के साथ तालमेल के बिना संभव नहीं होगा.

प्रोफ़ेसर गिंसबर्ग का कहना है कि भारत की सुरक्षा को विद्वानों से कोई खतरा नहीं है. "हम जैसे लोग सालों से भारत जा रहे हैं, वहां की संस्कृति और लोगों से हमें लगाव है और हम भारत के लोकतंत्र और विविधता भरी संस्कृति पर गर्व करते हैं. लेकिन पिछले कुछ सालों से भारत बदलता जा रहा है. अमेरिका में हम जैसे भारत प्रेमी चिंता में हैं".

अमेरिका में यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर ज़ूम पर वेबिनार आयोजित करने वालों और चीन का अध्ययन करने वालों को अब इसी तरह की चुनौती का सामना करना पड़ता है क्योंकि वो चीन के बारे में वही पढ़ा सकते हैं जो चीन की कम्युनिस्ट सरकार चाहती है.

प्रोफ़ेसर गिंसबर्ग ने बताया कि चीन ये निर्देश देता है कि अगर आप ने चीन के वीगर मुसलमानों या त्यान आन मेन स्क्वायर में हुई हिंसा के बारे में पढ़ाने की कोशिश करेंगे तो उन्हें चीन आने का वीज़ा कभी नहीं मिलेगा और चीन की तरफ से यूनिवर्सिटी को मिलने वाला चंदा रोक दिया जाएगा.

वो कहते हैं, "हम चीन के विद्यार्थियों को खास तौर से पहले बता देते हैं कि चीन पर रिसर्च और अध्ययन जोखिम भरा काम है."

उनका कहना है कि उन्हें चीन के साथ भारत की तुलना करने पर दुख होता है लेकिन अफ़सोस है कि "भारत सरकार उसी रास्ते पर चलने की कोशिश कर रही है".

BBC ISWOTY

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