पीएम मोदी ने जिस हीरामन के शब्दकोश की चर्चा की, उसकी छपाई का क़र्ज़ नहीं उतर रहा

हीरामन

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    • Author, रवि प्रकाश
    • पदनाम, झारखंड से, बीबीसी हिंदी के लिए

बीबीसी पर हीरामन की इस ख़बर को पढ़ने के बाद उन्हें मदद मिलने लगी है. क्लिक करके पढ़ें.

'साथियों, आइए अब बात करते हैं झारखंड की कोरवा जनजाति के हीरामन जी की. हीरामन जी गढ़वा ज़िले के सिंजो गांव में रहते हैं. आपको यह जानकर हैरानी होगी कि कोरवा जनजाति की आबादी महज़ छह हज़ार है, जो शहरों से दूर पहाड़ों और जंगलों में निवास करती है.'

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2020 के अपने अंतिम रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' के दौरान 27 दिसंबर को हीरामन कोरवा की चर्चा की थी.

उन्होंने कहा था, 'अपने समुदाय की संस्कृति और पहचान को बचाने के लिए हीरामन जी ने एक बीड़ा उठाया है. उन्होंने बारह साल के अथक परिश्रम के बाद विलुप्त होती कोरवा भाषा का शब्दकोश तैयार किया है. उन्होंने इस शब्दकोश में घर-गृहस्थी में प्रयोग होने वाले शब्दों से लेकर दैनिक जीवन में इस्तेमाल होने वाले कोरवा भाषा के ढेर सारे शब्दों को अर्थ के साथ लिखा है. कोरवा समुदाय के लिए हीरामन जी ने जो कर दिखाया है वह देश के लिए एक मिसाल है.'

इसके बाद हीरामन सुर्ख़ियों में आ गए लेकिन हीरामन के पास इतने पैसे नहीं हैं कि उस शब्दकोश (जिसकी चर्चा प्रधानमंत्री ने की थी) की छपाई के लिए जो क़र्ज़ उन्होंने लिया है, उसे चुका सकें.

हीरामन पर अभी भी 32 हज़ार रुपये का उधार है. हीरामन और उनके दोस्त मनिकचंद कोरवा इन पैसों का इंतज़ाम करने में लगे हुए हैं. वो इस क़र्ज़ से आज़ादी चाहते हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, ''कार्यक्रम 'मन की बात' के बाद लोगों ने बधाई तो दी, लेकिन किसी ने एक बार भी यह नहीं पूछा कि छपाई के लिए पैसा कहां से आया...क़र्ज़ कितना है...''

हीरामन कोरवा ने बीबीसी से कहा, "कई सालों की मेहनत के बाद जब मैंने 4000 कोरवा शब्दों का हिंदी अर्थ लिखकर शब्दकोश तैयार कर लिया, तो उसे छपवाना हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती थी. इसको कौन छापेगा, कितने पैसे में छापेगा. हम सब दोस्त ये बातें करते थे. तब मल्टी आर्ट एसोसिएशन ने हमारी मदद की. इस संस्था के सचिव मिथिलेश जी ने शब्दकोश की छपाई के लिए डाल्टनगंज के सुनील प्रिंटर्स से बात की और इसकी छपाई में लगे 32 हज़ार रुपये का भुगतान भी किया.''

वो कहते हैं, "इसके बाद हमें शब्दकोश की 1000 प्रतियां मिलीं. तब मिथिलेश जी ने हमसे कहा कि किताबें बेचकर छपाई का पैसा वापस कर दीजिएगा, क्योंकि यह संस्था का पैसा है. हालांकि, उन्होंने इसके लिए कोई समय सीमा नहीं रखी, फिर भी हम लोग पैसे के इंतज़ाम की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि माथे पर क़र्ज़ लेकर ज़्यादा दिन तक रहना संभव नहीं है."

मानिकचंद

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कैसे करेंगे इंतज़ाम

हीरामन के दोस्त मानिकचंद कहते हैं, "मैं एक एनजीओ में काम करता हूं. मुझे पाँच छह हज़ार रुपये मिल जाते हैं. हीरामन कोरवा पारा टीचर हैं. उन्हें 12 हज़ार रुपये मिलते हैं. हमारे एक और दोस्त कमलेश ने भी मदद के लिए बोला है. हमलोग अपना पैसा मिलाएंगे. फिर शब्दकोश बेचकर पैसे जुटाएंगे. उसकी क़ीमत 100 रुपये है. अगर फिर भी पैसे पूरे नहीं हुए तो चंदा मांगकर छपाई के पैसे का इंतज़ाम कर लेंगे. लेकिन अभी तक हमलोगों ने किसी से पैसे माँगे नहीं हैं."

वो कहते हैं, ''शब्दकोश बेचकर अभी तक हमने सिर्फ़ 4000 रुपये जुटाए हैं. कुछ किताबें मुफ़्त में ही बाँट दी हैं. उम्मीद है कि किताब ख़रीदने के लिए और लोग आगे आएंगे और पैसे का इंतज़ाम हो जाएगा.''

हीरामन

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'मन की बात' लाइव नहीं सुन सके

हीरामन कोरवा के घर में न तो टेलीविज़न है और न रेडियो. इस कारण वे मन की बात का 27 दिसंबर का एपिसोड लाइव नहीं सुन सके. उनका बाहरी दुनिया से संपर्क का एकमात्र माध्यम वह सस्ता स्मार्ट फ़ोन है, जिसकी मेमोरी में उन्होंने 'मन की बात' के उस एपिसोड की क्लिपिंग सेव कर ली है, जिसमें प्रधानमंत्री ने उनके काम की चर्चा की है.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "मुझे पता नहीं था कि 'मन की बात' में मेरे बारे में बोला गया है. मेरे दोस्त और रिश्तेदार मानिकचंद ने मुझे फ़ोन करके कहा कि मोदीजी ने मेरे बारे में बोला है. तब मैं उनके गांव कुसमही गया. उन्होंने मुझे मोबाइल पर सुनाया, जो उन्हें भी किसी और ने भेजा था. इसके बाद मीडिया वाले मेरे घर आने लगे, तब मेरे घर और गांव के लोगों को पता चला कि प्रधानमंत्री ने मेरे शब्दकोश की चर्चा की है. फिर लोगों ने मोबाइल पर वह कार्यक्रम सुना. गांव में मोबाइल का नेटवर्क भी बहुत अच्छा नहीं है. इस कारण लोगों को काफ़ी दिक़्क़तें भी हुईं."

हीरामन का घर

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हीरामन कोरवा का गांव

35 साल के हीरामन कोरवा का गांव गढ़वा ज़िले के सुदूर रंका प्रखंड में जंगलों के बीच बसा है. वे पारा टीचर हैं और बिरसा आवास योजना के तहत बने अपने टूटे घर में रहते हैं.

अपने घर के इकलौते कमाऊ सदस्य होने के कारण उनके ऊपर अपनी पत्नी और पाँच बच्चों के अलावा पिता, भाई और बहन की भी ज़िम्मेदारी है.

पारा शिक्षक के मेहनताने के बतौर मिले 12 हज़ार रुपये से यह ख़र्च बमुश्किल चल पाता है. उनके गांव में कोरवा जनजाति के 70-80 घर हैं. इनमें से अधिकतर लोग खेती पर आश्रित हैं.

कोरवा जनजाति में सामूहिक खेती की परंपरा है. झारखंड में इन्हें आदिम जनजाति की श्रेणी में रखा गया है. मतलब ये विलुप्त हो रही जातियों की श्रेणी में हैं.

कोरवा

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कोरवा जनजाति की संख्या

झारखंड के गढ़वा, सिमडेगा और गुमला ज़िलों के अलावा छत्तीसगढ़ और दूसरे कुछ राज्यों में भी कोरवा जनजाति के लोग रहते हैं.

साल 2011 की जनगणना के मुताबिक़, झारखंड में इनकी संख्या 35,606 है. सबसे अधिक कोरवा लोग गढ़वा ज़िले में निवास करते हैं.

हालांकि प्रधानमंत्री ने मन की बात कार्यक्रम के दौरान कोरवा जनजाति की संख्या सिर्फ़ छह हज़ार बतायी थी.

प्रधानमंत्री तक कैसे पहुँचे हीरामन

हीरामन अपने शब्दकोश को लेकर जुनूनी हो चुके थे. वे रोज़ कुछ शब्दों को लिखते, उसका हिन्दी अर्थ तलाशते और फिर लेमिनेशन कराकर उसे रख लेते. स्थानीय मीडिया में इसकी चर्चा होने के बाद पलामू के बीजेपी सांसद और झारखंड के पूर्व डीजीपी विष्णु दयाल (बीडी) राम ने हीरामन कोरवा के बारे में जाना.

इसके बाद उन्होंने हीरामन कोरवा को मिलने के लिए बुलाया. तब हीरामन अपने दोस्त मनिकचंद के साथ उनसे मिलने पहुँचे और अपनी पूरी कहानी बतायी. बीडी राम इससे प्रभावित हुए और उन्होंने पिछले साल नवंबर में प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर हीरामन की कहानी 'मन की बात' में शामिल करने का अनुरोध किया.

कोरवा

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शब्दकोश की कहानी

हीरामन कोरवा ने बताया कि बचपन में वे अपनी दादी-दादा को कोरवा भाषा में बात करते सुनते, तो उसका मतलब नहीं समझ पाते थे. फिर वे अपनी मां से इसका अर्थ पूछते.

तभी उन्हें लगा कि अगर कोरवा शब्दों का हिंदी रुपांतरण कर शब्दकोश बनाया जाए, तो उनकी जनजाति के लोगों को पढ़ाई में सहूलियत होगी.

तभी से वे रोज़ कुछ न कुछ शब्दों के अर्थ लिखने लगे और उनका लेमिनेशन करा कर रखने लगे. क्योंकि, काग़ज़ पर लिखे कई शब्द फट या गल जाने के कारण बर्बाद हो चुके थे.

इसके बाद उन्होंने एक पूरी डायरी बना ली. दोस्तों की मदद ली और फिर 12 साल बाद उनका शब्दकोश छप सका.

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