बिहार में रोज़गार दिलाती नौवीं शताब्दी की कैथी लिपि

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- Author, सीटू तिवारी, पटना से
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
अस्सी साल के अनिल कुमार श्रीवास्तव अपने इलाक़े में मशहूर हैं.
बिहार के सीतामढ़ी ज़िले के हुमायूंपुर गांव के अनिल के मशहूर होने की वजह है कैथी लिपि.
वो कैथी लिपि के अनुवादक हैं जिसके चलते उनसे हर हफ़्ते लोग अपने ज़मीन से जुड़े पुराने दस्तावेज़ों का हिन्दी अनुवाद कराने आते हैं.
अनिल ने 1963 में पश्चिमी चंपारण में रहकर बीएससी की थी. उनकी दादी सूर्यमुखी कुंअर कैथी में ही उन्हें पत्र लिखती थीं.
अनिल बताते हैं, "दादी के पत्रों को पढ़ने के लिए मैंने कैथी सीखी जो आज मेरे लिए फ़ायदेमंद साबित हो रही है. मैं अपने चार बच्चों से भी कैथी सीखने के लिए कहता रहता हूं. क्योंकि मेरे बाद इस पूरे बाजपट्टी प्रखंड में शायद ही कोई कैथी पढ़ने वाला बचे."

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कैथी बन रही रोज़गार की लिपि
33 साल के गौतम भी कैथी अनुवादक हैं. भागलपुर के गौतम ने साल 2008 में बीकॉम करके प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी की.
लेकिन जब बात नहीं बनी तो साल 2013 से कैथी अनुवादक के तौर पर काम करना शुरू किया.
वो बताते हैं, "दादाजी डीड राइटर थे. हमारा ख़ानदानी पेशा पढ़ना-लिखना रहा. मैंने 2005 में अपने दादाजी के दोस्त मंगलचंद घोष से ये लिपि सीखी थी. सात साल बीत गए अनुवाद का काम करते हुए. व्हॉट्सऐप, ईमेल आदि माध्यमों से भागलपुर, पटना, सहरसा, मधेपुरा, पूर्णिया, गया ज़िलों से लोग अनुवाद के लिए अप्रोच करते हैं. कैथी के चलते मुझे इतनी पहचान मिली."
लेकिन कैथी से हिन्दी अनुवाद का रेट क्या है? इसका बहुत ठोस जवाब हमें अनिल और गौतम से नहीं मिलता.
अनिल के मुताबिक़, "जिसकी जैसी ख़ुशी होती है, वो अपने मन से रुपये दे देता है."
लेकिन नौजवान गौतम इस मामले में ज़्यादा पेशेवर हैं.
वो बताते है, "मैं अपना रेट काग़ज़ देखकर ही बताता हूं. जैसे रजिस्ट्री ऑफ़िस के अगर काग़ज़ हो तो पहले तीन पन्नों का 500 रुपये और उसके बाद के पन्नों का कैथी लिपि की लिखाई के हिसाब से तय होता है."

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क्या है कैथी लिपि?
कैथी लिपि के जानकारों की मानें तो गुप्त साम्राज्य में जब शासन का विकेन्द्रीकरण हुआ तो कैथी लिपि विकसित हुई.
पूर्वी बंगाल, छत्तीसगढ़, नेपाल के कुछ इलाक़ों, झारखंड, उत्तरप्रदेश सहित कई राज्यों में ये लिपि विकसित हुई. छठी से दसवीं शताब्दी के बीच कैथी विकसित हुई और इसने 'जन लिपि' का दर्जा प्राप्त कर लिया. बाद में अफ़ग़ानी शासक शेरशाह सूरी ने इसे न्यायालय की लिपि यानी 'कोर्ट स्क्रिप्ट' के तौर पर मान्यता दी.
'कैथी लिपि का इतिहास' के लेखक भैरव लाल दास बताते हैं, "कैथी लिपि ने छठीं शताब्दी में आकार लेना शुरू कर दिया था लेकिन बहुत ठोस रूप में वो नौवीं शताब्दी में दिखती है. शेरशाह ने इसे अपनी मुहर में जगह दी और कोर्ट स्क्रिप्ट के तौर पर कैथी लिपि को मान्यता मिलने के चलते ज़मीन की ख़रीद बिक्री के काग़ज़ात कैथी लिपि में लिखे जाने लगे. बिहार के न्यायालयों में ये सिलसिला 70 के दशक तक चला. स्कूल की बात करें तो 1930 के बाद स्कूलों में कैथी की पढ़ाई ख़त्म होनी शुरू हो गई."
वहीं 'कैथी लिपि: एक परिचय' के लेखक ध्रुव कुमार बताते हैं, "गुप्त काल में एक वर्ग जो राजा के यहां गणक सह लिपिक (एकांउटेंट- क्लर्क) की नौकरी करते थे. वो 'कायस्थ' कहलाते थे. इन कायस्थों ने राजा के आदेश को लेने के लिए शार्ट हैंड का इस्तेमाल करते है जो कैथी लिपि थी. बाद में यहीं कायस्थ संगठित होकर एक जाति में तब्दील हुए."
राज्य में 60 फ़ीसद अपराध की वजह भूमि विवाद
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बार-बार ये दोहराते रहे हैं कि राज्य में 60 फ़ीसद से ज़्यादा अपराध की वजह भूमि विवाद है. भूमि विवाद की एक वजह ये भी है कि ये दस्तावेज़ कैथी लिपि में लिखे हुए है.
पटना हाईकोर्ट एडवोकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष योगेश चन्द्र वर्मा ने बीबीसी हिंदी को बताया, "कैथी पढ़ने वाले हैं ही नहीं और सारे पुराने काग़ज़ कैथी में है. नतीजा ये कि ना तो जज समझ पाते हैं और ना वकील कि आख़िर डॉक्यूमेंट में क्या लिखा है. इसके लिए एक्सपर्ट की मदद ली जाती है लेकिन वो भी लगातार कम हो रहे हैं."
हालांकि ऐसा नहीं है कि ये परेशानी सिर्फ़ बिहार में हो रही है. नीलेश कुमार सिंह उत्तरप्रदेश के मिर्ज़ापुर के कछवा गांव के रहने वाले हैं. उन्होंने बीबीसी को फ़ोन पर बताया कि उनकी ज़मीन के काग़ज़ात साल 1917 के थे और कैथी लिपि में लिखे हुए थे. कुछ साल पहले जब उन्होने गांव में घर बनवाना शुरू किया तो उनके चचेरे भाइयों से विवाद शुरू हो गया.
नीलेश बताते हैं, "हमारे पूरे मिर्ज़ापुर में कैथी पढ़ने वाला कोई नहीं था. मेरे सामने वाली पार्टी कैथी लिपि का ग़लत अनुवाद करा लाई थी. जिसके बाद मैंने इंटरनेट पर ढूंढ़ा तो मालूम चला कि पटना में कुछ लोग कैथी अनुवाद कर रहे हैं. ये अनुवादक मेरे लिए भगवान जैसे साबित हुए और मुझे मेरी ज़मीन का पूरा हक़ कोर्ट से मिला."
कैथी के रिसर्चर और पटना हाईकोर्ट के वकील रूदल प्रसाद ने नीलेश के मामले में अहम भूमिका निभाई. वो बताते हैं, "ज़मीन के मुक़दमों की बाढ़ आई हुई है और इसकी वजह डॉक्यूमेंट का कैथी में होना है. लेकिन सरकार इसको लेकर बहुत उदासीन है."

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कैथी की कार्यशालाएं
हालांकि साल 2010 के बाद से ही कैथी को लेकर बिहार के अलग अलग हिस्सों में कार्यशालाएं आयोजित की जा रही है. भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर और मैथिली साहित्य संस्थान कैथी और मिथिलाक्षर सिखाने की कार्यशालाएं लगातार करा रहा हैं.
कल्पना कुमारी 2017 से कैथी कार्यशालाओं में बतौर अध्यापक काम कर रही हैं. उन्होंने ख़ुद साल 2011 में कैथी सीखी.
बकौल कल्पना, " कैथी लिपि सीखने वालो की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है और मेरी क्लास में नब्बे साल के आदमी से लेकर बीस साल के कॉलेज स्टूडेंट तक आते हैं. वकील, शिक्षक, मुंशी के अलावा ऑर्केलॉजी के स्टूडेंट इस लिपि में ख़ास दिलचस्पी दिखा रहे हैं."
कैथी के महत्व को देखते हुए कई लोग अपने बच्चों को इन कार्यशालाओं में भेज रहे हैं.
पटना नगर निगम के कर्मचारी विनय कुमार कैथी के जानकार हैं. वो बताते हैं कि निगम के सभी पुराने रिकार्ड कैथी में हैं लेकिन कैथी पढ़ने वाला कोई कर्मचारी नहीं बचा.
उन्होंने बताया, "मैंने ख़ुद 2011 में अपने शौक़ के लिए कैथी सीखी और अब लोग काग़ज़ पढ़वाने के लिए ढूंढ़ते ढूंढ़ते आते हैं. इसके महत्व को देखते हुए मैंने अपने चारों बच्चों को कैथी में ट्रेन किया."

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महात्मा गांधी की डायरी में कैथी
1917 में महात्मा गांधी को चंपारण लाने वाले राजकुमार शुक्ल की डायरी कैथी में है जिसका अनुवाद रिसर्चर भैरव लाल दास ने किया है. पत्रकार- लेखक अरविंद मोहन की किताब "मि. एम.के.गांधी की चंपारण डायरी" में भी कैथी की ज़िक्र है.
महात्मा गांधी 14 अप्रैल, 1917 को लिखी अपनी डायरी में लिखते है, "मुझे हिंदी बोलने में दिक़्क़त होती है और न भोजपुरी आती है, न कैथी लिपि ही, जिसमें सारे दस्तावेज़ हैं. इसे जानने वाले सहयोगी चाहिए."
रिसर्चर और लेखक भैरव लाल दास बताते हैं, "लगभग 1000 साल तक कैथी जन लिपि या लोक लिपि रही. सरकार के वो सभी दस्तावेज़ जिनका संबंध लोगों से था वो सभी कैथी में लिखे गए. हमारे सभी आइकॉन चाहे वो भिखारी ठाकुर हो या फिर बाबू वीर कुंअर सिंह, सबकी हस्तलिखित रचनाएं या हुक्मनामे आपको कैथी में मिलेंगे."
"राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद अपनी पत्नी को कैथी में लिखते थे. ग्रियर्सन के लिंग्विस्टक सर्वे में भी कैथी है. गिरमिटिया मज़दूर बिहार यूपी से मारीशस, त्रिनिदाद, सूरीनाम आदि गए उनके पत्र भी कैथी में है. यानी अपने इतिहास को जानने-समझने और उसका फर्स्ट हैंड अकांउट पाने के लिए ये लिपि ज़रूरी है."
दिलचस्प है कि जहां एक तरफ़ राज्य की सभी यूनिवर्सिटी में भाषाओं की पढ़ाई करने के लिए छात्र बहुत कम संख्या में दाख़िले ले रहे हैं, वहीं मुंगेर और पटना विश्वविद्दालय ने कैथी लिपि की पढ़ाई शुरू करने में दिलचस्पी दिखाई है.
कैथी लिपि के जानकारों की ज़रूरत का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि यू ट्यूब पर कैथी लिपि सिखाने के लिए कई चैनल और कैथी अनुवादकों के इंटरव्यू मौजूद हैं.
लेकिन क्या कैथी सीख लेने भर से ही आप इसे पेशेवर तरीक़े से अपना सकते हैं?
कैथी लिपि पढ़ाने वाली कल्पना कुमारी इसका जवाब देती हैं, "अगर आप कैथी के सांस्कृतिक पक्ष के बजाए इसे ज़मीनी दस्तावेज़ पढ़ने के पक्ष से देखते हैं तो आपको ज़मीन के दस्तावेज़ लिखने के सारे गुण भी सीखने होंगे. बिना इसके काम नहीं चलने वाला."
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