बिहार में 'धान का कटोरा' कहलाने वाले इलाके में किसानों की मुश्किल

इमेज स्रोत, Seetu Tiwari
- Author, विष्णु नारायण
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए , पटना से
बिहार में धान की उपज के लिए चर्चित इलाक़ों में है कैमूर ज़िले का मोकरी और बेतरी गांव. यहां उपजने वाले महीन और सुगंधित चावल (गोविंदभोग) को उम्दा माना जाता है. लेकिन यहां के किसान एमएसपी से कम क़ीमत पर अपना धान बेचने को मजबूर हैं.
मोकरी गांव के किसान सिंह ने पिछले साल 400 क्विंटल धान 1350 रुपये प्रति क्विंटल के दर से बेचा. जबकि बीते वर्ष सरकार की ओर से तय किया गया एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) 1815 रुपये था. इस बार भी स्थितियां बहुत बदलती नहीं दिखतीं.
उन्होंने कहा, "विपक्ष के शोरग़ुल और दबाव से भले ही क्रय केन्द्र खुल गए हों लेकिन कहीं कोई ख़रीद अब तक शुरू नहीं हुई है और एमएसपी पर भुगतान मिलना तो बहुत दूर की बात है."
दिल्ली की सीमा पर डेरा डाले किसानों और सरकार के बीच जारी गतिरोध ने एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य और एपीएमसी एक्ट (एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमिटी ऐक्ट) यानी 'कृषि उपज और पशुधन बाज़ार समिति' अधिनियम जैसे शब्दों को घर-घर तक पहुंचा दिया हो लेकिन एपीएमसी को बिहार में ख़त्म हुए लगभग 14 साल हो चुके हैं. बिहार में इसकी जगह सहकारी समितियों को पैक्स के ज़रिए फ़सल ख़रीदने का विकल्प मुहैया ज़रूर कराया गया लेकिन इन केंद्रों में बिहार के किसानों से फ़सल की सरकारी ख़रीद मुश्किल से हो पाती है.

इमेज स्रोत, BBC/Vishnu Narayan
रोहतास ज़िले के नासरीगंज ब्लॉक के बरडीहा गांव के रहने वाले उमेश सिंह के पास पाँच बिगहा ज़मीन है.
वे कहते हैं, "देखिए किसी भी आम आदमी के लिए पैक्स में बेचना संभव नहीं. अधिकांश किसान बनिया या बिचौलियों को ही अपना धान या अन्य अनाज बेचते हैं. जैसे बीते वर्ष एमसएसपी 1815 रुपये था लेकिन मैंने 17 से 18 क्विंटल धान 1300 रुपये प्रति क्विंटल की दर से बेचा, अन्य किसानों ने तो 1200 रुपये प्रति क्विंटल भी धान बेचा और तौ और पैसे मिलने में कई बार महीनों का इंतज़ार करना पड़ता है."
कैमूर ज़िले की रामगढ़ से विधायक धान ख़रीद के मसले पर सवाल उठाने वाले राष्ट्रीय जनता दल के नेता सुधाकर सिंह कहते हैं, "इस पूरे इलाक़े या फिर कहें कि पूरे राज्य के भीतर धान ख़रीद में व्याप्त भ्रष्टाचार भी एक मसला है लेकिन अभी हम जल्द से जल्द धान की ख़रीद करवाने के लिए आंदोलनरत हैं. इस इलाक़े (कैमूर, रोहतास, बक्सर, आरा और औरंगाबाद शामिल) में धान सरपप्लस में होता है इसलिए हमारी सरकार से माँग है कि बिहार में धान ख़रीद का कुल 50 फ़ीसद हिस्सा यहां से ख़रीदा जाए."

इमेज स्रोत, SEETU TEWARI
शाहाबाद में धान की उपज और सरप्लस के सवाल पर पत्रकार कन्हैया भेलारी कहते हैं, "सोन नदी के जलग्रहण वाले इस इलाक़े की मुख्य उपज धान है और धान इस इलाक़े में वाक़ई सरप्लस में होता है. यहां की मिट्टी और आबोहवा भी धान उपज के लिहाज़ से मुफ़ीद है. धान ही इस इलाक़े की इकोनॉमी का केंद्रबिंदु भी है. सरकार की ओर से पटवन की तमाम परियोजनाएं भी इसी के मद्देनज़र शुरू की गईं. चाहे इंद्रपुरी बराज हो या फिर दुर्गावती जलाशय परियोजना."
हालांकि सरप्लस उपज के बावजूद इस पूरे इलाक़े में सरकार वैसी ख़रीद नहीं कर पा रही और न ही किसानों को एमएसपी मिल पा रहा.
सरप्लस उपज और ख़रीद के बीच तालमेल के अभाव पर सुधाकर सिंह कहते हैं, "बिहार के किसी भी हिस्से में चावल मुख्य खाद्य पदार्थ है. यहां हरियाणा और पंजाब की तरह किसान धान सिर्फ़ बेचने के लिए नहीं उपजाते. अंतर की बात करें तो अकेले कैमूर में धान की कुल उपज सात लाख मीट्रिक टन है. एक लाख मीट्रिक टन कैमूर खपत करता है और बाक़ी का 6 लाख मीट्रिक टन सरप्लस है. सरकार ने ख़रीद का लक्ष्य 4 लाख मीट्रिक टन रखा है. तो अंतर हुआ बाक़ी का बचा दो लाख मीट्रिक टन."
हालांकि एक सवाल यह है कि सरकार ने जो लक्ष्य रखा है वह धान भी वो ख़रीद पाती है या नहीं.
एपीएमसी के ख़ात्मे के बाद अस्तित्व में आया पैक्स कितना कारगर?
बिहार में एपीएमसी एक्ट साल 2006 में ख़त्म हुआ और उसके बाद से सरकार ने अनाज ख़रीद के लिए पैक्स और व्यापार मंडल को मज़बूत किया. पैक्स (PACS) यानी प्राइमरी एग्रीकल्चरल क्रेडिट सोसाइटी.
यह बिहार में ग्राम पंचायत और ब्लॉक स्तर पर काम करने वाला सहकारी संगठन है. राज्य में धान या अन्य अनाजों की ख़रीद करने वाली मुख्य एजेंसी यही है.
क्या पैक्स के माध्यम से अनाज का ख़रीद सफल मॉडल है? इस सवाल के जवाब में बिहार के भीतर खेती-किसानी के सवाल पर संघर्ष करने वाली जन जागरण शक्ति संगठन के उपाध्यक्ष कृष्ण कुमार सिंह कहते हैं, "देखिए बाज़ार समितियों के ख़त्म होने के बाद तो किसान और तबाह हो गया. आज किसान को धान बनिया के हाथों 1000 से 1300 रुपये क्विंटल तक बेचना मजबूरी है, क्योंकि रबी की बुआई का सीज़न भी सामने है. पैक्स के माध्यम से तुरंत भुगतान भी नहीं होता."

इमेज स्रोत, BBC/Vishnu Narayan
पटना ज़िले के पालीगंज ब्लॉक के पैक्स अध्यक्ष सुमेर सिंह कहते हैं, "हमलोगों को किसानों से धान ख़रीदने में सबसे बड़ी बाधा नमी की होती है. हमें 17 प्रतिशत से नीचे नमी वाला धान लेना है लेकिन अभी जो धान किसानों के पास है उसमें 22 प्रतिशत से 30 प्रतिशत तक नमी है. इतनी नमी वाले धान का चावल बनाकर रखने पर चावल की क्वालिटी में ख़राबी आ जाती है. हम नमी कम होने के इंतज़ार में हैं, राशि का भी अभाव होता है. अभी को-ऑपरेटिव बैंक से 27 लाख का लोन मिला है.
27 लाख के धान के ख़रीद और उसके कुटाई के चावल को एसएफ़सी को देने के एक माह के बाद हमें एसएफसी पैसा देगी. जब तक पैसा मिलेगा नहीं तब तक हमारे लिए भी दूसरी ख़रीद संभव नहीं. पैक्स के पास गोदामों का भी अभाव है. अच्छा होता कि पैक्स के साथ-साथ सरकार की दूसरी एजेंसियां जैसे बिस्कोमान, एसएफ़सी और एफ़सीआई के पास भी अनाज ख़रीद के अधिकार होते."

इमेज स्रोत, Getty Images/HINDUSTAN TIMES
क्या कहते हैं आंकड़े?
यदि धान ख़रीद के लिहाज़ से सहकारिता विभाग, बिहार सरकार की ओर से जारी किए गए बीते वर्ष के आंकड़ों पर ग़ौर करें तो पूरे बिहार में 8463 पैक्स और 521 व्यापार मंडल हैं. सरकार इन्हीं के माध्यम से धान या अन्य फ़सलों की सरकारी ख़रीद को सुनिश्चित करती है. अब यदि समूचे बिहार में साल 2019-20 के लिहाज़ से पैक्स और व्यापार मंडलों में रजिस्टर्ड किसानों के आंकड़ों पर ग़ौर करें तो इनकी संख्या 2,79,426 है.
ज़ाहिर तौर पर पैक्स और व्यापार मंडल जैसे संगठनों ने इन्हीं किसानों से धान की कुल ख़रीद काग़ज़ पर भी दिखाया. यहां हम आपको यह भी बताते चलें कि इन तमाम किसानों से ख़रीदा गया कुल धान 20,01,664.42 मीट्रिक टन था. सहकारिता विभाग की ओर से बीते वर्ष की गई धान की कुल ख़रीद पर राजद विधायक सुधाकर सिंह कहते हैं, "देखिए जब सरकार ही कहती है कि बिहार में धान की कुल उपज लगभग एक करोड़ मीट्रिक टन है तो फिर लगभग 20 लाख मीट्रिक टन की ख़रीद क्यों हुई? इसके अलावा जब 10 लाख से भी अधिक किसान फ़सलों का सरकारी बीमा करा रहे हैं तो फिर लगभग पौने तीन लाख किसान ही क्यों सहकारिता विभाग के पास रजिस्टर्ड हैं?"
बात अगर इस वर्ष के रजिस्ट्रेशन की करें तो साल 2020-21 के लिहाज़ से अभी किसानों ने ख़ुद को सहकारिता विभाग की वेबसाइट पर रजिस्टर करना शुरू किया है. पूरे सूबे से अब तक सिर्फ़ 40,597 किसानों ने ख़ुद को रजिस्टर किया है और 3,13,378.573 मीट्रिक टन की ख़रीद हो सकी है.
बिहार सरकार की ओर से धान की सरकारी ख़रीद की व्यवस्था के सरकारी आंकड़ों से स्पष्ट है कि बिहार में क़रीब पौने तीन लाख किसानों को ही इस व्यवस्था का लाभ मिलता है, बाक़ी के लाखों किसान, बनियों और बिचौलियों की तय की गई क़ीमतों पर धान को बेचने को मजबूर हैं. धान की फ़सल बेहद उन्नत है तो 1200 रुपये से 1300 रुपये प्रति क्विंटल की दर मिल जाती है, नहीं तो आठ सौ या नौ सौ रुपये प्रति क्विंटल की दर पर भी लोग बेचने के मजबूर होते हैं.

इमेज स्रोत, GETTY IMAGES
दिल्ली-हरियाणा बॉर्डर पर कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ चल रहे प्रदर्शनों के एक माह पूरे होने वाले हैं. लेकिन इस गतिरोध में बिहार के किसान कहीं नज़र नहीं आते हैं. वहीं बिहार के कृषि मंत्री अमरेंद्र प्रताप सिंह ने हाल ही में किसान आंदोलन को महज़ 'मुट्ठी भर दलालों' का आंदोलन बताते हुए कहा कि बिहार समेत देश के तमाम गांवों में इन क़ानूनों का स्वागत हो रहा है.
वहीं जनता दल यूनाइटेड (यू) के प्रवक्ता राजीव रंजन के अनुसार बिहार का कृषि मॉडल पूरे देश के लिए नज़ीर है, इसलिए भी बिहार में कहीं कोई किसान आंदोलन नहीं हो रहे.
सरकारी दावों से इतर हक़ीक़त यही है कि बिहार किसान इस पूरे गतिरोध के बीच कहीं का नहीं है क्योंकि यहां न हरियाणा और पंजाब की तरह किसान संगठनों की मज़बूती है और न मंडियां ही हैं कि किसान कहीं भी मोलभाव करके बेच सके और न अनाज ख़रीद के लिए सूबे में बनाया गया तंत्र ही इतना पारदर्शी और प्रभावी है जिससे किसानों की आमदनी बढ़े. ग़ौर करने की बात यह भी है कि बिहार के किसानों की औसत आमदनी पूरे देश में सबसे कम है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)














