चीन से निर्वासित तिब्बत की सरकार के लिए चुनाव कैसे होता है?

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- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
निर्वासन में तिब्बत की संसद के चुनाव में 'सिकयोंग' या राष्ट्रपति के पद के लिए अब तक के सबसे ज़्यादा सात उम्मीदवार मैदान में हैं जबकि 45 'चीथयूज़' यानी संसद की सीटों के लिए कई उम्मीदवार भी हैं जो संसद का सदस्य बनने के लिए चुनाव लड़ रहे हैं.
इससे पहले कुल आठ लोगों ने सिकयोंग के पद के लिए चुनाव लड़ा था मगर 'सेंट्रल टिब्बेटन एडमिनिस्ट्रेशन' की मीडिया संयोजक ल्हाकपा डोल्मा ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि एक उम्मीदवार ने अपना नामांकन वापस ले लिया है जिसकी वजह से 'सिकयोंग' के पद के लिए अब सात उम्मीवार मैदान में हैं.
जो लोग मैदान में हैं उनमें बौध धर्मगुरु दलाई लामा के दिल्ली में प्रतिनिधि डोंगचुंग नगोडुप, संसद के पूर्व अध्यक्ष पेन्पा सेरिंग, पूर्व उपाध्यक्ष डोल्मा गायरी, उत्तरी अमेरिका में दलाई लामा के प्रतिनिधि केलसंग दोरजी, आचार्या येशी, लोबसंग न्यंडक और ताशी तोप्ग्याल शामिल हैं.
निर्वासन में तिब्बत की संसद को वैसे तो भारत सहित किसी भी देश ने मान्यता नहीं दी है, मगर इसके चुनावों की प्रक्रिया बड़ी रोचक है जो, जानकारों के अनुसार, एक मज़बूत लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं. ये भी माना जा रहा है कि तिब्बत की इस संसद के चुनावों की प्रक्रिया के बाद भारत और चीन के बीच संबंध और भी ख़राब हो सकते हैं.
पाँचवें सीधे चुने जाने वाले 'सिकयोंग' और निर्वासन में तिब्बत की 17वीं संसद के चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो गयी है और इसके तहत पहले चरण का मतदान तीन जनवरी को हो चुका है. अगले चरण का मतदान 11 अप्रैल को होगा.

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हिमाचल प्रदेश में है मुख्यालय
डोल्मा कहती हैं कि 'सेंट्रल टिब्बेटन एडमिनिस्ट्रेशन' के चुनाव आयोग के अनुसार इस बार चुनावी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए पूरे विश्व भर से 80 हज़ार से ज़्यादा तिब्बती शरणार्थियों ने ख़ुद को पंजीकृत कराया है.
निर्वासन की इस तिब्बती संसद के चुनाव दो चरण में होते हैं. पहला प्रारंभिक और दूसरा मुख्य. प्रारम्भिक चरण के मतदान में 'सिकयोंग' पद के किसी उम्मीदार को अगर 60 प्रतिशत मत या उससे ज़्यादा मिलते हैं तो फिर दूसरे चरण का मतदान नहीं होगा. शुरुआती चरण के मतदान का नतीजा आठ फ़रवरी को घोषित किया जाएगा.
जबकि 11 अप्रैल को होने वाले मतदान का परिणाम 14 मई को घोषित किया जाएगा. संसद का कार्यकाल पाँच सालों का होता है और फ़िलहाल इसका मुख्यालय हिमाचल प्रदेश के धरमशाला में है.
'तिब्बत पॉलिसी इंस्टिट्यूट' के निदेशक टेनजिंग लेक्शय ने बीबीसी से चुनावों के बारे में चर्चा करते हुए कहा कि इस संसद के हर बार चुनाव से ठीक पहले मतदाताओं को अपना पंजीकरण कराना होता है. जो पंजीकृत मतदाता होते हैं सिर्फ़ वो ही अपना वोट डाल सकते हैं.
'आज़ाद तिब्बत' की नागरिकता
उनका कहना है कि पूरे विश्व में तिब्बती शरणार्थी हैं लेकिन वो लोग सिर्फ़ अपने क्षेत्र के उम्मीदवार को ही मत डाल सकते हैं. उनका ये भी कहना था कि हर मतदाता दस वोट डाल सकता है जिसमें उसे दो वोट अनिवार्य रूप से महिला उम्मीदवारों को देना है.
वो कहते हैं कि अगर दस वोटों से कम वोट कोई मतदाता डालता है तो उस पर फिर महिलाओं को वोट देना अनिवार्य नहीं होगा.
इस चुनावी प्रक्रिया का दूसरा अहम पहलू ये है कि वोट डालने और चुनाव लड़ने का अधिकार सिर्फ़ उन तिब्बती शरणार्थियों को होता है जिनके पास 'सेंट्रल टिब्बेटन एडमिनिस्ट्रेशन' द्वारा जारी की गई 'ग्रीन बुक' होती है.
ये बुक या पुस्तिका एक पहचान पत्र की तरह है और ये सिर्फ़ उन्हीं को मिलती है जो 'सेंट्रल टिब्बेटन एडमिनिस्ट्रेशन' को नियमित रूप से टैक्स देते रहते हैं. इस 'ग्रे बुक' के होने का मतलब है 'आज़ाद तिब्बत' की नागरिकता होना.

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तिब्बत की निर्वासन वाली सरकार
निर्वासन में तिब्बत की संसद के मौजूदा 'सिकयोंग' यानी राष्ट्रपति लोबसंग सांग्ये अपने पद पर पिछले दस सालों से हैं इसलिए वो इस बार चुनाव नहीं लड़ सकते. टेनजिंग लेक्शय बताते हैं कि वर्ष 2011 से पहले और वर्ष 1960 से दलाई लामा अपने प्रतिनिधि चुनते थे.
मगर लगभग 2011 से उन्होंने ऐसा करना बंद करने की घोषणा करते हुए चुने गए नेता को ये अधिकार दे दिया. ये चुनाव तिब्बत की निर्वासन वाली सरकार द्वारा तय किये गए 'चार्टर' या संविधान के हिसाब से ही होते हैं जिसका संशोधन पिछले साल किया गया है.
ये संविधान साल 1990 में बना और वर्ष 1991 में इसे तिब्बत की निर्वासन वाली संसद ने अनुमोदित कर दिया. संविधान में तीनों अंगों यानी विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के अधिकारों को अलग अलग रखा गया है.
संशोधन के बाद कोई भी ग़ैर-सरकारी संगठन यानी एनजीओ चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा नहीं ले सकता है. पहले ऐसा नहीं था.

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तिब्बती बौद्ध धर्म
टेनजिंग लेक्शय कहते हैं, "लोकतंत्र की इससे बेहतरीन मिसाल क्या हो सकती है कि इस चुनाव में किसी राजनीतिक दल का कोई लेना देना नहीं है. सिर्फ़ व्यक्ति ही चुनाव लड़ते हैं. जो योग्य उम्मीदवार होगा, वही चुनाव लड़ सकता है और जीत सकता है."
निर्वासन में तिब्बत की संसद के चुनावों के प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है कि बौद्ध भिक्षुओं को दो वोट डालने के अधिकार मिलते हैं. एक अपने प्रांत के लिए और दूसरा अपने धार्मिक पंथ के लिए.
मिसाल के तौर पर डोल्मा कहती हैं कि मुख्यतः तीन प्रान्तों का प्रतिनिधित्व इस संसद में है. जैसे - दोहोते, धूमे और यु-सांग प्रांत. इस प्रान्तों के लिए दस दस सीटें आरक्षित की गई हैं. उसी तरह तिब्बती बौद्ध धर्म के चारों केन्द्रों को भी दो दो सीटों का आरक्षण देने की व्यवस्था की गयी है. इनमे बौद्ध धर्म के पूर्व कार की व्यवस्था यानी बॉन अविलाम्बी भी शामिल हैं.
इसके अलावा उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका से एक-एक प्रतिनिधि, यूरोप से दो और ऑस्ट्रेलिया और एशिया से एक-एक प्रतिनिधि के लिए आरक्षण के व्यवस्था है.
इस संसद में चुने गए मंत्रिमंडल को 'कशाग' कहा जाता है जिसमें सात सदस्य होते हैं और इसके मुखिया 'सिकयोंग' यानी शरणार्थियों द्वारा सीधे चुने गए राष्ट्रपति होते हैं. वो सिकयोंग ही हैं जो अपने सात 'कालोन' यानी मंत्रियों को नियुक्त करते हैं.
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