नेपाल के सियासी संकट से क्या चीन को ख़ाली हाथ लौटना पड़ा?

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- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
नेपाल में पैदा हुए राजनीतिक संकट के बीच चीन के प्रतिनिधिमंडल का दौरा चर्चा का विषय बना हुआ है.
पिछले महीने नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने नेपाल की संसद को भंग करने का विवादित फ़ैसला लिया था. ओली ने इस साल अप्रैल महीने में फिर से चुनाव कराने की बात कही है.
नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर पैदा हुए मतभेद के बाद नेपाल में राजनीतिक संकट गहरा गया है. इन सबके बीच चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के अंतरराष्ट्रीय मामलों के विभाग में उप-मंत्री के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल नेपाल आया. कहा जा रहा है कि चीन नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन से ख़ुश नहीं है और वो चाहता है कि प्रचंड-ओली फिर से एक साथ आ जाएं.
लेकिन ऐसा होता दिख नहीं रहा. ओली ने बुधवार को कहा कि वो प्रचंड से समझौता करते-करते थक गए हैं जबकि चीनी प्रतिनिधिमंडल ने पीएम ओली से भी मुलाक़ात की थी.
चीनी प्रतिनिधि मंडल ने नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के पुष्प कमल दहाल 'प्रचंड' और माधव नेपाल से भी बातचीत की. ओली और प्रचंड के बीच नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी दो हिस्सों में बँट गई है. दोनों धड़ों ने निर्वाचन आयोग में पार्टी पर अपना-अपना दावा पेश किया है.
कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं के अलावा चीन के प्रतिनिधिमंडल ने नेपाल के कुछ अन्य नेताओं से भी बात की, जिनमें नेपाली कांग्रेस के शेर बहादुर देउबा और जनता समाजवादी पार्टी के नेता बाबूराम भट्टराई भी शामिल हैं.
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काठमांडू में अपनी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए ओली ने विरोधी गुट के नेताओं की निंदा की और कहा कि वे उन्हें पार्टी और सरकार चलाने में सहयोग नहीं करते.
उन्होंने प्रचंड पर कई समझौते तोड़ने का आरोप लगाया.
उन्होंने कहा, "प्रचंड जी नेपाली कांग्रेस के साथ सरकार बनाने की बातें कर रहे थे और उसी वक़्त मेरे साथ भी मोलभाव कर रहे थे. जबकि हम चुनावी गठबंधन बना कर ही जीते थे. अब मैं उनके साथ समझौते करके थक चुका हूँ."

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ओली ने कहा कि अगर वो संसद भंग करने की सिफ़ारिश नहीं करते, तो प्रचंड और विरोधी गुट के नेता उनके ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव और राष्ट्रपति के ख़िलाफ़ महाभियोग का प्रस्ताव ला रहे थे.
उन्होंने ये भी कहा कि नेपाल के संविधान के हिसाब से एक बार संसद को भंग करने का प्रस्ताव अगर भेज दिया जाता है, तो उस पर पुनर्विचार नहीं हो सकता.

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हालाँकि इस मामले को लेकर नेपाल के सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएँ दायर हुई हैं, जिन पर जल्द सुनवाई होने वाली है.
2018 में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को ही ओली और प्रचंड को साथ लाने का श्रेय दिया जाता है.
वर्ष 2017 में हुए आम चुनावों में केपी शर्मा ओली वाली नेपाल की कयुनिस्ट पार्टी (एकजुट मार्क्सवादी-लेनिनवादी) और प्रचंड की नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने एक साथ चुनावी मैदान में थीं. इस गठबंधन को नेपाल की संसद में दो तिहाई बहुमत भी मिला. अगले साल दोनों ही दलों का विलय चीन की पहल पर हो गया था.
नेपाल की राजधानी काठमांडू में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार युवराज घिमिरे ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि इस पूरे प्रकरण में चीन की कोशिश नाकाम रही और उसे कुछ भी हासिल नहीं हुआ.

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वो कहते हैं "चीन इस ख़ुशफ़हमी में था कि कम्युनिस्ट पार्टी के सभी धड़े उसकी बात मान लेंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. भारत विरोधी माने जाने वाले केपी ओली भी चीन की बातों में नहीं आए और ना ही प्रचंड का गुट."
ये चीन के लिए भी बड़ा धक्का था जबकि नेपाल में मौजूद चीनी राजदूत ने अपने स्तर पर भी बहुत प्रयास किए थे.
नेपाल के सेंटर फॉर इकनॉमिक एंड टेक्निकल स्टडीज़ के कार्यकारी निदेशक हरिबंश झा के अनुसार, "सत्तारूढ़ दल टूट की कगार पर पहुँच चुका है. ये ऐसे समय में हो रहा है, जब राजशाही की वापसी के लिए भी मांगें उठ रही हैं."
झा के अनुसार, "मौजूदा सरकार ना कोविड 19 की महामारी को सही तरीक़े से संभाल सकी और ना ही भ्रष्टाचार पर अंकुश ही लगाने में कामयाब हो सकी. यही वो समय है, जब भारत, नेपाल को लेकर अपनी स्थिति और दोनों देशों के बीच पारंपरिक रीतियों और संस्कृति पर फिर से ज़ोर दे रहा है.''
''वहीं चीन भी नेपाल में 'बॉर्डर रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) को लेकर पीछे नहीं दिखना चाहता है. अमेरिका भी पाँच सौ अरब डॉलर के 'मिलेनियम चैलेंज को-ऑपरेशन (एमसीसी) को लेकर तैयार है, जिसे नेपाल की संसद को अनुमोदित करना है."
झा मानते हैं कि नेपाल की घरेलू समस्याओं की वजह से ही विदेशी शक्तियों को वहाँ पाँव पसारने का मौक़ा मिला है.

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भारत ने भी नेपाल के मामलों को लेकर गंभीरता दिखाई है और अक्टूबर से लेकर नवंबर तक भारत की तरफ़ से रिसर्च एंड एनालिसिस विंग यानी रॉ के निदेशक सामंत कुमार गोयल, विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला और भारतीय सेना के प्रमुख जनरल एमएम नरवणे ने बारी-बारी से नेपाल का दौरा किया है.
हरिबंश झा ये भी मानते हैं कि इन दौरों के बाद इतना संकेत तो मिल गया है कि भारत, नेपाल के साथ अपने पारंपरिक रिश्ते फिर से बहाल करना चाहता है, जिनमें कुछ सालों से खटास पैदा हो गई थी.
विदेश मामलों के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार मनोज जोशी कहते हैं, "नेपाल में मौजूदा राजनीतिक संकट में चीन की नाकामी का सबसे बड़ा उदाहरण है कि जिस नेपाली कांग्रेस को वो इतने सालों तक 'चीन विरोधी' मानते रहे, उसी के नेताओं को चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने वापस लौटते हुए चीन आने का न्योता दिया है. उन्होंने ये न्योता चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के शताब्दी उत्सव में शामिल होने के लिए दिया है."

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वहीं ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन में सामरिक मामलों पर शोध विभाग के अध्यक्ष हर्ष पंत ने बीबीसी से कहा कि नेपाल की भौगोलिक स्थिति ऐसी है, जो उसे सामरिक रूप से काफ़ी महत्वपूर्ण बना देती है.
उनका कहना है, "पहले चीन को नेपाल के मामलों में उतनी दिलचस्पी नहीं थी. जब राजतंत्र था, तब भी चीन नेपाल के मामलों में ज़्यादा दखल नहीं देता था. भारत के साथ नेपाल के पारंपरिक और सांस्कृतिक रिश्ते भी मज़बूत रहे. यहाँ तक कि आज भी दोनों देशों के नागरिकों को आने जाने में ना वीज़ा की ज़रूरत है और ना ही पासपोर्ट की."

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वो कहते हैं, "लेकिन अब परिस्थितियाँ बदली हैं क्योंकि चीन महत्वाकांक्षी हो गया है. पहले नेपाल में अमेरिकी हस्तक्षेप से भारत को भी आपत्ति रहती थी. लेकिन अब नेपाल में अमेरिका की मौजूदगी से भारत को कोई फ़र्क नहीं पड़ता. इधर कुछ सालों से चीन की दिलचस्पी नेपाल में बढ़ी है. जबकि उसकी विदेश नीति कभी ऐसी नहीं रही थी. लेकिन अब नेपाल में चीन ने सरकार बनवाने से लेकर संगठनों के विलय तक में बड़ी भूमिका निभाई है."
पंत कहते हैं "वाम दलों में विचारों का मतभेद होना अप्रत्याशित नहीं है. चाहे वो नेपाल में हों या भारत में. लेकिन चीन भारत विरोधी भावनाओं को बनाए रखने के लिए नेपाल की राजनीति में दख़ल देता रहा है. हालांकि उनका कहना है कि अब नेपाल में चीन विरोधी भावनाएँ भी उभरनी शुरू हो रही हैं."
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