नेपाल में संकट के बीच अपना प्रतिनिधि मंडल भेजने पर बोला चीन

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नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने पिछले महीने यानी दिसबंर के दूसरे हफ़्ते के बाद अचानक से संसद भंग कर दी. प्रधानमंत्री ओली के इस फ़ैसले का नेपाल में राजनीतिक पार्टियाँ विरोध कर रही हैं. नेपाल अभी राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है.
मंगलवार को राजधानी काठमांडू में कोरोना वायरस को लेकर पाबंदियों के बावजूद हज़ारों लोगों ने सड़क पर निकलकर संसद भंग करने के फ़ैसले का विरोध किया.
ओली के संसद भंग करने के फ़ैसले को उनके विरोधी और सत्ताधारी नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के लोग भी असंवैधानिक बता रहे हैं.
यहाँ तक कि नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी प्रचंड और ओली के नेतृत्व में दो खेमों में बँट गई है.
नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई ने पिछले हफ़्ते ही घोषणा की थी कि संसद भंग करने के ख़िलाफ़ उनकी जनता समाजवादी पार्टी सड़क पर आंदोलन चलाएगी.

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नेपाल के एक और पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहाल प्रचंड भी सड़क पर प्रदर्शन कर रहे हैं.
ओली के इस फ़ैसले से नेपाल के भीतर ही हलचल नहीं है बल्कि चीन भी हरकत में है. चीन ने नेपाल में सियासी संकट के बीच रविवार को अपना एक प्रतिनिधिमंडल भेजा था.
साल 2020 के आख़िरी दिन चीनी विदेश मंत्रालय की नियमित प्रेस कॉन्फ़्रेंस में प्रसार भारती के एक पत्रकार ने नेपाल में चीनी प्रतिनिधिमंडल के जाने को लेकर सवाल पूछा.
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प्रसार भारती ने चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता वॉन्ग वेनबिन से पूछा, ''नेपाल में एक चीनी प्रतिनिधिमंडल का दौरा हुआ है. इस दौरे के नतीजों के बारे में क्या आप कुछ बताएंगे?"
इस सवाल के जवाब में वेनबिन ने कहा, ''चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) की केंद्रीय समिति के अंतरराष्ट्रीय विभाग का एक प्रतिनिधिमंडल नेपाल के दौरे पर गया था. इस प्रतिनिधिमंडल की वहाँ की सत्ताधारी और विपक्षी पार्टियों से मुलाक़ात हुई है. चीनी प्रतिनिधिमंडल और वहां की राजनीतिक पार्टियों के बीच विचारों का आदान-प्रदान हुआ. पारस्परिक हितों को लेकर भी बात हुई. बेल्ट रोड इनिशिएटिव पर भी बात हुई. नेपाली पक्ष ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की आने वाली 100वीं जयंती को लेकर बधाई दी है. नेपाल ने दोनों देशों के बीच रिश्ते और मज़बूत करने की बात कही है. इसके साथ ही हम दोनों पार्टियों के बीच संवाद को भी बढ़ाएंगे.''
2018 में नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार बनने के बाद से नेपाल में राजनीतिक स्थिरता थी और सरकार ठीक से चल रही थी.

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लेकिन अब एक बार फिर से नेपाल अस्थिरता के दौर में समाता दिख रहा है. अंतरराष्ट्रीय और नेपाली मीडिया में कहा जा रहा है कि नेपाल के राजनीतिक घटनाक्रम से इलाक़े की दो शक्तियाँ चीन और भारत बहुत सतर्क हैं.
भारतीय मीडिया में लंबे समय से ऐसा कहा जाता रहा है कि मोदी सरकार नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी से बहुत ख़ुश नहीं थी. इसके अलावा भारतीय मीडिया में प्रधानमंत्री ओली को चीन समर्थक प्रधानमंत्री कहा जा रहा था.
लिपुलेख और कालापानी को लेकर प्रधानमंत्री ओली के फ़ैसले से काफ़ी विवाद हुआ था. इन दोनों इलाक़ों को नेपाल ने अपने मानचित्र में शामिल कर लिया था.
नेपाल के इस फ़ैसले पर भारत के सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने कहा था कि नेपाल किसी तीसरे देश के इशारे पर ऐसा कर रहा है.
संसद भंग करने के बाद 21 दिसंबर को ओली ने देश को संबोधित करते हुए कहा था कि उनकी सरकार ने साहसिक फ़ैसला करते हुए नेपाल के नक़्शे में अपने सभी इलाक़ों को शामिल किया.
दूसरी तरफ़, चीन के रिश्ते नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी से स्थिर रहे हैं. चीन के लिए 'वन बेल्ट वन रोड' परियोजना में नेपाल बहुत ही अहम है.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार नेपाल के राजनीतिक संकट से चीनी रणनीति और उसकी महत्वाकांक्षी परियोजना बेल्ट एंड रोड प्रभावित हो सकती है.

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चीन ने इसी को देखते हुए एक प्रतिनिधिमंडल भेजा है. यह प्रतिनिधिमंडल चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अंतरराष्ट्रीय विंग का है.
इस प्रतिनिधिमंडल की कोशिश थी कि नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी में आई दरार भर जाए और प्रचंड-ओली एक हो जाएं. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.
पीएम ओली ने बुधवार को कहा कि वो प्रचंड से डील करते-करते थक गए हैं.
रॉयटर्स ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''विदेशी राजनयिक कह रहे हैं कि चीन ओली के क़दम से हैरान है. एक सीनियर यूरोपियन डिप्लोमैट ने कहा कि महामारी के बीच प्रधानमंत्री ओली के इस क़दम से चीन नाराज़ है. चीन ने यहाँ व्यापक पैमाने पर निवेश किया है और राजनीतिक अस्थिरता से उसका निवेश प्रभावित होने का डर है. चीन हैरान है कि बिना कोई परामर्श के इतना बड़ा फ़ैसला ओली कैसे ले सकते हैं?''
भारत और चीन के बीच लद्दाख में सैन्य तनाव ख़त्म नहीं हुआ है. अमेरिका में ट्रंप की विदाई और जो बाइडन का आगमन होने जा रहा है.
कहा जा रहा है कि बाइडन प्रशासन तिब्बत को लेकर चीन के ख़िलाफ़ आक्रामक रहेगा. ऐसे में नेपाल की भूमिका अहम हो जाएगी. नेपाल आधिकारिक रूप से वन चाइना पॉलिसी का समर्थन करता है.
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नेपाल के राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार सूर्य राज आचार्य ने ट्विटर पर अपनी एक टिप्पणी पोस्ट की है.
यह टिप्पणी उन्होंने निक्केई एशिया के लिए की है. आचार्य ने कहा है, ''नेपाली कांग्रेस पार्टी के शेर बहादुर देउबा के हालिया क़दम से पता चलता है कि वो संभावित गठबंधन के लिए परेशान हैं और सत्ता में वापसी चाहते हैं.
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