पश्चिम बंगालः अब घरों के भीतर पहुंचने लगी राजनीति की आंच

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- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए
राजनीति में पति-पत्नी का परस्पर विरोधी राजनीतिक दलों में होना या दल बदलना कोई नई बात नहीं है. लेकिन ऐसा पहली बार देखने में आया है जब इसकी वजह से परिवार ही दांव पर लग गया हो.
देखने-सुनने में यह कहानी फिल्मी लग सकती है, लेकिन है असली. वैसे प्रेम, राजनीति, धोखा और महत्वाकांक्षा की यह पटकथा महीनों पहले से लिखी जा रही थी. लेकिन इसका क्लाइमेक्स पत्नी के पार्टी बदलने और उसके बाद पति की ओर से तलाक का नोटिस भेजने से पूरा हुआ.
यह कहानी है पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा जिले की बिष्णुपुर सीट से बीजेपी के सांसद सौमित्र ख़ां और उनकी पत्नी सुजाता मंडल ख़ां की. बीजेपी में उचित सम्मान नहीं मिलने का आरोप लगाते हुए सुजाता ने बीजेपी से नाता तोड़ कर तृणमूल कांग्रेस का दामन क्या थामा, उनका दांपत्य जीवन ही दांव पर लग गया.
उनके पति सौमित्र ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्हें तलाक की नोटिस भेजने की धमकी देते हुए कहा कि वे ख़ान लिखना छोड़ दें, सिर्फ मंडल लिखें. यहां इस बात का ज़िक्र जरूरी है कि आम धारणा के विपरीत सौमित्र खां मुस्लिम नहीं बल्कि हिंदू हैं. उनका सरनेम खां है, खान नहीं.
सौमित्र बंगाल में बीजेपी युवा मोर्चा के अध्यक्ष भी हैं. महज पार्टी बदलने से परिवार के दांव पर लगने और मामला तलाक तक पहुंचने से पहले इस दंपति की पृष्ठभूमि के बारे में जानना जरूरी है.

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राजनीतिक यात्रा
सौमित्र और सुजाता वर्ष 2011 से ही एक-दूसरे से प्रेम करते थे. लगभग पांच साल तक चले प्रेम संबंधों के बाद दोनों ने वर्ष 2016 में शादी की थी. तब तक सौमित्र तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर बिष्णुपुर से सांसद बन गए थे. उससे पहले वे कांग्रेस के टिकट पर विधायक थे.
साल 2014 के चुनावों से पहले उन्होंने पार्टी बदलते हुए टीएमसी का दामन थामा था. बीते साल के लोकसभा चुनावों में उन्होंने एक बार फिर पार्टी बदली और बीजेपी में शामिल हो गए.
लेकिन उनके ख़िलाफ़ कुछ मामले लंबित होने की वजह से अदालत ने सौमित्र के अपने चुनाव क्षेत्र में प्रवेश पर पाबंदी लगा दी थी. नतीजतन उनके चुनाव अभियान की पूरी कमान सुजाता ने ही संभाली थी. बीते साल सौमित्र ने जीत कर अपनी सीट बरकरार रखी थी.
लेकिन अब साल-डेढ़ साल में ही अचानक ऐसा क्या हो गया कि सुजाता ने पार्टी बदल ली और इसी बात पर सौमित्र ने तलाक की धमकी तक दे डाली?
सुजाता कहती हैं, "बीजेपी के पक्ष में लंबी लड़ाई लड़ चुकी हूं. लेकिन पार्टी ने मुझे कभी उचित सम्मान नहीं दिया. अब तक मैं जिस पार्टी यानी टीएमसी के खिलाफ लड़ रही थी उसके तमाम भ्रष्ट और मौकापरस्त नेता अब बीजेपी में शामिल हो रहे हैं."

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सम्मान नहीं मिलने का आरोप
सुजाता का कहना है, "बीजेपी अब टीएमसी की बी टीम बन गई है. इसलिए मैंने बी टीम में रहने की बजाय ए टीम को ही तरजीह दी. मेरी राय में परिवार घर के भीतर रहता है और राजनीति घर से बाहर. सम्मान नहीं मिलने की वजह से पार्टी बदलने के कारण अगर मेरे पति तलाक देना चाहते हैं तो मैं कुछ नहीं कह सकती."
लेकिन सौमित्र सुजाता की बातों से सहमत नहीं है. वे बीजेपी में उनको सम्मान नहीं मिलने के आरोप को भी निराधार बताते हैं.
सौमित्र कहते हैं, "बीजेपी ने सुजाता को घर की बेटी जैसा सम्मान दिया है. कोई भी पार्टी पति-पत्नी दोनों को न तो एक साथ सासंद नहीं बना सकती है और न ही पार्टी में कोई पद दे सकती है. बीजेपी में परिवारवाद नहीं चलता. पता नहीं टीएमसी उन्हें क्या देगी?"
सौमित्र दावा करते हैं कि सुजाता ने किसी ज्योतिष की सलाह पर अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते ही पार्टी बदलने का फैसला किया है.
सौमित्र मानते हैं कि सुजाता ने उनके चुनाव अभियान में अहम भूमिका निभाई थी. वह कहते हैं, "बीते चुनावों में मैं दिल्ली में घर में नजरबंद था. लेकिन सुजाता मेरे साथ खड़ी थी. यह बात मैं आजीवन नहीं भूल सकता."
आखिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि सुजाता ने टीएमसी में शामिल होने का फैसला किया? सौमित्र का कहना है, "उसके साथ कुछ झगड़ा ज़रूर हुआ था. लेकिन उसने (सुजाता ने) अपने इस फ़ैसले की मुझे भनक तक नहीं लगने दी थी. तृणमूल कांग्रेस ने मेरी पत्नी को ही मुझसे छीन लिया."

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राजनीतिक महत्वाकांक्षा
क्या आपने तलाक की नोटिस भेज दी है? इस सवाल पर बीजेपी सांसद ने कहा कि उन्होंने नोटिस भेज दिया है.
उधर, तलाक के सवाल पर सुजाता कहती हैं कि सौमित्र ने बीजेपी के दवाब में आकर उन्हें नोटिस भेजा है.
वो कहती हैं, "अगर महज पार्टी बदलना ही तलाक की वजह है तो यह फ़ैसला सौमित्र का है, मेरा नहीं. उनका कहना है कि कोई नहीं कह सकता है कि कल को सौमित्र भी टीएमसी में नहीं लौट आएंगे. लेकिन मैंने उन पर इसके लिए कोई दबाव नहीं डाला है."
वे अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की बात से इनकार करती हैं. उनका कहना है, "बीजेपी मे मुख्यमंत्री पद के कम से कम छह और उप-मुख्यमंत्री पद के एक दर्जन दावेदार हैं. टीएमसी में मुझे यह तो पता है कि मैं किस मुख्यमंत्री के लिए लड़ रही हूं."
जानकारों का कहना है कि सुजाता और सौमित्र के बीच राजनीतिक मतभेद बीते कुछ महीनों से गहरा रहे थे.
सुजाता के एक करीबी नेता नाम नहीं छापने की शर्त पर बताते हैं, "बीते लोकसभा चुनावों में सौमित्र की जीत के लिए तमाम दबावों और धमकियों के बीच चट्टान की तरह दृढ़ रहने वाली सुजाता को चुनावों के बाद एकदम हाशिए पर धकेल दिया गया था. बाद में सौमित्र या बीजेपी ने उनको जीत का कोई श्रेय नहीं दिया. इससे वे काफी उपेक्षित महसूस कर रही थीं."

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सौमित्र की पृष्ठभूमि
बांकुड़ा जिले के दुर्लभपुर में बंगाली हिंदी परिवार में जन्मे सौमित्र की स्कूली पढ़ाई पांचमुड़ा महाविद्यालय में हुई थी. वर्ष 2011 में वे कांग्रेस के टिकट पर कातूलपुर विधानसभा सीट से जीते थे. लेकिन कांग्रेस पर बांकुड़ा जिले की अनदेखी का आरोप लगाते हुए दिसंबर, 2013 में वे टीएमसी में शामिल हो गए.
कई युवकों से नौकरी के लिए पैसा लेने के मामले में कोलकाता हाई कोर्ट ने फरवरी, 2019 में उन पर बांकुड़ा जिले में प्रवेश पर पाबंदी लगा दी थी. सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पाबंदी को बरकरार रखा था.
बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, "सुजाता के तौर पर टीएमसी को सांत्वना पुरस्कार मिला है. राजनीतिक महत्वाकांक्षा की वजह से पार्टी बदलने में कोई बुराई नहीं है."
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि पश्चिम बंगाल में टीएमसी और बीजेपी की बीच सत्ता की लगातार तेज़ होती होड़ की आंच अब निजी जीवन तक पहुंचने लगी है.
बीते साल कोलकाता नगर निगम के तत्कालीन मेयर शोभन चटर्जी और उनकी पत्नी रत्ना और प्रेमिका वैशाखी के प्रेम त्रिकोण का मामला ताज़ा ही था कि अब सौमित्र और सुजाता का मामला सामने आ गया. पत्नी से तलाक का मामला चलने की वजह से ही शोभन टीएमसी छोड़ कर बीजेपी में शामिल हुए थे. लेकिन वहां भी वे हाशिए पर ही हैं.
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