पश्चिम बंगाल: ममता ने शुरू की हिंदू-हिंदी वोटरों को लुभाने की क़वायद!

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- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से बीबीसी हिंदी के लिए
बीजेपी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी पर हिंदू-विरोधी होने का आरोप लगाती रही है. बीजेपी का आरोप यह भी रहा है कि ममता शुरू से ही अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति करती रही हैं और अब ममता की मौजूदा रणनीति को इन्हीं आरोपों के संदर्भ में देखा जा रहा है.
सवाल यह भी उठ रहे हैं कि क्या भाजपा के इन आरोपों की वजह से ही ममता हिंदू-हिंदी कार्ड खेल कर इस तबक़े के वोटरों को अपने पाले में खींचने की क़वायद कर रही हैं?मुख्यमंत्री के मौजूदा फ़ैसलों से राजनीतिक हलक़ों में इन सवालों पर बहस तेज़ हो गई है.
बीते साल लोकसभा चुनावों में हिंदू-हिंदी वोटरों के भरोसे 42 में 18 सीटें जीतने वाली भाजपा ने सरकार पर चुनावी रणनीति के तहत ख़ैरात बांटने का आरोप लगाया है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से लेकर भाजपा अध्यक्ष जे.पी.नड्डा तक अगले साल बंगाल में पार्टी के सत्ता में आने का दावा कर चुके हैं. कहा जा रहा है कि चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर उर्फ़ पीके की सलाह पर ही ममता ने हाल के तमाम फ़ैसले किए हैं.

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ममता के हाल के फ़ैसलों से साफ़ है कि वे ख़ुद पर लगे अल्पसंख्यक तुष्टिकरण का दाग़ धोकर हिंदू तबक़े के वोटरों को भाजपा के पाले से खींच कर तृणमूल कांग्रेस की ओर लाना चाहती हैं.
हालांकि ममता या उनकी पार्टी के लोग इसे स्वीकार नहीं करते. लेकिन इन पर न सिर्फ़ सवाल उठ रहे हैं बल्कि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी ज़ोर पकड़ रहा है.
पुजारियों को मासिक भत्ता
भाजपा अध्यक्ष जे.पी.नड्डा ने बीते सप्ताह ही तृणमूल कांग्रेस सरकार पर हिंदू-विरोधी सोच रखने और मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति पर चलने का आरोप दोहराया था. उसके दो दिन बाद ही ममता ने पुरोहितों को मासिक भत्ता और मकान देने का एलान किया. ऐसे में उनके उस फ़ैसले को नड्डा के आरोपों से भी जोड़ कर देखा जा रहा है.
ममता और उनकी पार्टी चाहे कुछ भी दावा करे, विपक्ष के इस आरोप में दम नज़र आता है कि सरकार के तमाम हालिया फ़ैसले चुनावों को ध्यान में रख कर लिए जा रहे हैं.

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ममता ने पहली बार हिंदू-हिंदी और दलितों पर ध्यान दिया है. बीते सप्ताह मुख्यमंत्री ने राज्य के आठ हज़ार से ज़्यादा ग़रीब ब्राह्मण पुजारियों को एक हज़ार रुपए मासिक भत्ता और मुफ़्त आवास देने की घोषणा की थी.
इसके साथ ही राज्य में हिंदी भाषी वोटरों को अपने साथ जोड़ने के लिए तृणमूल कांग्रेस की हिंदी सेल का गठन करते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री दिनेश त्रिवेदी को इसका चेयरमैन बनाया गया है. पश्चिम बंगाल हिंदी समिति का विस्तार करते हुए कई नए सदस्यों और पत्रकारों को इसमें शामिल किया गया है. इसके साथ ही सरकार ने पहली बार दलित अकादमी के गठन का एलान करते हुए सड़क से सत्ता के शिखर तक पहुंचने वाले मनोरंजन ब्यापारी को इसका अध्यक्ष बनाया है. दलित अकादमी के गठन के पीछे उनकी दलील है कि दलित भाषा का बांग्ला भाषा पर काफ़ी प्रभाव है.
वर्ष 2011 में राज्य की सत्ता में आने के साल भर बाद ही ममता ने इमामों को ढाई हज़ार रुपए का मासिक भत्ता देने का एलान किया था. उनके इस फ़ैसले की काफ़ी आलोचना की गई थी. कलकत्ता हाईकोर्ट की आलोचना के बाद अब इस भत्ते को वक़्फ़ बोर्ड के ज़रिए दिया जाता है.
अब मुख्यमंत्री ने अपने ताज़ा फ़ैसले में ममता ने राज्य के लगभग 37 हज़ार दुर्गापूजा समितियों को 50-50 हज़ार रुपए का अनुदान देने का एलान किया है.
यही नहीं, कोरोना और लॉकडाउन की वजह से आर्थिक तंगी का रोना रोने वाली मुख्यमंत्री ने पूजा समितियों को बिजली के बिल में 50 फ़ीसद छूट देने का तो एलान किया ही है, फ़ायर ब्रिगेड सेवा भी मुफ़्त करने का फ़ैसला किया है. इसके अलावा नगर निगम और नगरपालिकाएं अब आयोजन समितियों से कोई टैक्स नहीं वसूलेंगी.

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उनके इस फ़ैसले को भी चुनावों से पहले हिंदू वोटरों के धुव्रीकरण की भाजपा की कोशिशों को झटका देकर इस तबक़े के लोगों को अपने ख़ेमे में लाने की क़वायद माना जा रहा है.
पूजा समितियों को अनुदान
इसकी वजह यह है कि कोरोना और अंफ़न की दोहरी मार से जूझती सरकार बार-बार आर्थिक तंगी का रोना रोती रही है. ममता और उनके वित्त मंत्री अमित मित्र मार्च में शुरू हुए लॉकडाउन के बाद दर्जनों बार कह चुके हैं कि केंद्र की ओर से बक़ाया रक़म का भुगतान नहीं होने की वजह से बंगाल की आर्थिक हालत बेहद ख़राब है और उसके पास किसी काम के लिए पैसे नहीं हैं. ममता तो इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दो-दो पत्र भी भेज चुकी हैं. सरकार ने बीते साल यानी वर्ष 2019 में 28 हज़ार पूजा समितियों को 25-25 हज़ार का अनुदान दिया था. ऐसे में महामारी और आर्थिक तंगी के दौर में अनुदान की रक़म दोगुनी करने पर सवाल खड़े हो रहे हैं.
राज्य सरकार ने लगभग 81 हज़ार फेरीवालों को एकमुश्त दो-दो हज़ार का अनुदान देने का भी एलान किया है. मुख्यमंत्री ने कुछ पुरोहितों को मासिक भत्ते का प्रमाणपत्र भी सौंप दिया है. इसके अलावा बीते सप्ताह उन्होंने जिस दलित अकादमी के गठन का एलान किया था उसके लिए पहली क़िस्त के तौर पर अध्यक्ष मनोरंजन ब्यापारी को पाँच करोड़ का चेक भी सौंप दिया गया है. उन्होंने हिंदी साहित्य अकादमी को भी इतनी ही रक़म जारी कर दी है.
ममता ने अगले महीने बंगाल के सबसे बड़े त्योहार दुर्गापूजा के आयोजन की भी सशर्त अनुमति दे दी है. उनका कहना था, "अगर हमने पूजा के आयोजन की अनुमति नहीं दी तो वह लोग (भाजपा) कहेंगे कि सरकार ने पूजा के आयोजन की अनुमति नहीं दी है. यह त्योहार राज्य के सभी तबक़े के लोगों का है. इसे राजनीति से दूर रखना चाहिए."

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राजनीतिक बहस तेज़
ममता के फ़ैसलों पर राजनीतिक बहस तेज़ होने लगी है. प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, "मुख्यमंत्री के ताज़ा फ़ैसलों से साफ़ है कि ममता बनर्जी भाजपा से आतंकित हैं. सरकार पहले अलग-अलग तबक़े के लिए अलग-अलग नियम बनाती रही है. वह अब हिंदू वोटरों और हिंदीभाषी लोगों को लुभाने का प्रयास कर रही है. लेकिन अब लोगों को बेवक़ूफ़ नहीं बनाया जा सकता. लोग जमीनी हक़ीक़त समझ चुके हैं."
संघ के वरिष्ठ नेता जिष्णु बसु का कहना था, "अगर सरकार हिंदुओं की सहायता ही करना चाहती थी तो वह राज्य के विभिन्न इलाक़ों में हिंसा में मरने वालों के परिजनों को सहायता दे सकती थी. राज्य में हिंदुओं का वजूद ही ख़तरे में है."
माकपा नेताओं ने भी ममता पर सांप्रदायिकता की राह पर चल कर भाजपा और संघ के एजेंडे को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है.
माकपा नेता सुजन चक्रवर्ती कहते हैं, "बंगाल में भाजपा की पैठ की वजह तृणमूल कांग्रेस ही है. सरकार अब असली मुद्दों को भुला कर सत्ता के मोह में सांप्रदायिकता की राह पर चलने लगी है." उनका कहना है कि इन फ़ैसलों से राज्य में सांप्रदायिक खाई बढ़ेगी और उसका फ़ायदा भाजपा को मिलेगा.
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी ने इन फ़ैसलों को ममता बनर्जी सरकार की हताशा का सबूत बताया है.
वह कहते हैं, "इनसे साफ़ है कि तृणमूल कांग्रेस सरकार चुनाव जीतने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है. उसे समझ में आ गया है कि सिर्फ़ अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण की नीति से काम नहीं चलेगा. इसलिए अब हिंदू पुरोहितों को भी भत्ते और मकान दिए जा रहे हैं. पार्टी अब नरम हिंदुत्व की राह पर चल पड़ी है."
दूसरी ओर, हिंदी अकादमी के पुनर्गठन के समय ममता ने दलील दी थी, हम सभी भाषाओं का सम्मान करते हैं. पार्टी के वरिष्ठ नेता सांसद सौगत राय यह कहते हुए इन फ़ैसलों का बचाव करते हैं कि पार्टी सबको साथ लेकर चलने की पक्षधर है.

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वह कहते हैं, "हम भाजपा की तरह सांप्रदायिक राजनीति पर भरोसा नहीं करते. हमारा कोई धार्मिक एजेंडा नहीं है."
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा के बढ़ते ख़तरे को ध्यान में रखते हुए ही ममता बनर्जी ताबड़तोड़ फ़ैसले कर रही हैं. इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि उनके तमाम फ़ैसले हिंदू, हिंदी और आदिवासियों से जुड़े हैं जिन्होंने बीते लोकसभा चुनावो में भाजपा को जम कर समर्थन दिया था. ममता बनर्जी इससे पहले हमेशा बंगाली अस्मिता और संस्कृति की बात उठाती रही हैं. पहली बार उन्होंने हिंदीभाषियों और दलितों का सवाल उठाया है. राज्य के कई इलाक़ों में हिंदी भाषियों की भारी तादाद है और कई सीटों पर उनके वोट ही निर्णायक हैं.
राजनीतिक पर्यवेक्षक विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं, "इन फ़ैसलों का मक़सद भाजपा के ख़ेमे में जाने वाले हिंदू वोटरों को अपने पाले में खींचना है. यह तो वक़्त ही बताएगा कि पार्टी को इसका कितना सियासी फ़ायदा मिलेगा."
वह कहते हैं कि सरकार को धार्मिक आधार पर फ़ैसला करने की बजाय रोज़गार और निवेश जैसे मुद्दो पर ध्यान देना चाहिए था.
ममता ने हालांकि कहा है कि इन फ़ैसलों में कोई राजनीति नहीं देखी जानी चाहिए. लेकिन उनका इरादा चाहे कुछ भी रहा हो, सरकार के ताज़ा फ़ैसलों ने राज्य में एक नया सियासी विवाद तो छेड़ ही दिया है. इससे विपक्ष और ख़ासकर भाजपा को तृणमूल कांग्रेस के ख़िलाफ़ एक मज़बूत हथियार भी मिल गया है.
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