पाकिस्तान में इन दिनों शिया मुसलमानों पर हमले क्यों बढ़ गए हैं?

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पाकिस्तान में 'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' के पत्रकार बिलाल फ़ारूक़ी को पिछले हफ़्ते सेना की आलोचना और धार्मिक नफ़रत फैलाने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था.
फ़ारूक़ी की गिरफ़्तारी को लेकर पाकिस्तान में सोशल मीडिया पर इमरान ख़ान सरकार की तीखी आलोचना होने लगी. बिलाल को कुछ घंटों बाद ज़मानत पर छोड़ दिया गया था.
बिलाल सोशल मीडिया पर पाकिस्तान में धार्मिक कट्टरता और सरकार की नाकामियों को लेकर मुखर रहते हैं.
18 सितंबर को उन्होंने दो ट्वीट किए और दोनों ट्वीट पाकिस्तान में शिया मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने वाली रैलियों को लेकर हैं.
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बिलाल ने अपने ट्वीट में इस्लामाबाद में शिया विरोधी रैली का एक वीडियो क्लिप पोस्ट करते हुए लिखा है, "जब नफ़रत बेचने वाले ये मुल्ला पाकिस्तान की राजधानी में शिया मुसलमानों के बहिष्कार के लिए रैली कर रहे हों तब मैं चुप नहीं बैठ सकता. इसके पहले एक और शिया विरोधी रैली हुई थी, जिसमें उन्हें काफ़िर कहा गया था. जो भी पाकिस्तानी मुल्क की चिंता करते हैं, उन सभी के लिए यह ख़तरनाक है. ऐसा लग रहा है कि जानबूझकर सांप्रदायिक तनाव फैलाने की कोशिश की जा रही है. इन रैलियों में जो संगठन शामिल हो रहे हैं वो गृह मंत्रालय की लिस्ट में प्रतिबंधित हैं. इसके बाद भी इन्हें इतनी छूट कैसे मिल रही है?"

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शिया मुसलमानों के बहिष्कार की अपील
बिलाल ने ट्विटर पर जो वीडियो क्लिप पोस्ट किया है उसमें दिख रहा है एक बड़ी रैली है जिसमें मंच से शिया मुसलमानों के बहिष्कार की अपील की जा रही है.
वीडियो में धमकी भी दी जा रही है कि जो लोग शिया मुसलमानों के साथ मेलजोल रखेंगे उन्हें भुगतना होगा.
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बिलाल के इस ट्वीट पर पाकिस्तान की नारीवादी एक्टिविस्ट इस्मत रज़ा शाहजहां ने लिखा है, "मेरा अनुमान है कि चीन-ईरान में 400 अरब डॉलर की डील और ईरान की पोर्ट सिटी बन्दार अब्बास को अहमियत देने से अमरीका-सऊदी के साथ खाड़ी के अन्य देश चिढ़े हुए हैं. पाकिस्तान में शियाओं के ख़िलाफ़ हालिया नफ़रत सेना प्रमुख जनरल बाजवा, आईएसआई प्रमुख के रियाद दौरे और विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी के सऊदी पर बयान के बाद शुरू हुई है."
इस्मत के अनुमान की प्रतिक्रिया में पाकिस्तान की जानी-मानी राजनीति विज्ञानी आयशा सिद्दिक़ा ने लिखा है, "कई कारण हैं जिसमें 400 अरब डॉलर का समझौता एक छोटी वजह हो सकती है."

ईशनिंदा का आरोप
शियाओं के ख़िलाफ़ ये रैलियां मुहर्रम के जुलूस के बाद से निकाली जा रही है. कट्टरपंथी सुन्नी संगठनों ने शियाओं पर ईशनिंदा का आरोप लगाया है और तब से उन्हें निशाने पर लिया जा रहा है.
समाचार एजेंसी एएफ़पी के अनुसार 11 सितंबर को कराची की शिया विरोधी रैली में इस्लामिक जमिअत उलेमा-ए-इस्लाम के क़ारी उस्मान ने कहा था कि अब और ईशनिंदा बर्दाश्त नहीं की जाएगी.
इस रैली में शिया विरोधी समूह सिपाह-ए-सहाबा के लोग बैनर लिए खड़े थे. इस संगठन पर पिछले कई सालों में शियाओं के हत्या के आरोप हैं.

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शिया मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत और हिंसा को लेकर शुक्रवार को पाकिस्तान की सीनेट में भी आवाज़ उठी.
पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) ने सरकार से आग्रह किया कि शियाओं के ख़िलाफ़ खुलेआम नफ़रत को बढ़ावा देने का चलन बहुत ही ख़तरनाक है और इसे रोका जाए.
सीनेट में पीपीपी की संसदीय नेता और सीनेटर शेरी रहमान ने कहा, "पाकिस्तान की कुल मुस्लिम आबादी में 20 फ़ीसदी शिया हैं. शियाओं पर हमले लगातार बढ़ रहे हैं और यह मुल्क की स्थिरता के लिए ख़तरा है. ऐसे 20 मामले सामने आए हैं जिनमें शिया मुसलमानों को उनकी आस्था के कारण निशाना बनाया गया. सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि सरकार इसे लेकर चिंतित नहीं है."
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'जिन्ना का पाकिस्तान'
शेरी रहमान ने सीनेट में कहा, "शिया मुसलानों के ख़िलाफ़ रैलियां की जा रही हैं. नफ़रत भरे नारे लगाए जा रहे हैं. यह बहुत ही संवेदनशील मामला है और इस पर तत्काल कार्रवाई की ज़रूरत है. हमारे लोगों ने आतंकवाद को ख़त्म करने में बहुत कुर्बानियां दी हैं. यह जिन्ना का पाकिस्तान है. जिन्ना कहते थे कि आप मंदिर भी जा सकते हैं और मस्जिद भी जा सकते हैं. आप चाहे किसी भी मज़हब के हों, सरकार इसके आधार पर भेदभाव नहीं कर सकती है. सरकार को चाहिए कि शियाओं के बुनियादी हक़ों की रक्षा करे. शिया भी इसी मुल्क के नागरिक हैं."
साउथ एशिया टेररिजम पोर्टल के अनुसार पाकिस्तान में 2001 से 2018 के बीच 4847 शिया मुसलमानों को मार दिया गया. कुछ रिपोर्ट में यह तादाद 10 हज़ार भी बताई जाती है.

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सुन्नी व्याख्या वाला इस्लाम
द एक्सप्रेस ट्रिब्युन की रिपोर्ट के अनुसार इस साल मुहर्रम के बाद से शियाओं पर हमले बढ़े हैं. पिछले कुछ हफ़्तों में कराची में शियाओं को सबसे ज़्यादा निशाने पर लिया गया है.
13 सितंबर को कराची में दसियों हज़ार लोग शिया विरोधी रैली में शामिल हुए. समाचार एजेंसी एएफ़पी की तस्वीरों में भारी भीड़ दिख रही है और लोग मोहम्मद अली जिन्ना रोड के साथ सईद मंज़िल रोड पर शिया विरोधी नारे लगा रहे हैं. जो इस प्रदर्शन की अगुआई कर रहे थे उनमें सरकार से संबंधित रुयते हिलाल कमिटी के चेयरमैन मुनीब-उर-रहमान भी हैं. यही कमिटी ईद के चाँद की घोषणा करती है.
इसी साल जुलाई महीने में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की असेंबली ने तहफ़ुज़-ए-बुनियाद-ए-इस्लाम बिल पास किया था. इस बिल के अनुसार पाकिस्तान में सुन्नी व्याख्या वाला ही इस्लाम स्वीकार्य होगा. ज़ाहिर है शिया मुसलमानों ने इस बिल का विरोध किया.
पंजाब असेंबली में इस बिल के ड्राफ़्ट को ज़्यादातर सदस्यों ने पढ़ा भी नहीं और पक्ष में वोट किया. केवल अगस्त महीने में ईशनिंदा के 42 मामले दर्ज हुए और ये ज़्यादातर शियाओं के ख़िलाफ़ थे. इसी महीने 3 साल के शिया बच्चे के ख़िलाफ़ ईशनिंदा का मामला दर्ज हुआ था.

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1980 के दशक में सैन्य तानाशाह ज़िआ-उल-हक़ के शासन में शियाओं के ख़िलाफ़ हिंसा शुरू हुई थी. हालांकि पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना भी इस्माइली शिया थे लेकिन ज़िआ-उल-हक़ के शासन में इस्माइली शियाओं पर हमले बढ़े थे. जिन्ना शिया थे या सुन्नी इसे लेकर भी पाकिस्तान में विवाद हुआ था.
पाकिस्तान के इतिहासकार मुबारक़ अली ने बीबीसी से बातचीत में कहा था, "जिन्ना को दफ़्न करते वक़्त मुस्लिम लीग से जुड़े शब्बीर अहमद उस्मानी नाम के एक मौलवी थे. उन्होंने ज़िद कर दी कि क़ायद-ए-आजम की अंत्येष्टि सुन्नी तौर-तरीक़ों से होनी चाहिए. विवाद की स्थिति में उनकी अंत्येष्टि में शिया और सुन्नी दोनों तौर-तरीक़ों को अपनाया गया था."
मुबारक़ अली कहते हैं, "जिन्ना साहब इस्माइली से शिया बन गए थे. इस्माइली 6 इमामों को मानते हैं जबकि शिया 12 इमामों को मानते हैं. मेरा निजी तौर पर मानना है कि वो भले ही धार्मिक नहीं थे लेकिन उनमें स्वाभिमान काफ़ी था. दरअसल, इस्माइली आग़ा खां को फॉलो करते हैं लेकिन जिन्ना उन्हें इमाम के तौर पर फॉलो नहीं करना चाहते थे. ऐसे में उन्होंने ख़ुद को शिया बना लिया."
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