GHMC चुनाव: बीजेपी चार से 48 सीटों तक कैसे पहुंची?

बीजेपी समर्थक

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    • Author, जीएस राममोहन
    • पदनाम, संपादक, बीबीसी तेलुगू सेवा

सत्तारूढ़ तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) ग्रेटर हैदराबाद म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (जीएचएमसी) में शायद अपनी सत्ता बरक़रार रखे लेकिन अब उसे बीजेपी जैसे विपक्ष का सामना भी करना होगा.

यह अब साफ़ है कि राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी को केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी से हर रोज़ चुनौती का सामना करना होगा.

दुब्बका विधानसभा सीट के उप-चुनाव के दौरान ही यह संकेत मिल गए थे जो जीएचएमसी चुनाव के दौरान और मज़बूत हो चुके हैं. वहीं, कांग्रेस इस पूरे सीन से ग़ायब हो चुकी है.

आरएसएस से जुड़े आर. सुधाकर राव के अनुसार, इन चुनावों से कांग्रेस और टीआरएस के नेताओं को नया विकल्प मिलेगा. उन्होंने कहा कि यहां तक कि सत्तारुढ़ टीआरएस के कुछ मौजूदा मंत्री और पूर्व मंत्री ऐसे संकेत दे रहे हैं कि वो बीजेपी में शामिल होने की इच्छा रखते हैं.

यह दिखाता है कि इस चुनाव ने कैसे बीजेपी नेताओं में ऊर्जा का संचार किया है. जीएचएमसी के चुनाव प्रचार ने न केवल ग़ैर-हैदराबादी लोगों बल्कि ख़ुद हैदराबाद के लोगों को चौंकाया क्योंकि उन्होंने अब तक नगर निगम चुनाव इस तरह से होते नहीं देखे थे.

गृह मंत्री अमित शाह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत बीजेपी के अन्य बड़े नेताओं के प्रचार के कारण जीएचएमसी चुनाव एक राष्ट्रीय मुद्दा बन गया.

लेकिन, यह चुनाव क्या संकेत दे रहा है? क्या इसकी हैदराबाद की सीमा के बाहर कोई राजनीतिक प्रासंगिकता है?

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कांग्रेस का ढहना और बीजेपी का उदय

बीजेपी इन चुनाव परिणामों से साबित कर सकती है कि आधिकारिक तौर पर विधानसभा में कांग्रेस विपक्ष में ज़रूर है लेकिन तेलंगाना में असली विपक्ष अब बीजेपी है. अब बीजेपी ये खुलकर कहेगी कि राज्य में कांग्रेस के पास कोई मज़बूत नेतृत्व नहीं है और जो हैं भी वो समन्वय के साथ काम नहीं कर रहे हैं.

अपने साहसिक अभियानों के लिए पहचानी जाने वाली टीआरएस को अब विपक्ष में बीजेपी जैसा दल मिला है जो उससे भी ज़्यादा बड़े चुनावी अभियानों को अंजाम दे चुका है. लोकसभा चुनाव में तेलंगाना के नतीजों से उत्साहित बीजेपी में दुब्बका विधानसभा सीट उप-चुनाव ने और आत्मविश्वास जगाया. इस उप-चुनाव में बीजेपी ने टीआरएस के गढ़ में जीत दर्ज की थी.

दुब्बका उप-चुनाव में मिले समर्थन ने जीएचएमसी चुनाव में एक टॉनिक का काम किया. इसके अलावा तेलंगाना में आई बाढ़ और उस दौरान प्रभावित इलाक़ों में टीआरएस के ख़राब राहत कार्यों ने बीजेपी के हमलों को और मजबूती दे दी.

बीजेपी के वोट शेयर को देखें तो उससे साफ़ हो जाता है कि बीजेपी सत्ता विरोधी वोटों के ध्रुवीकरण में सफल रही है. ख़ासतौर से उन लोगों के बीच जो यह मानते हैं कि केसीआर परिवार के अलावा भी सत्ता संतुलन के लिए एक विकल्प होना चाहिए.

बीजेपी उन लोगों को आकर्षित करने में सफल रही जिनकी उनके साथ कोई वैचारिक आत्मीयता नहीं है. कारण कई हैं लेकिन परिणाम अब एक है. अगर दूसरे शब्दों में कहें तो बीजेपी सत्तारूढ़ टीआरएस के विपरीत एक विकल्प के रूप में खड़ी हो सकती है.

पहले जीएचएमसी चुनाव से तुलना नहीं

केसीआर, अमित शाह और ओवैसी

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बीजेपी की वर्तमान सफलता की तुलना 2015 के चुनावों से करने से पहले यह याद कर लेना चाहिए कि पहले चुनाव तेलंगाना राज्य बनने के तुरंत बाद हुए थे. तब बीजेपी ने सिर्फ़ 4 सीटें जीती थीं.

उस समय अलग राज्य की मांग को लेकर लोगों की भावनाएं और जुड़ाव बेहद ताज़ा थे और इसने टीआरएस को जीएचएमसी चुनाव जीतने में मदद की. साथ ही हमें ये भी सही है कि बीजेपी का हैदराबाद में पहले से कुछ समर्थन रहा है.

बीजेपी से पूर्व केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय संसद में यहीं से चुने गए थे. उसी तरह से बीजेपी के पहले भी कई सांसद यहां से संसद जाते रहे हैं. अभी के केंद्रीय गृह राज्य मंत्री जी. किशन रेड्डी इस शहर से सांसद हैं.

जी. किशन रेड्डी

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दुब्बका का असर और उसका महत्व

तेलंगाना राज्य बनने के बाद टीआरएस हमेशा उप-चुनाव जीतती रही है. बीजेपी ने उस पर रोक लगाई और हाल में दुब्बका सीट से बीजेपी उम्मीदवार रघुनंदन राव 1,000 वोटों से जीते.

इसके साथ ही विधानसभा में बीजेपी की दो सीटें हो गईं. वहीं, विधानसभा में कांग्रेस के छह सदस्य हैं और टीआरएस की क़रीबी एआईएमआईएम के सात विधायक हैं.

यहां यह भी याद रखने वाली बात है कि दुब्बका से बीजेपी के टिकट पर जीत दर्ज करने वाले रघुनंदन राव कभी के. चंद्रशेखर राव के क़रीबी हुआ करते थे और वो केसीआर की जाति से ही संबंध रखते हैं. दुब्बका के परिणामों में पार्टी के साथ-साथ सामाजिक गठजोड़ ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई. हालांकि, कारण चाहे जो भी रहे हों लेकिन दुब्बका की जीत का एक बड़ा सांकेतिक महत्व है.

दुब्बका से लगे हुए विधानसभा क्षेत्रों से मुख्यमंत्री और उनके परिवार के सदस्य चुनकर आते हैं. इसके कारण बीजेपी ने यह साफ़ संदेश देने की कोशिश की कि उसने टीआरएस को उसके क़िले में हराया है. इसने तेलंगाना में बीजेपी के कैडर के बीच एक नया उत्साह भर दिया. साथ ही बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व में इसने नई उम्मीदें जगा दीं.

केसीआर

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बीजेपी का युवा नेतृत्व

तेलंगाना में पहले के बीजेपी नेतृत्व और अभी के नेतृत्व में बहुत अंतर है. आज का युवा नेतृत्व जिस तरह से असंसदीय भाषा का इस्तेमाल करने से नहीं बचता, वैसा पहले नहीं था. यह दिखाता है कि वर्तमान नेतृत्व का यह मानना है कि उसे अधिक आक्रामक रहना है और सत्तारुढ़ पार्टी से आक्रामक भाषा में बात करके ध्रुवीकरण करना चाहिए.

आरएसएस से जुड़े एक शख़्स के अनुसार, केंद्रीय नेतृत्व राज्य में नेताओं की नई पौध की इस बात से सहमत है कि पुराने नेताओं की तरह विपक्ष में मृदु भाषी नहीं बने रहना है. उनका यह भी कहना था कि अब उनका ध्यान रेड्डी समुदाय के एक धड़े को कांग्रेस से दूर करने पर है.

हालांकि, बीजेपी नेताओं के राजनीतिक अनुभव और शालीन राजनीतिक भाषा की कमी भी जब तब सामने आ जाती है.

बीजेपी तेलंगाना प्रमुख ने एक बयान में कहा था कि अगर वे निगम चुनाव जीतते हैं तो ट्रैफ़िक नियमों के उल्लंघन पर जुर्माने का बोझ वो उठाएंगे जिसकी काफ़ी आलोचना हुई थी.

यह स्पष्ट है कि नई पीढ़ी के नेतृत्व की इन सभी कमियों के बावजूद उसने सत्तारूढ़ पार्टी के ख़िलाफ़ आक्रामक तरीक़े से सड़क पर लड़ाई लड़ी और केंद्रीय नेतृत्व का ध्यान खींचा.

पश्चिम बंगाल के बाद शुरू होगा ऑपरेशन तेलंगाना?

ममता बनर्जी

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बीजेपी इस समय अपना पूरा ध्यान पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ टीएमसी के ऊपर लगा रही है. यह भी कहा जा रहा है कि पश्चिम बंगाल के बाद बीजेपी का अगला लक्ष्य तेलंगाना होने जा रहा है.

वह यह संकेत देना चाहती है कि टीआरएस के लिए मुख्य विपक्षी पार्टी अब कांग्रेस नहीं बल्कि बीजेपी है. वह चुनाव ना जीतकर भी 4 सीट से 48 सीटों पर आ चुकी है और एक बड़ा संदेश भेजने में ज़रूर सफल हुई है.

बीजेपी दक्षिण भारत में अब तक सिर्फ़ कर्नाटक तक सीमित थी लेकिन अब वह दूसरी जगहों पर भी पैर पसारना चाहती है.

बीबीसी से बात करते हुए बीजेपी के एक नेता ने कहा कि ऐसी बड़ी संभावना है कि किसी केंद्रीय मंत्री को स्थाई तौर पर हैदराबाद भेज दिया जाए ताकि वो बीजेपी को तेलंगाना में मज़बूत करने के काम पर पूरी तरह ध्यान केंद्रित करे.

ममता और केसीआर

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केंद्र में केसीआर के थर्ड फ़्रंट का क्या होगा?

के. चंद्रशेखर राव ने हाल ही में घोषणा की थी कि वो केंद्र में एक थर्ड फ़्रंट बनाने की कोशिश शुरू करेंगे. उन्होंने दिसंबर के दूसरे सप्ताह में कई पार्टियों के नेताओं को हैदराबाद आमंत्रित किया है.

पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान भी उन्होंने ऐसा ही किया था. उन्होंने कोलकाता में ममता बनर्जी, चेन्नई में एम के स्टालिन से मुलाक़ात की थी. इसके बाद टीआरएस ने कहा था कि किसी भी पार्टी को सरकार बनाने के लिए बहुमत नहीं मिलेगा और छोटी पार्टियां सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाएंगी.

लेकिन बीजेपी ने हर किसी के अनुमानों पर पानी फेर दिया. उस समय टीआरएस के कुछ नेताओं को ऐसा लगता था कि अगर परिस्थितियां बदलती हैं तो केसीआर केंद्र में सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाएंगे.

इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने आंध्र प्रदेश के अपने समकक्ष वाईएस जगनमोहन रेड्डी के साथ अच्छे रिश्ते क़ायम किए थे. देवेगौड़ा के प्रधानमंत्री बनने के बाद कई क्षेत्रीय पार्टी के नेताओं की ऐसी उम्मीदें हमेशा बनी रहती हैं.

ऐसा अनुमान लगाया गया था कि अगर परिस्थितियां उनके अनुसार बनती हैं तो केसीआर राज्य की राजनीति बेटे केटी रामाराव को सौंपकर राष्ट्रीय राजनीति में चले जाएंगे. हालांकि, ऐसे दिन आ नहीं पाए और बीजेपी ने केंद्र में फिर से मज़बूत बहुमत के साथ सरकार बनाई और अब वह राज्य में भी टीआरएस को चुनौती दे रही है.

हाल तक टीआरएस की विधानसभा की यात्रा बेहद आसान रही है लेकिन अब परिस्थितियां पहली जैसी नहीं रहेंगी.

टीआरएस को ओडिशा मॉडल से उम्मीद?

नवीन पटनायक

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इमेज कैप्शन, नवीन पटनायक बीते 20 सालों से ओडिशा के मुख्यमंत्री हैं

टीआरएस यह कर सकती है कि वह ओडिशा की सत्ताधारी पार्टी बीजेडी की तर्ज़ पर बीजेपी के प्रभावों को कुछ जगहों तक सीमित कर दे और सत्ता में बनी रहे.

राजनीतिक विश्लेषक नागाराजू कहते हैं कि अगर कांग्रेस का कैडर कम संख्या में भी अपनी जगह फिर हासिल कर लेता है तो वो सत्ता विरोधी वोटों को अपने पक्ष में खींच सकता है और बीजेपी के ध्रुवीकरण के प्लान को ख़राब कर सकता है.

उनका मानना है कि टीआरएस के पास अब ओडिशा मॉडल है जहां पर सत्तारूढ़ बीजेडी बीजेपी और कांग्रेस से लड़कर केंद्र सरकार में अच्छे रिश्ते बरक़रार रखती रही है.

अब आगे की पूरी स्थिति स्थानीय कांग्रेस नेतृत्व के आंतरिक मुद्दों और बीजेपी के प्रसार पर निर्भर करती हैं.

इसके साथ ही कोई भी टीआरएस को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता जिसने कई कल्याणकारी योजनाओं के ज़रिए लोगों में मजबूत पहुंच बना रखी है लेकिन राजनीति में कभी भी, कुछ भी हो सकता है. एक समय अजेय लगने वाली कांग्रेस का हश्र आज सबके सामने है.

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