मुसलमान उम्मीदवार को उतारने का सवाल ही नहीं है: भाजपा मंत्री

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- Author, इमरान कुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
कर्नाटक के वरिष्ठ बीजेपी नेता केएस ईश्वरप्पा का कहना है कि उनकी पार्टी बेलगावी लोकसभा सीट के उप-चुनाव में मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारेगी.
बीजेपी सरकार में ग्रामीण विकास और पंचायत राज मंत्री ईश्वरप्पा पहले भी इस तरह के बयान देते रहे हैं, लेकिन इस बार के बयान ने राजनीतिक हलक़ों में भौंहें चढ़ा दी हैं.
ईश्वरप्पा ने बेलगावी में मीडिया से कहा, "बेलगावी हिंदुत्व के केंद्रों में से एक है. टिकट हम हिंदू समर्थकों को देंगे. हम इसे शंकराचार्य, कित्तूर रानी चेन्नम्मा या संगोली रायण्णा (जाति के अर्थ में एक ब्राह्मण, लिंगायत या कुरुबा) के अनुयायियों में से एक को देंगे. बेलगावी सीट से मुसलमान उम्मीदवार को उतारने का सवाल ही नहीं है."
मंत्री ने बीबीसी हिंदी से कहा, "मुझसे मीडिया ने एक सवाल पूछा कि क्या हम एक मुसलमान को उम्मीदवार बनाएंगे. तो मैंने कह दिया कि हम एक मुसलमान को सीट नहीं दे सकते क्योंकि बेलगावी एक हिंदुत्व वाला इलाक़ा है. मेरा बयान केवल बेलगावी सीट तक ही सीमित था."
सुरेश अंगडी के निधन के बाद बेलगावी लोक सभा सीट ख़ाली हो गई थी. सुरेश अंगडी मोदी सरकार में रेलवे राज्य मंत्री थे. सीट को भरने के लिए बेलगावी में जल्द ही उप-चुनाव कराया जाएगा.
दूसरी सीटों के बारे में ईश्वरप्पा ने कहा, "दूसरी सीटों के मामले में ये इस बात पर निर्भर करेगा कि किसी की जीत की संभावना कितनी है."

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कलाम जैसे मुसलमान उम्मीदवार
वरिष्ठ बीजेपी नेता ने माना कि उन्होंने कुछ सालों पहले कहा था कि पार्टी मुसलमानों को टिकट नहीं देगी, क्योंकि इस समुदाय के सदस्य बीजेपी के लिए वोट नहीं करते.
उन्होंने कहा, "2018 (विधान सभा चुनाव) में हमें मुसलमानों का एक वोट नहीं मिला. हाल के चुनावों में हमें कुछ वोट मिले, जिसके बाद मैंने ख़ुद शिवमोग्गा नगरपालिका चुनाव में एक मुसलमान महिला और एक पुरुष को पार्टी का टिकट दिया."
मुसलमान उम्मीदवारों को टिकट देने पर पार्टी के रुख़ को स्पष्ट करते हुए, बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव और कर्नाटक के पूर्व मंत्री सीटी रवि ने बीबीसी हिंदी से कहा, "कृपया ये ना भूलें कि बीजेपी ने ही राष्ट्रपति के तौर पर एपीजे अब्दुल कलाम के नाम का प्रस्ताव दिया था. अगर हमें कलाम जैसे मुसलमान उम्मीदवार मिलेंगे तो हम उन्हें पार्टी का टिकट देंगे."
रवि ध्यान दिलाते हैं कि उनकी पार्टी ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में मुस्लिम समुदाय के उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था.
"हमने टिकट दिया है और देंगे. बेशक पार्टी एक आंतरिक और बाहरी सर्वेक्षण, नामों की शॉर्टलिस्टिंग, केंद्रीय चुनाव समिति को प्रस्ताव भेजने जैसी प्रक्रिया का पालन करती है जो सामाजिक न्याय मापदंडों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेती है."
रवि को अकसर ये कहने के लिए जाना जाता है, "हम एक बैंक में नग़द रखकर उस दूसरे बैंक का चेक जारी नहीं कर सकते, जहां हमें पता है कि वो बाउंस हो जाएगा."

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ध्रुवीकरण की राजनीति
हालांकि, ईश्वरप्पा के बयान ने राजनीतिक टिप्पणीकार और जैन विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. संदीप शास्त्री को हैरान नहीं किया है.
डॉ शास्त्री बीबीसी हिंदी से कहते हैं, "ईश्वरप्पा का बयान विधानसभा और लोकसभा चुनावों में अपनाई जाने वाली बीजेपी की रणनीति को दर्शाता है. हाल के बिहार विधानसभा चुनावों के अंतिम चरण में भी बीजेपी ने सुनिश्चित किया कि वो हिंदू वोटों को अपनी तरफ़ करे, उनके नेताओं ने बाद में इसे स्वीकार किया और कहा कि इसमें ग़लत क्या है. और एआईएमआईएम जैसे दलों के चुनाव मैदान में होने के कारण मुस्लिम वोटों का विभाजन हुआ, जो उत्तर प्रदेश के चुनावों में भी देखा गया था."
डॉ शास्त्री कहते हैं, "कर्नाटक में तो यह साफ़ तौर पर बीजीपी की नीति का हिस्सा है. बीजेपी को इस बात का भी ख़्याल है कि उसे अल्पसंख्यकों का वोट पाने में अभी तक सफलता नहीं मिल पाई है. साल 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को आठ फ़ीसद अल्पसंख्यकों का वोट मिला था. 2019 लोकसभा चुनाव में इसे 2-3 फ़ीसद अधिक वोट मिले थे."
उनका कहना था, "कई लोगों ने सोचा था कि प्रधानमंत्री का सबका विश्वास कहना अल्पसंख्यकों तक पहुँचने का एक रास्ता था लेकिन हक़ीक़त में इससे और ज़्यादा किए जाने की ज़रूरत थी जो कि नहीं हुआ."
इन सब का नतीजा यह हुआ है कि विधान सभा और लोकसभा में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व घटता जा रहा है.
राज्यसभा के पूर्व उप-सभापति और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता के रहमान ख़ान ने बीबीसी से कहा, "ध्रुवीकरण की राजनीति के कारण निर्वाचित संस्थानों में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व कम हो गया है."
के रहमान ख़ान ग़लत नहीं कह रहे हैं.

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कर्नाटक विधानसभा में मुसलमानों की संख्या कभी भी एक समान नहीं रही लेकिन पिछले कुछ सालों में इसमें लगातार कमी देखी जा रही है.
1952 के विधासभा चुनाव में केवल एक मुसलमान जीत कर आए थे. 1957 में यह बढ़कर नौ हो गया लेकिन फिर 1967 में घटकर छह हो गया है.
लेकिन फिर 1972 में 12 मुसलमान जीतकर आए और 1978 में 17 मुसलमान कर्नाटक विधान सभा पहुँचे.
लेकिन साल 1983 में एक बार मुसलमान विधायकों की संख्या घटकर दो पहुँच गई. फिर 1985 चुनाव में आठ हुई और 1989 में 12.
1994 में छह जीतकर आए और 1999 में 12 मुसलमान विधायक बने.
फिर 2004 में सात मुसलमान जीते, 2008 में नौ और 2013 में 11, लेकिन 2018 में फिर घटकर सात हो गए.
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मुसलमानों का प्रतिनिधित्व कम
कर्नाटक की 6.7 करोड़ की आबादी में मुसलमान क़रीब 13 फ़ीसद हैं. लेकिन क़रीब-क़रीब उतनी ही आबादी वाले समाज के दूसरे वर्गों की तुलना में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व बहुत कम है.
कितने मुसलमान विधानसभा चुनाव जीतकर आते हैं इसका सीधा संबंध मुख्यमंत्री से भी है. देवराज उर्स, वीरेंद्र पाटिल, एसएम कृष्णा और सिद्धारमैया जैसा शक्तिशाली नेता जब मुख्यमंत्री बनते हैं तो उस दौरान अधिक मुसलमान चुनाव जीतकर आते हैं.
रहमान ख़ान कहते हैं, "पहले मुसलमान उम्मीदवार दूसरे जाति और धर्म के लोगों के वोट को लेकर आश्वस्त रहते थे लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा है क्योंकि दूसरे धर्म और जातियों में कांग्रेस का समर्थन कम हो रहा है."

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कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष डीके शिवकुमार ने बीबीसी हिंदी से कहा, "हमलोग मुसलमान उम्मीदवारों को टिकट देते थे. लेकिन हम देख रहे हैं कि जिन सीटों से पहले मुसलमान जीतकर आते थे, अब वहां से मुसलमान उम्मीदवार नहीं जीत पा रहे हैं. यह सच है कि उम्मीदवार के चुनाव जीत जाने की सलाहियत टिकट बंटवारे में एक फ़ैक्टर होता है. मैंने अल्पसंख्यक समुदाय के नेताओं से कहा है कि वो चुनाव के समय का इंतज़ार करने के बजाए पहले ही उन सीटों को चुन लें जहां से वो चुनाव लड़ना चाहते हैं."
मैसूर यूनिवर्सिटी में राजनीतिक विज्ञान पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर मुज़फ़्फ़र असदी कहते हैं, "मुसलमान कांग्रेस के लिए एक राजनीतिक बोझ बन गए हैं और मुसलमानों को टिकट देने में पार्टी में झिझक रहती है. कांग्रेस पर उसके विरोधी मुसलमान पार्टी होने का आरोप लगाते हैं और अपनी इस छवि को ठीक करने के लिए इसके कुछ नेता सॉफ़्ट हिंदुत्वा की नीति अपना रहे हैं लेकिन उससे भी पार्टी को कोई फ़ायदा नहीं हो रहा है. इसलिए कांग्रेस अब कोई ख़तरा (मुसलमानों को टिकट देकर) नहीं मोल लेना चाहती है."
प्रोफ़ेसर मुज़फ़्फ़र असादी कहते हैं, "आने वाले वर्षों में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व और कम होने वाला है. राजनीतिक दल मुसलमान उम्मीदवारों को सिर्फ़ एक प्रयोग की तरह देखेंगी और मुसलमान सिर्फ़ राजनीतिक परीक्षण बन कर रह जाएंगे."
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