असम: असमिया मुसलमानों की गिनती के पीछे भाजपा का क्या मक़सद है?

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- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, गुवाहाटी से
असम में भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली सरकार 'इंडिजिनस' यानी स्वदेशी मुसलमानों की संख्या का पता लगाने के लिए घर-घर जाकर सर्वेक्षण करने की योजना बनाने जा रही है.
मंगलवार को असम सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री रंजीत दत्ता ने स्वदेशी मुसलमान कहे जाने वाले गोरिया, मोरिया, देसी और जोलाह जैसे मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधियों के साथ एक बैठक कर राज्य में सर्वेक्षण करवाने की योजना तैयार करने की बात कही.
इस बैठक के बाद मीडिया के समक्ष मंत्री रंजीत दत्ता ने कहा, "स्वदेशी मुसलमानों के प्रतिनिधियों ने बैठक में जो सुझाव दिए हैं, हमने उसे स्वीकार किया है. सरकार के गृह, राजस्व और अल्पसंख्यक कल्याण विभाग द्वारा प्रदेश के स्वदेशी मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक जनगणना घर-घर जाकर आयोजित की जाएगी."
2011 की जनगणना के अनुसार असम की कुल आबादी लगभग तीन करोड़ 12 लाख है और इसमें एक करोड़ से अधिक मुसलमान है.
असम के इन 34.22 फ़ीसदी मुसलमानों में लगभग 42 लाख स्वदेशी मुसलमान बताए जाते है.
मंत्री दत्ता ने बैठक में शामिल हुए संगठनों की एक आपत्ति पर कहा, "स्वदेशी मुसलमानों की जनगणना के बाद जो विकास कॉर्पोरेशन बनाए जाएंगे. उनके नाम के आगे इंडिजिनस और मुसलमान शब्द इस्तेमाल न करने का फ़ैसला लिया गया है. यह एक संवेदनशील सर्वेक्षण होगा क्योंकि ये आशंका है कि बांग्लादेशी मुसलमान अपना नाम दर्ज कराने की कोशिश कर सकते हैं. यह मुसलमानों को विभाजित करने के लिए नहीं है बल्कि हम अपने पिछले बजट में किया गया वादा पूरा कर रहे हैं.

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'मुसलमानों को बांटना चाहती है बीजेपी'
देश में एनआरसी और नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर उत्पन्न माहौल में ख़ासकर यहां बांग्लाभाषी मुसलमान सत्तारूढ़ भाजपा सरकार की इस योजना पर सवाल उठा रहें हैं.
ऑल असम अल्पसंख्यक छात्र संघ के मुख्य सलाहकार अजीजुर रहमान ने बीबीसी से कहा, "भाजपा असम के मुसलमानों के बीच विभाजन पैदा करके अपनी आगे की राजनीति चमकाना चाहती है. इसलिए स्वदेशी मुसलमानों की अलग से जनगणना करने की योजना बना रही है. भाजपा ने बीते चार साल के शासन में अल्पसंख्यक लोगों के विकास के नाम पर कोई काम नहीं किया."
वो कहते हैं, "अगर मौजूदा सरकार सबका साथ सबका विकास वाली उनकी तथाकथित नीति पर सही तरीक़े से काम करती तो आज स्वदेशी मुसलमान और बाक़ी के मुसलमानों के बीच अंतर करने की ज़रूरत नहीं पड़ती. लोगों को रोज़गार, अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं चाहिए. लेकिन भाजपा सांप्रदायिकता और विभाजन की नीति पर काम करते हुए लोगों के बीच अशांति पैदा करना चाहती है."
वहीं गोरिया, मोरिया, देसी और जोलाह मुसलमान समुदाय का कहना है कि अल्पसंख्यकों के नाम पर उनकी हर क्षेत्र में भागीदारी का फ़ायदा बंगाली मूल के मुसलमान उठा ले जाते हैं.
अजीजुर रहमान इस बारे में कहते हैं, "अगर ऐसा होता तो फ़ख़रुद्दीन अली अहमद देश के राष्ट्रपति नहीं बन पाते. फ़ख़रुद्दीन अली अहमद बंगाली मुसलमान नहीं थे. फिर भी वो जनिया और बरपेटा जैसे बंगाली बोलने वाले मुसलमान संसदीय क्षेत्रों से विधायक और सांसद बने. अनवरा तैमूर भी बंगाली मूल की मुसलमान नहीं थीं और वो असम की मुख्यमंत्री बनीं. ऐसे बहुत सारे विधायकों के भी उदाहरण है."
रहमान कहते हैं कि इंडिजिनस मुसलमान के नाम पर कुछ संगठन के लोग इस तरह का झूठ फैलाकर सरकार से अपना फ़ायदा उठाने में लगे है.

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'स्वदेशी मुसलमानों के विकास के लिए कुछ नहीं हुआ'
उन्होंने कहा, "हम चाहते हैं कि गोरिया, मोरिया, देसी और जोलाह मुसलमान समुदाय का विकास हो लेकिन इस विकास के नाम पर विभाजन वाली राजनीति नहीं होनी चाहिए."
सदो असोम गोरिया-मोरिया-देसी जाति परिषद के अध्यक्ष हफ़ीज़ुल अहमद की राय इससे अलग है.
वो कहते हैं, "जब बात अल्पसंख्यकों की होती है तो उसमें इस्लाम को मानने वाले सभी लोगों को शामिल कर लिया जाता है लेकिन असम में पहले हम चार स्वदेशी मुसलमान समुदायों की संख्या ही ज़्यादा थी. बाद में बंगाली मूल के मुसलमानों के यहां आ जाने से हमारी संख्या काफ़ी कम हो गई, जबकि पूर्वी बंगाल से यहां आए मुसलमानों से हमारी भाषा, संस्कृति, पहनावा बिलकुल अलग है.''
अहमद कहते हैं, "अब हम गोरिया, मोरिया, देसी और जोलाह मुसलमान समुदाय के लोग अलपसंख्यकों के अंदर अल्पसंख्यक बन गए हैं. जितना पुराना हमारा इतिहास है उस हिसाब से विकास के नाम पर कुछ नहीं हुआ. क्योंकि राजनीति समेत कई क्षेत्रों में हमारी भागीदारी कम होने के कारण अल्पसंख्यक कल्याण के नाम पर सरकारी योजनाओं का फ़ायदा बंगाली मूल के मुसलमान उठा ले जाते हैं. उनकी संख्या भी ज़्यादा है और राजनीतिक हिस्सेदारी भी."
क्या स्वदेशी मुसलमानों की पहचान के लिए सर्वेक्षण करने और विकास निगम बनाने से यह सारी समस्याएं ख़त्म हो जाएगी?
इस सवाल के जवाब में हफ़ीजुल अहमद कहते हैं, "हमने सरकार के समक्ष ख़ासतौर पर ब्रह्मपुत्र घाटी में बसे गोरिया, मोरिया, देसी और जोलाह मुसलमान समुदाय के विकास के लिए निगम बनाने का प्रस्ताव रखा है. लेकिन उससे पहले उन तमाम स्वदेशी मुसलमान लोगों की पहचान करना ज़रूरी है जिनके विकास के लिए निगम बनाया जाएगा. ब्रह्मपुत्र घाटी में बसे कई मुसलमानों के पास स्वदेशी मुसलमान होने के फ़र्जी सर्टिफिकेट हैं. ऐसे लोगों की पहचान ज़रूरी है."
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'हम बंगाली मुसलमानों के ख़िलाफ़ नहीं...'
पिछली कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में इन चारों मुसलमान समुदाय के नाम पर विकास परिषदें बनाई गई थी लेकिन इनमें अनियमितता होने के आरोप लगे और मामला कोर्ट पहुंच गया.
गुवाहाटी हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील और गोरिया मुसलमान समुदाय से ताल्लुक़ रखने वाले नेकीबुर ज़मान कहते है, "कांग्रेस ने उस समय हमारे समुदाय के लिए विकास परिषद बनाया था लेकिन वो किसी काम नहीं आई. असम में एक करोड़ 22 लाख मुसलमानों में क़रीब 42 लाख स्वदेशी मुसलमान हैं लेकिन इनमें हमारे समुदाय से विधानसभा और संसद में एक भी मुस्लिम प्रतिनिधि नहीं है. राजनीतिक प्रतिनिधि नहीं होने के कारण हमें सरकार की योजनाओं का फ़ायदा नहीं मिलता."
वो कहते हैं, "मैं 2006 से यह मुद्दा उठा रहा हूं. साल 2014, 2016 और 2019 में बीजेपी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में हमारे समुदाय को आर्थिक और सामाजिक तौर पर प्रतिष्ठित करने का वादा किया था. उसी आधार पर विधानसभा के पिछले बजट में वित्त मंत्री ने हमारे चार समुदाय के विकास के लिए 100 करोड़ आंवटित करने की घोषणा की. ऐसे में स्वदेशी मुसलमानों की पहचान के लिए एक अलग से सर्वेक्षण करना ज़रूरी हो गया है."
इससे मुसलमानों में विभाजन होने की बात भी सामने आ रही है. इसके जवाब में नेकीबुर ज़मान कहते हैं, "असम में मरान, मटक जैसी जनजातियां हिंदू होने के बाबजूद वो अपनी पहचान के साथ रह रहे हैं. हम बंगाली मुसलमानों के ख़िलाफ़ नहीं है. हम चारों तरफ़ से शोषित हुए है लिहाज़ा हम सरकार के समक्ष अपने सुमदाय के विकास की मांग उठा रहे हैं.''
ज़मान ने बीबीसी से कहा, "हममें से अधिकतर लोग हिंदू से धर्मांतरित हुए मुसलमान हैं और कुछ लोग युद्ध के समय बंदी बनाकर रखे गए थे. हमारा इतिहास 1206 का है जबकि असम में आहोम शासन की शुरूआत 1228 में हुई थी. फिर भी हमारा अस्तित्व नहीं के बराबर है."
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आहोम शासन के समय गोरिया-मोरिया के लोगों को कारीगर के काम पर रखा जाता था. इनमें मोरिया समुदाय को सबसे अन्य पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में रखा गया था. देसी समुदाय के मुसलमान कोच राजवंशी जनजाति से धर्म परिवर्तन कर मुसलमान बने थे जो अविभाजित ग्वालपाड़ा जिले में बसे हुए हैं.
उस दौरान चाय बागान में काम करने वाले मज़दूरों ने धर्म परिवर्तन किया था. उनके समुदाय को जोलाह मुसलमान कहा जाता है. उसी तरह बराक वैली में बसे पंगल समुदाय के लोग मणिपुरी से मुसलमान बने थे.
नेकीबुर ज़मान कहते हैं, "हम शासन में बैठी सरकार से अपने समुदाय के विकास के लिए बात कर रहें हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम भाजपा की विचारधारा का समर्थन कर रहे हैं. हम सिर्फ़ सरकार से अपने अधिकारों की मांग कर रहें हैं."
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