बेंगलुरु हिंसा: SDPI, जिसकी भूमिका पर उठ रहे हैं सवाल

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
बेंगलुरु की हाल की वारदात हो या फिर झारखंड, राजस्थान में हिंसा का कोई मामला. ऐसे मामलों के सामने आते ही अख़बारों की सुर्खियां ये ऐलान शुरू कर देती हैं कि अब इन राज्यों की सरकारें बस सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया (SDPI) पर बैन लगाने ही वाली है.
हाल में बेंगलुरु नॉर्थ ईस्ट की घटनाओं के बाद कर्नाटक सरकार भी एक बार फिर SDPI को प्रतिबंधित करने का मन बनाने लगी है. यह विचार उसके ज़ेहन में पिछले नौ महीने से पल रहा है, जब नागरिकता संशोधन क़ानून यानी सीएए के ख़िलाफ़ मेंगलुरु का प्रदर्शन हिंसक हो गया था.
और अब एसडीपीआई के नेताओं को भी यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि अख़बारों की हेडलाइंस में उनकी पार्टी का नाम जितनी बार आता है, उतनी बार उसका दायरा और बढ़ जाता है.
एसडीपीआई के राष्ट्रीय सचिव डॉ. तस्लीम अहमद रहमानी साफ़ कहते हैं कि आरोपों से उनकी पार्टी मज़बूत ही होती है. लेकिन उनका कहना है कि आजकल उनके ख़िलाफ़ एक भी आरोप साबित नहीं हुआ है.
रहमानी कहे हैं, "हमारे नेता ऐसे आरोपों से चिंतित हैं. लेकिन जब भी हम पर आरोप लगते हैं, ज़मीनी स्तर पर काम कर रहे हमारे कार्यकर्ताओं में और जोश भर जाता है."
एसडीपीआई क्या है?
सरसरी तौर पर देखने में एसडीपीआई मुख्य रूप से मुसलमानों की पार्टी लगती है. लेकिन इसके नेताओं का कहना है कि यह समाज के हाशिये पर रह रहे लोगों की पार्टी है, ख़ासकर आदिवासियों और दलितों की.
एसडीपीआई का मूल संगठन है पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI).
कालीकट यूनिवर्सिटी में मलयालम के रिटायर्ड प्रोफेसर मोहिउददीन एन. कारासेरी बीबीसी हिंदी से कहते हैं, "देश में हिंदुत्व से जुड़े संगठनों हिंदू जागरण, बजरंग दल, हिंदू मुनानी की तरह ही एसडीपीआई के भी छात्र संगठन हैं. कई कैंपस में यह संगठन सक्रिय है. सोशल डेमोक्रेटिक ट्रेड यूनियन से जुड़े संगठन भी हैं. स्कूली छात्रों के लिए भी इसके संगठन बने हुए हैं. इनकी विचारधारा आरएसएस से अलग नहीं है. आरएसएस अगर हिंदू राष्ट्र की बात करता है तो एसडीपीआई ( SDPI) इस्लामी राष्ट्र की बात करता है."
लेकिन डॉ. रहमानी इन सारे आरोपों को सिरे से ख़ारिज करते हैं. वह पीएफ़आई से अपने रिश्तों की व्याख्या कुछ यूँ करते हैं, "हमारे विचार अलग-अलग लोगों के समूह और इतिहास से आते हैं. हमारी विचारधारा को पीएफ़आई नेतृत्व से खुराक मिलती है. लेकिन हमारे बीच कामकाजी रिश्ता नहीं है. हमें नहीं पता कि आरएसएस और बीजेपी मिलकर कैसे काम करते हैं लेकिन हमारी विचारधारा साफ़ है. हम चाहते हैं- भूख से आज़ादी, ख़ौफ़ से आज़ादी.''
कर्नाटक पुलिस के ख़ुफ़िया विभाग में आईजीपी रहे गोपाल होसुर कहते हैं, "ग्यारह साल पहले पीएफआई ने मुख्यधारा की राजनीति में उतरने का फैसला किया. इसके बाद इसने एसडीपीआई का एक राजनीतिक पार्टी के तौर पर रजिस्ट्रेशन कराया. पार्टी में कुछ उग्र तत्व हैं लेकिन कुछ का रवैया नरम है. संगठन की मजबूती सिर्फ मुस्लिमों के बीच है और यही ताकत इसे बढ़ा कर उत्तर प्रदेश और बिहार तक ले गई है. "

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एसडीपीआई का राजनीतिक आधार
कर्नाटक के एक पूर्व मंत्री यू टी क़ादिर इस पार्टी के शुरूआती दिनों के बारे में, "एसडीपीआई ने सबसे पहले कर्नाटक के तटीय इलाकों में फैलना शुरू किया. सामाजिक कार्यकर्ताओं के तौर पर इसके कैडर मस्जिदों में पहुंचने लगे. जगह-जगह सभाएं होने लगीं. इस तरह से ये युवाओं का ब्रेनवॉश करने लगे. पहले वे यह काम केएफडी (KFD) के सदस्य के तौर पर करते थे लेकिन बाद में केरल और तमिलनाडु से प्रॉपेगैंडा करने में माहिर लोगों को बुलाने लगे."
एसडीपीआई ने मुस्लिम वोटों को ही फ़ोकस कर काम करना शुरू किया है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पूरे मुस्लिम समुदाय में इसका आकर्षण है.
मैसूर यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर मुज़फ़्फ़र असदी कहते हैं, "दरअसल यह संगठन आर्थिक रूप से कमजोर मुसलमानों को बीच काम करता है. उनकी भावनाओं यह कह कर सहलाया जाता है कि देखो अब तक कांग्रेस ने मुस्लिमों के लिए कुछ नहीं किया. मध्यवर्गीय मुस्लिम इसकी तरफ आकर्षित नहीं होते. ग़रीब मुस्लिमों के समर्थन की वजह से ही विधानसभा चुनाव में कुछ सीटों पर यह थोड़ा-बहुत वोट झटकने में कामयाब रही थी. "

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प्रोफेसर असदी कहते हैं, "यह पार्टी कुछ सीटों पर एक-दो हज़ार या तीन हज़ार तक वोट तक पाने में कामयाब रही थी. लेकिन इसने कांग्रेस का ही नुकसान किया क्योंकि मोटे तौर पर बीजेपी के साथ मुक़ाबला हो तो मुसलमानों का वोट उसे ही मिलता है.
लेकिन जिस इलाके़ में इसका आधार है, वहां यह पंचायत और शहरी निकायों की कुछ सीटें पाने में कामयाब रही है. यह कर्नाटक में भी हुआ है और दूसरी जगहों पर भी.''
जहां तक 2018 के विधानसभा चुनावों की बात है तो कर्नाटक के तीन विधानसभा सीटों- नरसिम्हाराजा (मैसुरू), चिकपेट (बेंगलुरू) और गुलबर्गा सिटी पर ही एसडीपीआई कांग्रेस को थोड़ा नुकसान पहुंचा पाई थी. नरसिम्हाराजा सीट पर 38 हजार वोट लेकर यह दूसरे स्थान पर रही थी. वहीं चिकपेट सीट पर इसे 15 हजार वोट मिले थे. इस वजह से बीजेपी यहां जीत गई थी.
राज्य में विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही एसडीपीआई ने ऐलान कर दिया था कि वह तीन सीटों को छोड़ कर हर जगह सेक्यूलर ताकतों का समर्थन करेगी क्योंकि यही वक्त की मांग है. इसके ऐलान की वजह से पूरे तटवर्ती इलाके में बीजेपी भारी बहुमत से जीत गई.
एसडीपीआई किसके पाले में ?
नॉर्थ-ईस्ट बेंगुलुरू के हिंसाग्रस्त इलाकों का दौरा करने के बाद पूर्व गृह मंत्री रामालिंगा रेड्डी ने आरोप लगाया कि बीजेपी एसडीपीआई का समर्थन करती है.

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उन्होंने कहा, "बीजेपी एसडीपीआई का समर्थन कर हमारे वोट काटना चाहती है". बीजेपी ने रेड्डी के आरोपों का पुरज़ोर खंडन किया है.
बीबीसी से बातचीत में कर्नाटक में बीजेपी नेता और सरकार में मंत्री सीटी रवि ने रेड्डी के आरोपों के जवाब में कहा, "जब रेड्डी राज्य के गृह मंत्री थे तो एसडीपीआई के खिलाफ चल रहे 1500 केस क्यों वापस लिए? दरअसल ये पार्टी कांग्रेस का ही एक्सटेंशन है. अब तक कांग्रेस के किसी भी केंद्रीय नेता ने अपने विधायक पर हुए हमले की निंदा क्यों नहीं की है."
बेंगलुरु हिंसा के बाद उठते सवाल
बहरहाल, आठ अगस्त की हिंसा के बाद लोगों का ध्यान एसडीपीआई पर केंद्रित हो गया है. हिंसा में उसकी कथित भूमिका की बात हो रही है.
दरअसल नॉर्थ ईस्ट बेंगलुरू में हिंसा एक कांग्रेस विधायक के भतीजे के सोशल मीडिया पोस्ट की वजह से भड़की थी. सोशल मीडिया के पोस्ट पर लोगों ने शिकायतें दर्ज कराई थी. लेकिन बाद में इलाके में जमा हुई भीड़ हिंसक हो गई. इस दौरान लोगों ने एक पुलिस थाना और विधायक का घर जला दिया. एक दूसरे पुलिस थाने पर हमला किया गया. अब भी दो पुलिस थानों के तहत आने वाले इलाकों में क़र्फ्यू लगा हुआ है.
डॉ. रहमानी कहते हैं, "दरअसल बीजेपी बेंगलोर कॉरपोरेशन के चुनाव जीतना चाहती है. लिहाजा ध्रुवीकरण कर रही है. इसलिए वह आठ अगस्त की हिंसा में शामिल थी. सिर्फ वोट के लिए बीजेपी यह सब कर रही है. इसीलिए हमें निशाना बनाया जा रहा है. हमारी पार्टी मेयर का चुनाव नहीं जीतने जा रही है. हम एक या दो वार्ड में जीत सकते हैं. जबकि एसडीपीआई पर लगातार आरोप लगाए जा रहे हैं ताकि हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण किया जा सके."
ध्रुवीकरण के आरोप पर बीजेपी के कहते हैं कर्नाटक सरकार में मंत्री सीटी रवि कहते हैं, "ये तो बिल्कुल हास्यास्पद है. कांग्रेस एमएलए के घर और पुलिस स्टेशन पर हमला करने वाले बीजेपी के समर्थक नहीं थे. व्हाट्सएप्प पर संदेश फैलाने वाले एसडीपीआई के सदस्य थे. ये सबकुछ एसडीपीआई और कांग्रेस के बीच आंतरिक झगड़े की वजह से हुआ है."

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डॉ. रहमानी कहते हैं कि उनकी पार्टी की न तो कांग्रेस से कोई डील है और न ही बीजेपी से. उनका दावा है कि वो हर मुद्दे पर बैख़ौफ़ आवाज़ उठाते हैं.
डॉ. रहमानी कांग्रेस पर निशाना साधते हैं. वह कहते हैं, "कांग्रेस पार्टी को राम मंदिर और अल्पसंख्यकों के बारे में अपनी नीतियों की समीक्षा करनी चाहिए." उनका दावा है कि अब कांग्रेस मुसलमानों को यह कह कर डरा रही है कि अगर एसडीपीआई को वोट दिया तो बीजेपी सत्ता में आ जाएगी.
बहरहाल, देखा जाए तो चुनाव में एक-एक वोट के लिए राजनीतिक दलों में होने वाली लड़ाई ही एसडीपीआई के असर को बढ़ावा देती दिख रही है. एसडीपीआई ने हाल ही में पप्पू यादव की पार्टी जन अधिकार मंच से गठबंधन किया है. लगता है वह तीसरे मोर्चे का हिस्सा बनेगी.
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