अर्नब गोस्वामी: न्यूज़ एंकर जिनसे लोग मोहब्बत भी करते हैं और नफ़रत भी

अर्नब गोस्वामी

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    • Author, योगिता लिमये
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

हाल ही में रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ़ और न्यूज़ एंकर अर्नब गोस्वामी ख़ुद एक ख़बर बन गए जब आत्महत्या के एक केस में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया था. वे इन आरोपों को ख़ारिज करते हैं और अब उन्हें ज़मानत भी मिल चुकी है लेकिन इस केस से उनके ध्रुवीकरण वाली शख़्सियत को और मज़बूती ही मिली है.

अप्रैल में रिपब्लिक भारत पर अपने प्राइम टाइम शो में अर्नब ने कहा, "एक ऐसे देश में जहां 80 फ़ीसद हिंदू रहते हैं, वहां हिंदू होना क्राइम हो गया है"

"मैं आज पूछता हूं कि अगर किसी मौलवी या पादरी की हत्या हो जाती तो क्या लोग चुप बैठते?"

अर्नब उस घटना के बारे में बात कर रहे थे जिसमें दो हिंदू साधुओं और उनके ड्राइवर को भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला था.

पुलिस के मुताबिक़, इन लोगों को बच्चा चोर समझ लिया गया था. हमलावर और मृतक सभी हिंदू ही थे. लेकिन एक हफ़्ते तक रिपब्लिक नेटवर्क ऐसे कार्यक्रम करता रहा जिनमें दावा किया जा रहा था कि मृतकों की हिंदू पहचान ही अपराध का कारण थी.

आलोचकों का कहना है कि ये अर्नब के मुंहफ़ट, शोर भरे और पक्षपाती कवरेज का असल ख़तरा है. वे कहते हैं कि सत्तारूढ़ बीजेपी को फ़ायदा पहुंचाने के लिए इस चैनल के दर्शकों में ग़लत जानकारी, दुष्प्रचार, विभाजनकारी और भड़काऊ विचार भरे जाते हैं.

अर्नब और रिपब्लिक टीवी ने बीबीसी के इंटरव्यू के अनुरोध का कोई जवाब नहीं दिया. संस्थान ने न ही भड़काऊ और फ़ेक न्यूज़ के सवाल पर और न ही बीजेपी के प्रति झुकाव को लेकर ही कोई जवाब दिया.

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विवादास्पद स्टाइल

अर्नब पहले ऐसे व्यक्ति नहीं है जिन्होंने कवरेज का ऐसा स्टाइल अपनाया है लेकिन उन्होंने इसे पहले से ज़्यादा शोर भरा और आक्रामक ज़रूर बना दिया है.

उनका लहज़ा भी ध्रुवीकरण वाला होता है और भारत में धार्मिक मतभेदों का फ़ायदा उठाने का काम करता है.

अप्रैल में उन्होंने एक मुसलमान समूह तब्लीग़ी जमात पर लॉकडाउन के आदेशों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया और प्रधानमंत्री मोदी से अपील की कि वे इस ग्रुप के नेताओं को जेल में बंद करें.

महामारी के शुरुआती दिनों में, दिल्ली में इस ग्रुप के लोग इकट्ठे हुए थे और फिर इन्हें देशभर में हज़ार कोविड मामलों का ज़िम्मेदार बताया गया. इस कार्यक्रम के आयोजक ने ज़ोर दिया कि ये मरकज़ लॉकडाउन के पहले से चल रहा था. इस दावे के सच होने की पुष्टि अब देश की कई अदालतें कर चुकी हैं.

लेकिन रिपब्लिक और दूसरे चैनलों की ग़लत कवरेज की वजह से सोशल मीडिया पर इस्लामोफ़ोबिक प्रतिक्रियाएं आईं.

अर्नब ने अपने कार्यक्रम में कहा, "इस वक़्त जिस बुरी हालत से देश गुज़र रहा है, आपको पसंद आए ना आए लेकिन उसका दोषी तबलीग़ी जमात है"

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जुलाई में चैनल की कवरेज बॉलीवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत की मौत पर रही.

पुलिस का कहना था कि उनकी मौत आत्महत्या से हुई है लेकिन सुशांत के परिवार ने उनकी दोस्त रिया चक्रवर्ती पर आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में एफ़आईआर दर्ज करवा दी.

रिया ने आरोपों को ख़ारिज किया लेकिन इन आरोपों की वजह से स्त्री-द्वेष और कड़वाहट भरी कवरेज शुरू हुई. रिपब्लिक ने तो रिया की गिरफ़्तारी के लिए कैंपेन तक चलाया.

न्यूज़लॉन्ड्री की एक्ज़िक्यूटिव एडिटर मनीषा पांडे कहती हैं, "भारत में लोग रिपब्लिक की तुलना अमेरिका के फ़ॉक्स न्यूज़ से करते हैं लेकिन मुझे लगता है कि ये सही नहीं है. फ़ॉक्स न्यूज़ पक्षपाती और ट्रंप समर्थक नज़र आता है लेकिन रिपब्लिक टीवी पूरी तरह दुष्प्रचार फैलाता है और केंद्र सरकार के फ़ायदे के लिए अक्सर ग़लत जानकारी देता है."

वीडियो कैप्शन, अर्नब गोस्वामी महाराष्ट्र की राजनीति में मोहरा या खिलाड़ी?

"रिपब्लिक एक तरह से लोगों को हैवान की तरह पेश करता है और अक्सर ऐसे लोगों को जिनके पास लड़ने की ताक़त नहीं, चाहे वे एक्टिविस्ट हों, युवा छात्र हों, अल्पसंख्यक हों या प्रदर्शनकारी."

प्रशंसक भी और आलोचक भी

रिपब्लिक का दावा है कि वो भारत का सबसे ज़्यादा देखा जाने वाला न्यूज़ चैनल है. इस दावे पर काफ़ी लोग भरोसा भी करते हैं क्योंकि टीआरपी के आंकड़ें कुछ ऐसा ही कहते हैं. लेकिन अब इन आंकड़ों पर भी विवाद है, अर्नब और उनके चैनल पर इन आंकड़ों में धांधली के आरोप की जांच हो रही है. हालांकि वे इन आरोपों को ख़ारिज करते हैं.

लेकिन ये साफ़ है कि अर्नब गोस्वामी का एक बड़ा प्रशंसक वर्ग है.

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एक फ़ाइनेंशियल कंसलटेंट गिरिधर पसुपुलेटी ने कहा, "रात को जब मैं घर जाता हूं तो सबसे पहला चैनल रिपब्लिक ही खोलता हूं. अर्नब गोस्वामी काफ़ी बहादुर हैं और जनता को सच बताने की कोशिश करते हैं."

जब उनसे पूछा कि क्या रिपब्लिक पर लगे फ़ेक न्यूज़ फैलाने के आरोपों से उन्हें फ़र्क़ पड़ता है, तो उनका कहना था, "मुझे इस बात पर विश्वास नहीं. वह सब छानबीन करके ही हमें सच बताते हैं."

अकाउंटेंट लछमन अदनानी का कहना है, "ये थोड़ी भड़कीली पत्रकारिता है लेकिन इसका काम तो सही मैसेज पहुंचाना है. ये शो बिज़नेस जैसा भी है. भड़कीलेपन को नज़रअंदाज़ कर जानकारी को देखना चाहिए जो बाक़ी चैनलों से इस चैनल पर काफ़ी अलग है."

लेखिका शोभा डे का मानना है कि इस तरह का प्रभाव काफ़ी ख़तरनाक है. वे कहती हैं, "हमें ज़्यादा नज़र रखने की ज़रूरत है, ज़्यादा चैक एंड बैंलेस लगाने की ज़रूरत है. बेशक़ ऐसी धमकी और झूठ भरी पत्रकारिता के बिना भी काम चल सकता है जिसे खोजी पत्रकारिता कहा जा रहा है."

ये सफ़र कहां से शुरू हुआ

वीडियो कैप्शन, अर्नब गोस्वामी की गिरफ़्तारी क्यों हुई, क्या है पूरा मामला?

अर्नब उत्तर-पूर्व राज्य असम में पैदा हुए थे. एक आर्मी अफ़सर के बेटे अर्नब ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन की और ऑक्सफ़ॉर्ड यूनिवर्सिटी से मास्टर डिग्री किया.

उन्होंने अपनी शुरुआत कोलकाता के टेलीग्राफ़ न्यूज़पेपर से की और उसके बाद उन्होंने एनडीटीवी न्यूज़ चैनल ज्वाइन किया. उनके पुराने सहकर्मी उन्हें एक संतुलित प्रेज़ेंटर के रूप में याद करते हैं जिन्होंने टीवी पर सार्थक बहस की.

लेकिन जब साल 2006 में टाइम्स नाउ चैनल शुरू हुआ और अर्नब इसका मुख्य चेहरा बने तबसे उनकी ऑन-स्क्रीन छवि धीरे-धीरे बदलती चली गई और आज वे सबके सामने हैं. उन्होंने भारत के मध्यम वर्ग की नस पकड़ी जो साल 2008 में मुंबई हमलों की वजह से कांग्रेस से नाराज़ था और भ्रष्टाचार के मामलों से भड़का हुआ. धीरे-धीरे वे घर-घर लिये जाने वाला नाम बन गए.

साल 2017 में उन्होंने रिब्पलिक चैनल की स्थापना की और उसके बाद वे ज़्यादा पक्षपाती और कठोर दिखने लगे. 2019 में उन्होंने हिंदी चैनल भी शुरू किया.

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शोभा डे अर्नब के कार्यक्रम में हिस्सा लेती थीं.

उन्होंने बताया, "जब उनकी पत्रकार के तौर पर एक विश्वसनीयता थी, तब मैं उनके शो में पैनलिस्ट के तौर पर जाती थी. लेकिन जब उन्होंने निष्पक्ष पत्रकार के तौर पर अपना काम करना छोड़ दिया तो मेरे मन से उनके लिए सम्मान ख़त्म हो गया. उन्होंने कई जगहों पर हद पार की है और आज के दिन उनकी ईमानदारी पर कई गंभीर सवाल हैं."

अर्नब को कुछ दिन पहले एक आर्किटेक्ट की मौत के लिए गिरफ़्तार किया गया था जिन्होंने उनका स्टूडियो डिज़ाइन किया था. अर्नब और उनका चैनल इस बात से इनकार करते हैं कि उन पर आर्किटेक्ट का कोई पैसा बक़ाया है.

कई लोगों का मानना है कि उन्हें इसलिए टारगेट किया गया क्योंकि उन्होंने महाराष्ट्र सरकार की कठोर आलोचना की थी.

गोस्वामी की राजनीतिक ताक़त का अंदाज़ा इस बात से भी लगा जब कई बीजेपी मंत्री उनके समर्थन में आए और उनकी गिरफ़्तारी को प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला बताया.

ये एक चौंकाने वाला दावा था क्योंकि पिछले कुछ सालों में बीजेपी की सरकार वाले राज्यों में कई पत्रकारों को गिरफ़्तार किया गया है. कई पर तो राजद्रोह और आतंकवाद का भी आरोप लगाया गया है. लेकिन किसी पार्टी नेता या मंत्री ने उनके लिए आवाज़ नहीं उठाई.

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रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स के प्रेस फ्ऱीडम इंडेक्स में 180 देशों में भारत का स्थान 142वां है. पिछले पांच सालों में ये छह पायदान नीचे खिसका है.

साल 2018 में गल्फ़ न्यूज़ के एक इंटरव्यू में अर्नब से उनके बीजेपी के लिए पक्षपाती होने को लेकर सवाल किया गया.

उन्होंने जवाब दिया, "ये अप्रमाणित दावा है. बल्कि हम तो बहुत मज़बूती से बीजेपी की आलोचना करते हैं जहां आलोचना की ज़रूरत होती है."

पिछले हफ्ते अर्नब गोस्वामी सात दिन की हिरासत के बाद रिहा हुए. उनका अपने न्यूज़रूम में लौटना लाइव ब्रॉडकास्ट किया गया.

उनकी टीम ने तालियों से उनका स्वागत किया. अर्नब ने अपने भाषण में कहा, "वे हमारी पत्रकारिता की वजह से हमारे पीछे पड़े हैं. अपनी पत्रकारिता की सीमा का फ़ैसला मैं करूंगा."

मनीषा पांडे कहती हैं, "जो रिपब्लिक करता है, उसे पत्रकारिता नहीं कहा जा सकता. ये एक रिएलटी शो कहा जा सकता है. लेकिन वह लोगों की राय को प्रभावित करने में कामयाब हो रहे हैं और यही लोकतंत्र में चिंताजनक बात है."

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