हाथरस मामला: सीबीआई जांच का फ़ैसला क्या योगी सरकार ने डैमेज कंट्रोल में किया

योगी आदित्यनाथ

इमेज स्रोत, Deepak Gupta/Hindustan Times via Getty Images

    • Author, कमलेश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

हाथरस मामले में एक दलित युवती के कथित गैंगरेप और हत्या के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार ने सीबीआई जांच की सिफारिश की है.

इस मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस की भूमिका पर कई सवाल उठ रहे थे.

इसके बाद शनिवार शाम को यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मामले की सीबीआई जांच की घोषणा की.

उन्होंने ट्वीट करके भी इसकी जानकारी दी.

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लेकिन, यूपी सरकार की घोषणा के बाद ही मृतका के परिवार ने सीबीआई जांच का विरोध कर दिया.

वीडियो कैप्शन, हाथरस केस: पीड़िता के भाई ने पुलिस और प्रशासन पर लगाए गंभीर आरोप

न्यायिक जांच की मांग

परिवार ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में न्यायिक जांच की मांग की. परिवार का कहना था कि उन्होंने सीबीआई जांच की मांग नहीं की थी.

यूपी कांग्रेस प्रभारी प्रियंका गांधी ने भी ट्वीट करते हुए सवाल उठाया कि परिवार न्यायिक जांच की मांग कर रहा है तब क्यों सीबीआई जांच का हल्ला करके एसआईटी की जांच जारी है.

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हाथरस मामले में सीबीआई जांच की मांग बसपा प्रमुख मायावती ने की थी. उन्होंने ट्वीट किया था कि इस मामले में सीबीआई से या सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच होनी चाहिए.

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लेकिन, एक दिन पहले ही कई पुलिसकर्मी निलंबित किए गए, फिर अभियुक्तों, मृतका के परिवार के सदस्यों और जांच में शामिल पुलिसकर्मियों के नार्को टेस्ट के आदेश दिए गए और इसके बाद विशेष जांच दल (एसआईटी) भी पूछताछ के लिए पहुंचा.

लेकिन, इस सबके बीच अचानक आई सीबीआई जांच की सिफारिश पर सवाल उठने लगे हैं कि क्या यूपी सरकार इस मामले में अपना पल्ला झाड़ना चाहती है.

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कांग्रेस का हमला और डैमेज कंट्रोल

इस संबंध में राजनीतिक विश्लेषक राधिका रामाशेषन का कहना है कि यूपी सरकार इस वक़्त डेमेज कंट्रोल कर रही है.

वह कहती हैं, "हाथरस मामले में केंद्र और राज्य सरकार दोनों को ये अंदाज़ा नहीं था कि मामला इतना आगे बढ़ जाएगा. वो जो भी कर रहे हैं उसे डेमेज कंट्रोल ही कह सकते हैं. इससे पहले भी उत्तर प्रदेश में गंभीर मामले हुए हैं, चाहे विकास दूबे के एनकाउंटर का मामला हो या सीएए के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शनों के बाद की कार्रवाई. इन सभी मामलों में यूपी पुलिस पर सवाल उठे थे लेकिन सरकार ने इन्हें संभाल लिया."

"इस बार सरकार मामले को समझने में चूक गई. साथ ही कांग्रेस की सक्रियता ने भी उन्हें चौंका दिया है. पिछले मामलों में तो विपक्ष ने खास प्रतिक्रिया ही नहीं दी थी. सरकार को लगने लगा था कि विपक्ष तो है ही नहीं. लेकिन, अब जो परिस्थितियां बदलीं उसमें केंद्र और राज्य दोनों में बीजेपी की सरकार है तो उनके लिए सीबीआई को ये मामला सौंपना बेहतर विकल्प है. इससे सभी का फोकस यूपी पुलिस से हट जाएगा."

वहीं, सीबीआई के पूर्व संयुक्त निदेशक एनके सिंह बताते हैं कि सीबीआई राज्य में होने वाले रेप और हत्या के मामलों में जांच नहीं करती है. ये राज्य सरकार के अधीन आते हैं. लेकिन, कुछ परिस्थितियों में बहुत विवाद होने पर और राज्य सरकार व पुलिस की निष्पक्षता पर प्रश्न उठने पर सीबीआई को जांच दी जाती है. जैसा कि उन्नाव में रेप मामले में हुआ था. यूपी सरकार ने भी इसी विवाद से निकलने की कोशिश की है.

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सीबीआई पर भरोसा क्यों नहीं

हाथरस मामले में एक बात और सामने आई कि जहां आमतौर पर सीबीआई को जांच सौंपने पर सभी पक्ष आश्वस्त हो जाते हैं और मामला शांत हो जाता है वहीं, इसमें ऐसा कुछ नहीं हुआ.

परिवार ने तुरंत ही सीबीआई जांच का विरोध किया. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में न्यायिक जांच की मांग की है. इससे ये सवाल भी उठता है कि क्या सीबीआई जांच भी अब संदेह के घेरे में आ गई है, उस पर भरोसा डगमगाने लगा है और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच की जरूरत पड़ने लगी है.

इस सब पर पर चर्चा से पहले ये जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच होने का मतलब क्या है.

'रेप लॉज एंड डेथ पेनेल्टी' किताब के लेखक एवं सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच को लेकर कोई संवैधानिक व्यवस्था नहीं है. जिस तरह आर्टिकल 32 में पीआईएल का विस्तार किया गया था उस तरह से भ्रष्टाचार के कुछ मामलों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच कराने का निर्णय लिया गया. इसके तीन तरीके होते हैं-

- कोई मामला सुप्रीम कोर्ट में जाए और कोर्ट अपनी निगरानी में सीबीआई या एसआईटी की जांच करवाए.

- सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जजों की अध्यक्षता में जांच हो.

- हाईकोर्ट की निगरानी में एसआईटी की जांच हो.

लेकिन, सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच तभी हो सकती है जब कोई मामला कोर्ट में जाता है. इसके आदेश देने का अधिकार सरकार के पास नहीं होता. इसमें अपराध की जांच तो पुलिस या सीबीआई ही करती है लेकिन उस जांच की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के पास जाती है.

लेकिन, पुलिस पर लीपापोती के जो आरोप लग रहे हैं उसकी जांच सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट की निगरानी में या सेवानिवृत्त जज की अध्यक्षता में ही की जा सकती है.

जांच एजेंसी को नियमित अंतराल पर सुप्रीम कोर्ट को रिपोर्ट सौंपनी होती है जिससे राजनीतिक हस्तक्षेप गुंजाइश बहुत कम हो जाती है.

सुप्रीम कोर्ट की निगरानी से मतलब ये है कि जांच एजेंसी की नियुक्त या अनुमोदन सुप्रीम कोर्ट करता है. जो अधिकारी इसकी जांच करेंगे उन्हें लेकर कोई राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं होगा. इसके अलावा जांच एजेंसी अपनी सारी रिपोर्ट्स सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के समक्ष पेश करेंगी.

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स्थानीय संस्थाओं को करें दुरुस्त

जानकार मानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में होने वाली जांच में राजनीतिक हस्तक्षेप ना के बराबर होता है. ये सर्वोच्च संस्था है इसलिए लोगों का उस पर भरोसा बना रहता है.

लेकिन, ये भी कहा जाता है कि सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच कराना हर मर्ज़ की दवा नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने खुद कुछ मामलों में कहा है कि ये उनका नियमित न्यायिक क्षेत्र नहीं है. ऐसे में ज़रूरी है कि सरकारें स्थानीय स्तर पर बनी संस्थाओं को दुरुस्त करे.

विराग गुप्ता कहते हैं, “अगर आपको हाशिये के व्यक्ति तक न्याय पहुंचाना है तो स्थानीय स्तर पर मौजूद पुलिस को ही विश्वसनीय बनाना होगा. क़ानूनी प्रक्रिया में आम लोगों का पहला सामना पुलिस थाने के इंस्पेक्टर से ही होता है. अगर वहां निष्पक्षता और गंभीरता से जांच नहीं होगी तो सीबीआई और सुप्रीम कोर्ट कितने मामलों की जांच करेंगे.”

“हालांकि, दुर्भाग्य ये है कि पुलिस भी अब राजनीतिक खानों में बंट गई है. जब राजनीतिक खानों में जांच होने लगती है तो क़ानून मायने नहीं रखता. ऐसी स्थिति में लोगों का भरोसा उठने लगता है.”

पहले भी कई मामलों पर सीबीआई की आलोचना हुई है. सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नरेंद्र दाभोलकर और गौरी लंकेश की हत्या के मामले में सीबीआई जांच में कुछ खास सामने नहीं आ पाया. जवाहरलाल नेहरू विश्विविद्यालय के छात्र नजीब अहमद के रहस्यमय तरीके से लापता होने का मामला भी अभी तक सुलझ नहीं पाया है.

इसी तरह मध्य प्रदेश में व्यापम घोटले से लेकर शारदा चिट फंड घोटाले में भी सीबीआई को खास सफलता हाथ नहीं लग पाई.

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सीबीआई की छवि को पहुंचा नुक़सान

सीबीआई जांच पर पैदा हुए अविश्वास को लेकर एनके सिंह भी मानते हैं कि सीबीआई पर अब पहले जैसा भरोसा नहीं रहा. अगर परिवार सीबीआई जांच से इनकार कर रहा है तो इसका मतलब है कि उसका सरकारी जांच एजेंसियों से भरोसा ख़त्म हो गया है.

वह कहते हैं, “लाल बहादुर शास्त्री ने जैसी जांच एजेंसी की कल्पना की थी, सीबीआई अब वैसी नहीं रही. हालांकि, जब शास्त्री जी प्रधानमंत्री थे तब लोग न्यायिक जांच की जगह सीबीआई जांच की मांग करते थे. सीबीआई उस भरोसे को बनाए रखने में सफल भी होती थी.”

हालांकि, एनके सिंह ये भी कहते हैं कि सीबीआई ने कई मामलों में बेहतरीन प्रदर्शन किया है. लोगों का अब भी उस पर भरोसा कायम है और सीबीआई जांच की मांग की जाती है. लेकिन, जो क्षति उसकी छवि को पहुंची है उस पर विचार करने की जरूरत है.

फिलहाल हाथरस मामले में सीएम योगी आदित्यनाथ की सीबीआई जांच की सिफारिश पर केंद्र सराकर की ओर से कोई बयान नहीं आया है. इस मामले पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेकर यूपी सरकार के शीर्ष अधिकारियों को तलब भी किया था.

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