कन्हैया कुमार ने क्या उमर ख़ालिद के मामले में चुप्पी साध रखी है- BBC EXCLUSIVE

    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता कन्हैया कुमार का कहना है कि उन्होंने दिल्ली दंगों के मामले में उमर ख़ालिद की गिरफ़्तारी को लेकर चुप्पी नहीं साध रखी है.

उमर ख़ालिद जेएनयू में कन्हैया कुमार के साथ विवादित नारों के मामले में गिरफ़्तार हुए थे और उन पर भी राजद्रोह का आरोप लगा था.

अब कन्हैया कुमार पर आरोप है कि उन्होंने दिल्ली दंगों के मामले में उमर ख़ालिद का खुलकर समर्थन नहीं किया है. कन्हैया कहते हैं कि बात सिर्फ़ एक उमर की नहीं है, दर्जनों लोगों को जेल में बंद किया गया है, इसी कड़ी में उमर भी एक हैं.

कन्हैया कहते हैं, "जो सत्ता अभी देश में क़ाबिज है, वो चाहती है कि देश में जो असहमति की आवाज़ है, उसका अपराधीकरण कर दिया जाए. उन्हें फ़र्जी रिपोर्टों के आधार पर, उन्हें फ़र्जी बहसों के आधार पर, नकली वीडियो बनाकर, ग़लत तरीक़े का वॉट्सऐप मैसेज बनाकर उनकी ही जनता के बीच उन्हें बदनाम कर दिया जाए."

उन्होंने ये सवाल उठाया कि अगर सरकार इतनी ही निष्पक्ष थी तो उन्होंने क्यों नहीं उन लोगों पर कार्रवाई की, जिन्होंने खुलेआम गोली मारने की बात की, जिन्होंने पुलिस की मौजूदगी में दंगा भड़काने की बात की. उनको तो कुछ नहीं हो रहा है. इस देश में दंगा भड़काने के अभियुक्त, तड़ीपार होने वाले लोग सत्ता पर क़ाबिज हो जाते हैं, तो न्याय की आवाज़ को दबाया जाता है.

इस साल फरवरी में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के मामले में 'यूनाइटेड अगेंस्ट हेट' के सह-संस्थापक उमर ख़ालिद को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने गिरफ़्तार किया है.

फ़िलहाल वे दिल्ली पुलिस की हिरासत में हैं. उन्हें 'यूएपीए' यानी ग़ैर-क़ानूनी गतिविधियाँ रोकथाम अधिनियम की धाराओं के तहत गिरफ़्तार किया गया. उनकी गिरफ़्तारी को लेकर विभिन्न छात्र संगठनों ने अपना विरोध जताया है.

इन गिरफ़्तारियों को लेकर दिल्ली के प्रेस क्लब में जाने-माने अधिवक्ता प्रशांत भूषण और एनी राजा के साथ सामाजिक संगठनों ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस का आयोजन किया था. इसमें बोलने वालों में कन्हैया कुमार का भी नाम था. लेकिन वो कार्यक्रम में नहीं आए.

इस पर कन्हैया कुमार का कहना है, "जिस दिन प्रेस क्लब में पत्रकार वार्ता आयोजित की गई, उस दिन मैं दिल्ली में नहीं था. आप मेरी फ़ेसबुक पोस्ट देख लीजिए. मैंने ग़िरफ्तारी के ख़िलाफ़ लिखा है.

कन्हैया ने पिछले दिनों एक लंबा फ़ेसबुक पोस्ट ज़रूर लिखा था, लेकिन उस पोस्ट में कई मुद्दों की चर्चा थी और सीधे तौर पर उमर ख़ालिद के नाम का ज़िक्र नहीं था.

बीबीसी के साथ विशेष बातचीत में कन्हैया कुमार ने कहा कि इस मामले में पार्टी का रुख़ स्पष्ट है. उन्होंने कहा- जिस किसी भी व्यक्ति के लोकतांत्रिक अधिकारों पर प्रहार हो रहा हो, चाहे उसकी पहचान कोई भी हो, हमारी विचारधारा के विपरीत सोच भी रखने वाला हो. हम उसके अधिकारों के लिए लड़ेंगे और अन्याय के ख़िलाफ़ भी लड़ेंगे.

कन्हैया कुमार कहते हैं, "संगठन ने तय किया कि इस मुद्दे को लेकर राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपना चाहिए. इसलिए अगले ही दिन कांग्रेस, राजद और वाम दलों के प्रतिनिधि मंडल ने राष्ट्रपति से मुलाक़ात की और दिल्ली दंगों की जिस तरह दिल्ली पुलिस जाँच कर रही है और निर्दोष लोगों को फँसा रही है, उस पर अपनी आपत्ति और विरोध दर्ज कराया."

इस साल फ़रवरी के आख़िरी हफ़्ते में दिल्ली में हुए दंगों में 53 लोग मारे गए थे. दिल्ली पुलिस का कहना है कि मारे गए लोगों में से 40 मुसलमान और 12 हिंदू थे.

हाल ही में दिल्ली पुलिस ने इस मामले में 17 हज़ार पन्नों की चार्जशीट दाखिल की है, जिनमें 15 लोगों को अभियुक्त बनाया गया है. अभियुक्तों पर यूएपीए, आईपीसी और आर्म्स एक्ट के तहत कई धाराएँ लगाई गई हैं.

बिहार विधानसभा चुनाव लड़ेंगे कन्हैया कुमार?

तो क्या कन्हैया कुमार बिहार चुनाव की तैयारी तो नहीं कर रहे हैं.

इस पर कन्हैया कुमार कहते हैं कि वो चुनाव नहीं लड़ना चाहते हैं. लेकिन उनका ये भी कहना है कि सब कुछ उनकी पार्टी सीपीआई पर निर्भर करता है कि वो उनको बिहार विधान सभा चुनाव में क्या ज़िम्मेदारी सौंपती है. कन्हैया कुमार सीपीआई के राष्ट्रीय परिषद के सदस्य भी हैं.

उन्होंने कहा, "जहाँ तक मेरे चुनाव लड़ने का सवाल है, व्यक्तिगत तौर पर मैं उम्मीदवार नहीं हूँ. मैं चुनाव नहीं लड़ रहा हूँ. लेकिन जब चुनाव होगा, तो पार्टी चुनाव लड़ेगी. पार्टी का सदस्य होने के नाते, जो ज़िम्मेदारी मुझे मिलेगी, मैं उसे निभाऊँगा."

बीबीसी से ख़ास बातचीत के दौरान कन्हैया कुमार ने कहा कि उनकी पार्टी का स्पष्ट मत था कि कोरोना महामारी के काल में बिहार में चुनाव फ़िलहाल होने ही नहीं चाहिए.

उनका कहना था कि उनकी पार्टी ने चुनाव आयोग से कहा है कि वो स्पष्ट करे कि मौजूदा महामारी की हालात में किस तरह से चुनाव संपन्न होंगे, जिसमें सबकी सुरक्षा का इंतज़ाम हो सके.

वो कहते हैं, "हम तो नहीं चाहते कि चुनाव फ़िलहाल इस माहौल में हो. चुनाव आयोग को बताना चाहिए कि सामजिक दूरी के साथ किस तरह प्रचार हो पाएगा? किस तरह का इंतज़ाम मतदान केंद्रों में होगा, जिससे मतदान कर्मियों और मतदाताओं की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जा सके. फिर भी अगर सब संसदीय दल चुनाव लड़ने को तैयार हो जाते हैं तो हम भी संसदीय दल ही हैं. हमें भी इन चुनावों में शामिल होना पड़ेगा."

विपक्षी दलों में हो पाएगी एकजुटता

बिहार विधानसभा के चुनाव से पहले वाम दलों ने संकेत दिए हैं कि वो राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस की अगुआई वाले महागठबंधन का हिस्सा भी बन सकते हैं.

इसे लेकर बातचीत जारी है. जहाँ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) और सीपीआई ने राष्ट्रीय जनता दल के बिहार के अध्यक्ष से मिलकर गठबंधन में शामिल होने की मंशा जताई, वहीं सीपीआई-एमएल (लिबरेशन) की भी सीटों के बँटवारे को लेकर बातचीत जारी है.

पिछले विधानसभा के चुनावों में सीपीआई (एमएल) को तीन सीटें मिलीं थीं, जबकि सीपीएम और सीपीआई को एक भी सीट नहीं मिली थी. वो बात और है कि 70 के दशक में सीपीआई बिहार विधानसभा की मुख्य विपक्षी पार्टी रही है.

लेकिन समय के साथ लाल झंडे की राजनीति करने वालों का आधार सिकुड़ता हुआ दिखने लगा और ये बिहार के कुछ इलाक़ों में ही सिमट कर रह गए. कन्हैया ने स्वीकार किया कि आपसी मतभेद की वजह से वाम दलों को नुक़सान उठाना पड़ा. लेकिन उनका ये भी कहना था कि बाक़ी के राजनीतिक दलों की तुलना में वाम दल जनता के मुद्दों को लेकर संघर्ष करते हैं.

वो कहते हैं, "वाम दलों के पास संसाधनों की कमी है. उतने पैसे भी नहीं हैं जो दूसरे मुख्य धारा के राजनीतिक दलों के पास हैं. अब मिसाल के तौर पर भारतीय जनता पार्टी ने बिहार में चुनाव प्रचार के लिए 70 हज़ार एलईडी टीवी लगवाए हैं. हमारे पास उतना पैसा ही नहीं है कि हम इस तरह चुनाव का प्रचार करें. उसी तरह राजनीतिक दल सोशल मीडिया के ज़रिए भी काफ़ी सक्रिय हैं. लेकिन वाम दल और ख़ास तौर पर हमारी पार्टी उतने बड़े पैमाने पर इस तरह की व्यवस्था नहीं कर सकती क्योंकि इसमें भी काफ़ी पैसे लगते हैं."

क्यों खिसका वामदलों का आधार?

लेकिन जानकारों को लगता है कि लाल झंडे की राजनीति करने वालों के समर्थकों का जो मज़बूत आधार था, उसकी वजह दलित, पिछड़े, ओबीसी और अल्पसंख्यकों का संघर्ष था.

इन विश्लेषकों के मुताबिक़ पिछड़ों की राजनीति करने वाले वाम दलों में और ख़ास तौर पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का नेतृत्व हमेशा अगड़ी जाति के हाथों में रहा और इसी वजह से संगठन का ज़मीनी आधार खिसकता रहा.

लेकिन कन्हैया कुमार ऐसा नहीं मानते और कहते हैं कि डी राजा पिछड़ी जाति से आते हैं और वो पार्टी के महासचिव हैं. लेकिन जानकार कहते हैं कि यह सीपीआई के इतिहास में पहली बार किया गया है और वो भी तब जब संगठन का आधार कमज़ोर होता साफ़ दिखने लगा.

इससे पहले भी सीपीआई के संगठन के जो चर्चित चेहरे रहे हैं, वो अगड़ी जातियों से ही रहे हैं. चाहे वो बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे सुनील मुखर्जी हों या फिर रामावतार शास्त्री, भोगेन्द्र झा और चतुरानन मिश्र.

कन्हैया का कहना था कि विधानसभा और संसद में भी सीपीआई की तरफ़ से पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक श्रेणी से कई नेता प्रतिनिधित्व करते रहे हैं. संगठन ने ऐसे तबक़े से आने वाले नेताओं को हमेशा से ही प्रोत्साहित करने का काम किया है.

लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक़ भारतीय जनता पार्टी की आक्रामक हिंदुत्व की राजनीति ने अगड़ी जातियों का ध्रुवीकरण उसके पक्ष में करना शुरू कर दिया.

वहीं मंडल कमीशन की रिपोर्ट के बाद बिहार की राजनीति में ऐसे दलों का उदय हुआ, जिन्होंने वाम दलों के समर्थन वाले गढ़ में सेंध लगा दी और ये तबक़ा जातिगत राजनीति की तरफ़ आकर्षित हो गया.

कन्हैया कहते हैं कि यह ग़लत प्रचार किया जाता रहा है कि सीपीआई आरक्षण के समर्थन में नहीं है. जबकि सीपीआई मंडल कमीशन की रिपोर्ट का समर्थन करती रही है. सीपीआई पर ये भी आरोप लगे कि जब मुख्यमंत्री रहते कर्पूरी ठाकुर ने आरक्षण की बात कही, तो उसने समर्थन नहीं किया था.

आरक्षण के सवाल पर कन्हैया

इस मुद्दे पर कन्हैया कुमार ने बताया, "सीपीआई का हमेशा से ये स्टैंड रहा है कि जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण दिया जाना चाहिए. अब शरीर को ही उदहारण के तौर पर ले लीजिए. सारे अंग अपने अनुपात के हिसाब से ही ठीक लगते हैं. अब अगर नाक बहुत लंबी हो जाए या कान, वो स्वभाविक रूप से सही नहीं है. इसी तरह आरक्षण को भी लोगों की आबादी और उनके प्रतिनिधित्व के हिसाब से देखा जाना चाहिए."

उनका कहना था कि उनकी पार्टी अगड़ी जाति के लिए लाए गए 10 प्रतिशत आरक्षण का भी समर्थन करती है.

बिहार में वाम दलों के हालात कुछ ऐसे हो गए कि बेगूसराय, मिथिलांचल, सिवान और चंपारण के अलावा इक्का दुक्का इलाक़ों में वाम दलों का कुछ प्रभाव बाक़ी रहा. जबकि राज्य के अन्य इलाक़ों में इनकी पकड़ कमज़ोर होने लगी.

बेगूसराय की बात की जाए, तो महागठबंधन का हिस्सा होते हुए भी सीपीआई और राष्ट्रीय जनता दल ने लोकसभा चुनाव में इस सीट पर भारतीय जनता पार्टी के गिरिराज सिंह के ख़िलाफ़ अलग-अलग उम्मीदवार उतारे.

सीपीआई ने कन्हैया कुमार को, राष्ट्रीय जनता दल ने इस सीट पर तनवीर हसन को उतारा था. नतीजा गिरिराज सिंह के पक्ष में आया. कहा जाता है कि सीपीआई और राष्ट्रीय जनता दल ने इस सीट को मूंछ की लड़ाई बना लिया था.

इस पर कन्हैया कुमार का कहना था, "पता नहीं कि गठबंधन के नेताओं के बीच उस समय बेगूसारय की सीट को लेकर क्या तय हुआ था. लेकिन दूसरी सीटों पर तो महागठबंधन के घटक दलों ने एक दूसरे का समर्थन किया था. वैसे जो बीत गया सो बीत गया और अब आगे का सोचना होगा."

विश्लेषकों के मुताबिक़ बेगूसराय की सीट महागठबंधन के प्रमुख दलों यानी सीपीआई और राजद के बीच सम्मान की लड़ाई इसलिए बन गई थी, क्योंकि लोकसभा चुनाव होने तक कन्हैया कुमार ने देश की छात्र राजनीति में अपनी मज़बूत पकड़ बना ली थी और वो 'ब्रांड कन्हैया' बन चुके थे.

तेजस्वी के नेतृत्व में ही लड़ना होगा चुनाव?

जहाँ राजद की विरासत एक दूसरे उभरते हुए 'ब्रांड तेजस्वी यादव' को मिल रही थी, ऐसे में कन्हैया कुमार के बिहार की राजनीति में आने से राष्ट्रीय जनता दल में बेचैनी ज़रूर देखी गई. लेकिन जानकार कहते हैं कि विधानसभा के चुनावों में विपक्षी पार्टियों की भी मजबूरी है कि वो तेजस्वी यादव के नेतृत्व में चुनाव लड़ें.

कमज़ोर पड़ने के बावजूद आज भी बिहार विधानसभा की 50 से ज़्यादा ऐसी सीटें हैं, जहाँ वाम दलों का समर्थन बहुत मायने रखता है. ये वो सीटें हैं, जहाँ जीत और हार वाम दलों के प्रभाव से ही तय होगा. जानकार कहते हैं कि फ़िलहाल महागठबंधन के लिए भारतीय जनता पार्टी और जनता दल (यूनाइटेड) के गठबंधन को हराना प्राथमिकता है न कि कौन मुख्यमंत्री बनेगा.

कन्हैया कुमार का कहना है कि बिहार विधान सभा के चुनावों में विपक्षी दलों का रुख़ काफ़ी सकारात्मक है, क्योंकि सब दलगत राजनीति से आगे बढ़कर विपक्षी एकता की बात कर रहे हैं.

कन्हैया कुमार हमेशा से सुर्ख़ियाँ बटोरते रहे हैं. लेकिन पिछले कई महीनों से वो न तो टीवी चैनेलों पर न सोशल मीडिया पर ही ज़्यादा दिखाई दिए. आख़िर क्यों?

वो कहते हैं कि कोरोना वायरस की महामारी ने सब कुछ बदल दिया है. पहले मुद्दों को लेकर वो सड़कों पर उतर आते थे. वो कहते हैं, "कोरोना वायरस से फैली महामारी की वजह से विरोध करने का तरीक़ा भी बदल गया."

उन्होंने यह भी कहा, "मैं सोशल मीडिया को विरोध दर्ज करने का माध्यम नहीं बनाना चाहता, क्योंकि इसमें लोगों की निजता सुरक्षित नहीं है. न ही ये सही माध्यम ही है. ज़मीनी मुद्दों को लेकर ज़मीनी स्तर पर ही संघर्ष होना चाहिए."

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