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रघुवंश प्रसाद सिंह: लालू यादव के साथ हमेशा खड़े रहे, आखिरी वक़्त में क्यों छोड़ा साथ?
- Author, शुभम किशोर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बिहार के राष्ट्रीय जनता दल के नेता रघुवंश प्रसाद सिंह का रविवार को दिल्ली के एम्स अस्पताल में निधन हो गया.
दो दिन ही पहले ही उनकी लालू यादव को हाथ से लिखी एक चिट्ठी सुर्खियों में आई थी. चिट्ठी में लालू यादव को उन्होंने अपना इस्तीफ़ा भेजा था.
हालांकि लालू ने उनके इस्तीफ़े को नामंजूर करते हुए जवाब दिया था वो आरजेडी से बाहर नहीं जाएंगे.
रविवार को जब सिंह के निधन की ख़बर आई तो लालू ने श्रद्धांजलि देते हुए ट्वीट किया, “प्रिय रघुवंश बाबू! ये आपने क्या किया? मैनें परसों ही आपसे कहा था आप कहीं नहीं जा रहे हैं. लेकिन आप इतनी दूर चले गए. नि:शब्द हूं. दुःखी हूँ. बहुत याद आएँगे."
हमेशा लालू-आरजेडी का साथ दिया
तमाम उतार-चढ़ाव, आरोपों प्रत्यारोपों, हार-जीत और हर कदम पर लालू के साथ खड़े दिखने वाले रघुवंश प्रसाद ने अपने निधन से दो दिन पहले पार्टी छोड़ने का फ़ैसला क्यों किया?
जेडीयू में रह चुके आरजेडी नेता शिवानंद तिवारी बताते हैं, “वो हमेशा अपनी बात रखते थे, कई बार प्रेस कॉन्फ्रेंस में, पार्टी के मंच पर, जब महागठबंधन में भी थे तब भी वहां जो ग़लत लगता था, वो कह देते थे लेकिन उन्होंने कभी लालू यादव का साथ नहीं छोड़ा, वो हमेशा आरजेडी में बने रहे, अब आख़िरी वक़्त में ऐसा क्या हुआ यह बता पाना मुश्किल हैं.”
आरजेडी के कई सीनियर नेता 2005 में बिहार विधानसभा चुनाव में आरजेडी की हार के बाद पाला बदलकर नीतीश कुमार के साथ आ गए थे. शिवानंद तिवारी और श्याम रजक जैसे नेता भी नीतीश कुमार के साथ चले गए थे.
लालू, आरजेडी और सिंह के बीच ऐसा क्या हुआ जो उन्होंने इस्तीफ़ा देने का फैसला किया? इसके जवाब में तिवारी कहते हैं, “मुझे नहीं लगता इन मुद्दों पर मुझे बात करनी चाहिए, ये वक़्त है एक महान शख़्सियत को उनके योगदान के लिए याद करने का.”
हालांकि वो इस बात को मानते हैं कि लालू यादव के जेल जाने के बाद रघुवंश प्रसाद सिंह के लिए परिस्थितियां पहले जैसी नहीं रही होंगी. “ये समझा जा सकता है, तेजस्वी आज के नेता हैं, उनके काम करने का अलग अंदाज़ है, दो अलग-अलग पीढ़ियों के बीच ऐसी दिक्कतें आना लाज़मी है, इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में एक ऐसा नेता जिसे मोबाइल भी रखना नहीं पसंद, उसकी नई पीढ़ी से साथ मतभेद तो होंगे ही.”
“वो लालू यादव के घर में घंटों बैठ कर चर्चा करने वाले शख़्स थे, तेजस्वी के साथ वो घंटों क्या ही विमर्श कर पाते”
बिहार के वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं, “वो कुछ नेताओं से दूर रहना चाहते थे, जिन्हें पार्टी जगह दे रही थी, वो शायद इससे बिल्कुल सहमत नहीं थे.”
इसके अलावा पार्टी में परिवारवाद को लेकर भी उन्होंने चिंता ज़ाहिर की थी. ठाकुर कहते हैं, “उन्हें लग रहा था कि लालू के बेटे और परिवार का वर्चस्व पार्टी पर भारी पड़ रहा है, पुराने लोगों को नहीं पूछा जा रहा है, उन्होंने कहा था कि कर्पूरी ठाकुर के बाद वो 32 सालों तक लालू के साथ खड़े रहे. वह लालू यादव के हर उतार-चढ़ाव का हिस्सा थे.”
आरजेडी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के पद पर रह चुके रघुवंश प्रसाद सिंह पार्टी में अब किसी पद पर नहीं थे. माना जाता है कि पार्टी और तेजस्वी यादव के काम करने के तरीकों से नाराज़ होकर उन्होंने अपने पद से इस्तीफ़ा दिया था. ठाकुर कहते हैं, “यह साफ़ दिखने लगा था उनसे मशवरा लेना भी ज़रूरी नहीं समझा जाता था.”
आरजेडी के मुश्किल वक़्त में हमेशा साथ रहने वाले रघुवंश की अपनी एक अलग छवि थी, ख़ासकर ग़रीबों और पिछड़े वर्ग के लोगों के बीच. ठाकुर बताते हैं कि सबको साथ लेकर चलना, ख़री-ख़री बातें करना और पार्टी के निर्णय का विरोध करने से भी वो नहीं पीछे रहते थे.
ठाकुर कहते हैं, “आजकल की राजनीति में वो शायद फ़िट नहीं होते थे.”
पटना के ए एन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज़ में पूर्व निदेशक डॉ. डीएम दिवाकर बताते हैं, “वो अपनी राय रखने के लिए जाने जाते थे, पार्टी के अंदर भी वो मुखरता से विरोध करते थे. सबसे ख़ास बात थी कि लालू प्रसाद यादव उनकी बातों को सुनते थे, उनकी आलोचनाओं को गंभीरता से लिया जाता है, उन्होंने कभी पार्टी नहीं छोड़ी. ऐसा इसलिए क्योंकि वो आरजेडी को अपनी पार्टी मानते थे, उन्हें लगता था कि पार्टी अगर ग़लत है, तो उसे सही रास्ते पर लाना उनका कर्तव्य है.”
लालू यादव को लिखी उनकी आख़िरी चिट्ठी को भी दिवाकर अलग नज़रिये से देखते हैं.
वो कहते हैं, “उन्होंने ये नहीं कहा कि वो त्यागपत्र दे रहे है, वो कह रहे हैं कि 32 वो साल उनके साथ रहे, अब नहीं, अब नहीं का मतलब है कि जिस समाजिक न्याय की लड़ाई को हम साथ लेकर चले थे, वो अगर रास्ते से भटकेगा, तो अब नहीं चुप रहूंगा.”
दिवाकर कहते हैं कि 32 साल जिस पार्टी का सपना लेकर रघुवंश सिंह चले थे, उन्हें लग रहा था कि वो अपने उद्देश्य से भटक गई है.
रघुवंश प्रसाद सिंह साल 2014 में वैशाली से चुनाव हार गए थे, लेकिन अपने क्षेत्र के लोगों का उन्हें हमेशा ध्यान रहता था. दिवाकर के मुताबिक हाल ही में उन्होंने अस्पताल से नीतीश कुमार को एक चिट्ठी लिखी जिसमें वैशाली से जुड़े मुद्दों का ज़िक्र किया.
गांव-गांव तक मनरेगा पहुंचाने में भूमिका
रघुवंश प्रसाद सिंह यूपीए-1 में ग्रामीण विकास मंत्री थे और मनरेगा क़ानून का असली शिल्पकार उन्हें ही माना जाता है. भारत में बेरोज़गारों को साल में 100 दिन रोज़गार मुहैया कराने वाले इस क़ानून को ऐतिहासिक माना गया था. कहा जाता है कि यूपीए-2 को जब फिर से 2009 में जीत मिली तो उसमें मनरेगा की अहम भूमिका थी.
डीएम दिवाकर बताते हैं, “उनका ग्रामीण जीवन से ताल्लुक बहुत गहरा था, ग्रामीण विकास मंत्री के तौर पर उनका पूरा ज़ोर अंतिम पंक्तियों के व्यक्तियों तक सुविधाएं पहुंचाने का था, उन्हें पता था कि गांव में संसाधनों की कमी है जब खेती का मौसम नहीं होता तो लोगों के हाथ में कुछ काम देना ज़रूरी है.”
उन्होंने एक कमेटी बनाई, जिसकी अनुशंसाएं लागू की गईं, यहीं से 100 दिन के रोज़गार की योजना सामने आई.
शिवानंद तिवारी के मुताबिक मंत्रालय के कामकाज पर उनकी मज़बूत पकड़ थी. वो कहते हैं, “सदन में उनको जवाब देते हुए सुना है, कभी ऐसा नहीं लगा कि किसी जवाब में वो अटक गए हों या किसी जवाब में उन्हें सहायता की ज़रूरत पड़े, पूरे विभाग से जुड़ी जानकारियां उनके ज़ुबान पर रहती थीं”
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने ट्वीट कर रघुवंश सिंह से जुड़ी कई चीज़ों को साझा किया है. जयराम रमेश ने लिखा है, "मैं रघुवंश प्रसाद सिंह के निधन से बहुत दुखी हूं. वो बिहार के गणितज्ञ नेता थे. यूपीए एक में 2004 से 09 तक वो एक शानदार मंत्री रहे. ग्रामीण विकास मंत्री रहते हुए उन्होंने जो प्रतिष्ठा अर्जित की वो बहुत ऊंची थी. जब मैंने इस मंत्रालय को संभाला तो कई मामलों में उनकी सलाह लेता था."
संघर्ष पर ज़ोर देने वाले जननेता
जेडीयू के शिवानंद तिवारी ने लंबे समय तक उनके साथ राजनीति की. वो कहते हैं, “रघुवंश सिंह संघर्ष वाले नेता थे. पार्टी की मीटिंग में, अनेक मंचों पर उनका ज़ोर संघर्ष पर रहता लेकिन आज की राजनीति अलग हो गई है.”
उन्हें कर्पूरी ठाकुर के साथ काम करने का मौका मिला. तिवारी कहते हैं, "उनके लिए वो आदर्श थे. रघुवंश जी ने अपना एक स्टाइल बनाया था, वो लोगों के बीच उनके जैसे रहते थे. भारत सरकार में मंत्री रहने के बावजूद, बिहार सरकार में मंत्री रहने के बावजूद उनका अंदाज़ एकदम गंवई था, लोगों से उनका एक अलग जुड़ाव था."
वे कहते हैं, “ऐसे नेता अब बचे ही कहां हैं.”
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