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बिहार चुनाव: जीतन राम मांझी को नीतीश कुमार इस 'गेम प्लान' की वजह से अपने साथ लाए?
- Author, प्रवीण शर्मा
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
इसी साल अक्टूबर या नवंबर में बिहार में विधानसभा चुनाव हो सकते हैं. इसके चलते राज्य में राजनीतिक गतिविधियां तेज़ हो गई हैं. चुनाव से ठीक पहले नेताओं के एक दल से दूसरे दल में आने-जाने का सिलसिला भी तेज़ हो गया है.
भले पूरी दुनिया कोरोना वायरस से जूझ रही है और ख़ुद भारत में भी रोज़ाना 80,000 से ज़्यादा संक्रमण के मामले आ रहे हैं, लेकिन कोई भी पार्टी अपनी चुनावी तैयारियों को इसके चलते टालना नहीं चाहती है.
2013 में एनडीए से अलग चले गए नीतीश कुमार की अगुवाई वाले जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) ने 2017 में फिर से एनडीए से हाथ मिला लिया.
2015 के बिहार विधानसभा चुनावों में बीजेपी को 54 सीटें ही मिली थीं. तब नीतीश कुमार की पार्टी ने आरजेडी और कांग्रेस के साथ महागठबंधन बनाकर चुनाव लड़ा था और सत्ता हासिल की थी.
अब चूंकि, जेडीयू फिर से एनडीए के तहत चुनाव लड़ रही है ऐसे में बीजेपी हर हालत में बिहार में सत्ता को कायम रखना चाहती है. दूसरी ओर, लंबे वक्त से मुख्यमंत्री बने हुए नीतीश कुमार के लिए इस बार पहले के चुनावों के मुकाबले मुश्किलें कहीं ज़्यादा हैं.
महादलित, दलित और पिछड़ों के वोटों को साधने की कोशिश में नीतीश कुमार ने महागठबंधन में शामिल हो गए हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी को जेडीयू के साथ जोड़ लिया है.
जीतन राम मांझी ने कहा है कि उनकी पार्टी जेडीयू के साथ मिल-जुलकर चुनाव लड़ेगी. बिहार विधानसभा चुनावों में सीट शेयरिंग को लेकर उनकी अभी कोई चर्चा नहीं हुई है.
हालांकि, उनकी एनडीए में एंट्री को लेकर मामला अभी पेचीदा बना हुआ है. मांझी भले ही कह रहे हैं कि वो एनडीए में आ गए हैं, लेकिन एनडीए के एक मुख्य घटक दल राम विलास पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) को उनके आने पर आपत्ति है.
मांझी के एनडीए का हिस्सा बनने को लेकर लोक जनशक्ति पार्टी का रुख़ सख़्त दिखाई दे रहा है.
एलजेपी तो अभी ये मान ही नहीं रही है कि मांझी की पार्टी एनडीए का हिस्सा बन चुकी है.
एलजेपी के उपाध्यक्ष और मुख्य राष्ट्रीय प्रवक्ता ए.के बाजपेई कहते हैं, "एनडीए शब्द इस्तेमाल न करें क्योंकि मांझी की न तो बीजेपी से कोई बात हुई है और न ही एलजेपी से बात हुई है. जेडीयू से अगर उनकी कोई बात हुई है तो वे जानें और जेडीयू जाने. एनडीए की जब बात होगी तो हम तीनों पार्टियां बैठेंगी और तब फै़सला होगा."
महादलित वोटों पर नज़र
मांझी महादलितों में मुसहर समुदाय से आते हैं. गया के आसपास के इलाक़ों में उनका प्रभाव माना जाता है. राजनीति में आने के बाद से वे फ़तेहपुर, बाराचट्टी, बोधगया, मखदूमपुर और इमामगंज से भी चुनाव लड़े और जीत हासिल की. हालांकि, गया सीट से सांसद के रूप में निर्वाचित होने का उनका सपना अब तक पूरा नहीं हो सका है.
2015 के विधानसभा चुनावों में जीतनराम मांझी की पार्टी ने 21 सीटों पर चुनाव लड़ा था. लेकिन, पार्टी एक सीट ही जीत पाई है.
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मांझी के एनडीए में आने की राजनीति
जीतन राम मांझी का जेडीयू के साथ जाना एक तरह से पहले से तय था. वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं, "जीतन राम मांझी की जो राजनीतिक महत्वाकांक्षा है वो बढ़ गई है, लेकिन उस हिसाब से उनका जनाधार नहीं बढ़ा है. पिछले चुनावों में भी यह चीज़ दिखाई दी थी."
वो कहते हैं कि मांझी जितने भी दलों के साथ रहे उन्होंने उनकी उम्मीदों को पूरा नहीं किया है.
मणिकांत ठाकुर बताते हैं, "मांझी जिन दलों के साथ रहे उन्हें वोट ट्रांसफ़र नहीं करा पाए. इन पार्टियों का इनको लेकर मोहभंग हो गया."
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक सत्यव्रत मिश्रा कहते हैं कि मांझी और नीतीश दोनों को ही एक-दूसरे की ज़रूरत थी.
मिश्रा कहते हैं कि जीतन राम मांझी को एनडीए में 10-13 सीटें तक लड़ने के लिए मिल सकती हैं. महागठबंधन में उन्हें इतनी सीटें मिलने वाली नहीं थीं.
वो कहते हैं, "जीतन राम मांझी को ज़्यादा सीटें चाहिए थीं. पिछले चुनाव में उनके अधिकतर कैंडिडेट अपनी ज़मानत तक नहीं बचा पाए थे. ख़ुद मांझी दो सीटों में से एक पर चुनाव हार गए थे."
महादलितों में जिस मुसहर जाति से मांझी आते हैं उनका भी ये वोट अपने समर्थन वाली पार्टियों को नहीं दिला पाए. ठाकुर कहते हैं, "इसी वजह से राष्ट्रीय जनता दल ने इन्हें छोड़ने का मन बना लिया था. इसी वजह से मांझी की महागठबंधन में जो सीटों की मांग रही होगी उसे आरजेडी ने नकार दिया होगा. ये बात अलग है कि मांझी इसकी कुछ भी वजह बताते हों."
लेकिन, मांझी जेडीयू के साथ क्यों जुड़े और बीजेपी के साथ क्यों नहीं गए?
एक तरह से तो मांझी एनडीए का हिस्सा ही हैं. लेकिन, वो वास्तव में जेडीयू के साथ जुड़े हैं और इस तरह से एनडीए का हिस्सा बने हैं.
मणिकांत ठाकुर बताते हैं कि बीजेपी के साथ नहीं जाने की एक वजह यह रही है कि मांझी ने अपनी पार्टी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा में सेक्युलर शब्द जोड़ लिया था.
ठाकुर कहते हैं, "मांझी ये दिखाना चाहते थे कि उनका कोई धार्मिक रुझान नहीं है. वो महागठबंधन में भी इसी आधार पर गए थे. ऐसे में फिर से वापस आकर बीजेपी से मिलना उचित नहीं होता."
नीतीश से नाराज़ हैं लोग?
नीतीश के 15 सालों से बिहार की सत्ता पर काबिज़ हैं. कोरोना वायरस और बाढ़ के चलते पैदा हुई अव्यवस्थाओं से भी लोग सरकार से नाराज़ हैं. लोगों में ग़ुस्सा दिख रहा है.
मिश्रा कहते हैं, "कोविड-19 के वक्त पर राज्य सरकार के मुताबिक, क़रीब 40 लाख मज़दूर राज्य में वापस लौटे हैं. इनमें से ज़्यादातर महादलित और निचली जातियों के लोग हैं. इन मज़दूरों में बहुत ग़ुस्सा है. इन्हें लगता है कि नीतीश सरकार ने उनको छोड़ दिया और उनकी वजह से उन्हें पैदल चलकर आना पड़ा."
वो कहते हैं, "इन्हें लगता है कि अगर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार गुजरात से मज़दूरों को बुला सकती है तो नीतीश कुमार बनारस से उन्हें क्यों नहीं बुला सकते थे."
इसी ग़ुस्से को ख़त्म करने के लिए नीतीश हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं और उन्हें इसके लिए एक महादलित नेता की ज़रूरत थी जो उन्हें मांझी में दिखा.
मिश्रा कहते हैं कि भले ही नीतीश इस ग़ुस्से को पूरी तरह से शांत न कर पाएं, लेकिन वे चाहते हैं कि जितना मुमकिन हो सके इस डैमेज को कंट्रोल किया जाए.
लोक जनशक्ति पार्टी को मांझी से क्या दिक्कत है?
मांझी के एनडीए में शामिल होने पर राम विलास पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी ख़ुश नहीं है.
ठाकुर बताते हैं, "पिछले कुछ वक्त में चिराग पासवान ने बिहार सरकार के नेतृत्व पर कोविड-19 के फैसलों और लोगों के दूसरे मसलों को लेकर सवाल उठाए हैं. इसे लेकर माना जा रहा था कि पासवान अपनी पार्टी के लिए ज़्यादा सीटों का दावा रख रहे हैं."
"लेकिन, बात यहीं नहीं रुकी बल्कि बाद में इन्होंने नीतीश कुमार के खिलाफ खुलकर बोलना शुरू कर दिया. नीतीश ने इस चीज़ को गंभीरता से लिया है. उसके बाद उन्होंने ये रुख़ अपनाया कि हमारा एलजेपी के साथ कोई गठबंधन नहीं है, हमारा बीजेपी से गठबंधन है."
एलजेपी इशारों ही इशारों में नीतीश कुमार के नेतृत्व पर सवाल खड़ा करती है. पार्टी के उपाध्यक्ष और मुख्य राष्ट्रीय प्रवक्ता ए.के बाजपेई कहते हैं कि बिहार का जितना विकास होना चाहिए था उतना नहीं हुआ है.
बाजपेई कहते हैं, "हमने बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट का नारा दिया है. हमने मांग की है कि एनडीए में एक कॉमन मिनिमम प्रोग्राम बनाया जाए और हमारी मांगों को उसमें जगह दी जाए. बिहार में विकास की रफ्तार बढ़नी चाहिए."
हालांकि, वो यह भी कहते हैं कि पार्टी गठबंधन की सहयोगी पार्टियों को मिलने वाली सीटों पर भी पूरी जी-जान से मेहनत करेगी.
क्या दलितों का बड़ा नेता कौन होगा, इसे लेकर एलजेपी असहज है, इस पर बाजपेई कहते हैं कि पासवान लंबे वक्त से राजनीति में हैं और उनका और मांझी का कोई मुकाबला नहीं है.
ठाकुर कहते हैं, "अभी तक चूंकि सीटों का बंटवारा नहीं हुआ है तो ऐसे में यह चीज बाद में तय होगी. अगर एलजेपी की सीटों की मांग पर बात बन जाती है तो एलजेपी को एनडीए में रहने में कोई दिक्कत नहीं होगी."
बीजेपी भी राम विलास पासवान का साथ नहीं छोड़ना चाहती है क्योंकि पार्टी के पास बतौर पासवान एक बड़ा दलित नेता मौजूद है.
दूसरी ओर, चिराग पासवान के नीतीश के खिलाफ बयान देने से भी मांझी के जेडीयू में शामिल होने का आधार बना. ठाकुर कहते हैं, "इन्हीं के चलते नीतीश ने मांझी के खिलाफ पुरानी कड़वाहट को मिटाकर उन्हें अपने साथ मिलाया है. साथ ही नीतीश को एक दलित नेता भी मिल गया है."
लेकिन, मांझी के एनडीए से जुड़ने पर पासवान की दिक्कत की एक वजह और भी है.
मणिकांत ठाकुर बताते हैं, "एनडीए में अभी तक बीजेपी, एलजेपी और जेडीयू ही थी. ऐसे में पासवान की वैल्यू काफी थी. अब उन्हें लग रहा है मांझी के आने से उनकी वैल्यू कम होगी."
"दलितों के नेता के तौर पर एनडीए में पासवान अकेले ही थे. अब मांझी के आने से इस कुनबे में दलितों के दो बड़े नेता हो गए हैं."
मांझी को लाकर नीतीश ने पासवान को चिढ़ाने का भी काम किया है. पहले से भी मांझी और पासवान में मधुर संबंध नहीं रहे हैं.
एलजेपी का चिराग पर फ़ोकस
एलजेपी का पूरा फोकस चिराग पासवान को भविष्य के नेता के तौर पर प्रोजेक्ट करने का है.
क्या पार्टी चिराग को सीएम पद के उम्मीदवार के तौर पर देखती है? इस सवाल पर बाजपेई कहते हैं, "हमें सीएम बनने की कोई जल्दी नहीं है. चिराग के पास बिहार के लिए एक विजन है."
बाजपेई कहते हैं, "जो एनर्जी चिराग में है वो नीतीश कुमार या दूसरे किसी बुज़ुर्ग नेता में नहीं हो सकती है."
हालांकि, मिश्रा कहते हैं कि चिराग पासवान खुद को अभी तक बिहार के एक बड़े नेता के तौर पर स्थापित नहीं कर पाए हैं. वो कहते हैं कि चिराग अपने पिता की लीडरशिप के सहारे चल रहे हैं.
मिश्रा कहते हैं, "उनके पिता नेता हैं, वो नहीं हैं. चिराग अभी तक अपनी अलग आइडेंटिटी नहीं बना पाए हैं."
बाजपेई कहते हैं कि अभी एनडीए में सीटों के बंटवारे को लेकर कोई बात नहीं हुई है.
जेडीयू और मांझी के उम्मीदवारों के ख़िलाफ़ एलजेपी प्रत्याशी उतारेगी इस तरह की ख़बरों पर बाजपेई कहते हैं कि ये सब ख़बरें निराधार हैं.
सात सितंबर को होने वाली बैठक के बारे में वो कहते हैं कि जल्द ही चुनाव होने वाले हैं और उसकी तैयारियां पार्टी को भी करनी है.
सत्ता से ज़्यादा देर दूर नहीं रह सकते मांझी
जीतन राम मांझी के साथ सबसे बड़ी चीज़ यह रही है कि वो जब से राजनीति में आए हैं तब से बीच का कुछ वक्त छोड़ दें तो लगातार सत्ता में रहे हैं. वो 1980 के दशक से सत्ता में हैं.
सत्यव्रत मिश्रा कहते हैं कि जीतन राम मांझी बहुत दिनों से सत्ता से बाहर हैं. अब वो सत्ता में वापस आना चाहते हैं.
वो कहते हैं, "मांझी को लगता है कि लालू यादव उन्हें सत्ता का वो सुख नहीं दे सकते हैं जो उन्हें नीतीश से मिलेगा."
सौदेबाज़ी की हैसियत में नहीं रहे मांझी
इस पूरे घटनाक्रम की एक अहम चीज़ यह भी है कि अब मांझी एनडीए में सीटों को लेकर सौदेबाजी करने की हैसियत में नहीं हैं.
मणिकांत ठाकुर कहते हैं, "चूंकि, वो जेडीयू के साथ मिले हैं. ऐसे में वो बीजेपी की ज़िम्मेदारी नहीं हैं. मांझी मजबूरी में एनडीए से जुड़े हैं. अब जेडीयू उन्हें जितनी सीटें देती है उससे ही उन्हें काम चलाना पड़ेगा."
इस लेख के संबंध में जीतन राम मांझी से कई बार संपर्क करने पर भी उनसे बात नहीं हो पाई.
बीजेपी के बिहार के प्रवक्ता निखिल आनंद ने फ़ोन पर बताया कि वो वर्चुअल कॉन्फ्रेंस में हैं और अभी बात नहीं कर सकते हैं.
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