तिरुपति बालाजी मंदिर में ग़ैर-हिंदुओं के प्रवेश के नियमों में बदलाव नहीं

तिरुमला तिरुपति बालाजी

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    • Author, मानसी दाश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

तिरुपति तिरुमाला की देखरेख करने वाले तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) ने शनिवार को कहा कि ग़ैर-हिंदुओं के मंदिर में प्रवेश से जुड़े नियमों में कोई बदलाव नहीं होगा.

टीटीडी के चेयरमैन वाईवी सुब्बा रेड्डी ने कहा कि, "मैंने पत्रकारों को बताया तिरुमला में दुनियाभर से हज़ारों श्रद्धालु आते हैं जिनकी आस्था श्री वेंकटेश्वर स्वामी में है. आम दिनों में 80 हज़ार से 1 लाख श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं. इसमें दूसरे धर्म के लोग भी होते हैं... और ये मुमकिन नहीं है कि सभी से डिक्लरेशन ऑफ़ फेथ एंड बिलीफ लिया जाए."

रेड्डी के मुताबिक उन्होंने यह नहीं कहा कि डिक्लरेशन देने के नियम को ख़त्म किया जा रहा है. इससे जुड़ी सभी ख़बरों को उन्होंने बेबुनियाद बताया.

क्या है पूरा मामला

तिरुपति तिरुमाला का सालाना ब्रह्मोत्सवम रविवार से शुरू हो रहा है. लेकिन उत्सव शुरू होने से पहले ही इसे लेकर विवाद गहरा गया था.

नौ दिनों तक चलने वाले ब्रह्मोत्सवम में इस बार कोरोना महामारी के कारण आम लोग शामिल नहीं होंगे. मंदिर की देखरेख करने वाले तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) का कहना है कि उत्सव एकांत में ज़रूर मनाया जाएगा लेकिन हमेशा की तरह इस साल भी सभी परंपराओं का पालन किया जाएगा.

उत्सव के दौरान परंपरा के अनुसार 23 सितंबर को प्रदेश सरकार की तरफ से मुख्यमंत्री वाईएस जगनमोहन रेड्डी भगवान वेंकटेश्वर को ‘पट्टु वस्त्रम’ देने के लिए मंदिर पहुंचेंगे. वो इस दौरान वहां कोई फॉर्म भरेंगे या नहीं और इसी को लेकर चर्चा गर्म है.

तिरुमला तिरुपति

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शनिवार को तिरुमला में इस मुद्दे पर संवाददाताओं से बात करते हुए टीटीडी के चेयरमैन वाईवी सुब्बा रेड्डी ने कहा था कि “भगवान वेंकटेश्वर में विश्वास रखने वाले सभी धर्मों के लोग दर्शनों के लिए आ रहे हैं.”

उनके इस बयान के बाद कयास लगाए जा रहे थे कि क्या तिरुपति मंदिर में अब सभी धर्मों के लोगों का प्रवेश आसानी से हो सकेगा? और क्या टीटीडी मंदिर में ग़ैर-हिंदुओं के प्रवेश से जुड़े अपने पुराने नियम बदलने वाला है?

क्या है ये नियम जिसे लेकर है चर्चा

तिरुपति आने वाले ग़ैर-हिंदुओं को फ़ेथ फ़ॉर्म भर कर ये बताना होता है कि वो हिंदू धर्म से ताल्लुक नहीं रखते लेकिन भगवान वेंकटेश्वर को मानते हैं.

बात जून 2012 की है जब मौजूदा मुख्यमंत्री रेड्डी प्रदेश कांग्रेस प्रमुख हुआ करते थे. उपचुनावों से पहले वो दर्शन के लिए मंदिर गए लेकिन मंदिर में प्रवेश करने के लिए उन्होंने जब फॉर्म नहीं भरा तो इसे लेकर विवाद हो गया.

जगनमोहन रेड्डी

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जगनमोहन रेड्डी ईसाई धर्म को मानते हैं.

हिंदू धर्म संगठनों ने मंदिर के नियम तोड़ने के लिए टीटीडी को कसूरवार ठहराया और जगनमोहन रेड्डी के विरोध में प्रदर्शन किए.

इस मामले पर कार्यकारी अधिकारी एलवी सुब्रमण्यम का कहना था कि, "उन्होंने कर्मचारियों को बताया था कि 2009 में पहली बार मंदिर आने पर उन्होंने फ़ेथ फॉर्म भरा था. दोबारा उन्हें ये फ़ॉर्म भरने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि ऐसा कोई नियम नहीं है कि हर बार मंदिर आने पर फ़ॉर्म भरना ज़रूरी हो."

इसके बाद 2014 में गवर्नर ने मंदिर प्रशासन को आदेश दिया कि बिना भेदभाव के प्रवेश से पहले ग़ैर-हिंदुओं से फ़ेथ फ़ॉर्म लिया जाए.

हालांकि ये विवाद केवल इतने तक ही सीमित नहीं था. टीटीडी के पूर्व चेयरमैन करुणाकर रेड्डी ने फिर सवाल उठाए कि पांच साल पहले सोनिया गांधी जब तिरुपति आई थीं तो उनसे क्या फ़ॉर्म भरवाया गया था?

पुरी का जगन्नाथ मंदिर

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इमेज कैप्शन, पुरी का जगन्नाथ मंदिर

इसके बाद इस मामले पर चर्चा के लिए 26 जुलाई को टीटीडी की बैठक हुई जिसमें ये फ़ैसला लिया गया कि फेथ फ़ॉर्म में अपना धर्म बिना बताए किसी भी ग़ैर-हिंदू को मंदिर में प्रवेश नहीं दिया जाएगा.

टीटीडी के कार्यकारी अधिकारी केएस श्रीनिवास राजू ने कहा कि दशकों से इस परंपरा का पालन किया जा रहा है और इसे बाध्यकारी नहीं बनाया गया था, ”लेकिन अब राज्य सरकार के आदेशानुसार गैजेट नंबर 311 के नियम 16 के अनुसार बैकुंठधाम में प्रवेश के लिए आने वाले ग़ैर-हिंदुओं के लिए प्रवेश से पहले धर्म बताने संबंधी फ़ॉर्म भरना अनिवार्य किया जा रहा है.”

जिस गेजेट नोटिफ़िकेशन का उन्होंने ज़िक्र किया है उसके अनुसार "टीटीडी के तहत आने वाले मंदिर सार्वजनिक हिंदू मंदिर हैं जिसका उपयोग हिंदू समुदाय के लोग करते हैं. लेकिन यहां ग़ैर-हिंदुओं के प्रवेश पर कोई ऐतराज़ नहीं होना चाहिए बशर्ते कि दर्शन के लिए आने वाले बताएं कि उनकी श्रद्धा भगवान वेंकटेश्वर में है.”

इसपर अप्रैल 1990 की तारीख़ है. बताया जाता है कि 1933 से तिरुपति में ग़ैर-हिंदुओं के लिए ये नियम है हालांकि उस वक्त धर्म के बारे में बताना बाध्यकारी नहीं था. लेकिन 1960 में इस नियम का कड़ाई से पालन किया जाने लगा.

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विवाद इतने पर ख़त्म नहीं हुआ...

लेकिन मामला इतने पर भी ख़त्म होने वाला कहां था.

2014 मार्च को एक बार फिर जगनमोहन तिरुपति गए और एक बार फिर उन्होंने फ़ेथ फ़ॉर्म भरने से मना कर दिया.

साल 2019 में वाईएस जगनमोहन रेड्डी आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. उनकी सरकार ने आदेश दिया कि तिरुपति मंदिर में ग़ैर-हिंदुओं को नौकरी पर नहीं रखा जाएगा.

इस आदेश के अनुसार जिन्होंने अपना धर्म परिवर्तन किया है उन्हें नौकरी से निकाला नहीं जाएगा और अगर नौकरी पाने के लिए किसी ने अपने धर्म के बारे में ग़लत जानकारी दी है तो इसकी जांच की जाएगी.

ये मामला दरअसल एक टीटीडी कर्मचारी के मंदिर का कार लेकर चर्च में जाने के वीडियो के सामने आने के बाद बढ़ा. टीटीडी ने अपने 45 कर्मचारियों को दूसरे सरकारी विभागों में भेजने का फ़ैसला किया.

डेकन हेराल्ड में प्रकाशित हुई एक ख़बर के अनुसार यहां के अधिकतर कर्मचारियों की नियुक्ति 1989 से पहले की गई थी जिस वक्त ग़ैर-हिंदू की नियुक्ति को लेकर कोई रोक नहीं थी.

इनमें से 36 कर्मचारियों ने इस मामले में अब अदालत से न्याय की गुहार लगाई है.

वीडियो कैप्शन, असम में एक मुस्लिम दंपति मंदिरों और रास्तों को संवार रहा है

कहा जाता है कि महाभारत काल में तिरुपति मंदिर धर्मराज युधिष्ठिर के बेटे परीक्षित के पुत्र जन्मेजय ने बनवाया था.

अधिकतर वक्त इसकी देखरेख हिंदू शासक करते रहे हैं और 1932 से पहले ये ज़िम्मेदारी महंतों पर थी.

1932 में मद्रास सरकार ने टीटीडी क़ानून के तहत तिरुमला तिरुपति देवस्थानम यानी टीटीडी की स्थापना की जिस पर मंदिर की देखदेख और विकास के काम का ज़िम्मा आ गया.

आज़ादी के बाद इसे मद्रास हिंदू रीलिजन एंड चेरिटेबल एंडाओमेन्ट्स एक्ट 1951 के तहत लाया गया.

1953 में आंध्र प्रदेश के अलग राज्य बनने के बाद इसे हिंदू रीलिजस इंस्टीट्यूशन एंड चेरिटेबल एन्डाउमन्ट एक्ट, 1966 के तहत लाया गया और इसकी देखरेख के काम के लेखाजोखा का हिसाब सरकार देखने लगी.

इसके बाद 1979 में मौजूदा ज़रूरतों को देखते हुए एक अलग तिरुमला तिरुपति देवस्थानम क़ानून लाया गया.

वीडियो कैप्शन, पाकिस्तान के कराची शहर में क्यों तोड़ा गया हनुमान मंदिर?

अन्य हिंदू मंदिरों में क्या है स्थिति?

आंध्र के पड़ोसी ओडिशा में मौजूद पुरी के जगन्नाथ मंदिर के बाहर भी स्पष्ट लिखा हुआ है कि ग़ैर-हिंदुओं को मंदिर में प्रवेश की इजाज़त नहीं.

कांचा इलाइया अपनी किताब ‘बफ़ेलो नेशनलिज़्म: अ क्रिटीक ऑफ़ स्पिरीचुअल फासिज़्म’ में लिखते हैं कि प्रधानमंत्री रहते हुए एक बार जब इंदिरा गांधी पुरी के जगन्नाथ मंदिर गई थीं, उन्हें पारसी समझते हुए मंदिर में प्रवेश करने की इजाज़त नहीं दी गई.

इंदिरा की शादी एक पारसी व्यक्ति से हुई थी जिन्होंने धर्म परिवर्तन किया था.

बनारस में मौजूद जानेमाने काशी विश्वनाथ मंदिर में भी कुछ ऐसे ही नियमों का पालन होता है. मंदिर के बाहर इससे जुड़े संदेश लिखे हुए हैं.

इसी साल मार्च में बॉलीवुड अभिनेत्री सारा अली ख़ान अपनी मां अमृता सिंह के साथ काशी विश्वनाथ मंदिर गई थीं जिसका वीडियो उन्होंने सोशल मीडिया पर अपलोड किया था.

वीडियो के सामने आने के बाद उनके ग़ैर-हिंदू होने को लेकर पंडों और संतों ने ऐतराज़ जताया और ज़िम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग की.

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