सुशांत सिंह राजपूत केस: सीबीआई इस बार ‘पिंजरे के तोते’ की छवि से उबर पाएगी?

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- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले को लेकर बिहार और मुंबई पुलिस के बीच तनातनी के बाद अब मामला सीबीआई यानी 'सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टीगेशन' को सौंप दिया गया है.
ये उम्मीद की जाने लगी है कि सीबीआई को मामला सौंपे जाने के बाद अब दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा. कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनको अब भी शक है कि सीबीआई सही रूप से जाँच कर पाएगी भी या नहीं.
सीबीआई की स्थापना का श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को जाता है और इस प्रमुख एजेंसी ने कई पेचीदा मामलों की गुत्थी को सुलझाया भी है.
लेकिन समय के साथ-साथ सीबीआई पर आरोप लगने लगे कि वो एक "पिंजरे में बंद तोता" है, जिसका इस्तेमाल समय-समय पर केंद्र सरकारों ने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के ख़िलाफ़ किया है. इन आरोपों से देश की इस प्रमुख एजेंसी की साख़ पर असर भी पड़ा.
पिंजरे में तोता वाली टिप्पणी वर्ष 2013 में सप्रीम कोर्ट ने कोयला ब्लॉक आबंटन घोटाले की सुनवाई करते समय किया था. उस समय सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सीबीआई पिंजरे में बंद ऐसा तोता बन गई है, जो अपने मालिक की बोली बोलता है. उस समय केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस की सरकार थी.
सीबीआई केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन है, जबकि क़ानून और व्यवस्था पूरी तरह से राज्यों का विशेषाधिकार है. इसलिए अगर किसी मामले की जाँच सीबीआई करती भी है, तो उसके लिए संबंधित राज्य सरकार से अनुमति लेना अनिवार्य भी है.
किन मामलों की जाँच कर सकती है सीबीआई?

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कौन से मामले की जाँच सीबीआई करेगी, इसके स्पष्ट नियम हैं. अगर मामला केंद्र सरकार के अधिकारी और कर्मचारियों के ख़िलाफ़ है, तो फिर इसके लिए सीबीआई को किसी की अनुमति की ज़रूरत नहीं है.
मसलन रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ पकड़ना. लेकिन राज्यों के कर्मचारियों और अधिकारियों को सीबीआई रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों नहीं पकड़ सकती क्योकि राज्यों के पास एंटी करप्शन ब्यूरो हैं.
दो और परिस्थितियाँ हैं, जब सीबीआई मामले की जाँच कर सकती है. या तो वो मामला उसे केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सौंपा हो, या राज्य सरकार ने सौंपा हो या फिर उच्च न्यायलय ने उन्हें मामला सौंपा हो.
राज्य सरकार भी सीबीआई जाँच की सिर्फ़ सिफ़ारिश कर सकती है, जिसका फ़ैसला केंद्रीय गृह मंत्रालय को ही करना है. यानी हर मामला सीबीआई नहीं ले सकती.
राज्य सरकार इनकार भी कर सकती है?

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कई ऐसे मामले भी हैं, जब राज्य सरकारों ने सीबीआई को अपने राज्य में जाँच करने की इजाज़त नहीं दी.
ताज़ा उदहारण पश्चिम बंगाल का है, जब सीबीआई की टीम कोलकाता के पुलिस कमिश्नर से किसी मामले के संबंध में पूछताछ करने गई, तो राज्य सरकार ने इसकी अनुमति नहीं दी.
कुछ एक राज्यों ने तो सीबीआई के दफ़्तर अपने यहाँ खुलने नहीं दिए.
सीबीआई के प्रवक्ता आरके गौड़ ने बीबीसी को बताया कि जाँच एजेंसी की अपनी तय प्रक्रिया है, जिसके तहत वो काम करती है.
वो कहते हैं कि जब कोई भी मामला सीबीआई को सुपुर्द किया जाता है, तो सबसे पहले एजेंसी उसके संबंध में प्राथमिकी दर्ज करती है, फिर जाँच अधिकारी नियुक्त किए जाते हैं.
सीबीआई की जांच का तरीक़ा भी पुलिस से थोड़ा अलग ही है, क्योंकि वो अपराध अनुसंधान विज्ञान या फ़ॉरेंसिक साइंस का ज़्यादा सहारा लेती है.
सीबीआई की कब हुई तारीफ़

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सीबीआई को एक निष्पक्ष संस्था के रूप में ही जाना जाता रहा है. लेकिन कई ऐसे मामले आए, जिसको लेकर संस्था की स्वायत्तता पर आरोप लगने लगे और माना जाने लगा कि इसकी डोर सत्ता में बैठे लोगों के हाथों में जाती रही.
एनके सिंह सीबीआई के पूर्व संयुक्त निदेशक हैं. बीबीसी से बात करते हुए वो स्वीकार करते हैं कि जिस जाँच एजेंसी की कल्पना लाल बहादुर शास्त्री ने की थी, वो अब उस पर खरी उतरती नहीं दिख रही है. उनका कहना है कि अब कई संस्थाओं की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं.
बीबीसी से बात करते हुए सिंह कहते हैं, "कई संस्थानों पर सवाल उठ रहे हैं, जिन्हें अपनी निष्पक्षता और स्वतंत्र कार्यशैली के लिए जाना जाता रहा है. सीबीआई भी इससे अछूती नहीं है. लोगों का विश्वास इन संस्थानों पर कम हो रहा है."
हालाँकि वो दावा करते हैं कि राजनीति अपनी जगह, लेकिन सीबीआई के पास आज भी बेहतरीन अधिकारी हैं, जिनके जाँच करने के तरीक़े का लोहा माना जाता है.
उन्होंने मुज़फ़्फ़रपुर केयर सेंटर में हुए यौन शोषण में सीबीआई जाँच की तारीफ़ की और कहा कि जाँच करने वालों ने इस मामले की मुश्किल गुत्थी को सुलझा लिया. उसी तरह वो कहते हैं कि बिहार में हुए चारा घोटाले की जाँच भी तारीफ़ के काबिल है.
मामले जिनको लेकर सीबीआई विवाद में

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राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद पवार ने ट्वीट कर आशा जताई है कि सीबीआई सुशांत सिंह राजपूत की मौत की गुत्थी सुलझा लेगी.
उनका कहना था कि उन्हें आशा है कि सुशांत का मामला भी नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के मामले जैसा लंबित ना रहे.
सात साल पहले सामाजिक कार्यकर्ता और डॉक्टर नरेंद्र दाभोलकर की हत्या महाराष्ट्र के पुणे में हुई थी. ये मामला भी सीबीआई को सौंपा गया और जाँच में जिस अभियुक्त का नाम सामने आया, उनके तार बेंगलुरु की पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या से भी जुड़े बताए जाते हैं. मामला अभी तक अपने अंजाम तक नहीं पहुँच पाया है.
लेकिन कई ऐसे बड़े मामले हैं, जिनको लेकर सीबीआई की जाँच पर सवाल उठते रहे. इसमें 2जी स्पेक्ट्रम का मामला भी है. इस मामले में सभी अभियुक्तों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया था. विशेष सीबीआई अदालत के जज ओपी सैनी वर्ष 2011 से ही इस मामले की सुनवाई कर रहे थे.
लेकिन जब उन्होंने फ़ैसला सुनाया तो उन्होंने सीबीआई की जाँच की बहुत आलोचना की थी.
सैनी का कहना था कि वो "सात वर्षों तक सुबह 10 बजे से लेकर शाम 5 बजे तक इस इंतज़ार में रहते थे कि शायद कोई सबूत लेकर उनकी अदालत में आएगा."
उन्होंने ये भी टिप्पणी की कि मामले के अभियोजन का पक्ष 'स्तरहीन और दिशाहीन' था. मामले में कोई भी गवाह पेश नहीं हो सका.
एक और मामला जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के छात्र नजीब अहमद से संबंधित है, जो कैम्पस से 15 अक्तूबर 2016 को रहस्यमय तरीक़े से लापता हो गए थे. ये मामला भी सीबीआई जाँच के लिए सौंपा गया. लेकिन अभी तक सीबीआई को इसमें कोई सफलता नहीं मिल पाई है.

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रॉबर्ट वाड्रा की कंपनी स्काई लाइट हॉस्पिटैलिटी को हरियाणा के मानेसर में किए गए ज़मीन आबंटन का मामला भी सीबीआई को सौंपा गया. लेकिन इसकी जाँच भी ढीली रही और बहुत कुछ इसमें सामने नहीं आ पाया.
व्यापम से लेकर अगस्ता-वेस्टलैंड मामले की भी जाँच
मध्य प्रदेश में हुए व्यापम घोटाले की जाँच का ज़िम्मा भी सीबीआई को सौंपा गया जब एक-एक कर गवाह और अभियुक्तों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत के मामले सामने आने लगे. इस बहुचर्चित मामले की जाँच में भी बहुत कुछ सामने नहीं आ पाया, जबकि ये मामला भी सीबीआई को दिया गया था.
पश्चिम बंगाल में साल 2013 में हुए बहुचर्चित शारदा चिट फ़ंड घोटाले के मामले में भी 200 के क़रीब लोगों पर आरोप लगे थे. इसमें राज्य और केंद्र के प्रमुख राजनेताओं के अलावा पूँजीपतियों के भी नाम सामने आए थे. ये निवेशकों के साथ की गई धोखाधड़ी का मामला था, जो सीबीआई को सौंपा गया था.
इस मामले के संबंध में सीबीआई ने आरोप पत्र भी दायर किया था. लेकिन जिन पर आरोप लगे थे, उनके ख़िलाफ़ कितने ठोस प्रमाण सामने आ पाए, ये पता नहीं चल पाया.
जब अगस्ता-वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर ख़रीद में हुए घोटाले के आरोप वाला मामला सुर्ख़ियों में आया था, तो देश भर में इसको लेकर आरोपों का दौर शुरू हो गया था.
आरोप थे कि इन 12 हेलिकाप्टरों की ख़रीद में बिचौलियों और नेताओं को इटली की कंपनी फ़िनमेकेनिका से कथित तौर पर कमीशन मिला था. 3,600 करोड़ रुपए की इस डील की जाँच का ज़िम्मा भी सीबीआई को सौंपा गया. लेकिन बहुत कुछ सामने नहीं आ पाया.
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