सुशांत सिंह राजपूत मामले से सुर्ख़ियों में आई बिहार पुलिस इन मामलों में घिरी है सवालों से

नीतीश कुमार

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    • Author, नीरज प्रियदर्शी
    • पदनाम, बिहार से, बीबीसी हिंदी के लिए

फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के 55 दिन बाद मामले की जाँच सीबीआई से कराने के लिए बिहार सरकार ने केंद्र को सिफ़ारिश भेजी और अगले ही दिन केंद्र सरकार ने इस‌ सिफ़ारिश को स्वीकार भी कर लिया है.

अब सवाल यह है कि क्या जाँच का ज़िम्मा सीबीआई को सौंप देने से मौत का सच सामने आ पाएगा और सुशांत के घरवालों को न्याय मिल पाएगा?

क्योंकि यह पहला मामला नहीं है, जिसमें बिहार सरकार की तरफ़ से सीबीआई जाँच की सिफ़ारिश की गई हो, केंद्र ने सिफ़ारिश स्वीकार की हो, लेकिन अब तक उन जाँचों के नतीजे शून्य ही रहे.

क़रीब सात साल पहले 18 सितंबर 2013 को बिहार सरकार ने मुज़फ़्फ़रपुर के चर्चित नवरुणा कांड की जांच सीबीआई से कराने की सिफ़ारिश की थी. लेकिन जाँच अभी भी जारी है.

सीबीआई इसके अलावा बिहार के चर्चित ब्रह्मेश्वर मुखिया हत्याकांड की जाँच भी 18 जुलाई 2013 से कर रही है, लेकिन अब तक किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पाई है.

सिवान के पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या के मामले की जाँच भी सीबीआई 2016 से ही कर रही है. लेकिन फ़िलहाल इस मामले में अभियोजन पक्ष से गवाही ही ली जा रही है.

आख़िर इतने दिन बीत जाने के बाद भी सीबीआई इन मामलों की जाँच पूरी क्यों नहीं कर पाई?

नवरूणा

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आठ साल से (18 सितंबर 2012 को) लापता अपनी बेटी के लिए न्याय की आस लगाई बैठीं नवरूणा की मां मैत्री चक्रवर्ती कहती हैं, "जांच चाहे कोई भी कर ले लेकिन अगर मामला बिहार का है तो देरी होनी तय है. यहाँ पुलिस, राजनेताओं और माफ़ियाओं के बीच एक नेक्सस है, जो हमेशा गुनहगारों को बचाने का काम करता है. सीबीआई से जाँच करा लेने और न्याय मिलने में बहुत अंतर है."

नवरुणा मामले को बिहार पुलिस ने पहले अपहरण बताया और बाद में अस्थियाँ बरामद करके हत्या भी साबित कर दी थी.

ब्रह्मेश्वर मुखिया के पौत्र चंदन कुमार सिंह कहते हैं, "मेरे दादा के हत्यारों का संबंध राजनीतिक पार्टी से है. यह स्पष्ट है कि सीबीआई राजनीतिक दबाव में काम करती है. आप इस बात से ही समझिए कि दादा की हत्या के प्रत्यक्षदर्शियों तक ने सीबीआई कोर्ट में गवाही दे दी है, लेकिन सीबीआई ने अभी तक घटना की चार्जशीट भी दायर नहीं की है."

सुशांत का केस कैसे सीबीआई तक पहुँचा

वीडियो कैप्शन, सुशांत केस में बिहार और मुंबई पुलिस के बीच क्या चल रहा है?

14 जून को सुशांत सिंह राजपूत का शव उनके फ्लैट से मिला था. अभी तक मामले की जाँच दो राज्यों की पुलिस अलग-अलग कर रही थी.

एक ओर मुंबई पुलिस एक्सीडेंटल डेथ रिपोर्ट करके मामले की जांच कर रही है और उसने सुशांत से जुड़े 56 लोगों के बयान दर्ज किए हैं.

वहीं दूसरी ओर बिहार पुलिस सुशांत के पिता केके सिंह की तरफ़ से पटना के राजीव नगर थाने में रिया चक्रवर्ती के खिलाफ दर्ज कराए गए एफआईआर की जाँच के लिए मुंबई पहुँची है.

मौत के कारणों की जाँच को लेकर इस दरम्यान दोनों राज्यों की पुलिस के बीच टकराव भी सामने आया.

मुंबई पुलिस का कहना है कि घटना मुंबई की है, इसलिए जाँच का काम भी मुंबई पुलिस का ही है.

जबकि मुंबई में जाँच करने पहुँची बिहार पुलिस ‌का कहना है कि एफ़आईआर उनके यहाँ दर्ज़ हुआ है, इसलिए उन्हें पूरा अधिकार है कि वे जाँच करें.

कथित आत्महत्या को लेकर शुरू में यह चर्चा उठी कि सुशांत ने ऐसा क़दम फ़िल्म जगत में चल रहे भाई-भतीजावाद से परेशान होकर उठाया.

बाद में उनके पिता कृष्ण कुमार सिंह ने 25 जुलाई को पटना के राजीव नगर थाने एक एफ़आईआर दर्ज कराई और इस एफ़आईआर में फिल्म अभिनेत्री और ख़ुद को सुशांत की गर्लफ़्रेंड बताने वालीं रिया चक्रवर्ती के ख़िलाफ़ पैसा ऐंठने और आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाया गया है.

बहरहाल केंद्र ने बिहार सरकार की सिफारिश स्वीकार कर ली है इसलिए अब मामले की जाँच सीबीआई करेगी.

सुशांत राजपूत केस में जल्दी पर नवरुणा में देरी क्यों?

नवरुणा के पिता अतुल्य चक्रवर्ती

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बिहार का सबसे चर्चित मामला, जिसकी जाँच सीबीआई कर रही है, वह है नवरूणा कांड.

लेकिन, नवरुणा कांड की सीबीआई जाँच की सिफ़ारिश इतनी जल्दी नहीं हुई थी, जितनी जल्दी सुशांत ‌सिंह राजपूत की मौत के मामले में हुई.

नवरुणा के पिता अतुल्य चक्रवर्ती बताते हैं, "हमें एक साल केवल सरकार को मनाने में लग गए थे कि सीबीआई जाँच कराई जाए. न जाने कितनी बार मुख्यमंत्री के चक्कर काटे, देशभर में आंदोलन हुआ. तब जाकर मुख्यमंत्री ने सिफ़ारिश की. लेकिन केवल सिफ़ारिश कर देने से ही सीबीआई जाँच नहीं शुरू हो गई! उसमें भी महीनों लग गए. सुप्रीम कोर्ट को दख़ल देना पड़ा. सीबीआई ने पत्र जारी करते हुए कहा कि बिहार के अधिकारी उसे सहयोग नहीं कर रहे हैं. आख़िरकार 14 फरवरी 2014 को केस सीबीआई को सौंपा गया."

पिछले छह सालों से सीबीआई इस मामले की जाँच कर रही है, लेकिन अभी तक फ़ाइनल चार्जशीट भी दायर नहीं कर सकी.

सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट से जाँच की अवधि बढ़ाने को लेकर 10 बार मोहलत मांगी है. सुप्रीम कोर्ट हर बार सीबीआई से कहता है कि यह आख़िरी मौक़ा है.

इस दौरान सीबीआई के डायरेक्टर छह बार बदले गए. सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश भी छह बार बदले. सीबीआई के बिहार एसपी पाँच बार बदले और केस के इन्वेस्टिगेटिंग अफ़सर भी चार बार बदले.

सुप्रीम कोर्ट में आख़िरी सुनवाई पाँच जून 2020 को हुई थी, जिसमें सीबीआई ने फिर से तीन महीने का वक़्त मांगा है. अब अगली सुनवाई सितंबर में होगी.

दिल्ली में इस‌ केस को लड़ रहे अभिषेक रंजन कहते हैं, "उम्मीद है कि अगली बार भी यही होगा जैसा इसके पहले होता आया है. सीबीआई फिर से समय मांगेगी और सुप्रीम कोर्ट समय दे देगा."

अभिषेक के मुताबिक़ इस मामले की शुरुआत में ही अगर बिहार पुलिस ने इतनी गंभीरता दिखाई होती, जितनी सुशांत मामले में दिखा रही है, तो अब तक कब का गुनहगारों को पकड़ लिया जाता.

अभिषेक कहते हैं, "किसी भी पुलिस जाँच का अहम दस्तावेज़ केस डायरी होती है. अगर आप नवरुणा मामले की केस डायरी देखेंगे तो पता चलेगा कि बिहार पुलिस ने शुरू के चार महीनों में कुछ किया ही नहीं. उल्टा पुलिस ‌का ज़ोर मामले को प्रेम प्रसंग बनाने पर रहा."

ब्रह्मेश्वर मुखिया मामले में भी देरी

डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे

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सीबीआई जाँच में देरी केवल नवरूणा कांड में ही नहीं हुई.

रणवीर ‌सेना के संस्थापक और तत्कालीन राजनीतिक तबके में बड़ा नाम रहे ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या को भी आठ साल (एक जून 2012) बीत चुके हैं.

सीबीआई इस मामले की जाँच 2013 से कर रही है. लेकिन अभी तक हत्यारों का सुराग नहीं मिल पाया है.

2016 में जमुई से नन्दगणेश पांडेय उर्फ़ फौजी पांडेय की गिरफ़्तारी के अलावा सीबीआई के पास इस मामले में बताने लायक कुछ भी नहीं है.

फ़िलहाल सीबीआई ने पोस्टर जारी कर हत्यारों का सुराग देने वाले को 10 लाख रुपये पुरस्कार देने की घोषणा की है.

ब्रह्मेश्वर मुखिया के पौत्र चंदन कहते हैं, "इस केस में सबकुछ खुला हुआ है. सारी गवाही हो गई हैं लेकिन फिर भी सीबीआई ने चार्जशीट नहीं किया है. यह हाल देश की सर्वोच्च जाँच एजेंसी का है. अब किससे जाँच कराई जाए!"

सिवान के पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या के चार साल बाद भी अब तक कोर्ट में गवाही ही चल रही हैं. राजदेव रंजन की पत्नी आशा रंजन कहती हैं, "देरी हो रही है लेकिन हमें उम्मीद है कि इंसाफ़ ज़रूर मिलेगा. डर केवल इसी बात का बना रहता है कि अभियुक्तों की तरफ़ से मुझ पर या मेरे बच्चों पर फिर से हमला न करवा दिया जाए."

बिहार पुलिस की भूमिका पर सवाल

आशा रंजन

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में जिस तरह बिहार पुलिस मुखर हो रही है, इसके पहले कभी ऐसे मामले में मुखर होते नहीं देखा गया.

नवरुणा कांड को ही लें, तो उसमें बिहार की मुजफ़्फ़रपुर पुलिस पर भी सवाल उठे थे. उस समय बिहार के मौजूदा डीआईजी गुप्तेश्वर पांडे मुजफ्फरपुर रेंज के आईजी थे.

नवरुणा के माता-पिता गुप्तेश्वर पांडे की भूमिका पर भी सवाल उठाते हैं और कहते हैं कि बार-बार मिलने पर भी उन्होंने कोई सहयोग नहीं किया.

सीबीआई ने भी सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि इस मामले में गुप्तेश्वर पांडे समेत इस मामले की जाँच से जुड़े कई पुलिस अधिकारियों से पूछताछ की गई है.

इस बार तो डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे ने बीबीसी से बात करने से इनकार कर दिया, लेकिन पिछले साल उन्होंने इस मामले पर कहा था कि उन्हें इस मामले में फँसाया जा रहा है.

गुप्तेश्वर पांडे ने उस समय कहा था, "मैं अभी भी कहूँगा कि नवरुणा की हत्या उसके घरवालों ने ही की थी. जब घर के पास से लाश मिली तो मानने से इनकार कर दिया. जहाँ तक बात सीबीआई पूछताछ की है तो मैंने खुद सीबीआई को कहा था, मुझसे भी पूछताछ करिए. वरना मेरे ऊपर सवाल उठेंगे."

नवरुणा के माता-पिता हों या ब्रह्मेश्वर मुखिया के पौत्र या पत्रकार राजदेव रंजन की पत्नी, सबकी चाहत है कि सुशांत के परिजनों को न्याय मिले.

लेकिन सब अपनी-अपनी दास्तान बताते हुए सीबीआई, सरकार और पुलिस को कोसते हैं. जाँच में हो रही देरी पर तरस खाते हैं.

नवरुणा की मां मैत्री कहती हैं, "मेरी बेटी के अपहरण के बाद भी अगर पुलिस इतनी ही एक्टिव होती तो शायद उसे बचाया जा सकता था."

हमने बिहार पुलिस के डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे से यह पूछना चाहा कि आख़िर उन पुराने मामलों का क्या हुआ, जिनकी जाँच सालों बाद भी पूरी नहीं हो सकी और उल्टा पुलिस पर शोषण के आरोप लगे. डीजीपी ने कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया.

विपक्ष के आरोपों पर सरकार का जवाब

राजदेव रंजन

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चाहे नवरुणा का मामला हो या ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या या फिर पत्रकार राजदेव रंजन हत्याकांड, सरकार ने हर बार सीबीआई जांच की सिफारिश तो कर दी, लेकिन उसके बाद इन मामलों में उसकी कोई खास रुचि नहीं दिखी. शायद यही कारण है कि ये जाँचें आज तक पूरी नहीं हो सकीं. राजद के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी कहते हैं, "क्या सरकार की भूमिका महज़ सीबीआई जाँच की सिफ़ारिश कर देना भर है? सृजन घोटाले में सरकार के ख़ज़ाने से कई सौ करोड़ रुपए का गबन हो गया. लेकिन आजतक मुख्य अभियुक्त पकड़ा नहीं जा सका है. जब सरकार राज्य के ख़ज़ाने को बचा कर नहीं रख पा रही है तो उसके बाद कहने की कोई बात ही नहीं है. सच यही है कि सीबीआई जाँच का हवाला देकर सरकार अपनी जवाबदेही से बचना चाहती है." लेकिन सरकार विपक्ष के आरोपों मानने के लिए तैयार नहीं है. सत्ताधारी पार्टी जेडीयू के प्रवक्ता नीरज कुमार कहते हैं, "सीबीआई एक केंद्रीय जाँच एजेंसी है और एक बार जब जाँच उस एजेंसी को सौंप दी जाती है तब राज्य सरकार की उसमें कोई भूमिका नहीं रहती. विपक्ष को इसलिए सरकार की भूमिका पर संदेह होता है क्योंकि सीबीआई ने ही उसके नेता को जेल पहुँचाया है."

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