गलवान घाटी पर भारत-चीन सीमा विवाद से जुड़े अहम सवाल का जवाब

नरेन्द्र मोदी और शी जिनपिंग

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भारत-चीन के बीच रिश्ते इस वक़्त नाज़ुक दौर में हैं. दोनों देशों के बीच 1962 में एक बार जंग हो चुकी है जिसमें चीन की जीत हुई और भारत की हार. इसके बाद 1965 और 1975 में भी दोनों देशों के बीच हिंसक झड़पें हुई हैं. इन तारीख़ों के बाद ये चौथा मौका है जब भारत-चीन सीमा पर स्थिति इतनी तनावपूर्ण है. 15-16 जून की रात को गलवान घाटी में भारत-चीन सीमा पर दोनों देशों के बीच जो कुछ हुआ, उससे जुड़े कई सवाल आपकी जेहन में होंगे. उन सभी सवालों के जवाब आप एक साथ यहां पढ़ सकते हैं.

सवाल 1: गलवान में 15-16 जून की रात क्या हुआ?

15-16 जून को लद्दाख की गलवान घाटी में एलएसी पर हुई इस झड़प में भारतीय सेना के एक कर्नल समेत 20 सैनिकों की मौत हुई थी. भारत का दावा है कि चीनी सैनिकों का भी नुक़सान हुआ है लेकिन इसके बारे में चीन की तरफ़ से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है. चीन ने अपनी सेना को किसी भी तरह का कोई नुक़सान होने की बात नहीं मानी है. इसके बाद दोनों देशों में पहले से मौजूद तनाव और बढ़ चुका है. दोनों ही देश एक-दूसरे पर अपने इलाक़ों के अतिक्रमण करने का आरोप लगा रहे हैं.

कीलें लगी हुई लोहे की रॉड

बताया जा रहा है कि गलवान घाटी में भारत-चीन लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) पर दोनों सेनाओं के बीच हुई झड़प में हथियार के तौर पर लोहे की रॉड का इस्तेमाल हुआ जिस पर कीलें लगी हुई थी. भारत-चीन सीमा पर मौजूद भारतीय सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने भी बीबीसी को ये तस्वीर भेजी है और कहा है कि इसी हथियार से चीनी सैनिकों ने भारतीय सैनिकों पर हमला किया था.

सवाल 2: ये हिंसक संघर्ष अभी क्यों हो रहे हैं? इस शुरूआत कब और कैसे हुई?

भारत-चीन सीमा पर मौजूदा विवाद की शुरुआत अप्रैल के तीसरे हफ़्ते में हुई थी, जब लद्दाख बॉर्डर यानी लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल पर चीन की तरफ़ सैनिक टुकड़ियों और भारी ट्रकों की संख्या में इज़ाफ़ा दिखा था, ऐसा रक्षा विशेषज्ञ बताते हैं.

इसके बाद से मई महीने में सीमा पर चीनी सैनिकों की गतिविधियाँ रिपोर्ट की गई हैं. चीनी सैनिकों को लद्दाख में सीमा का निर्धारण करने वाली झील में भी गश्त करते देखे जाने की बातें सामने आई थीं.

साल 2018-19 की सालाना रिपोर्ट में भारत के रक्षा मंत्रालय ने कहा था कि सरकार ने भारत-चीन सीमा पर 3812 किलोमीटर इलाक़ा सड़क निर्माण के लिए चिह्नित किया है. इनमें से 3418 किलोमीटर सड़क बनाने का काम बॉर्डर रोड्स ऑर्गेनाज़ेशन यानी बीआरओ को दिया गया है. इनमें से अधिकतर परियोजनाएँ पूरी हो चुकी हैं.

भारत-चीन सीमा विवाद के जानकारों की राय है कि यही निर्माण कार्य दोनों देशों की विवाद की असली वजह है, लेकिन वो ये भी मानते हैं कि ये एकमात्र वजह नहीं है. कुछ जानकार भारत-चीन सीमा विवाद को कई परिस्थितियों के मेल के तौर पर देख रहे हैं.

भारत में जानकारों की राय में इसके लिए पिछले साल अगस्त में भारत सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 का हटाना, भारत की विदेश नीति में पिछले दिनों हुए बदलाव, चीन की आंतरिक राजनीति और कोरोना के दौर में विश्व राजनीति में ख़ुद को बनाए रखने की चीन के प्रयासों से जोड़कर देखा जाना चाहिए.

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सवाल 3: ये हिसंक संघर्ष इतना महत्वपूर्ण हैं?

45 साल बाद दोनों देशों के बीच संघर्ष इतना हिंसक हुआ है, जिसमें भारत के 20 सैनिकों की जान गई है. चीनी सैनिकों के घायल होने का कोई आधिकरिक आँकड़ा नहीं है.

इससे पहले 1975 भारतीय सेना के गश्ती दल पर अरुणाचल प्रदेश में एलएसी पर चीनी सेना ने हमला किया था. उसमें भी भारतीय सैनिकों की मौत हुई थी. इस बीच दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों के बीच कई मुलाक़ातें हुईं. इससे ऐसा लगा कि व्यापार के साथ-साथ सीमा पर भी सब कुछ ठीक चल रहा है.

नरेंद्र मोदी जब से भारत के प्रधानमंत्री बने हैं, उनकी चीन के राष्ट्रपति से पिछले छह साल में 18 बार मुलाक़ात हुई है. लेकिन इस हिंसक संघर्ष के बाद दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ता दिख रहा है.

सवाल 4: गलवान घाटी में भारत के कितने सैनिक मारे गए?

चीन और भारत की सेना में हिंसक झड़प में भारतीय सेना के 20 जवानों की मौत हुई है. ये सभी 16 बिहार रेजिमेंट के जवान थे. पहले तीन जवानों की मौत की ख़बर आई लेकिन बाद में भारतीय सेना ने ख़ुद ही बयान जारी कर बताया कि 17 अन्य जवान गंभीर रूप से ज़ख़्मी थे और उनकी भी मौत हो गई.

भारतीय सेना के सूत्रों के मुताबिक 18 सैनिकों का लेह के अस्पताल में इलाज चल रहा है, बाक़ी 58 को मामूली चोटें आई है. इनमें से कोई गंभीर रूप से घायल नहीं है.

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सवाल 5: इस संघर्ष में कितने चीनी सैनिक मारे गए?

चीन कभी किसी भी युद्ध में मारे गए सैनिकों की संख्या के बारे में कभी नहीं बताता.

17 जून को यही सवाल चीनी विदेश मंत्रालय की प्रेस कॉन्फ़्रेंस में समाचार एजेंसी पीटीआई ने पूछा कि भारतीय मीडिया में चीनी सैनिकों के हताहत होने की बात कही जा रही है, क्या आप इसकी पुष्टि करते हैं?

इस सवाल के जवाब में चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता चाओ लिजियान ने कहा, ''जैसा कि मैंने कहा कि दोनों देशों के सैनिक ग्राउंड पर ख़ास मसलों को हल करने की कोशिश कर रहे हैं. मेरे पास ऐसी कोई जानकारी नहीं है जिसे यहां जारी करूं. मेरा मानना है और आपने भी इसे देखा होगा कि जब से यह हुआ है तब से दोनों पक्ष बातचीत के ज़रिए विवाद को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि सरहद पर शांति बहाल हो सके.''

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सवाल 6: भारतीय सैनिकों ने क्यों नहीं किया हथियारों का इस्तेमाल ?

भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ट्वीट कर कहा, ''सीमा पर तैनात सभी जवान हथियार लेकर चलते हैं. ख़ासकर पोस्ट छोड़ते समय भी उनके पास हथियार होते हैं. 15 जून को गलवान में तैनात जवानों के पास भी हथियार थे. लेकिन 1996 और 2005 के भारत-चीन संधि के कारण लंबे समय से ये प्रैक्टिस चली आ रही है कि फ़ैस-ऑफ़ के दौरान जवान फ़ायरआर्म्स (बंदूक़) का इस्तेमाल नहीं करते हैं.''

सवाल 7: गलवान घाटी दोनों देशों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

गलवान घाटी विवादित क्षेत्र अक्साई चिन में है. गलवान घाटी लद्दाख और अक्साई चिन के बीच भारत-चीन सीमा के नज़दीक स्थित है. यहां पर वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) अक्साई चिन को भारत से अलग करती है.

अक्साई चिन पर भारत और चीन दोनों अपना दावा करते हैं. यह घाटी चीन के दक्षिणी शिनजियांग और भारत के लद्दाख तक फैली है. ये क्षेत्र भारत के लिए सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये पाकिस्तान, चीन के शिनजियांग और लद्दाख की सीमा के साथ लगा हुआ है.

1962 की जंग के दौरान भी गालवन नदी का यह क्षेत्र जंग का प्रमुख केंद्र रहा था. इस घाटी के दोनों तरफ के पहाड़ रणनीतिक रूप से सेना को एडवांटेज देते हैं. यहां जून की गर्मी में भी तापमान शून्य डिग्री से कम होता है.

इतिहासकारों की मानें तो इस जगह का नाम एक साधारण से लद्दाखी व्यक्ति गुलाम रसूल गलवान के नाम पर पड़ा. ये गुलाम रसूल ही थे जिन्होंने इस जगह की खोज की थी.

भारत की तरफ़ से दावा किया जाता है कि गलवान घाटी में अपने इलाके में भारत सड़क बना रहा है जिसे रोकने के लिए चीन ने यह हरकत की है.

दारबुक-श्‍योक-दौलत बेग ओल्‍डी रोड भारत को इस पूरे इलाके में बड़ा एडवांटेज देगी. यह रोड काराकोरम पास के नजदीक तैनात जवानों तक सप्‍लाई पहुंचाने के लिए बेहद अहम है.

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सवाल 8: वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) क्या है. नियंत्रण रेखा(LoC) से ये कैसे अलग है?

भारत की थल सीमा (लैंड बॉर्डर) की कुल लंबाई 15,106.7 किलोमीटर है जो कुल सात देशों से लगती है. इसके अलावा 7516.6 किलोमीटर लंबी समुद्री सीमा है. भारत सरकार के मुताबिक़ ये सात देश हैं, बांग्लादेश (4,096.7 किमी), चीन (3,488 किमी), पाकिस्तान (3,323 किमी), नेपाल (1,751 किमी), म्यांमार (1,643 किमी), भूटान (699 किमी) और अफ़ग़ानिस्तान (106 किमी).

भारत चीन के साथ 3,488 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करता है. ये सीमा जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश से होकर गुज़रती है.

ये तीन सेक्टरों में बंटी हुई है - पश्चिमी सेक्टर यानी जम्मू-कश्मीर, मिडिल सेक्टर यानी हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड और पूर्वी सेक्टर यानी सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश. हालांकि दोनों देशों के बीच अब तक पूरी तरह से सीमांकन नहीं हुआ है. क्योंकि कई इलाक़ों को लेकर दोनों के बीच सीमा विवाद है.

इन विवादों की वजह से दोनों देशों के बीच कभी सीमा निर्धारण नहीं हो सका. हालांकि यथास्थिति बनाए रखने के लिए लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल यानी एलएसी टर्म का इस्तेमाल किया जाने लगा.

सात दशकों से भी ज़्यादा वक़्त गुजर चुका है, लेकिन जम्मू और कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव का मुख्य मुद्दा बना हुआ है. ये क्षेत्र इस समय एक नियंत्रण रेखा से बँटा हुआ, जिसके एक तरफ़ का हिस्सा भारत के पास है और दूसरा पाकिस्तान के पास. इसे भारत पाकिस्तान नियंत्रण रेखा कहते हैं.

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सवाल 9: इस ताज़ा विवाद के बाद अब दोनों देश आगे क्या करेंगें?

चीन ने 17 जून को गलवान घाटी क्षेत्र में स्वायत्तता का दावा किया है जिसे भारत ने बड़बोलापन और खोखला दावा बताया है.

चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लीजान ने कहा, "गलवान घाटी की संप्रभुता हमेशा से चीन के पास रही है. भारतीय सैनिकों ने बॉर्डर प्रोटोकॉल और हमारे कमांडर स्तर की बातचीत में हुई सहमति का गंभीर उल्लंघन किया.'' चीनी प्रवक्ता ने साथ ही कहा कि चीन अब और संघर्ष नहीं चाहता.

दूसरी तरफ़ भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने बुधवार को बताया कि दोनों ही देशों के विदेश मंत्रियों ने फ़ोन पर बातचीत की है और इस बात पर सहमति जताई है कि पूरे हालात को ज़िम्मेदारी के साथ संभाला जाएगा.

भारतीय प्रवक्ता ने कहा कि चीनी सेना ने एलएसी के भारतीय हिस्से में निर्माण कार्य करने की कोशिश की थी. फ़िलहाल दोनों देशों के बीच कूटनीतिक और सैनिक स्तरों पर बातचीत चल रही है.

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सवाल 10: भारत और चीन इससे पहले कब-कब आपस में भीड़?

1962 -भारत-चीन युद्ध, ये लड़ाई क़रीब एक महीने चली थी और इसका क्षेत्र लद्दाख़ से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक फैला हुआ था. इसमें चीन की जीत हुई थी और भारत की हार. जवाहर लाल नेहरू ने भी ख़ुद संसद में खेदपूर्वक कहा था, "हम आधुनिक दुनिया की सच्चाई से दूर हो गए थे और हम एक बनावटी माहौल में रह रहे थे, जिसे हमने ही तैयार किया था."

इस तरह उन्होंने इस बात को लगभग स्वीकार कर लिया था कि उन्होंने ये भरोसा करने में बड़ी ग़लती की कि चीन सीमा पर झड़पों, गश्ती दल के स्तर पर मुठभेड़ और तू-तू मैं-मैं से ज़्यादा कुछ नहीं करेगा. 1962 की लड़ाई के बाद भारत और चीन दोनों ने एक दूसरे के यहाँ से अपने राजदूत वापस बुला लिए थे. दोनों राजधानियों में एक छोटा मिशन ज़रूर काम कर रहा था.

1967 - नाथु ला में चीन और भारत के बीच झड़प हुई थी. दोनों देशों के कई सैनिक मारे गए थे. संख्या के बारे में दोनों देश अलग-अलग दावे करते हैं. ये झड़पें तीन दिन तक चली.

नाथु ला में तैनात मेजर जनरल शेरू थपलियाल ने 'इंडियन डिफ़ेस रिव्यू' के 22 सितंबर, 2014 के अंक में इन झड़पों के बारे में विस्तार से लिखा है. उनके मुताबिक नाथु ला में दोनों सेनाओं का दिन कथित सीमा पर गश्त के साथ शुरू होता था और इस दौरान दोनों देशों के फ़ौजियों के बीच कुछ न कुछ तू-तू मैं-मैं शुरू हो जाती थी.

छह सितंबर, 1967 को भारतीय सैनिकों ने चीन के राजनीतिक कमिसार को धक्का देकर गिरा दिया, जिससे उसका चश्मा टूट गया. इलाके में तनाव कम करने के लिए भारतीय सैनिक अधिकारियों ने तय किया कि वो नाथु ला से सेबु ला तक भारत चीन सीमा को डिमार्केट करने के लिए तार की एक बाड़ लगाएंगे.

जैसे ही कुछ दिनों बाद, बाड़ लगाने का काम शुरू हुआ चीन के राजनीतिक कमिसार अपने कुछ सैनिकों के साथ उस जगह पर पहुंच गए और तार बिछाना बंद करने की बात कही. भारतीय सैनिकों ने उनका अनुरोध स्वीकार नहीं किया, तभी अचानक चीनियों ने मशीन गन फ़ायरिंग शुरू कर दी.

1975 - भारतीय सेना के गश्ती दल पर अरुणाचल प्रदेश में एलएसी पर चीनी सेना ने हमला किया था.

भारत और चीन इससे पहले कब-कब आपस में भीड़

सवाल 11: इस तनाव को दोनों देशों के आपसी रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा?

इसका सीधा जवाब देना थोड़ा मुश्किल है. दोनों देशों के बीच अब भी बातचीत चल रही है. आने वाले कुछ महीने दोनों देशों के लिए निर्णायक होगें. जानकार मानते है कि ताज़ा स्तिथि से निपटने के लिए सेना के स्तर पर नहीं बल्कि राजनीतिक स्तर पर भी बातचीत होनी चाहिए.

पुरानी स्थिति में लौटने या दोनों देशों के तनाव से छुटकारा दिलाने को डिसइंगेजमेंट प्रक्रिया भी कहा जाता है. दोनों देशों ने वैसे तो साफ़ किया है कि बातचीत से इस मसले को सुलझाना चाहते हैं.

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