भारत-चीन सीमा विवाद: 45 साल बाद ये नौबत क्यों आई?

भारत-चीन सीमा विवाद

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    • Author, टीम बीबीसी हिंदी
    • पदनाम, दिल्ली

1962 - भारत-चीन युद्ध, ये लड़ाई क़रीब एक महीने चली थी और इसका क्षेत्र लद्दाख़ से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक फैला हुआ था.

1967 - नाथु ला में चीन और भारत के कई सैनिक मारे गए थे. संख्या के बारे में दोनों देश अलग-अलग दावे करते हैं.

1975 - भारतीय सेना के गश्ती दल पर अरुणाचल प्रदेश में एलएसी पर चीनी सेना ने हमला किया था.

भारत और चीन संबंधों के इतिहास में साल 2020 का ज़िक्र भी अब 1962, 1967 और 1975 की तरह ही होगा. वजह साफ़ है भारत-चीन सीमा विवाद में 45 साल बाद इतनी संख्या में सैनिकों की जान गई है.

ऐसा नहीं है कि दोनों देशों के बीच सीमा पर तनाव कोई नई बात हो, लेकिन दोनों देशों ने आपसी सहमति से सीमा विवाद को सुलझाने की कोशिशों के बीच राजनीतिक रिश्ते बनाए रखते हुए व्यापार और निवेश को लंबे समय तक चलते रहने दिया है.

बीते छह सालों में जब से भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभाली है, 18 बार दोनों देशों के बीच मुलाक़ातें और बातचीत हुई है. इन सब कोशिशों को दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने के पहल की तरह से ही देखा गया.

इसलिए बीते दो दिनों में सीमा पर हिंसक झड़पों के बाद हर कोई सवाल पूछ रहा है कि आख़िर अचानक ऐसा क्या हुआ? भारत और चीन के बीच बात इतनी क्यों बिगड़ गई कि नौबत हिंसक संघर्ष तक पहुँच गई.

क्या लद्दाख में भारत की ओर से सड़क निर्माण ही चीन की चिंता का सबब है या बात कुछ और ही है.

बीबीसी ने बात की दोनों देशों के संबंधों पर नज़र रखने वाले जानकारों से. उनके मुताबिक़ पूर्वी लद्दाख में सड़क निर्माण एक वजह हो सकती है, पर एकमात्र वजह नहीं हैं.

भारत-चीन सीमा

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सड़क निर्माण

साल 2018-19 की सालाना रिपोर्ट में भारत के रक्षा मंत्रालय ने कहा था कि सरकार ने भारत-चीन सीमा पर 3812 किलोमीटर इलाक़ा सड़क निर्माण के लिए चिह्नित किया है.

इनमें से 3418 किलोमीटर सड़क बनाने का काम बॉर्डर रोड्स ऑर्गेनाज़ेशन यानी बीआरओ को दिया गया है. इनमें से अधिकतर परियोजनाएँ पूरी हो चुकी हैं.

भारत-चीन सीमा विवाद के जानकारों की राय है कि यही निर्माण कार्य दोनों देशों की विवाद की असली वजह है.

हिंदुस्तान टाइम्स में रक्षा सम्बंधी मामले कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार राहुल सिंह भी इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखते हैं और कहते हैं कि, "पिछले पाँच सालों से भारतीय सीमाओं को बेहतर बनाने पर ज़्यादा ध्यान दिया गया है."

उनके मुताबिक़, "पहले भी सीमा पर दोनों सेनाओं में छोटी-मोटी झड़पें होती रही हैं. डोकलाम के पहले भी 2013 और 2014 में चुमार में ऐसी घटनाएँ सामने आई थीं. लेकिन इस बार की गतिविधियों का दायरा ख़ासा बड़ा है."

पूर्व मेजर जनरल अशोक मेहता ने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर बढ़ती कथित चीनी गतिविधियों का बड़ा कारण, "पुल और हवाई पट्टियों का निर्माण बताया जिसकी वजह से भारतीय गश्तें बढ़ चुकी हैं."

उनके मुताबिक़ इस तनाव के पीछे कई मामले आपसे में एक दूसरे से जुड़े हैं. वो कहते हैं कि हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि जब भारत ने जम्मू-कश्मीर के ख़ास दर्जे को ख़त्म कर दो नए केंद्र शासित प्रदेशों के नक़्शे ज़ारी किए तो चीन इस बात से ख़ुश नहीं था कि लद्दाख के भारतीय क्षेत्र में अक्साई चिन भी था."

लद्दाख

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अनुच्छेद 370 ख़त्म

भारत सरकार ने 5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देनेवाले अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को ख़त्म करने का फ़ैसला किया. जिसके बाद दो केंद्र शासित प्रदेश बनाए गए - एक जम्मू-कश्मीर और दूसरा लद्दाख.

चीन ने भारत सरकार के इस फ़ैसले का विरोध किया था विशेष तौर पर लद्दाख क्षेत्र को जम्मू-कश्मीर से हटाकर केंद्र शासित प्रदेश बनाने का.

भारत के फ़ैसले का विरोध करते हुए चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुअ चुनइंग ने उस वक़्त कहा था, "चीन अपनी पश्चिमी सीमा पर चीनी क्षेत्र को भारत के अपनी सीमा में दिखाए जाने का हमेशा विरोध करता है."

ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन में स्ट्रैटेजिक स्टडी प्रोग्राम के हेड, हर्ष पंत का मानना है कि भारत के इस क़दम को चीन अपने लिए एक ख़तरे के तौर पर देखता रहा है.

कश्मीर पर भारत के इस फ़ैसले के बाद चीनी प्रवक्ता हुअ चुनइंग ने कहा था, "हाल ही में भारत ने अपने घरेलू क़ानून में बदलाव करके चीन की संप्रभुता पर सवाल खड़ा किया है. भारत का यह क़दम अस्वीकार्य है और इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा."

पूरा मामला संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद में भी उठा. इस मुद्दे पर अनौपचारिक बैठक भी हुई लेकिन भारत ने वहाँ अपना पक्ष रखते हुए ये स्पष्ट रूप से कह दिया कि अनुच्छेद 370 को हटाना भारत का आंतरिक मामला है.

हर्ष पंत का मानना है कि चीन ने विरोध जताने के साथ-साथ अपना विरोध जारी रखा. अप्रैल में जब ठंड ख़त्म हुई तो दोबारा से उस इलाक़े में अपने सैनिकों की तैनाती शुरू कर दी.

भारत-चीन सीमा

काराकोरम पर चीनी नियंत्रण

अक्साई चिन के 38,000 वर्ग किलोमीटर के अलावा शक्सगाम घाटी के 5,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक इलाक़े पर भी चीन का नियंत्रण है.

काराकोरम पर्वतों से निकलने वाली शक्सगाम नदी के दोनों ओर शक्सगाम वादी फैला हुआ है. 1948 में इस पर पाकिस्तान ने अपना क़ब्ज़ा जमा लिया था. बाद में 1963 में एक समझौते के तहत पाकिस्तान ने इस क्षेत्र को चीन को सौंप दिया.

पाकिस्तान का मानना था कि इससे दोनों देशों के बीच दोस्ती बढ़ेगी और साथ ही यह भी दलील थी कि चूँकि यहाँ पहले से अंतरराष्ट्रीय सीमा निर्धारित नहीं थी लिहाज़ा पाकिस्तान को इसे चीन को सौंपने से कोई नुक़सान नहीं हुआ.

इसी इलाक़े को लेकर पाकिस्तान ने चीन के साथ समझौता किया था. आज, चीन और पाकिस्तान यहीं बने काराकोरम हाइवे से एक दूसरे के साथ व्यापार करते हैं, जो पश्चिमी कश्मीर के ज़रिए दोनों देशों को जोड़ता है.

हर्ष पंत के मुताबिक़ अगर लद्दाख में हो रहे प्रशासनिक बदलाव में भारत सफल होता है और उस इलाक़े में सैनिकों के लिहाज़ से इंफ्रास्ट्रक्चर को मज़बूत करता है, तो चीन का काराकोरम के रास्ते पाकिस्तान की तरफ़ का जो सीधा रास्ता जाता है, उसमें आने वाले समय में दिक़्क़त आ सकती है. इस लिहाज़ से भी चीन लद्दाख सीमा पर अपनी पकड़ मज़बूत रखना चाहता है.

शी जिनपिंग

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चीन की आंतरिक राजनीति

कई जानकार मानते हैं कि चीन के राष्ट्रपति को इन दिनों कई मोर्चों पर मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. वास्तव में शी जिनपिंग अपने आठ साल के शासन के सबसे मुश्किल दौर से गुज़र रहे हैं.

विवादास्पद प्रत्यर्पण विधेयक पर हॉन्गकॉन्ग में हुए हिंसक विरोध प्रदर्शन को पूरी दुनिया ने देखा. दूसरी तरफ़ ताइवान में सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी की चुनौती जटिल होती जा रही है.

चीन के शिनजियांग प्रांत के वीगर मुसलमानों के ख़िलाफ़ सरकार की नीतियों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना भी बढ़ रही है.

रही सही कसर कोरोना महामारी ने पूरी कर दी है. हाल ही में 194 सदस्य देशों वाली वर्ल्ड हेल्थ असेंबली में एक प्रस्ताव पेश किया गया कि इस मामले की जाँच होनी चाहिए कि दुनिया भर में नुक़सान पहुँचाने वाला कोरोना वायरस कहाँ से शुरू हुआ.

ये असेंबली विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) की प्रमुख नीति निर्धारक इकाई है. दूसरे देशों के अलावा भारत ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया था.

अमरीका और चीन के बीच अघोषित तौर पर चल रहे ट्रेड वॉर की बात भी किसी से छुपी नहीं है.

पिछला पूरा साल चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लिए मुश्किलों भरा ही रहा. ये तमाम उदाहरण ऐसे हैं जो बताते हैं कि शी जिनपिंग आर्थिक मोर्चे पर ही नहीं राजनीतिक मोर्चे पर भी मुश्किलों का सामना कर रहे हैं.

हर्ष पंत की मानें तो ऐसी कठिन परिस्थितियों में चीनी राष्ट्रपति का जनता के अंदर राष्ट्रवाद की भावना को जगाने का ये एक तरीक़ा भी हो सकता है.

साउथ चाइना सी, ताइवान और भारत - हर सीमा पर चीन इस तरह का काम कर रहा है.

हर्ष पंत इसे 'मिलिटरी नेशनलिज्म' प्रोजेक्ट करने की एक पहल मानते हैं. उनके मुताबिक़ साउथ चाइना सी और भारत सीमा में थोड़ा अंतर है. साउथ चाइना सी में मैरीटाइम बाउंडरी की वजह से संघर्ष इतना हिंसक नहीं होता, लेकिन भारत के साथ सीमा भौगोलिक है, इसलिए भी भारत के साथ सीमा विवाद हिंसक हो जाते हैं. साउथ चाइना सी में सैनिकों के मोबलाइज़ेशन में थोड़ा वक़्त ज्यादा लगता है.

शी जिनपिंग, नरेन्द्र मोदी

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भारत की विदेश नीति और आर्थिक वजहें

इसी साल 17 अप्रैल को भारत सरकार ने एक चौंकाने वाला फ़ैसला किया.

केंद्र सरकार ने देश में होने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफ़डीआई के नियमों को उन पड़ोसियों के लिए और सख़्त कर दिया जिनकी सीमाएँ आपस में मिलती हैं.

नए नियम के तहत किसी भी भारतीय कंपनी में हिस्सा लेने से पहले सरकारी अनुमति लेना अब अनिवार्य कर दिया गया है चूँकि पड़ोसियों में सबसे ज़्यादा व्यापार चीन के साथ है तो इसका सबसे ज़्यादा असर भी उसी पर होगा.

इस फ़ैसले की प्रमुख वजहों में से एक थी चीन के सेंट्रल बैंक 'पीपल्स बैंक ऑफ़ चाइना' का भारत के सबसे बड़े निजी बैंक 'एचडीएफ़सी' के 1.75 करोड़ शेयरों की ख़रीद. इससे पहले तक चीन भारतीय कंपनियों में 'बेधड़क' निवेश करता रहा है.

अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के जानकार और जामिया मिलिया इस्लामिया के पूर्व प्रोफ़ेसर एमएम ख़ान का मानना है, "फ़ौजी और आर्थिक ही वो क्षेत्र हैं जहाँ चीन अपना वैश्विक वर्चस्व क़ायम करने के लिए विदेश नीति को समय-समय पर बदलता रहता है."

उन्होंने कहा, "कोरोना के बाद दुनिया के शेयर बाज़ारों में अफ़रातफ़री मची हुई है और चीन बड़े देशों की कंपनियों में निवेश कर रहा है. आप दक्षिण एशिया को देख लीजिए. श्रीलंका, पाकिस्तान और बांग्लादेश में इन्फ़्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी की बड़ी कंपनियों में चीनी क़र्ज़ या निवेश मिल ही जाएगा."

अब अगर भारत ने एकाएक अपनी एफ़डीआई नीति में एक बड़ा बदलाव किया तो काफ़ी संभव है कि चीन की विदेश नीति इससे थोड़ा असहज महसूस कर रही हो.

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