लॉकडाउन ने बताया दक्षिण भारतीयों को तरक़्क़ी के लिए उत्तर भारतीयों की कितनी ज़रूरत

उत्तर भारतीय मज़दूर

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    • Author, विग्नेश ए
    • पदनाम, बीबीसी तमिल

भारत सरकार की ओर से लॉकडाउन की घोषणा के बाद किसी अन्य भारतीय राज्य की तरह ही, दक्षिणी राज्य कर्नाटक से भी प्रवासी मज़दूरों ने अपने गृहराज्य लौटने की कोशिशें शुरू कर दीं थी.

उन्होंने पैदल चलना शुरू कर दिया और घर पहुंचने की हर मुमकिन कोशिश की.

कर्नाटक सरकार ने केंद्र सरकार से विशेष ट्रेनें चलाने की अपील भी की. ट्रेनें तैयार भी थीं.

लेकिन मई की शुरुआत में कर्नाटक की भारतीय जनता पार्टी सरकार ने घोषणा की कि कोई भी ट्रेन राज्य से प्रवासियों को लेकर नहीं जाएगी.

ये घोषणा मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा ने रियल-एस्टेट ट्रेड बॉडी क्रेडाई के सदस्यों के साथ बैठक करने के बाद की. कहा जाने लगा कि इंडस्ट्री लॉबी ने प्रवासियों को वापस अपने घर जाने से रोका है.

लेकिन मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रवासी मज़दूरों को ग़ैर-ज़रूरी यात्रा करने से बचना चाहिए. मुख्यमंत्री ने ये बयान भी दिया कि उन्होंने मंत्रियों से कहा है कि वो प्रवासी मज़दूरों को घर ना जाने के लिए मनाएं.

हालांकि विपक्षी पार्टियों ने आरोप लगाया कि रियल-एस्टेट मालिकों ने मुख्यमंत्री से कहा कि अगर प्रवासी मज़दूर चले गए तो उनके पास काम करने वाला कोई नहीं बचेगा.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ बाद में, राज्य सरकार के अधिकारियों ने कहा कि कामगार इसलिए कर्नाटक छोड़ने की योजना बना रहे थे, क्योंकि उनके पास काम नहीं था और उन्हें रोज़गार दिया जाएगा.

मई के आख़िर में अन्य दक्षिणी राज्य तमिलनाडु के मीडिया ने प्रवासी मज़दूरों की ख़बर चलाई.

मदुरै ज़िले के सरकारी उद्योगों की यूनिट के मालिकों ने अपने क्षेत्र की ग्राम पंचायतों से संपर्क किया और उनसे ऐसे स्थानीय युवाओं की पहचान में मदद माँगी, जिन्होंने व्यावसायिक प्रशिक्षण लिया हुआ है और जो दूसरे राज्यों से लौटे हैं.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, इस खोज के पीछे उनका मक़सद ये था कि वो उन्हें अपनी मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों में काम पर रख सकें. क्योंकि उनकी इकाइयों में पहले काम करने वाले प्रवासी मज़दूरों के चले जाने से उनके पास काम करने वाले लोग नहीं थे. जो पहले उनके यहां काम कर रहे थे उनमें से ज़्यादातर उत्तर भारत से आए प्रवासी मज़दूर थे, जो लॉकडाउन के बाद अपने घरों की ओर निकल गए थे.

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दक्षिणी राज्यों को उत्तरी राज्यों के कामगारों की ज़रूरत क्यों पड़ती है?

साल 2006 में तमिलनाडु के तत्कालीन डीएमके मुख्यमंत्री एम करुणानिधि ने इंजीनियरिंग कोर्स के लिए प्रवेश परीक्षा ख़त्म कर दी थी.

इससे गरीब, ग्रामीण पृष्ठभूमि के उन छात्रों को आसानी से पेशेवर पाठ्यक्रमों में दाख़िला लेने में मदद मिली, जो आर्थिक दिक़्क़तों की वजह से प्रवेश परीक्षा नहीं दे पाते थे.

2000 के दशक से राज्य में कला और विज्ञान कॉलेजों की संख्या बढ़ने लगी थी. और महिलाओं के लिए राज्य प्रायोजित वित्तीय-सहायता योजना की पात्रता के लिए शैक्षिक योग्यता हर साल बढ़ाई जा रही थी.

18वीं शताब्दी की महिला समाज सुधारक मूवलूर रामामृतम के नाम पर चलाई जा रही स्कीम और पहली पीढ़ी के ग्रेज्यूट के लिए छात्रवृत्ति की स्कॉलरशीप ने हाल के सालों में तमिनलाडु में कई महिलाओं के लिए अहम भूमिका निभाई है.

अब तमिलनाडु का ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो राष्ट्रीय औसत से लगभग दोगुना है.

अविभाजित आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री (दिवंगत) वाईएस राजशेखर रेड्डी ने ओबीसी, एससी-एसटी छात्रों और ओसी कैटेगरी के आर्थिक रूप से कमज़ोर छात्रों के लिए उच्च शिक्षा की फ़ीस माफ़ कर दी थी. इससे राज्य में ग्रेजुएट की संख्या बढ़ाने में मदद मिली.

राज्य के मुख्यमंत्री रहे एन. चंद्रबाबू नायडू को पहले अविभाजित आंध्र प्रदेश के आईटी सेक्टर के ब्रांड एंबेसडर के रूप में भी देखा गया. उनके कार्यकाल में कई इंजीनियरिंग कॉलेज खुले. इसके चलते ग्रेजुएट की रूची औद्योगिक क्षेत्र में काम करने से ज़्यादा आईटी सेक्टर में काम करने की तरफ़ हो गई.

अविभाजित आंध्र प्रदेश और फिर राज्य का बंटवारा करके बने दो तेलुगू राज्यों में सिंचाई परियोजनाओं पर जो ज़ोर दिया गया, उससे दोनों तेलुगू राज्यों, ख़ासकर तेलंगाना में खेती योग्य भूमि के क्षेत्र में वृद्धि हुई.

जो लोग कृषि छोड़ चुके थे और अन्य राज्यों और अन्य देशों, विशेष रूप से मध्य पूर्व चले गए थे, वो प्राथमिक क्षेत्र में काम करने के लिए अपने गांव लौट आए हैं.

मध्य पूर्व के साथ केरल का संबंध इतना मज़बूत है कि ये पिछले कई दशकों से केरलवासियों के माइग्रेशन का पहला विकल्प बना हुआ है.

उत्तर भारतीय मज़दूर

'उत्तर भारतीय कामगारों के चले जाने से हो रही परेशानी'

तमिलनाडु के कोयंबटूर में स्थित एक एमएसएमई ट्रेड बॉडी, CODISSIA के अध्यक्ष रामामूर्ति कहते हैं, जब वो यहां आए थे तो उनमें से कई स्किल्ड लेबर नहीं थे. लेकिन यहां आने पर हमने उन्हें प्रशिक्षण दिया और उन्हें उत्पादन के काम में कुशल बनाया. कई प्रोडक्शन यूनिट में ज़्यादातर उत्तर भारतीय मज़दूर ही काम करते हैं. वो धीरे-धीरे प्रोडक्शन फिर से शुरू कर रहे हैं और मज़दूर ना होने की वजह से उन्हें परेशानी हो रही है.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "अभी मार्केट में माँग कम है. इसलिए प्रोडक्शन भी फ़िलहाल कम हो रहा है. लेकिन जब मार्केट में फिर से तेज़ी आएगी, तो हमें काम करने वाले और लोगों की ज़रूरत होगी."

तेलंगाना के एमएसएमई एसोसिएशन के अध्यक्ष अप्पी रेड्डी ने बीबीसी को बताया, "हमारे 60% मज़दूर उत्तर भारतीय प्रवासी श्रमिक हैं. हम जानते हैं कि वो इतनी जल्दी वापस नहीं आएंगे. हमारा मानना है कि प्रोडक्शन को पूरी तरह शुरू होने में कम से कम 2 से 3 महीने लगेंगे. अगर उस समय तक वो लौट आए, तब तो ठीक है. नहीं तो, ये हमारी परेशानी और बढ़ा देगा."

वीडियो कैप्शन, मज़दूर, महिलाएं और बच्चे सैकड़ों किलोमीटर के सफ़र हैं

मेटेरियल रिसोर्स दक्षिण की - ह्यूमन रिसोर्स उत्तर की

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के 2019 के आंकड़ों के मुताबिक़, 2018-19 में 24,11,600 करोड़ रुपये के साथ पश्चिमी राज्य महाराष्ट्र सकल राज्य घरेलू उत्पाद में सबसे आगे था.

दक्षिणी भारतीय राज्य तमिलनाड 16,64,159 करोड़ रुपए के साथ दूसरे नंबर पर रहा, इसके बाद उत्तरप्रदेश 15,42, 432 करोड़ रुपए के साथ तीसरे नंबर पर रहा.

चौथे नंबर पर रहा कर्नाटक कुछ करोड़ के अंतर से यूपी से पीछे रह गया था. 2018-19 में उसकी जीएसडीपी 15,35,224 करोड़ रुपए रही थी.

इसका मतलब तमिलनाडु की जीएसडीपी यूपी से ज़्यादा है, जबकि तमिलनाडु की आबादी यूपी से क़रीब तीन गुना कम है. कर्नाटक की जीएसडीपी भी यूपी से लगभग बराबर थी, जबकि वो आबादी के मामले में उससे लगभग 3.5 गुना कम है. दक्षिणी राज्यों में सबसे कम उद्योगों वाले केरल की जीएसडीपी भी बिहार से कहीं ज़्यादा रही थी.

वीडियो कैप्शन, प्रवासी मज़दूर आखिर शहरों में क्यों नहीं रुक रहे?

लेकिन इस सब के बावजूद कम विकसित माने जाने वाले उत्तर भारतीय राज्यों में हाल के सालों में ज़्यादा आर्थिक वृद्धि दर दर्ज हुई है. कई बार तो इनमें से कई राज्य राष्ट्रीय औसत से भी आगे निकले हैं. पिछले दो सालों में वृद्धि में गिरावट पूरे देश में ही देखने को मिली है और इन राज्यों के लिए ये अलग बात नहीं है.

इससे ये संकेत मिलते हैं कि ये राज्य आने वाले सालों में रोज़गार बढ़ाने की स्थिति में हो सकते हैं.

इसे देखते हुए, दक्षिण के उद्योग टेक्नोलॉजी अपग्रेडेशन की संभावनाओं को टटोल रहे हैं. इसमें केंद्र और राज्य स्तर पर सरकार भी रिफ़ंड और सब्सिडी के ज़रिए उनकी मदद कर रही है. कारोबारियों का उद्देश्य है कि वो श्रम निर्भरता को कम करें.

रामामूर्ति कहते हैं, "लॉकडाउन के दौरान झेली पीड़ाओं की वजह से उनमें से कुछ वापस नहीं लौटना चाहेंगे. लेकिन हो सकता है कि उनकी आर्थिक ज़रूरतें उन्हें कुछ महीनों में वापस लौटने पर विवश करें. यूपी, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों को हमारे जैसे उद्योग खड़े करने में 10 से 20 साल लग जाएंगे."

तबतक दक्षिण के मेटेरियल रिसोर्स और उत्तर के ह्यूमन रिसोर्स साथ-साथ चलते रहेंगे.

(बीबीसी तेलुगू के बल्ला सतीश के इनपुट के साथ)

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