दिल्ली में केजरीवाल पर उठते सवाल और स्वास्थ्य व्यवस्था का बुरा हाल?

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- Author, सिन्धुवासिनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बेहतरीन स्वास्थ्य सुविधाओं का वादा करके दिल्ली की सत्ता में आई आम आदमी पार्टी की सरकार पर इन दिनों स्वास्थ्य से जुड़े कई सवाल उठ रहे हैं.
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में बुधवार को कोरोना वायरस संक्रमण के 1,513 नए मामले सामने आए थे. ये एक दिन में दर्ज किए गए अब तक से सबसे ज़्यादा मामले हैं.
हालाँकि गुरुवार को संक्रमण के 1359 मामले दर्ज हुए. सरकारी अधिकारियों के अनुसार दिल्ली में संक्रमण के कुल मामले 25 हज़ार से ज़्यादा हो गए हैं और मौतों का आँकड़ा 650 हो गया है.
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पिछले कुछ दिनों से दिल्ली में संक्रमण के मामलों की संख्या लगातार 1,000 के क़रीब देखने को मिल रही है.
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संक्रमण मामलों की कुल संख्या के अनुसार अब दिल्ली, महाराष्ट्र के बाद दूसरे नंबर पर है. मौतों के मामले में भी दिल्ली, महाराष्ट्र और गुजरात के बाद तीसरे नबंर पर है.
ज़ाहिर है, यहाँ स्थिति दिन पर दिन गंभीर होती नज़र आ रही है.
लेकिन सफ़दरजंग अस्पताल में कम्युनिटी मेडिसिन के प्रमुख और कोविड-19 नोडल अधिकारी डॉक्टर जुगल किशोर का कहना है कि दिल्ली में स्वास्थ्य तंत्र के बिखरने की हालत आ गई हो, ऐसा भी नहीं है.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “दिल्ली में स्वास्थ्य सुविधाएं बाक़ी जगहों की तुलना में काफ़ी बेहतर हैं लेकिन यहाँ प्रबंधन और को-ऑर्डिनेशन की समस्या है.
दिल्ली में सब ठीक नहीं है
दिल्ली में स्थिति गंभीर हो रही है, ये हाल के घटनाक्रमों से पता चलता है.
बॉर्डर सील करने की हड़बड़ी
कुछ दिनों पहले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस करके बताया कि हरियाणा और उत्तर प्रदेश से लगी दिल्ली की सीमा को एक हफ़्ते के लिए सील किया जा रहा है.
उन्होंने कहा, “लॉकडाउन खुलने के बाद अगर बॉर्डर भी खोल दिया जाए तो दूसरे राज्यों से लोग दिल्ली आने लगेंगे क्योंकि हमारे यहाँ सबसे अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएँ हैं और सरकारी अस्पतालों में इलाज मुफ़्त में होता है.”
केजरीवाल ने आने वाले दिनों में बॉर्डर सील किए जाने का फ़ैसला जनता के पाले में डाल दिया.
उन्होंने कहा, “आप लोग वोट करके बताइए कि क्या बॉर्डर आगे भी सील रखा जाए? क्या दिल्ली के अस्पतालों के बेड दिल्ली के लोगों के लिए ही रिज़र्व रखे जाएं?”
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अरविंद केजरीवाल के इस बयान की काफ़ी आलोचना हो रही है. इतना ही नहीं, बॉर्डर सील किए जाने के फ़ैसले को असंवैधानिक बताते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में इसके ख़िलाफ़ याचिका भी दायर की जा चुकी है.
याचिकाकर्ता वकील कुशाग्र कुमार ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 21 (जीवन का अधिकार) का उल्लंघन बताया है.
इधर, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अपने आदेश में कहा कि दिल्ली-एनसीआर में आवाजाही के लिए एक ही पास दिया जाना चाहिए.
इन सबके बीच मुख्यमंत्री केजरीवाल ने दिल्ली की सीमाएँ सील करने को लेकर जिस तरह की हड़बड़ी दिखाई है, उससे ये सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या दिल्ली का स्वास्थ्य तंत्र दम तोड़ रहा है? क्या दिल्ली अगला मुंबई बनने जा रहा है?

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टेस्टिंग कम करने के आदेश
दिल्ली सरकार ने प्राइवेट लैब के मालिकों से कहा है कि वो टेस्टिंग की संख्या कम करें, ख़ासकर एसिंप्टोमैटिक (बिना लक्षण वाले) मरीज़ों की टेस्टिंग.
सरकार का कहना है कि बिना लक्षणों वाले या हल्के लक्षणों वाले मरीज़ टेस्ट करा रहे हैं और कोविड-19 पॉज़िटिव आने पर अस्पतालों में भर्ती हो रहे हैं.
दिल्ली स्वास्थ्य विभाग का तर्क है कि अगर अस्पताल कम गंभीर या बिना लक्षणों वाले मरीज़ों से भर जाएंगे तो गंभीर रूप से बीमार मरीज़ों के इलाज में कठिनाइयां आएंगी. सरकार अभी अपना ध्यान सिंप्टोमैटिक (लक्षणों वाले मरीज़) मरीज़ों पर केंद्रित करना चाहती है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़ प्राइवेट लैब के निजी अस्पतालों के प्रतिनिधियों का कहना है कि एसिंप्टोमैटिक मरीज़ों की टेस्टिंग इसलिए ज़रूरी है ताकि अस्पताल में कोविड और ग़ैर-कोविड मरीज़ों को अलग-अलग रखा जा सके.

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कुछ प्राइवेट लैब और निजी अस्पतालों का मानना है कि आईसीएमआर के टेस्टिंग दायरे को बढ़ाया जाना चाहिए क्योंकि कई जगहों पर मरीज़ों को भर्ती किए जाने से पहले कोविड-19 टेस्ट के लिए कहा जाता है और कई होटल अपने किचन स्टाफ़ का टेस्ट भी कराना चाहते हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि एसिंप्टोमैटिक मरीज़ों का टेस्ट इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि भारत में बिना लक्षण वाले मरीज़ों की संख्या काफ़ी ज़्यादा है.
सवाई मानसिंह अस्पताल के डॉक्टर एमएस मीणा ने बीबीसी को अप्रैल में दिए एक इंटरव्यू में बिना लक्षण वाले मरीज़ों को ‘दोमुँही तलवार’ बताया था.
उन्होंने कहा था, “जब किसी मरीज़ में कोई लक्षण नहीं होगा, तो वो अपना टेस्ट भी नहीं कराएंगे, तो इन्हें पता ही नहीं चलेगा और ये कोरोना फैलाते चले जाएंगे.”
वहीं, दिल्ली सरकार कम लक्षण वालों को लगातार ‘होम क्वारंटीन’ में रहने की सलाह दे रही है.
ऐसे में प्राइवेट लैब्स को टेस्टिंग घटाने के निर्देशों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या ये संक्रमण मामलों की संख्या घटाने के लिए किया जा रहा है?

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बीजेपी और कांग्रेस जैसी विपक्षी पार्टियां भी आम आदमी पार्टी पर कोरोना मरीज़ों के असली आँकड़े छिपाने के आरोप लगा रही हैं. ये भी आरोप लग रहा है कि दिल्ली के सरकारी अस्पताल मरीज़ों की सही संख्या नहीं बता रहे हैं.
शवों के प्रबंधन में मुश्किलें
कुछ दिनों पहले मीडिया में ऐसी रिपोर्ट्स आई थीं कि दिल्ली के लोकनायक अस्पताल में शवगृह इस क़दर भर चुका है कि कई शवों को ज़मीन पर एक के ऊपर एक लादकर रखना पड़ रहा है.
इतना ही नहीं, कोविड -19 की वजह से मरे लोगों का मौत के पाँच दिनों बाद भी अंतिम संस्कार नहीं हो पा रहा है. निगम बोध घाट, पंजाबी बाग़ और सीएनजी शवदाहगृह से शवों को लौटाया जा रहा है.
दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में स्वत: संज्ञान लेते हुए सरकार से जवाब मांगा है.
हाईकोर्ट ने कहा कि दिल्ली सरकार शवों के प्रबंधन के लिए अपने ही दिशा-निर्देशों का पालन नहीं कर पा रही है.
दिल्ली सरकार ने अदालत से कहा था कि कोविड-19 से जुड़े मामलों में मौतों का आँकड़ा अचानक बढ़ने से शवों के प्रबंधन में कठिनाई आ रही है.
विश्व स्वाथ्य संगठन की गाइडलाइंस के मुताबिक़ कोरोना वायरस संक्रमण के मामले में शवों की अंत्येष्टि के लिए अधिकतम 24 घंटे का समय लिया जा सकता है.

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किस अस्पताल में कितने वेंटिलेटर
दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने गुरुवार को आदेश दिया कि दिल्ली के 61 फ़ीसदी प्राइवेट अस्पताल अपने 20% बेड कोरोना वायरस संक्रमण के मरीज़ों के लिए आरक्षित रखें.
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दिल्ली सरकार के मुताबिक़ मौजूदा वक़्त कुछ प्रमुख अस्पतालों में उपलब्ध बेड और वेंटिलेटर्स की संख्या की जानकारी के लिए बीबीसी संवाददाता शादाब नाज़मी ने एक रियल टाइम ट्रैकर बनाया है. ट्रैकर देखने के लिए आप यहाँ क्लिक कर सकते हैं:
क्या कह रहे हैं दिल्ली के डॉक्टर?
सफ़दरजंग अस्पताल में कम्युनिटी मेडिसिन के प्रमुख और कोविड-19 नोडल अधिकारी डॉक्टर जुगल किशोर का कहना है कि अभी स्वास्थ्य तंत्र के बिखरने की हालत आ गई हो, ऐसा नहीं है.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “दिल्ली में स्वास्थ्य सुविधाएं बाक़ी जगहों की तुलना में काफ़ी बेहतर हैं लेकिन यहाँ प्रबंधन और को-ऑर्डिनेशन की समस्या है. यहाँ दिल्ली सरकार के अस्पताल भी हैं, केंद्र सरकार के भी और एनडीएमसी के भी. ऐसे में सूचनाओं के आदान-प्रदान और मिलकर काम करने में कई तरह की मुश्किलें सामने आती हैं. अस्पताल न तो उचित तरीक़े से एक-दूसरे के संपर्क में रहते हैं और न साथ मिलकर काम करते हैं.”
डॉक्टर जुगल दिल्ली सरकार की नई टेस्टिंग नीति से सहमत नहीं हैं. उनका मानना है कि अगर एसिंप्टोमैटिक और कम लक्षणों वाले मरीज़ों का टेस्ट नहीं होगा तो बीमारी की गंभारता का सही स्तर सामने नहीं आएगा और साथ ही संक्रमण फैलने का ख़तरा भी बढ़ेगा.
उन्होंने कहा, “सरकार को ये बात समझनी चाहिए कि अगर सिर्फ़ गंभीर रूप से बीमार लोगों का टेस्ट होगा तो मृत्यु दर भी ज़्यादा दर्ज होगा. अगर बिना लक्षणों वाले और कम लक्षणों वाले लोगों का टेस्ट होगा तो वो ठीक होंगे और इससे इलाज के बाद ठीक हुए लोगों की संख्या बढ़ेगी. इससे आम लोगों का डर कम होगा.”

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डॉक्टर जुगल कहते हैं कि टेस्टिंग में कमी की वजह से डॉक्टरों के पास सही आँकड़े और जानकारियाँ नहीं आ पातीं.
उन्होंने कहा, “दिल्ली सरकार का नया फ़ैसला एपिडेमियोलॉजिकल (महामारी से जुड़े) संदर्भ में बिल्कुल ग़लत है. हम डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के पास सही आँकड़े ही नहीं आते कि संक्रमण कितनी तेज़ी से बढ़ रहा है और किस दर से लोग ठीक हो रहे हैं. ऐसे में हमें बीमारी को समझने और तैयारियों में दिक्कत आती है.”
डॉक्टर जुगल का मानना है कि सरकार को पॉज़िटिव मामलों की बढ़ती संख्या से नहीं डरना चाहिए.
वो कहते हैं, “अभी भारत पीक से बहुत दूर है और मेरा मानना है कि दिल्ली के 30-40 फ़ीसदी लोगों का संक्रमण की चपेट में आना तय है. इसलिए अगर संक्रमण मामले बढ़ रहे हैं तो सरकार को इससे घबराने की ज़रूरत नहीं है. पॉज़िटिव लोग आख़िरकार हर्ड इम्युनिटी विकसित करने में भी मदद करेंगे. मैं ये नहीं कहता कि हमें हर्ड इम्युनिटी विकसित होने का इंतज़ार करना चाहिए लेकिन ये ज़रूर मानता हूं कि भविष्य में संक्रमण की भयावहता से बचने के लिए बड़े स्तर पर टेस्टिंग ज़रूरी है.”

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सर गंगाराम अस्पताल में सीनियर कंसल्टेंट डॉक्टर धीरेन गुप्ता भी उनसे सहमति जताते हैं.
उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, “सरकार को अगर लग रहा है कि लोग ग़ैर-ज़रूरी तरीके से भर्ती हो रहे हैं तो भर्ती किए जाने के नियम बदले, टेस्टिंग के नहीं. कम से कम टेस्टिंग के ज़रिए पॉज़िटिव लोगों को होम क्वारंटीन या होम आइसोलेशन में तो रखा जा सकेगा. अगर टेस्ट नहीं होगा तो वो चुपचाप संक्रमण फैलाते रहेंगे.”
पब्लिक हेल्थ रिसर्चर इनायत सिंह कक्कड़ का मानना है कि स्वास्थ जैसे बुनियादी मुद्दों को आधार बनाकर चुनाव लड़ने वाली आम आदमी पार्टी सरकार अब स्वास्थ्य व्यवस्था संभालने में ही फिसड्डी साबित होती दिख रही है.
उन्होंने कहा, “दिल्ली सरकार ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले लोगों के सुझावों पर ध्यान नहीं दे रही है. हमने सरकार को कई चिट्ठियां लिखीं लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. अस्पतालों में और अलग-अलग विभागों में सामंजस्य का गहरा अभाव है इसलिए मरीज़ों को बहुत तकलीफ़ें उठानी पड़ रही हैं.”
इनायत सिंह कक्कड़ और उनके सहयोगी कोविड-19 मरीज़ों को इलाज दिलाने में मदद कर रहे हैं.
उन्होंने कहा, “मैं अपने अनुभव से बता सकती हूँ कि दिल्ली सरकार के हेल्पलाइन नंबरों पर फ़ोन करके एंबुलेंस बुलाने जैसी छोटे से काम के लिए कितना संघर्ष करना पड़ता है. जिनकी सरकारी अधिकारियों तक पहुँच है, उनका काम फिर भी हो जाता है लेकिन जो ऐसी पहुँच से दूर हैं, उनकी सुनवाई बेहद मुश्किल है.”
इनायत कहती हैं कि हालात सिर्फ़ दिल्ली सरकार के अस्पतालों में ख़राब हों, ऐसा नहीं है. उनका मानना है कि केंद्र सरकार और एनडीएमसी के अधिकार क्षेत्र में आने वाले अस्पतालों की स्थिति तो और ज़्यादा बुरी है.

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हमारे पास अथाह क्षमता नहीं है: स्वास्थ्य महासचिव
दिल्ली सरकार की स्वास्थ्य विभाग की महासचिव (डीजीसीएच) डॉक्टर नूतन मुंडेजा ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि लोगों में बेवजह डर और घबराहट की वजह से टेस्टिंग कम करने का फ़ैसला किया गया.
उन्होंने कहा, “हमने टेस्टिंग बंद नहीं की है, बल्कि कम की है. हमने कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग भी बंद नहीं की है. हम बस इतना चाहते हैं कि अगर किसी में कोविड-19 के लक्षण नहीं है या हल्के लक्षण हैं तो उसे होम क्वारंटीन किया जाए, न कि अस्पताल में भर्ती.”
डॉक्टर मुंडेजा के मुताबिक़, “हर पॉज़िटिव व्यक्ति अस्पताल में भर्ती होना चाहता है. ऐसे में उन लोगों को परेशानी हो रही है जो गंभीर रूप से बीमार हैं या नॉन-कोविड बीमारियों के शिकार हैं. हमारे पास अथाह क्षमता नहीं है कि हम हर किसी को भर्ती कर सकें. न ही हमारे पास इतनी क्षमता है कि दिल्ली के दो करोड़ लोगों का टेस्ट कर सकें.”
डॉक्टर मुंडेजा कहती हैं कि निजी लैब और अस्पतालों के लिए टेस्टिंग पैसे कमाने के माध्यम से ज़्यादा कुछ नहीं है.
उन्होंने कहा, “लैब्स को सैंपल प्रोसेस करने और उसकी जाँच करने में भी वक़्त लगता है. ज़्यादा लोगों की टेस्टिंग से उन पर दबाव बढ़ता है और नतीजे आने में भी देरी होती है. ऐसे में गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति टेस्ट रिज़ल्ट के इंतज़ार में परेशान होता रहता है.”

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दिल्ली सरकार के पास फ़ंड की कमी?
कुछ दिनों पहले दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने ट्वीट करके केंद्र सरकार से 5,000 करोड़ रुपए की मदद मांगी थी.
दिल्ली सरकार का कहना है कि पिछले दो महीनों में लॉकडाउन की वजह से उसका रेवेन्यू बेहद कम हो गया है और केंद्र की ओर से राज्यों की दी जाने वाली मदद राशि उसे अब तक नहीं मिली है.
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विपक्षी पार्टियों और आलोचकों का कहना है कि दिल्ली सरकार ने अपना ख़ज़ाना विज्ञापनों पर बेतहाशा खर्च करके और लोगों को मुफ़्त सेवाएँ देकर ख़ाली कर दिया.
आर्थिक मामलों के जानकार आलोक जोशी का इस बारे में मानना है कि दिल्ली सरकार के रेवेन्यू कम होने और विज्ञापनों पर बेतहाशा ख़र्च, दोनों बातों में दम है.
वो कहते हैं, “दिल्ली-मुंबई जैसे शहरों को लॉकडाउन की वजह से भारी नुक़सान हुआ है, इसमें कोई शक़ नहीं है. दिल्ली के पास बाकी राज्यों की तरह ज़मीन या अन्य माध्यमों से रेवेन्यू इकट्ठा करने का विकल्प नहीं है. यहाँ सारी कमाई लगभग स्थानीय टैक्स से होती है. इसलिए ये सच है कि दो महीनों में दिल्ली सरकार को काफ़ी नुक़सान हुआ होगा.”
इसके साथ ही आलोक जोशी ये भी मानते हैं कि आम आदमी पार्टी की सरकार ने ग़ैर-ज़रूरी विज्ञापनों में बेशुमार ख़र्च किया है.
उन्होंने कहा, “दिल्ली बाक़ी राज्यों जितना बड़ा भी नहीं है कि उसे इस तरह बड़े स्तर पर विज्ञापनों की ज़रूरत पड़े. सरकार के कुछ विज्ञापन जानकारी वाले ज़रूर होते हैं लेकिन बहुत से अनावश्यक भी होते हैं. दिल्ली सरकार ने जो पैसे अनावश्यक विज्ञापन देने में ख़र्च किए, अगर वो स्वास्थ्य सुविधाओं पर ख़र्च किए जाते तो शायद इतने प्रचार-प्रसार की ज़रूरत ही न पड़ती.”
इस बारे में दिल्ली सरकार के कई मंत्रियों से बात करने की कोशिश की गई लेकिन किसी ने बीबीसी के कॉल और मैसेज का जवाब नहीं दिया.

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