कोरोना संकट: घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं के लिए कितना दर्दनाक रहा लॉकडाउन?
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Author, पद्मा मीनाक्षी
पदनाम, बीबीसी तेलुगू
दूसरे कई देशों की तरह भारत में भी लंबे समय से चल रहा लॉकडाउन घरेलू हिंसा के पीड़ितों के लिए भारी साबित हुआ है. 18 अप्रैल को तारा (अनुरोध पर बदला हुआ नाम) ने ऑनलाइन हेल्पलाइन नंबर सर्च किया जिस पर घरेलू हिंसा की शिकार पीड़ितों को मदद मिलती है.
तब लॉकडाउन को गुज़रे हुए तीन हफ़्ते से थोड़े ज़्यादा का वक़्त हुआ था. भारत में 25 मार्च से लॉकडाउन शुरू हुआ था.
उनके पति 15 सालों से उनके साथ मारपीट और गाली-गलौज करते आ रहे हैं. लेकिन चूंकि वो नौकरी करती थीं, इसलिए वो ज़्यादातर वक़्त घर से बाहर रहती थीं. उनके पति भी अक्सर सफ़र पर होते थे जिस वजह से वो दोनों ज्यादा वक़्त साथ में नहीं रहते थे.
लॉकडाउन ने लेकिन अब उन दोनों के बीच बहुत कुछ बदल कर रख दिया है.
उनके पति और सास सुन न लें इसलिए वो फ़ोन पर बंद कमरे से धीमी आवाज़ में बताती हैं, "मैं हमेशा एक डर के साए में जीती हूँ कि कौन सी बात मेरे पति को बुरी लग जाए."
वो बताती हैं कि दोनों ही उन्हें ताना देते हैं और उन्हें प्रताड़ित करते हैं.
"मुझे हमेशा कहा जाता है कि मैं एक अच्छी मां नहीं हूँ और ना ही एक अच्छी पत्नी हूँ. वो मेरे सामने खाने-पीने की चीज़ों की लंबी-चौड़ी फ़रमाइशें रखते हैं और मेरे साथ नौकरों की तरह व्यवहार करते हैं."
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इमेज कैप्शन, अब महिलाएं घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ बोलने लगी हैं
चेतावनी के बावजूद प्रताड़ना
इन सब प्रताड़नाओं से तंग आकर उन्होंने आख़िरकार मदद माँगने की सोची. उन्हें एक फ़ेसबुक पेज दिखाई पड़ा जो इनविज़िबल स्केयर्स नाम का एक ग्रुप चलाता है. उन्होंने उस ग्रुप से संपर्क किया.
इनविज़िबल स्केयर्स की संस्थापक एकता विवेक वर्मा जिन्होंने तारा से बात की थी, बताती हैं, "हमें बहुत सारी शिकायतें मिल रही हैं जिसमें मदद की गुहार लगाई जा रही हैं."
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वो बताती हैं कि उन्होंने तारा के सामने सारे विकल्प रख दिए. उन्होंने तारा को पुलिस में शिकायत दर्ज करने को कहा या फिर क़ानूनी रूप से अलग होने को कहा या फिर अपने पति से काउंसलर से मिलने की बात करने का सुझाव दिया.
तारा कहती हैं कि उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज करने की चेतावनी अपने पति को दी तब कुछ दिनों तक ये सब बंद रहा लेकिन बाद में फिर से शुरू हो गया. वो बताती हैं कि छोड़ना कोई रास्ता नहीं है.
वो कहती हैं, "सिर्फ़ भगवान ही मुझे बचा सकते हैं. मैं अपने माता-पिता और छोटे बच्चे को मुसीबत में नहीं डाल सकती हूं."
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इमेज कैप्शन, पूरी दुनिया में शिकायत हेल्पलाइन नंबर पर फ़ोन आने की संख्या बढ़ी है
शिकायतों में इज़ाफ़ा
एकता वर्मा कहती हैं, "ज़्यादातर ऐसा होता है कि औरतें उत्पीड़न के मामले में अपने पति को नहीं छोड़ना चाहती हैं. वो हमसे पूछती हैं कि हम कैसे उन्हें सबक़ सिखाएं या फिर उनका व्यवहार बेहतर बना सकें."
तलाक़ को लेकर भारत में एक तरह का सामाजिक कलंक जुड़ा हुआ है. कुछ परिवार ही ऐसे होते हैं जो एक असफल शादी से बाहर आने में अपनी बेटी का साथ देते हैं ख़ासकर जब वो किसी बच्चे की मां होती हैं.
फ़िलहाल घर छोड़कर किसी आश्रम में जाना या फिर मां-बाप के घर जाना मुश्किल भरा फ़ैसला है क्योंकि लॉकडाउन की वजह से यातायत के साधन बंद पड़े हुए हैं.
2018 के आंकड़ों के मुताबिक़ "पति और रिश्तेदारों द्वारा महिलाओं पर होने वाले अत्याचार के मामले क़रीब 32 फ़ीसदी है मतलब क़रीब एक तिहाई."
पुलिस ने 2018 में 103,272 ऐसे मामले दर्ज किए थे.
भारत के राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वे के मुताबिक़ 2015-16 के दौरान 33 फ़ीसदी औरतों को किसी ना किसी रूप में अपने पति के हिंसा का शिकार होना पड़ा है फिर चाहे वो शारीरिक, यौनिक या फिर भावनात्मक स्तर पर हो.
लेकिन इनमें से सिर्फ़ 14 फ़ीसदी औरतें ही मदद के लिए सामने आईं.
हताशा के कारण हिंसा में हुई बढ़ोतरी?
राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी लॉकडाउन के दौरान शिकायतों में इज़ाफ़ा दर्ज किया है. इसकी अध्यक्ष रेखा शर्मा ने बीबीसी को बातचीत में यह बताया है. इसके लिए महिला आयोग ने व्हाट्सएप हेल्पलाइन नंबर शुरू किया है.
23 मार्च से लेकर 16 अप्रैल के बीच मतलब क़रीब लॉकडाउन के शुरुआती तीन हफ़्ते में महिला आयोग में घरेलू हिंसा के 239 मामले दर्ज किए गए थे. यह उन 123 मामलों की तुलना में कहीं ज्यादा हैं जो लॉकडाउन शुरू होने से पहले उस महीने में आए थे.
राजधानी दिल्ली के अशोक यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र की प्रोफ़ेसर अश्विनी देशपांडे कहती हैं, "लगता है कि लॉकडाउन की वजह से ये दुर्व्यवहार करने वाले लोग निराश और हताश महसूस कर रहे और यह हताशा वो अपने साथी या फिर बच्चों पर हिंसा के रूप में निकाल रहे हैं."
प्रोफ़ेसर देशपांडे इस साल के मार्च और अप्रैल के महीने से 2019 के इन्हीं दोनों महीनों की तुलना करते हुए बताती हैं कि पिछले साल इस दौरान जहाँ औसतन पाँच मामले प्रतिदिन आए हैं तो वहीं इस साल इस दौरान नौ मामले औसतन प्रतिदिन सामने आए हैं.
ऐसा नहीं है कि ऐसा सिर्फ़ भारत में ही है. संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेश ने अप्रैल की शुरुआत में ही कहा था कि, "लॉकडाउन के दौरान दुनियाभर में घरेलू हिंसा के मामले में भयावह वृद्धि हुई है."
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़, लेबनान और मलेशिया में हेल्पलाइन पर आने वाले कॉल्स की संख्या साल के इन्हीं महीनों में पिछले साल की तुलना में दोगुनी हो गई है तो वहीं चीन में तीन गुनी हो गई है.
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डर के साए में ज़िंदगी
अक्सर पुलिस को सबसे पहले इन मामलों की जानकारी मिलती है और ऐसा माना जाता है कि वो ऐसे मामलों में औरतों को लेकर ग़ैर-सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनाते हैं. अभी तो ऐसे भी पुलिस फ़ोर्स पर लॉकडाउन की वजह से अतिरिक्त बोझ है.
लेकिन प्रोफ़ेसर देशपांडे कहती हैं कि इन हताश महिलाओं को मदद मिलनी ही चाहिए किसी भी हालत में. सरकार को चाहिए कि वो पीड़ितों को सहायता को अनिवार्य ज़रूरतों के अंतर्गत लाए ताकि उन्हें सु्रक्षित जगहों पर पहुँचाया जा सके.
लक्ष्मी (अनुरोध पर बदला हुआ नाम) का कहना है कि उनके मामले में पुलिस का रवैया मदद करने वाला नहीं था. उनके पति अक्सर बहुत शराब पीया करते थे और फिर हिंसक हो जाते थे.
वो बताती हैं, "वो मेरा बलात्कार करते थे. वो मुझे अपनी यौन ज़रूरतों को पूरा करने का कोई समान समझता था ना कि अपना साथी."
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दुनिया भर में पुष्ट मामले
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गोले प्रत्येक देश में कोरोना वायरस के पुष्ट मामलों की संख्या दर्शाते हैं.
स्रोत: जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी, राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसियां
आंकड़े कब अपडेट किए गए 5 जुलाई 2022, 1:29 pm IST
पहले ऐसा होने पर वो अक्सर अपने मां-बाप के घर चली जाती थीं लेकिन लॉकडाउन के दौरान यह विकल्प भी नहीं रहा.
जब लक्ष्मी को पता चला कि उनके पति सेक्स वर्कर के पास जाते हैं तो वो यह जानकर चिंतित हो गई कि कहीं वो वहाँ से कोरोना वायरस लेकर घर ना लौटें. वो ख़ुद को और अपने दो बच्चों को लेकर घबरा गईं और उन्होंने डरते हुए पुलिस में शिकायत की.
वो बताती हैं कि पुलिसवालों ने उन्हें चेतावनी दी और उनकी बाइक ज़ब्त कर ली ताकि वो घर से ना निकले सकें लेकिन उन्हें हिरासत में नहीं लिया. जब वो घर लौटे तो मुझे बुरी तरह से मारा.
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'मुझे लगा कि अब मैं नहीं बचूंगी'
उनकी नौ साल की बेटी पड़ोस में भागी गई और मदद माँगा. पड़ोसियों के दख़ल देने के बाद वो अपने पति की मार से बच पाईं. फिर उन्होंने डॉक्टर के पास जाकर अपना इलाज करवाया और फिर पुलिस स्टेशन शिकायत दर्ज करने गईं.
वो बताती हैं, "मुझे लगा कि मेरी हालत देखकर वो शिकायत दर्ज करेंगे और मेरे पति को गिरफ़्तार करेंगे लेकिन पुलिसवालों ने ऐसा कुछ भी करने से इनकार कर दिया."
उन्होंने उल्टा लक्ष्मी को जाने को कहा.
"मैं ख़ुद को बेबस और अपमानित महसूस कर रही थी. मैं घर वापस जाने को लेकर डरी हुई थी. कहीं उसने मुझे मार दिया तो?"
अगली सुबह वो अपने बच्चों को लेकर अपने मां-बाप के घर चली गईं. अब भी वो वहीं हैं. वो कहती हैं कि उनके पति ने भी उनसे तब से संपर्क नहीं किया है.
"मेरी ज़िंदगी लॉकडाउन की तरह ही अनिश्चित बन कर रह गई है जिसका कुछ पता नहीं."
कोरोना वायरस क्या है?लीड्स के कैटलिन सेसबसे ज्यादा पूछे जाने वाले
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कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है
सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं
कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.
ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.
लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.
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जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.
यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.
ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.
कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है?जिलियन गिब्स
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वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.
इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.
क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है?सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.
ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.
फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.
बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.
इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.
अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है?फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.
अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.
क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड
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ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.
ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.
जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे
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कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.
लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.
कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.
फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.
क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.
मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.
फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.
यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.
अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.
सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.
मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.
यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.
गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.
मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.
अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.
ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.
बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.
ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.
हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.