दरभंगा में ज्योति का घर बना पीपली लाइव, नींद अधूरी-खाना पीना छूटा

ज्योति अपने पिता के साथ

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    • Author, सीटू तिवारी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

"शौचालय के लिए आज तक यानी 26 मई तक तो बाहर ही गए हैं. आज घर में बन रहे शौचालय में दरवाजा लग जाएगा. अंजाद (अंदाज) है कि कल से बाहर नहीं जाना पड़ेगा."

ज्योति की मां फूलो देवी ने मुझसे ये फ़ोन पर कहा तो साल 2010 में आई फ़िल्म 'पीपली लाइव' याद आ गई.

फ़िल्म में नत्था नाम का एक किसान अपनी ग़रीबी से परेशान आकर आत्महत्या करने की कोशिश करता है. जिसके बाद मीडिया और नेता का नत्था के गांव में जमावड़ा लग जाता है और फ़िल्म के अंत में नत्था गुड़गांव (अब गुरुग्राम) में गुमनामी में मज़दूरी करते दिखता है.

दिलचस्प है कि ज्योति के पिता मोहन पासवान भी गुरुग्राम में ही कुछ महीनों पहले बैट्री रिक्शा चलाते थे. ज्योति का एक कमरे और छोटे से बरामदे वाला घर इस वक़्त पीपली लाइव का सेट सरीखा ही लग रहा है. हमेशा इस छोटे से घर में 40-50 लोगों का जुटान रहता है.

कुछ नेता, कुछ मीडिया वाले, कुछ सामाजिक संगठन, कुछ सरकारी अधिकारी. सब ज्योति की उपलब्धियों और सरकार की नाकामियों को लपकने को बेताब.

पोखर के पास पंडाल लगाएंगे

इस जुटान से घर वाले ख़ुश भी हैं और कोरोना के इस काल में डरे हुए भी.

ज्योति के पिता मोहन पासवान ने बीबीसी से कहा, "पोखर के पास पंडाल लगाएंगे. घर बहुत छोटा पड़ता है. कोरोना का भी डर है, लेकिन किसी को मना करेंगे तो कहेगा कि बहुत अहंकार आ गया है. इसलिए सोच रहे हैं कि पोखर के पास पंडाल लगाएं ताकि वहीं आकर लोग मेरी बच्ची को आशीर्वाद दे दे."

दरअसल बिहार के दरभंगा ज़िले के सिंहवाड़ा के सिरहुल्ली गांव में कोरोना से ज़्यादा ज्योति की चर्चा है. यही वजह है कि सोशल या फिज़िकल डिस्टैंसिंग जैसे शब्द यहां आकर दम तोड़ रहे है.

नेता, मंत्री, संगठन, सरकार के लोग आकर ज्योति को लड्डू खिला रहे हैं, अंग वस्त्र से सम्मानित कर रहे हैं, कपड़े दे रहे हैं और सेल्फ़ी ले रहे हैं. कोरोना के संक्रमण से निर्भय होकर.

भेंट मिली साइकिल के साथ ज्योति

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मास्क लगाए ज्योति, अभी होम क्वारंटीन में हैं लेकिन लोग ज़रूरी शारीरिक दूरी बरत नहीं रहे हैं. मैंने ज्योति से पूछा तो उन्होंने थकी आवाज़ में कहा, "हम अब किसी को कुछ नहीं बोलते. क्या करें?"

नींद अधूरी, खाना-पीना छूटा

ज्योति के घर में सुबह 7 बजे से आने-जाने वालों का मजमा लगना शुरू होता है तो लोगों की महफ़िल रात आठ बजे जाकर ही टूटती है.

मोहन पासवान ने गर्मी का ख़याल रखते हुए एक नया पंखा भी ख़रीद लिया है.

ज्योति की मां फूलो कहती हैं, "उसकी नींद पूरी नहीं हो रही है. लेकिन क्या करें. खाना-पीना भी मुश्किल हो गया है. लेकिन मेरी बिटिया चिड़चिड़ा नहीं रही है. सबसे ख़ुश होकर बात करती है."

ज्योति ने भी बीबीसी से कहा कि उसे अच्छा तो बहुत लग रहा है लेकिन नींद पूरी नहीं हो रही है. वहीं पिता ने उसे सबका फ़ोन कॉल उठाने की हिदायत दी है ताकि कोई बुरा ना मान जाएं.

इंजीनियर, डॉक्टर क्या बनना चाहती है ज्योति?

ज्योति अपने पिता के साथ

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15 साल की ज्योति पढ़ाई में औसत छात्रा रही है. उसने राजकीयकृत मध्य विद्यालय, सिरहुल्ली से साल 2017 में आठवीं पास किया है.

उसके स्कूल के प्रिंसीपल रत्नेश्वर झा ने बीबीसी को बताया, "ज्योति औसत छात्रा थी. स्कूल की किसी अन्य गतिविधियों में उसकी बहुत दिलचस्पी नहीं थी. शर्मीली थी पहले, लेकिन आज वो हमारे स्कूल के लिए गर्व का विषय है."

ज्योति की मां बताती हैं कि उसने नौवीं में दाख़िला लेकर पढ़ाई छोड़ दी.आंगनबाड़ी में काम करने वाली फूलो बताती हैं, "सब आस पड़ोस के बच्चे ट्यूशन पढ़ते थे लेकिन हमारे पास इतने पैसे नहीं थे कि उसे ट्यूशन पढ़ाए तो उसने पढ़ाई छोड़ दी."

फ़िलहाल अब बिहार सरकार ने ज्योति का नामांकन नौवीं कक्षा में करा दिया है. लेकिन अलग-अलग संस्थाओं ने ज्योति को इंजीनियरिंग, डॉक्टरी पढ़ने या प्रशासनिक अधिकारी बनने के लिए होने वाली तैयारी में उसे मदद का आश्वासन दिया है.

वीडियो कैप्शन, पिता को साइकिल पर बैठाकर कई किलोमीटर ले गई बेटी

उधर साइकिलिंग फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया ने भी ज्योति को ट्रायल के लिए दिल्ली बुलाया है ताकि उसके साइकिलिस्ट बनने की संभावनाओं को तलाशा जा सके.

केन्द्रीय खेल मंत्री किरन रिजूजू ने इस मामले में स्पोर्टस अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया से ज्योति ट्रायल के बाद रिपोर्ट मांगी है.

मेरी इस लड़की को हम कहां-कहां भेजे?

ज्योति क्या चाहती है? मेरे इस सवाल पर किसी पत्रकार के 'वीडियो शूट' के लिए साइकिल चलाकर लौटी ज्योति कहती है, "जब पढ़ लिख लेंगे तो बता देंगे. बस हमको इतना मालूम है कि पढ़ लिख कर कुछ बनना है."

ज्योति ने साइकिलिंग फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया से एक महीने का समय मांगा है. लंबी दूरी तक साइकिल चलाने के चलते उसकी कमर में घाव हो गए हैं, जिसका इलाज चल रहा है.

दिचलस्प है कि लोगों के जमावड़े के चलते टीवी पर ज्योति से जुड़ी क्या ख़बरें चल रही हैं, ये देखने की फ़ुरसत भी परिवार के पास नहीं है.

इधर लोगों से मिल रहे लगातार ऑफ़र से उसके पिता संशय की स्थिति में हैं. वो बेचैन होकर पूछते है, "एक लड़की है इसे हम कहां-कहां भेजेंगें? सब कह रहे हैं कि मकान नौकरी की व्यवस्था करेंगे लेकिन मेरी एक बेटी कहां-कहां जाएगी?"

घर में लग गया नल, अब तक मिल चुकी चार साइकिल

ज्योति के घर में जहां आनन-फ़ानन में शौचालय बन गया वहीं मुख्यमंत्री हर घर नल जल योजना के तहत तीन नल लग गए है.

एक शौचालय के पास और दो बरामदे में. उसके घर में खाना बनाने की गैस है लेकिन गैस भराने के लिए ज़रूरी पैसों के अभाव में ज़्यादातर चूल्हे पर ही खाना बनता है.

ज्योति अपने घर में

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इसके अलावा ज्योति को अब तक चार नई साइकिल मिल चुकी है. जिसमें एक स्पोर्ट्स साइकिल भी है जो स्थानीय विधायक संजय सरावगी ने दिया है.

ज्योति ने जो साइकिल गुरुग्राम से दरभंगा आने के लिए ख़रीदी उसको मिलाकर घर में पांच साइकिल हो गई हैं जो इस छोटे से घर से बहुत जगह घेर रही है.

इन साइकिलों का क्या कीजिएगा, मेरे इस सवाल पर ज्योति की मां बोलीं, "गुरुग्राम वाली साइकिल को संजोकर रखेंगें क्योकि वो हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण निशानी है. बाक़ी साइकिल बच्चे चलाएंगे."

ज्योति की छोटी बहन मानसी पांचवीं में पढ़ती है, भाई दीपक तीसरी कक्षा में और प्रियांशु अभी आंगनबाड़ी जाता है.

बारहवीं तक पढ़े मोहन पासवान कहते हैं, "लोग पैसे से मदद कर रहे हैं लेकिन अकांउट में कितना पैसा आया, ये अभी तक मालूम नहीं किया है. लेकिन जो भी पैसा आ रहा है उससे बच्चों को अच्छी शिक्षा देंगें."

गर्व और शर्म का विषय

15 साल की ज्योति जो अपने पिता को कभी साइकिल और कभी ट्रक पर बैठाकर गुरुग्राम से सिरहुल्ली पहुंची है, उस पर सोशल साइट्स में लोग बंटे हुए हैं.

किसी के लिए ज्योति गर्व, किसी के शर्म और कोई ज्योति पर गर्व और सरकार पर शर्म महसूस कर रहा है.

दरअसल ज्योति के इस पूरे एपिसोड ने समाज और व्यवस्था को बेपर्द कर दिया है. इस समय भी जब ज्योति को सम्मानित करने वालों की भीड़ उसके घर लगी है, हज़ारों 'ज्योति' सड़क पर पैदल चलती रही है, ट्रेन में ठूंस-ठूंस कर भूखे प्यासे अपने घर आने की पीड़ादायक यात्रा कर रही है.

लोजपा प्रमुख चिराग पासवान ने ज्योति को राष्ट्रपति पुरस्कार देने की अनुशंसा की है, तेजस्वी यादव ने उनकी पढ़ाई लिखाई और शादी का ख़र्च उठाने का भरोसा दिया है तो बिहार सरकार हाशिए पर पड़े समाज के लिए बनी हर कल्याणकारी योजना को ज्योति के घर तक पहुंचाने में लगी है.

बीते आठ दिनों में ज्योति का जीवन बदल गया, लेकिन क्या ये बेहतर नहीं होता कि बिहार, जहां 60 फ़ीसदी महिलाएं एनीमिया की शिकार है वहां प्रत्येक बच्ची-प्रत्येक महिला के जीवन में ये बदलाव सरकार, व्यवस्था और समाज उठाने का ज़िम्मा लेता?

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