कोरोना लॉकडाउन: फ़्रांसीसी परिवार को कैसे भा गया यूपी के महराजगंज का यह गांव

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- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, लखनऊ से, बीबीसी हिन्दी के लिए
भारत की यात्रा पर आए फ़्रांस के एक परिवार को यूपी के महराजगंज ज़िले का एक गांव इतना भा गया और वहां के लोग इतने घुल-मिल गए कि परिवार ने होटल या गेस्ट हाउस में रहने की प्रशासन की पेशकश को अस्वीकार कर दिया.
फ़्रांस के टॉलोस शहर के रहने वाले पलारेस पैट्रिस अपनी पत्नी वर्जीनी, दो बेटियों और एक बेटे के साथ फ़रवरी से ही भारत की यात्रा पर निकले थे. 21 मार्च को उनका नेपाल जाने का कार्यक्रम था और वो नेपाल की सीमा में जब प्रवेश करने वाले थे, उसके अगले दिन जनता कर्फ़्यू था. उस दिन ये लोग महराजगंज के लक्ष्मीपुर ब्लॉक के कोल्हुआ गांव में एक मंदिर में रुक गए.
दो दिन बाद ही लॉकडाउन घोषित कर दिया गया और सभी अंतरराष्ट्रीय सीमाएं सील कर दी गईं, जिसके बाद इन लोगों को यहीं रुकना पड़ा.
नौतनवां के उप-ज़िलाधिकारी जसवीर सिंह कहते हैं, "प्रशासन की ओर से इन लोगों को खाने-पीने का सामान उपलब्ध कराया जा रहा है और उनकी जांच भी कराई गई. सभी लोग जांच में स्वस्थ पाए गए. हम लोगों ने इनसे अनुरोध किया कि कहीं बेहतर जगह रुकने की व्यवस्था कर दी जाए लेकिन इनका कहना था कि यहां उन्हें अच्छा लग रहा है. ये लोग जंगल के पास बने मंदिर के पास ही रुके हुए हैं. प्रशासन के लोग नज़र रखे हुए हैं कि किसी तरह की असुविधा न हो इन्हें. हालांकि गांव के लोगों से इन्हें काफ़ी सहयोग मिल रहा है."
यह फ़्रांसीसी परिवार पिछले कई महीने से अपने ही विशेष वाहन से कई देशों के भ्रमण पर निकला है. पैट्रिस बताते हैं कि एक मार्च को वो वाघा सीमा पार करके पाकिस्तान से आए थे. वो कहते हैं, "पंजाब, यूपी होते हुए अब नेपाल जाना था. इसके बाद म्यांमार, इंडोनेशिया और मलेशिया होते हुए वापस फ़्रांस जाने की योजना थी. लेकिन अब देखते हैं कि यहां से कब निकलना होता है."

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नेपाल सीमा खुलने का इंतज़ार
ये लोग भारत में भी कई जगह भ्रमण कर चुके थे और फ़िलहाल नेपाल जाने की तैयारी में थे लेकिन अचानक लॉकडाउन की स्थिति आ गई. इसी वजह से महराजगंज में सोनौली सीमा से क़रीब 30 किलोमीटर दूर जंगल के किनारे बसे इस गांव में इन लोगों ने अपना ठिकाना बना लिया.
फ़िलहाल ये लोग गांव के ही एक मंदिर के पास रुके हुए हैं. इनके पास अस्थाई तौर पर रुकने के लिए संसाधन हैं और गांव वालों के साथ ये काफ़ी घुलमिल गए हैं. ये लोग फ्रेंच और अंग्रेज़ी बोलते-समझते हैं लेकिन अब हिन्दी शब्दों को भी काफ़ी कुछ समझने लगे हैं.
ग्राम प्रधान के प्रतिनिधि जोगेंद्र सहानी कहते हैं कि गांव के लोग और मंदिर के पुजारी इनकी मदद कर रहे हैं. साहनी
के मुताबिक, "महराजगंज ज़िला प्रशासन की ओर से इन्हें फल, अनाज सहित रोज़मर्रा की सामग्री भेजकर हर संभव मदद की जा रही है. गांव वाले भी इनसे काफ़ी मेल-जोल के साथ रहते हैं और लॉकडाउन का आनंद ले रहे हैं."

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परिवार की सबसे वरिष्ठ महिला वर्जीनी कहती हैं, "हम पिछले दस महीने से ट्रैवल कर रहे हैं. हमें यात्रा करना और लोगों से मिलना बहुत अच्छा लगता है. लॉकडाउन के कारण हमें यहां रुकना पड़ा क्योंकि हम और कहीं जा नहीं सकते थे. हम यहां रहकर नेपाल की सीमा खुलने का इंतज़ार कर रहे हैं."
"ये जगह काफ़ी अच्छी है. धूप है लेकिन पेड़ की छांव इससे बचा रही है. मेरे परिवार के साथ यहां के लोगों का व्यवहार काफ़ी अच्छा है. बाबा मेरे परिवार के लिए खाना बनाते हैं. गांव के कई लोग दूध, फल-सब्ज़ियां देते हैं, खाना देते हैं. हम अच्छी तरह से रह रहे हैं और बाबा के साथ मिलकर हनुमान जी से प्रार्थना करते हैं कि वो कोरोना को ख़त्म कर दें."
पैट्रिक पेशे से मोटर मैकेनिक हैं और उन्होंने अपनी कार में ही रुकने-रहने का भरपूर इंतज़ाम कर रखा है. उनकी पत्नी वर्जीनी स्वास्थ्य विभाग में काम करती हैं.
गांव वालों के मुताबिक, फ्रांसीसी परिवार मंदिर में पूजा भी करता है और मंदिर के पुजारी के साथ शाम को कीर्तन-भजन में भी हिस्सा लेता है. परिवार को इन सबमें काफ़ी आनंद आ रहा है, ख़ासकर बच्चों को.
पुलिस उपाधीक्षक अशोक मिश्र कहते हैं, "इनकी देखभाल के लिए सरकार के साथ-साथ स्थानीय नागरिक भी सहयोग कर रहे है, ज़िला प्रशासन के अधिकारी भी लगातार इनके संपर्क में हैं. चूंकि इन्हें गांव में ही अच्छा लग रहा है और ये यहीं रुकना चाहते हैं तो इन पर दबाव भी नहीं बनाया गया है. गांव के लोगों को भी इनसे कोई दिक़्क़त नहीं है. पुलिस और प्रशासन के लोग लगातार इनका हाल-चाल लेते रहते हैं."

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स्थानीय लोगों का कहना है कि ये हमारे अतिथि जैसे हैं, इसलिए इनका ख़याल रखा जाता है. प्रशासन की ओर से इन लोगों के रहने की सूचना फ़्रांसीसी दूतावास को भी दे दी गई है.
ज़िलाधिकारी उज्ज्वल कुमार कहते हैं, "फ़्रांस के दूतावास को बता दिया गया है इनके बारे में और इनकी वीज़ा अवधि उन लोगों ने बढ़ा दी है. फ्रांसीसी परिवार का पूरा ख़याल रखा जा रहा है और सभी लोग पूरी तरह से स्वस्थ हैं. किसी भी परेशानी की स्थिति में उन्हें ज़िम्मेदार लोगों को फ़ोन नंबर उपलब्ध करा दिए गए हैं."
बहरहाल, इस फ़्रांसीसी परिवार को भले ही लॉकडाउन के चलते विवशता में इस गांव में रुकना पड़ा हो लेकिन अब उन्हें यही गांव ख़ूब भा रहा है और इसीलिए ये लोग इस जल्दी में भी नहीं हैं कि लॉकडाउन कब खुलेगा?



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