कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ लड़ाई में पिछड़ता क्यों दिख रहा है भारत- प्रेस रिव्यू

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भारत में बुधवार को कोरोना वायरस के संक्रमण के क़रीब 27 हज़ार टेस्ट किए गए और पिछले दो दिनों में 22 नए लैब जोड़े गए हैं. हिन्दुस्तान टाइम्स ने पहले पन्ने पर कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ भारत की कोशिश रफ़्तार क्यों नहीं पकड़ पा रही उस पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है. अख़बार ने लिखा है कि भारत कोशिश कर रहा है कि कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ अभियान को तेज़ किया जाए लेकिन कई ऐसी वजहें हैं जिनसे ये कोशिशें रंग नहीं ला पा रहीं.
इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च यानी आईसीएमआर की ओर से जारी किए गए डेटा के अनुसार 26,351 सैंपल बुधवार को लिए गए. ये सैंपल इस महीने की शुरुआत से पाँच गुना ज़्यादा हैं. इस महीने की शुरुआत में हर दिन पाँच हज़ार सैंपल लिए जा रहे थे. सरकारी और प्राइवेट लैबों की संख्या भी 258 हो गई है.
मेडिकल इमरजेंसी पर प्रधानमंत्री की उच्चस्तरीय समिति के उपाध्यक्ष सीके मिश्रा ने कहा, ''हमने कई नए लैब शुरू किए. सैंपल कलेक्शन की प्रक्रिया में भी तेज़ी आई है. पूरे अभियान में ट्रेंड मेडिकल कर्मियों को शामिल किया गया है ताकि टेस्टिंग की रफ़्तार तेज़ हो.'' अख़बार लिखता है कि भारत में टेस्टिंग की रफ़्तार इसलिए धीमी है क्योंकि संसाधन और तकनीक पर्याप्त नहीं हैं. पिछले महीने से जब भारत में कोविड-19 के मामले बढ़ने शुरू हुए तो टेस्टिंग प्रक्रिया में तेज़ी लाना सबसे अहम था लेकिन अब तक नहीं हो पाया है.

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अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि सैंपल लेने के बाद भी नतीजे आने में देरी हो रही है. हिन्दुस्तान टाइम्स की इस रिपोर्ट के अनुसार जैसे-जैसे सैंपल लेने में तेज़ी आई उस तेज़ी से नतीजे नहीं आए और बैकलॉग बढ़ता गया. दिल्ली में 16,605 टेस्ट किए गए लेकिन 956 की रिपोर्ट अब भी पेनडिंग है.
भारत टेस्ट के लिए आरटी-पीसीआर प्रक्रिया पर निर्भर है जो सार्स-कोव-2 के लिए होती है. इस प्रक्रिया के तहत किसी व्यक्ति के ख़ून का सैंपल लेकर लैब में भेजा जाता है और यहीं जाँच होती है कि वायरस का संक्रमण है या नहीं. इस पूरी प्रक्रिया में सात से आठ घंटे का वक़्त लगता है. लेकिन सैंपल जुटाने से लेकर इसके नतीजे तक पहुंचने में 24 से 36 घंटे का वक़्त लग जाता है. कुछ मामलों में टेस्ट बढ़ता है तो नतीजे आने में दो से तीन दिन लग जाते हैं.
तमिलनाडु के वेल्लौर में क्रिस्चन मेडिकल कॉलेज वायरोलॉजी (विषाणु विज्ञान) के हेड प्रोफ़ेसर जैकब जॉन कहते हैं, ''जब तक हम टेस्टिंग सिस्टम को ठीक नहीं करेंगे तब तक पता नहीं चलेगा कि भारत में कोरोना वायरस कितनी तेज़ी से फैल रहा है. जब तक हम टेस्ट नहीं करेंगे तब तक हमें कुछ पता नहीं चलेगा.'' बुधवार को अब तक आधिकारिक रूप से भारत में कोरोना वायरस से संक्रमण के कुल मामले 12 हज़ार के पार बताए गए हैं.
विशेषज्ञों के अनुसार भारत की रणनीति तत्काल टेस्टिंग की है लेकिन अब तक ज़मीन पर उतर नहीं पाई है. तेज़ टेस्टिंग के ज़रिए ही भारत इसका अंदाज़ा लगा पाएगा कि कहां से लॉकडाउन ख़त्म करना चाहिए और कहां लागू रखना चाहिए. विशेषज्ञों का कहना है कि भारत जैसा ग़रीब मुल्क बहुत दिनों तक लॉकडाउन बर्दाश्त नहीं कर सकता.
दक्षिण कोरिया दुनिया के उन चंद देशों में से एक है जिसने कोरोना वायरस के संक्रमण को नियंत्रित करने में सफलता पाई है. दक्षिण कोरिया हर दिन 15 हज़ार टेस्ट कर रहा था और जर्मनी 12 हज़ार. इन देशों में टेस्ट रैपिड टेस्ट किट से किए गए. इसमें व्यक्ति के ख़ून का सैंपल लिया जाता है और एंटीबॉडीज़ के ज़रिए संक्रमण देखा जाता है. भारत के पास यह किट नहीं है. यह किट चीन से मंगवाया जा रहा है लेकिन कई डेडलाइन मिस हो चुकी हैं. भारत के अधिकारियों का कहना है कि गुणवत्ता जाँच में पिछड़ने के कारण देरी हो रही है लेकिन तमिलनाडु की सरकार का कहना था कि चीन से जो किट यहां आना था उसे चीन ने अमरीका भेज दिया.

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इस बार मॉनसून पूरे तेवर में रहेगा
तमाम निराशाओं के बीच बुधवार को मौसम विभाग की ओर से एक अच्छी ख़बर आई. मौसम विभाग ने अनुमान जताया है कि इस बार मॉनसून सामान्य रहेगा. मॉनसून सामान्य रहने की ख़बर आज लगभग हर अख़बारों में है. मॉनसून में 96 से 100% बारिश को सामान्य माना जाता है. मौसम विभाग ने 100% बारिश का अनुमान लगाया है.
केरल तट पर यह एक जून को टकराएगा. पिछली बार वहां 8 दिन की देरी से पहुंचा था. मॉनसून एक्सप्रेस दिल्ली 5 दिन की देरी से 27 जून को आएगी और 22 सितंबर को यहां से विदा लेगी. हालांकि देश से विदाई का समय 15 अक्टूबर है.
बारिश का यह अनुमान अर्थव्यवस्था में नई जान फूंक सकता है, क्योंकि देश में ज़्यादातर खेती मॉनसून पर टिकी है. अच्छी बारिश मतलब बेहतर फसल. इससे खाने-पीने की चीज़ों की महंगाई काबू में रहेगी. गाँवों में पैसे की आमद बढ़ेगी तो रोज़गार के साथ बाज़ार में मांग बढ़ेगी, जो देश के विकास की रफ्तार को तेज़ करेगी.
यमुना किनारे जुटे प्रवासी मज़दूर
लॉकडाउन के बावजूद प्रवासी मज़दूरों के जमा होने की ख़बर नवभारत टाइम्स ने पहले पन्ने पर छापी है. अख़बार ने लिखा है, ''बांद्रा रेलवे स्टेशन पर हज़ारों मज़दूरों के इकट्ठा होने की घटना के बाद बुधवार को दिल्ली में भी यमुना किनारे कुदेसिया घाट पर हज़ारों की तादाद में मज़दूर इकट्ठा हो गए. दिल्ली सरकार फौरन हरकत में आई और इन मज़दूरों को शहर के अलग-अलग स्कूलों में शिफ्ट कर दिया गया.
बुधवार देर शाम तक 20 से ज्यादा बसें रोहिणी, भलस्वा, घेवरा समेत अलग-अलग इलाक़ों के स्कूलों में इन मज़दूरों को लेकर गईं. यमुना किनारे मज़दूरों की भारी भीड़ को सरकार ने बेहद गंभीरता से लिया और तुरंत मज़दूरों को शेल्टर होम्स में शिफ्ट करने का काम शुरू कर दिया. इन लोगों को 10 स्कूलों में ठहराया गया है. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि मज़दूरों को शिफ्ट करने के आदेश दिए गए और उनके रहने और खाने की व्यवस्था की गई.

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सार्वजनिक स्थानों पर थूकना दंडनीय अपराध
दैनिक जागरण के पहले पन्ने की एक ख़बर के अनुसार गृह मंत्रालय ने लॉकडाउन के तीन मई तक विस्तार के बाद बुधवार को जारी समग्र संशोधित गाइडलाइंस में सार्वजनिक स्थलों पर थूकने को आपदा प्रबंधन क़ानून की धारा 51(बी) के तहत दंडनीय अपराध बना दिया है. इसके अलावा सार्वजनिक और कार्यस्थलों पर मास्क पहनना भी अनिवार्य कर दिया है.
गाइडलाइंस के मुताबिक़, ''लॉकडाउन के दौरान सार्वजनिक स्थलों पर थूकना जुर्माने के साथ दंडनीय अपराध होगा. शराब, गुटखा, तंबाकू इत्यादि की बिक्री और थूकने पर कड़ाई से प्रतिबंध होना चाहिए.' ज़िलाधिकारी जुर्माने और दंडनीय कार्रवाई के ज़रिए इन निर्देशों का पालन कराएंगे. आदेश मानने से इनकार करने पर एक साल तक की जेल या जुर्माना अथवा दोनों हो सकते हैं.
शहरों में नगरपालिका क़ानूनों के तहत सार्वजनिक स्थलों पर थूकना अपराध है, लेकिन देश में शायद ही लोग इसे गंभीरता से लेते हैं. बृहन मुंबई नगर निगम ने थूकते हुए पकड़े जाने पर एक हज़ार रुपए का जुर्माना लगाने का प्रावधान किया है. दिल्ली और कई अन्य राज्यों में भी नगर निगमों ने इसी तरह के प्रावधान किए हैं. बिहार, झारखंड, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, हरियाणा, नगालैंड और असम पहले ही तंबाकू उत्पादों के इस्तेमाल और सार्वजनिक स्थलों पर थूकने पर प्रतिबंध लगा चुके हैं.

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