कोरोना वायरसः क्या दुनिया के देश एक दूसरे से लड़ पड़ेंगे?

पीपीई पहने मेडिकल कर्मी

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इमेज कैप्शन, पीपीई किटों की कमी ने दुनियाभर में तनाव पैदा किया है.
    • Author, स्टेफ़ानिया गोज़्ज़र
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत में कोरोनावायरस के मामले

17656

कुल मामले

2842

जो स्वस्थ हुए

559

मौतें

स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 30 IST को अपडेट किया गया

कोरोना वायरस की महामारी से निपटने के लिए अगर कोई देश चीन से ज़रूरी चीज़ों की ख़रीदारी करता है और उसे मंगाने के लिए हवाई जहाज़ भेजना चाहता है तो उसे कुछ सवालों पर ग़ौर करना होगा. जैसे कि प्लेन का रूट क्या हो, उसे कहां रुकना चाहिए, कहां नहीं...? ताकि वो जहाज़ मंज़िल तक पहुंच जाए और रास्ते में किसी दूसरे देश की सरकार उसे ज़ब्त न कर ले.

मुमकिन है कि आपको लगे कि ये कैसी पहेली बुझाई जा रही है. लेकिन सच तो ये है कि दुनिया के कुछ देश इस सवाल का सामना कर रहे हैं, ख़ासकर पेरू की सरकार. दुनिया में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर जिस तरह की आपातकालीन स्थिति बन गई है, उसकी वजह से मास्क, रेस्पिरेटर्स, मैकेनिकल वेंटिलेटर्स की मांग बढ़ गई है और ये आसानी से मिल नहीं रहे हैं.

कारोबारी लड़ाई की तस्वीर उभरती हुई दिख रही है और कई देशों की सरकारें इसकी शिकायत कर रही है. भले ही इसमें कुछ भी ग़ैर-क़ानूनी नहीं हो पर हालात अच्छे नहीं कहे जा सकते. महामारी का सामना करने के लिए आम नागरिकों को ज़रूरी चीज़ों की आपूर्ति नहीं हो पा रही है. फ्रांस में 'मास्क वॉर' के बारे में बात हो रही है.

'नए ज़माने की डकैती'

मास्क

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इमेज कैप्शन, हालांकि मास्क सीमित इस्तेमाल के लिए ही होते हैं लेकिन कमी के कारण कई जगहों पर इनका दोबारा इस्तेमाल किया जा रहा है.

हाल ही में फ्रांस सिर्फ़ इसलिए मास्क नहीं ख़रीद पाया क्योंकि कुछ अमरीकी ख़रीदारों ने इसकी ज़्यादा ऊंची क़ीमत नक़द में अदा कर दी थी. फ्रांस की एक प्रांतीय सरकार के अध्यक्ष रेनॉड मुसेलियर ने पिछले दिनों बताया, "चीन की एक रनवे पर फ्रांस के लिए मास्क ले जा रहे जहाज़ का सामान अमरीकियों ने नक़द में ख़रीद लिया. जिस प्लेन को फ्रांस आना था, अमरीका चला गया."

ऐसी ही शिकायत जर्मनी की तरफ़ से आई. इस बार निशाने पर साफ़ तौर पर अमरीका की सरकार थी. जर्मनी के अधिकारियों ने ये आरोप लगाया कि बर्लिन पुलिस के लिए दो लाख मास्क की खेप ले जा रही शिपमेंट को अमरीका ने थाईलैंड में 'ज़ब्त' कर लिया.

जर्मनी के इंटीरियर मिनिस्टर एंड्रियास गीज़ेल ने कहा, "हमें इसे नए ज़माने की डकैती के रूप में देखते हैं. अटलांटिक सागर के दूसरी तरफ़ के दोस्तों के साथ ऐसा सलूक नहीं किया जाता. भले ही वैश्विक संकट का समय हो पर हम जंगलियों की तरह तो बर्ताव नहीं कर सकते हैं. अमरीका की सरकार से हमारी अपील है कि वे अंतरराष्ट्रीय नियम-क़ायदों का पालन करें."

भारत और तुर्की जैसे देश

पेरू के चिकित्सा अधिकारी

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इमेज कैप्शन, पेरू के अधिकारियों को चिंता है कि चीन से उनके देश के लिए आ रहे चिकित्सा उपकरण कोई और न हथिया ले.

हालांकि ट्रंप प्रशासन ने इन आरोपों से इनकार किया है कि वो देश के बाहर किसी तरह की कोई चीज़ ज़ब्त कर रहे हैं या ऐसा कोई अभियान चला रहे हैं. इसके बाद आख़िरकार जर्मनी ने अपने सुर धीमे कर लिए. जिस मास्क के लिए उसने पैसा चुकाया था, वो बर्लिन नहीं पहुंचा. अगर फ्रांस और जर्मनी जैसे अमीर देशों का ये हाल है तो कमज़ोर देशों से क्या उम्मीद की जा सकती है.

स्पेन के बिज़नेस स्कूल ईसेड के प्रोफ़ेसर मैनेल पीयरो कहते हैं कि इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती. ज़बर्दस्त मांग और सीमित आपूर्ति से समस्या है. जो समस्या यूरोपीय देशों के साथ है, वो दूसरे देश भी झेल रहे हैं. दिक्क़त ये है कि जो अतिरिक्त पैसा मांगा जा रहा है, वो देने के लिए नहीं है."

इस महामारी ने भूमंडलीकरण और मुक्त बाज़ार अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है. फेस मास्क, गाउन जैसे पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट (पीपीई) का उत्पादन करने वाले बड़े देशों ने अपने अस्पतालों की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए इसके निर्यात पर पाबंदी लगा दी है. इनमें भारत, तुर्की और अमरीका जैसे देश शामिल हैं.

मुक्त बाज़ार अर्थव्यवस्था

मेडिकल उपकरण

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इमेज कैप्शन, ब्राज़ील की फ़िएट कार फैक्ट्री इन दिनों मेडिकल उपकरण बनाने पर काम कर रही है.

कोरोना वायरस की महामारी की मार झेल रहे स्पेन को हाल ही में तुर्की और यहां तक कि अपने फ्रांस जैसे यूरोपीय साझीदार देशों से बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है. फ्रांस ने तो अपने यहां से गुज़रने वाले पीपीई किट्स की खेप को रोक लिया था. इन हालात में पेरू जैसे देशों की दुविधा बढ़ गई है कि वो कैसे चीन से अपना सामान मंगाए.

पेरू के स्वास्थ्य मंत्री विक्टर ज़मोरा ने बीबीसी मुंडो से कहा, "स्पेन ने भरोसा दिलाया है कि उसके एयरपोर्ट पर पीपीई किट्स ले जा रहे जहाज़ को उतारे जाने और आगे जाने से कोई दिक्क़त नहीं होगी. लेकिन रास्ते में और भी पड़ाव हैं. क्या हुआ अगर तुर्की में रोक लिया जाए? क्या होने जा रहा है? नियम क़ानून बहुत तेज़ी से बदल रहे हैं."

इसके अलावा मुक्त बाज़ार अर्थव्यवस्था के दूसरे नियम भी चुनौती बनकर सामने आ रहे हैं. जैसे कि सामान उसी को मिलेगा जो सबसे ऊंची क़ीमत लगाए या फिर जो सबसे ज़्यादा मात्रा में ख़रीदेगा, वो सामान ले जाएगा. ये नियम अमल में थे, हैं और रहेंगे.

अमरीका को तरजीह

डोनल्ड ट्रंप

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इमेज कैप्शन, अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया है कि वो नहीं चाहते कि कोई अमरीकी कंपनी मेडिकल केयर में ज़रूरी चीज़ों को निर्यात करे.

विक्टर ज़मोरा कहते हैं, "टेक्नॉलॉजी और जिस मात्रा में हम ख़रीदारी कर रहे हैं, उस हिसाब से हम ग्राहकों की क़तार में हम सबसे आख़िर में खड़े हैं. हम 100 वेंटिलेटर्स ख़रीद रहे हैं तो दूसरे देश एक लाख यूनिट. मात्रा के हिसाब से दुनिया के बाज़ार में हमारा कोई वजूद नहीं है. हम बहुत छोटे देश हैं."

यहां तक कि लातिन अमरीका में ताक़तवर माने जाने वाले ब्राज़ील को भी समस्याएं आ रही हैं. कुछ दिनों पहले चीन में मेडिकल प्रोडक्ट्स का एक ऑर्डर ब्राज़ील ने गंवा दिया था. ब्राज़ीली अख़बार 'ओ ग्लोबो' के अनुसार चीनी विक्रेता ने ब्राज़ील, फ्रांसं और कनाडा की जगह पर अमरीका को तरजीह दी.

मार्केट रिसर्च करने वाली हिंदुस्तानी फर्म 'मेटिक्यूलस रिसर्च' ने बीबीसी की मुंडो सेवा को बताया कि कोरोना वायरस की महामारी ने दुनिया भर में मांग बढ़ा दी है. दुनिया भर में 85 फीसदी अस्पतालों को सप्लाई की समस्या का सामना करना पड़ रहा है.

कोरोना वायरस से संक्रमण

मेडिकल स्टाफ़

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इमेज कैप्शन, लातिन अमरीकी देशों की सरकारें बढ़ रहे कोविड-19 के मामलों से निपटने के लिए तैयारियां कर रही हैं. सवाल यही है कि क्या ये तैयारियां काफ़ी होंगी?

'मेटिक्यूलस रिसर्च' का कहना है, "ये अनुमान लगाया गया है कि अमरीका जैसे विकसित देशों के पास केवल चार से साढ़े चार करोड़ मास्क का रिज़र्व है. ये कुल मांग का एक से डेढ़ प्रतिशत के क़रीब बैठता है. यूरोप और विकासशील देशों में हालात बहुत ही ख़राब है."

मेडिकल सप्लाई के मामले में अमरीका को दुनिया का सबसे ज़्यादा रिज़र्व रखने वाला देश माना जाता है. कोरोना वायरस से संक्रमण के चार लाख मामलों और 13 हज़ार से भी ज़्यादा मौत देखने वाला अमरीका और भी बुरे समय की तैयारी कर रहा है. 'मेटिक्यूलस रिसर्च' के मुताबिक़ अमरीकी कंपनियों ने युद्ध स्तर पर काम करके अपना उत्पादन दोगुना कर लिया है.

अमरीकी सरकार के सूत्र बताते हैं, "हमें उम्मीद है कि अप्रैल तक मांग दोगुनी हो जाएगी. आने वाले सौ दिनों में अमरीका को एक लाख वेंटिलेटर्स की ज़रूरत पड़ेगी. आख़िरकार धरती पर जितनी भी कंपनियां प्रोडक्शन में लगी हैं, वो इस मांग को पूरा नहीं कर पाएंगी."

भूमंडलीकरण की अवधारणा

रेस्पिरेटर

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इमेज कैप्शन, समूचे पेरू में सिर्फ़ 250 रेस्पिरेटर ही हैं.

उत्पादकों ने भले ही अपने रेट बढ़ा दिए हों लेकिन मांग का पूरा कर पाना उनके बूते से बाहर हो गया है. 'मेटिक्यूलस रिसर्च' का कहना है, "उदाहरण के लिए आयरलैंड की कंपनी मेडट्रोनिक ने वेंटिलेटर उत्पादन की अपनी क्षमता 40 फ़ीसदी तक बढ़ाई है. हर महीने 160 वेंटिलेटर का उत्पादन करने वाली इतालवी कंपनी सियारा चार महीने में दो हज़ार वेंटिलेटर बनाना चाहती है."

ऑटोमोबाइल कंपनी सिएट ने स्पेन में गाड़ियों का उत्पादन बंद कर दिया है और अब वो अस्पतालों के लिए वेंटिलेटर्स का निर्माण कर रही है. कुछ देशों में तो टेक्सटाइल कंपनियां मास्क बना रही हैं. विक्टर ज़मोरा कहते हैं, "कारोबारी पैमाने पर देखें तो मेरे लिए इस महामारी ने आर्थिक भूमंडलीकरण की अवधारणा को ख़त्म कर दिया है और हम संरक्षणवाद पर वापस लौट आए हैं."

पेरू के कुछ यूनिवर्सिटी छात्रों ने एक वेंटिलेटर का प्रोटोटाइप तैयार किया है. इस दक्षिण अमरीकी देश के पास फ़िलहाल बहुत कम वेंटिलेटर्स हैं और जो उसने विदेशी बाज़ारों से खरीदा भी है, वे अप्रैल के आख़िर तक डेलिवर नहीं हो पाएंगे. हालांकि विक्टर ज़मोरा को डर है कि ये वेंटिलेटर्स शायद पेरू तक न पहुंच पाएं.

दूसरे हासिल न कर पाएं...

रेस्पिरेटर

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इमेज कैप्शन, दुनिया की शीर्ष मास्क निर्माता कंपनी 3एम ने अपनी उत्पादन क्षमता को दोगुना कर दिया है.

रेसपिरेटर्स जैसे उपकरण अमूमन कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री के लोग इस्तेमाल करते थे लेकिन अब उन्हें अस्पतालों में काम में लाया जा रहा है. पिछले दिनों इसका उत्पादन करने वाली अमरीकी कंपनी '3M' रेसपिरेटर्स का निर्यात कनाडा और लातिन अमरीका को न कर सके, इसके लिए ट्रंप प्रशासन ने कोरिया युद्ध के समय बनाए गए एक क़ानून का सहारा लिया.

एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा, "हमें मास्क की ज़रूरत है. हम नहीं चाहते कि इसे दूसरे लोग हासिल कर लें. अगर लोग इसे हमें नहीं देंगे जिसकी हमारे लोगों को ज़रूरत है तो हम उनसे सख्ती से निपटेंगे."

कई दिनों तक तनाव की स्थिति बने रहने के बाद कंपनी और व्हॉइट हाउस के बीच समझौता हो गया. इसके तहत '3M' ने वादा किया कि विदेश में मौजूद अपने कारख़ानों से रेसपिरेटर्स का निर्यात अमरीका को किया जाएगा साथ ही दूसरे देशों की आपूर्ति भी जारी रहेगी.

कोरोना वायरस की महामारी की चपेट में लाखों लोग आ चुके हैं. दुनिया के देशों के बीच भरोसा कमज़ोर हुआ है. प्रोफ़ेसर मैनेल पीयरो के शब्दों में कहें तो कोरोना ने सरकारों और बाज़ार अर्थव्यवस्था का सबसे घिनौना चेहरा हमारे सामने लाकर रख दिया है.

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