भारत में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन बेहद मुश्किल है क्योंकि...

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश भर में जारी लॉक डाउन को तीन मई तक बढ़ा दिया है, मंगलवार 14 अप्रैल को उन्होंने यह घोषणा की. ताज़ा घोषणा के मुताबिक लोगों को कुल मिलाकर 40 दिन तक सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना होगा.

मंगलवार की प्रधानमंत्री की लॉक डाउन 19 दिनों के लिए और बढ़ाने की घोषणा के समय भारत में वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या 10 हज़ार से ऊपर चली गई है.

यह कदम कोविड-19 संक्रमण के कम्युनिटी ट्रांसमिशन पर कारगर ढंग से अंकुश लगाने के उद्देश्य से उठाया गया. जब लॉकडाउन की शुरुआत हुई थी तब भारत में संक्रमित मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी थी.

24 मार्च को लॉकडाउन की घोषणा वाले संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जोर देते हुए कहा था, “कोरोना से लड़ने के लिए सोशल डिंस्टेंसिग एकमात्र रास्ता है.”हालांकि उनकी घोषणा के बाद लोगों में पैनिक का भाव दिखा, लोग जरूरत का सामान खरीदने बड़ी संख्या में सड़कों पर उतर आए.

नवंबर, 2016 में नोटबंदी की घोषणा के बाद जिस तरह के अफरातफरी का माहौल दिखा था, वैसा ही इस बार भी दिखा.

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“आप लोगों को एक दूसरे से दूर रहना है और अपने घरों में ही रहना है. कोरोना से सुरक्षित रहने का दूसरा कोई रास्ता नहीं है.”.
प्रधानमंत्री मोदी, लॉकडाउन की घोषणा वाले संबोधन में

बहरहाल, कुछ भारतीयों के लिए सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना संभव नहीं है, अपने घरों के अंदर भी. इसे कुछ तस्वीरों के सहारे समझते हैं.

एक औसत भारतीय परिवार में पाँच सदस्य होते हैं

ये सब एक साथ या तो अपने घर में रहते हैं या किराए के घर में

देश के करीब 40% परिवारों के पास घर के नाम पर बस एक कमरा होता है

देश में ऐसे करीब 10 करोड़ परिवार मौजूद हैं

इसका मतलब ये है कि...

ज़्यादातर लोगों के पास कोई निजी कमरा नहीं है

ये 2011 की जनगणना के आंकड़े हैं, यह भारतीय परिवारों को लेकर मौजूद एकमात्र आंकड़ा है. जब तक अगली जनगणना नहीं हो जाती तब तक इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि भारत की करीब एक चौथाई आबादी मुश्किल हालात में गुजर-बसर कर रही है. यह समझना भी मुश्किल नहीं है कि झुग्गी बस्तियों में रहने वाले इन परिवारों का कोई एक सदस्य भी कोरोना वायरस से संक्रमित हुआ तो उस परिवार की क्या स्थिति होगी.

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मुंबई के धारावी में कोविड-19 संक्रमण के मामले आने के बाद आशंकाएँ और बढ़ गईं. दुनिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्तियों में से एक, धारावी में दस लाख की आबादी रहती है और इसे कोविड-19 संक्रमण कम्युनिटी ट्रांसमिशन का संभावित हॉट स्पॉट माना जा रहा है.

2011 की जनगणना के आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि झुग्गी बस्तियों में रहनी वाली करीब आधी आबादी के पास महज एक कमरे का घर होता है. इस आंकड़े को थोड़ा और गंभीरता से देखने पर मालूम चलता है कि इनमें एक प्रतिशत परिवारों में नौ से ज्यादा सदस्य होते हैं जिन्हें एक ही कमरे में रहना होता है.

धारावी की झुग्गी बस्तियों में एक कमरे में रहने वाले परिवारों की संख्या राष्ट्रीय औसत से काफ़ी ज्यादा है.

वर्ल्ड इकॉनामिक फोरम के मुताबिक धारावी में आबादी का घनत्व, प्रति वर्ग किलोमीटर दो लाख 70 हजार लोगों का है. आबादी के इस घनत्व में कोरोना वायरस संक्रमण के फैलने का खतरा बहुत ज्यादा होता है.

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विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, अगर किसी परिवार का एक सदस्य कोरोना वायरस से संक्रमित हो जाए या उसमें इसके लक्षण हों तो संक्रमित मरीज को एक अकेले साफ सुथरे हवादार कमरे में रखना चाहिए. मरीज को उसी कमरे तक सीमित रखना चाहिए और परिवार के सदस्यों को दूसरे कमरों में रहना चाहिए. इसे आइसोलेशन कहते हैं.

अगर यह संभव नहीं हो तो संक्रमित मरीज से कम-से-कम एक मीटर की दूरी रखने की अनुशंसा की गई है.

भारतीय परिवारों में, संक्रमित मरीज को एक अलग कमरे में रखना ही बेहद मुश्किल है और झुग्गी बस्तियों वाले इलाकों में तो इसे लागू करना असंभव ही लगता है.

नेशनल सैम्पल सर्वे के मुताबिक, भारत के 42 प्रतिशत ग्रामीण घरों के अंदर पानी की उपलब्धता नहीं है

लोगों के घर से बाहर निकलने की एक बड़ी वजह पानी लाने जाना है

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40% से अधिक ग्रामीण भारतीय घरों में पीने के पानी का स्रोत नहीं है

करीब 40 प्रतिशत ग्रामीण आबादी को पानी लाने के लिए 200 मीटर से 1.5 किलोमीटर तक की दूरी तय करनी होती है

ओडिशा, झारखंड और मध्य प्रदेश में 35 प्रतिशत से ज्यादा ग्रामीण आबादी को पानी के लिए आधे किलोमीटर की दूरी तय करनी होती है

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ग्रामीण भारत के हर चार में से एक परिवार को पानी के लिए आधे घंटे तक पैदल चलना होता है. आइएचडीएस के इस सर्वे में 42 हज़ार से ज़्यादा परिवारों से बातचीत की गई है.

पानी का इस्तेमाल केवल पीने के लिए नहीं होता है. इसी सर्वे में यह भी कहा गया है कि करीब 3.5 प्रतिशत भारतीय शौचालयों का इस्तेमाल इसलिए नहीं करते हैं क्योंकि पानी नहीं है.

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21 दिन के लॉकडाउन के दौरान, ढेरों परिवारों को केवल पानी के लिए घरों से बाहर निकलना होगा और इस दौरान उन्हें कोरोना वायरस से संक्रमित होने का खतरा बना रहेगा. लेकिन उनके सामने खुद को इस जोखिम में डालने के सिवा दूसरा विकल्प मौजूद नहीं है.

रिपोर्टर और ग्राफिक्स: शादाब नज़्मी
चित्रण: पुनीत बरनाला
तस्वीरें: गेटी