कोरोना पर सरकार इस तरह करेगी 'वॉर'

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    • Author, गुरप्रीत सैनी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

भारत में कोरोनावायरस के मामले

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स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 30 IST को अपडेट किया गया

भारत में लॉकडाउन के बावजूद अब तक साढ़े तीन हज़ार से ज़्यादा मामले सामने आ चुके हैं.

इतने दिन के अनुभव के बाद भारत सरकार ये समझ चुकी है कि कोरोना के प्रसार को रोकने के लिए प्रभावित इलाक़ों की पहचान कर उन पर काम करना होगा.

इसके लिए सरकार ने पहले हॉटस्पॉट की पहचान की और अब उससे भी आगे बढ़कर ज़िला स्तर पर कन्टेनमेंट प्लान लेकर आई है.

स्वास्थ्य मंत्रालय में संयुक्त सचिव लव अग्रवाल के मुताबिक़ अब तक देश के 274 ज़िलों में कोरोना के मामले सामने आ चुके हैं.

क्या है कन्टेनमेंट प्लान?

इसमें पहले स्थानीय स्तर पर उस इलाक़े की पहचान की जाएगी जहां एक साथ बहुत सारे कोरोना के मामले सामने आए हैं.

ये कोई गांव, क़स्बा या शहर हो सकता है. जहां पहले एक छोटा सा क्लस्टर मिला था, पर अब कई क्लस्टर बन गए हैं.

फिर कन्टेनमेंट और बफ़र ज़ोन तय किया जाएगा.

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कन्टेनमेंट ज़ोन यानी वो ज़िले जहां कोरोना के मामले ज़्यादा मिले हैं और बफ़र ज़ोन यानी उन प्रभावित ज़िलों या ग्रामीण ज़िलों से लगने वाले ब्लॉक. दोनों के एंट्री और एक्ज़िट प्वाइंट तय किए जाएंगे. आसान भाषा में कहा जाए तो इस पूरे इलाक़े को ही क्वारंटाइन कर दिया जाएगा.

कन्टेनमेंट प्लान के तहत मरीज़ों की कॉन्टेक्ट लिस्टिंग, ट्रैकिंग और उनका फॉलोअप होगा. मरीज़ों से संपर्क में आए लोगों की कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग की जाएगी.

कन्टेनमेंट एरिया को कम से कम 28 दिनों के लिए सील किया जाएगा. कन्टेनमेंट ज़ोन के सभी निवासीयों का होम क्वारंटाइन में रहना होगा.

कोरोना से निपटने के लिए सरकार द्वारा बनाए गए प्लान पर बीबीसी ने बात की हरियाणा के नोडल अफसर से. हरियाणा के नोडल अफसर ध्रुव चौधरी ने बीबीसी से कहा, "इस कन्टेनमेंट प्लान से कितना फायदा हो सकता है, ये आप चीन के वुहान और इटली के बाकी हिस्सों को देखकर समझ सकते हैं. किसी महामारी को रोकने का ये सबसे अच्छा तरीक़ा है. हम कोशिश कर रहे हैं कि इस तरीक़े से आम लोगों को दिक्कत ना हों. लेकिन ये भी समझना होगा कि 'नो पेन, नो गेन'. कोई सरकार अपने लोगों को तंग करना नहीं चाहती, खासकर लोकतांत्रिक देश में तो बिल्कुल नहीं. लेकिन इस स्थिति में ये करना बहुत ज़रूरी है. हम राज्यों में कोशिश कर रहे हैं कि जिन लोगों में वायरस मिला है, उन्हें अलग-थलग किया जाए और उनके कॉन्टेक्ट को भी ट्रेस किया जाए. और कन्टेनमेंट प्लान को लागू करने में हम किसी तरह की ढिलाई नहीं बरत रहे हैं. हमें उम्मीद है कि कन्टेनमेंट प्लान से हम नए मामलों को बनने से भी रोक देंगे."

हॉस्पिटल केयर

अस्पताल से भार कम करने के लिए तीन स्तर पर व्यवस्था की गई है.

माइल्ड केसों को अस्थायी मेकशिफ्ट हॉस्पिटल फैसिलिटी में रखा जाएगा. जो कोविड-19 हॉस्पिटलों के नज़दीक स्थित होटलों, हॉस्टलों, स्टेडियम, गेस्ट हाउस को कनवर्ट करके बनाए गए हैं.

कोविड के लिए डेडिकेटेड अस्पताल या बड़े अस्पतालों में ब्लॉक बनाए जाएंगे. मॉडरेट से गंभीर स्थिति वाले मरीज़ों को अस्पतालों में भर्ती किया जाएगा.

कुछ गंभीर मामलों में रेस्पिरेटरी फेलियर और/या मल्टी ऑर्गन फेलियर हो सकता है, जिसके लिए क्रिटिकल केयर की ज़रूरत होगी. अगर कन्टेनमेंट ज़ोन में ये सुविधा नहीं है तो ज़ोन के नज़दीकी सरकारी या प्राइवेट अस्पताल की पहचान करनी होगी.

सरकार के इस प्लान पर बीबीसी ने डॉक्टर से बात की. दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में डिपार्टमेंट ऑफ मेडिसिन के चेयरमैन डॉ एस पी बयोत्रा ने बताया, "इस वक्त ये करना बहुत ज़रूरी है. शुरुआती तौर पर पूरे देश में लॉकडाउन किया गया. इतने दिनों में पता चल चुका है कि किन इलाक़ों में सबसे ज़्यादा कोरोना के मामले सामने आ रहे हैं. जैसे दिल्ली के निज़ामुद्दीन का उदाहरण देखा जाए. वहां इतने सारे लोग पॉज़िटिव मिले. इन लोगों ने दूसरे राज्यों में जाकर भी कोरोना फैला दिया. इस तरह कोरोना के कम्युनिटी लेवल पर फैलने का डर है. यूरोप, अमरीका में स्थिति ऐसे ही बिगड़ी. इसलिए ज़रूरी है कि भारत वक्त रहते कदम उठाए और ऐसे इलाक़ों की पहचान कर उन्हें आइसोलेट करे और इस कन्टेनमेंट प्लान से यही किया जा रहा है. इससे इलाक़ों को अलग-थलग कर क्वारंटाइन किया जा रहा है. इस तरह ये बीमारी तीन से चार हफ्ते में काबू में आ सकती है. ये सबसे कारगर तरीक़ा है कि जिन इलाक़ों में मामले सामने आए उन्हें वहीं रोक दो, ताकि वो आगे कम्युनिटी में वायरस ना फैलाएं."

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मामले बहुत ज़्यादा बढ़ गए तो...

अगर कन्टेनमेंट ज़ोन में मामले बहुत ज़्यादा बढ़ जाते हैं तो चिन्हित अस्पतालों की क्षमता बढ़ाई जाएगी. प्राइवेट अस्पतालों की भी मदद ली जाएगी और जगह चिन्हित कर बनाए गए अस्थायी अस्पतालों में भी काम शुरू किया जाएगा. टेस्टिंग की क्षमता भी बढ़ाई जाएगी.

इन कन्टेनमेंट ज़ोन के लिए विशेष टेस्ट की तैयारी भी है. जिन्हें रैपिड एंटी बॉडी बेस ब्लड टेस्ट कहा जाता है. अगर एक वक्त पर ज़्यादा लोगों की टेस्टिंग की ज़रूरत पड़ती है, तो इस टेस्ट का इस्तेमाल किया जा सकता है.

आईसीएमआर ने ज़रूरत पड़ने पर राज्य सरकारों को ऐसे ख़ास टेस्ट करने की एडवाइज़री जारी की है.

कबतक चलेगा कन्टेनमेंट प्लान

अगर आखिरी पॉज़िटिव मरीज़ मिलने के कम से कम चार हफ्ते बाद तक किसी नए मामले की पुष्टि नहीं होती तो अभियान को धीमा कर दिया जाएगा. आख़िरी संक्रमित मरीज़ के डिस्चार्ज होने के बाद 28 दिन में कन्टेनमेंट ऑपरेशन ख़त्म कर दिया जाएगा.

हालांकि अगर कन्टेनमेंट प्लान काम नहीं करता और मामले बढ़ने का सिलसिला जारी रहता है तो राज्य प्रशासन इसे ख़त्म करने पर फ़ैसला लेगा और दूसरे क़दम उठाएगा.

रणनीति पर सामूहिक चर्चा

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल के मुताबिक रविवार को कोविड से संबंधित कैबिनेट सेकेट्री ने सभी ज़िलो के डिस्ट्रिक्ट मेजिस्ट्रेट, सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस, चीफ़ मेडिकल ऑफिसर, स्टेट सर्विलांस और डिस्ट्रिक्ट सर्विलांस ऑफिसर, स्टेट हेल्थ सेक्रेटरी और चीफ सेक्रेटरी के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए समीक्षा की और कन्टेनमेंट रणनीति पर चर्चा की.

इस कॉन्फ्रेंस में भीलवाड़ा, आगरा, गौतमबुद्ध नगर, पथानामथिट्टा ज़िलों के अधिकारियों और पूर्वी दिल्ली के कलेक्टर्स और मुंबई के म्युनिसिपलिटी कमिशनर ने अपने अनुभव साझा किए. इन इलाक़ों में पहले ज़्यादा मामले सामने आए हैं.

यहां के अधिकारियों ने अपने इलाक़े में लागू की गई रणनीति के बारे में बताया कि कैसे उन्होंने कन्टेनमेंट ज़ोन और बफ़र ज़ोन को मैनेज किया,

कैसे उन्होंने स्पेशल टीम से बफर ज़ोन और कन्टेनमेंट ज़ोन में आने वाले घरों का डूर टू डूर सर्वे करवाया और कॉल सेंटर के ज़रिए कैसे आने वाले यात्रियों को वो मॉनिटर कर रहे हैं, किस तरह से रिंग फेंसिंग करते हुए हाई रिस्क आबादी को मॉनिटर किया जा रहा है.

केबिनेट सेक्रेटरी ने खासतौर पर सभी डीएम से अपील की कि कोविड के रिस्पॉन्स में यूनिफॉर्मिटी बने रहना बहुत ज़रूरी है और इसके लिए सभी ज़िलों में कोविड-19 के लिए क्राइसिस मैनेजमेंट प्लान बनाया जाए.

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