राजस्थान के सीमावर्ती इलाक़ों में कैसे लड़ी जा रही है कोरोना से जंग?

धौलपुर और करौली ज़िले की सीमा बथुआ खोह के बड़गांव में काम कर रहे स्वास्थ्यकर्मी

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इमेज कैप्शन, धौलपुर और करौली ज़िले की सीमा बथुआ खोह के बड़गांव में काम कर रहे स्वास्थ्यकर्मी
    • Author, मोहर सिंह मीणा
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, राजस्थान से

दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क भी जहां कोरोना वायरस से जंग लड़ते हुए घुटनों पर आ गए हैं, वहीं भारत में भी लगातार कोरोना के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है. लेकिन भारतीय स्वास्थ्यकर्मी सीमित संसाधनों और लोगों के विरोध के बीच बिना किसी शिकायत, कोरोना से लोहा लेने के लिए मैदान में डटे हुए हैं.

राजस्थान से जुड़ी अन्य राज्यों की सीमाओं के नज़दीक ज़िला और ग्राम पंचायत स्तर पर चिकित्सक दिन रात अपनी सेवाएं दे रहे हैं. लेकिन क्या वह सुविधाओं और संसाधनों के अभाव में कोरोना से जंग जीत पाएंगे?

डॉक्टर राजवीर सिंह कहते हैं, "यह एक वॉर है और हम लड़ रहे हैं. 15 दिन से मैं घर नहीं गया हूं. मैं घर इसलिए भी नहीं जा रहा हूं कि, यदि मुझे इन्फेक्शन हुआ तो मैं नहीं चाहता हूं कि मेरे घर भी यह इन्फेक्शन पहुंचे हैं."

डॉक्टर राजवीर सिंह, राजस्थान के भरतपुर जिले में हरियाणा और उत्तर प्रदेश राज्य की सीमा से सटे अंतिम ग्राम पंचायत रारह बॉर्डर पर तैनात हैं. वह पिछले एक सप्ताह से वायरस को प्रदेश में प्रवेश से रोकने के काम में जुटे हुए हैं.

डॉक्टर राजवीर सिंह ने बीबीसी को बताया, "हर वॉर में संसाधनों की कमी होती है. लेकिन हमें यह रोना नहीं रोना है. मेरे पास एक ही बोतल सैनिटाइज़र है, तब भी मैं लड़ ही रहा हूं. बजाए इसके मैं प्रशासन को कोसने लग जाऊं तो ये सही नहीं होगा."

वह कहते हैं, "हमारे पास ग्लासेज भी नहीं है. किट्स भी नहीं है. राजस्थान की सरहद से आने-जाने वालों से केवल हम सिम्पटम्स के बारे में ही पूछ रहे हैं और उनको एडवाइज़ दे रहे हैं."

क्या डॉक्टर्स और मेडिकल टीम जो स्क्रीनिंग कार्य में लगे हुए हैं, उनकी भी स्क्रीनिंग या सैंपल जांच होती है? इस सवाल के जवाब में डॉक्टर राजवीर कहते हैं, "अभी तक इस तरह का कुछ भी इन्होंने शुरू नहीं किया है. स्टार्ट तो यह सिम्पटम से ही होता है और सिम्पटम देरी से आते हैं."

डॉक्टर राजवीर कहते हैं, "रेगुलर चैकअप की आवश्यक्ता तो नहीं है. लेकिन साप्ताहिक तौर पर ख़ून के नमूने लिए जा सकते हैं. कम से कम मेडिकल टीम के ख़ून के नमूनों की जांच की ही जानी चाहिए."

राजस्थान सीमा पर सैनिक की तरह वह प्रदेश के लोगों को कोरोना वायरस से बचाव के लिए नाम मात्र की सुविधाओं के बीज अपनी जान पर खेल रहे हैं. फिर भी वह प्रशासन से शिकायत की जगह कोरोना से लड़ने के लिए अपने हौसले को बुलंद करने का काम कर रहे हैं.

डॉक्टर राजवीर सिंह

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इमेज कैप्शन, राजस्थान के भरतपुर ज़िले में हरियाणा और उत्तर प्रदेश की सीमा से सटे अंतिम ग्राम पंचायत रारह बॉर्डर पर काम कर रहे डॉ राजवीर सिंह

धौलपुर और करौली जिले की सीमा पर

धौलपुर और करौली ज़िले की सीमा बथुआ खोह पर अपनी टीम के साथ डॉक्टर सिद्धार्थ गोयल एक सप्ताह से करीब 600 लोगों की स्क्रीनिंग कर चुके हैं.

डॉक्टर गोयल बताते हैं कि सवेरे से लेकर पूरी रात यहां शिफ्ट में स्टाफ तैनात है. करौली से कोई आता है या धौलपुर से बाहर निकलता है तो उनकी स्क्रीनिंग की जाती है.

खुले आसमान के नीचे एनएच 11 के बगल में खड़े होकर ये टीम लोगों से उनके स्वास्थ्य और ट्रेलव हिस्ट्री की जानकारी लेती है.

डॉक्टर गोयल के अनुसार, "स्क्रीनिंग के दौरान यदि कोई पॉजिटिव केस होता है लेकिन लक्षण नहीं होते तो हमें मालूम नहीं चल पाता. कई मामलों में तो लक्षण बिल्कुल भी नज़र नहीं आते. सैंपल के पूरी जांच होने पर ही मरीज़ के कोविड-19 पॉज़िटिव होने के बारे में पता चलता है."

सुविधाओं के नाम पर इस टीम के पास महज़ हल्की क्वालिटी के मास्क, ग्लव्स और कैप हैं. स्क्रीनिंग के दौरान बिना सुविधाओं के किसी पॉज़िटिव शख्स के संपर्क में आने से इनके ख़ुद के ही आइसोलेशन सेंटर में भर्ती होने के पूरे आसार हैं.

डॉक्टर गोयल कहते हैं कि, "हमारे पास तो बस ग्लव्स और सैनिटाइज़र ही हैं. स्क्रीनिंग के दौरान खु़द के बचाव के लिए व्यक्ति से उचित दूरी बनाए रखते हैं."

"इस समय तो पीपीई किट उपलब्ध करानी ही चाहिए. स्क्रीनिंग के दौरान आंखों का एक्सपोजर रहता है और हमारे पास ग्लासेस तक नहीं हैं. अभी दुकानें भी बंद हैं, तो खुद भी खरीद नहीं सकते हैं."

स्क्रीनिंग कर रहे अनजान कोरोना पॉजिटिव शख्स से संपर्क में आने पर कर्मियों के बचाव की व्यवस्थाओं पर सवाल पूछने पर धौलपुर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमएचओ) डॉ गोपाल प्रसाद शर्मा ने कहा, "स्क्रीनिंग कर रहे कर्मियों को मास्क और सेनेटाइजर दिए गए हैं. पीपीई किट सर्वे के लिए आवश्यक नहीं है. जहां जरूरत है वहां एन-95 मास्क पहनाए जा रहे हैं."

अपनी छोटी सी टीम के साथ डॉक्टर राजवीर सिंह

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बूंदी ज़िले का कोटाखुर्द ग्राम पंचायत

बूंदी जिले की ग्रामपंचायत कोटाखुर्द के प्राइमरी हैल्थ सेंटर पर कार्यरत सहायक नर्सिंग एंड मिडवाइफरी (एएनएम) राजकरंता कहती हैं, "न मास्क है, न ग्लव्स हैं, न कैप, न सैनिटाइज़र और ना ही किसी तरह की कोई किट. ख़ुद जागरूक होकर भी हमने कोरोना से बचाव के कोई बंदोबस्त साथ नहीं लिए हैं. लेकिन हम घर-घर जा कर सभी लोगों को कोरोना वायरस से बचाव के लिए जागरूक कर रही हैं."

विडंबना देखिए कि राजस्थान के चिकित्सा विभाग ने कोरोना जैसी महामारी से लड़ने के लिए मैदान में उतारे योद्धाओं को ही बचाव के हथियार तक नहीं दिए. ऐसे में राजस्थान के आम नागरिक को क्या सुविधाएं मिल रही होंगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है.

एएनएम राजकरंता बताती हैं, "आसपास के गांवों में भीलवाड़ा, गुजरात, जयपुर समेत बाहर से करीब 80 लोग आए हैं. जिन्हें होम क्वारंटीन किया और उनकी जानकारी भी उच्च स्तर पर दी है."

वो कहती हैं कि उन्होंने खुद के बचाव की सुविधाओं के लिए वरिष्ठ अधिकारियों को कई बार कहा है लेकिन हर बार उन्हें एक ही जवाब मिला कि अभी ऊपर से सामान आया नहीं हैं.

राजकरंता के पति राहुल उनके स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हैं. वो कहते हैं, "इन्हें ही नहीं बल्कि इनकी किसी भी सहकर्मी को कोई सुविधा उपलब्ध नहीं कराई गई है. ऐसे में यदि राजकरंता को कुछ हो गया तो मेरे परिवार का क्या होगा?"

बूंदी जिले के कोटाखुर्द उप स्वास्थ्य केंद्र प्रभारी डॉ ललित कहते हैं, "मास्क तो खुद के लिए भी नहीं है, एक दो पड़े हैं उन्हीं से काम चला रहे हैं. कवरिंग के लिए भी कुछ नहीं है. कंप्लेंट की है तो कह रहे हैं कि एक दो दिन में आ जाएगी. सैनेटाइज़र तो खुद डॉक्टरों के लिए नहीं है, कर्मचारियों के लिए कहां. बोला तो हुआ है देखो आज आ जाएंगे."

डॉक्टर सिद्धार्थ गोयल

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इमेज कैप्शन, डॉक्टर सिद्धार्थ गोयल एक सप्ताह से करीब 600 लोगों की स्क्रीनिंग कर चुके हैं.

जयपुर से घंटे भर की दूरी पर भी सुविधाएं नदारद

राजधानी जयपुर से महज़ एक घंटे भर की दूरी पर टोंक ज़िले के मालपुरा तहसील के सीतारामपुरा गांव में आशा सहयोगिनी संपत काम करती हैं.

वो गांव में हर घर की दहलीज़ पर पहुंच कर लोगों को कोरोना वायरस से बचाव का संदेश दे रही हैं. वो जयपुर, सीकर, सूरत से आए लोगों को होम क्वारंटीन में रहने की जानकरी दे रही हैं और लोगों की पूरी जानकारी सरकार को उपलब्ध करा रही हैं.

संपत के पास बेहद हल्की क्वालिटी के मास्क के अलावा अन्य कोई सुविधा नहीं है. सरकार लगातार प्रचार के माध्यम से लोगों से बार बार साबुन से या सैनिटाइज़र से हाथ धोने को कह रही है, लेकिन कोरोना के ख़िलाफ़ ज़मीन पर जंग लड़ रही संपत के पास सैनिटाइज़र तक नहीं है.

संपत कहती हैं कि, "हमें जो मास्क दिया गया है, उसे पहन कर ही लोगों से संपर्क कर रही हूं. सरकार से मुझे कोई शिकायत नहीं है, बस हमें कोरोना से अपने देशवासियों को बचाने का हर संभव प्रयास करना है. सो मैं कर रही हूं."

आशा सहयोगिनी संपत महिलाओं से बात कर उन्हें कोरोना वायरस के बचाव के तरीके समझा रही हैं.

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इमेज कैप्शन, टोंक ज़िले के मालपुरा तहसील के सीतारामपुरा गांव में आशा सहयोगिनी संपत (नीले रंग की शर्ट में) महिलाओं से बात कर उन्हें कोरोना वायरस के बचाव के तरीके समझा रही हैं.

बढ़ रहे हैं पॉज़िटिव मामले

राजस्थान में अब तक कोरोना संक्रमण के 133 पॉज़िटिव मामले सामने आ चुके हैं. राजधानी जयपुर में ही 41 मामले के साथ ही अधिकतर ज़िलों से मामले मिल रहे हैं. प्रदेश में लगभग सभी ज़िलों से कोरोना के मामले सामने आए हैं.

राजस्थान का शासन व प्रशासन जिस मेडिकल टीम के भरोसे ज़मीनी स्तर पर कोरोना के ख़िलाफ़ जंग जीतने की कोशिश कर रहा है, असल में वही टीम सीमित संसाधन और ख़ुद के जीवन की जंग हारने के डर के बीच सेवाएं देने को मजबूर हैं.

जब बीबीसी ने डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की शिकायतों के बारे में अतिरिक्त मुख्य सचिव रोहित कुमार से पूछा तो उन्होंने इससे साफ इनकार करते हुए कहा कि, "मैं हर घंटे स्थिति को ऑनलाइन मॉनिटर करता हूं. मुझे नहीं लगता कि किसी भी ज़िले में किसी तरह की कमी है."

वो कहते हैं, "जो स्वास्थ्यकर्मी कोविड-19 के मरीज़ों से सीधे तौर पर संपर्क में हैं उनके पास पर्याप्त संसाधन हैं. राज्य में काफी बड़ी जनसंख्या है जिनकी जांच की जा रही है. हमें अपने संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल के लिए प्राथमिकता तय करनी होगी. हमें ये भी याद रखना होता कि नो वन इज़ हंड्रेड पर्सेंट सेफ एनीवेयर इन द वर्ल्ड (दुनिया में कोई भी कहीं भी सौ फीसदी सुरक्षित नहीं है)."

राजस्थान के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर रघु शर्मा ने भी हाल में बयान जारी कर कहा, "प्रदेश में किसी भी तरह की कोई चिकित्सकीय सामग्री की कोई कमी नहीं है."

मंत्री डॉक्टर शर्मा का कहना है कि, "हमारे पास 11,442 पीपीई किट, 70,534 एन-95 मास्क उपलब्ध हैं. बफर स्टॉक में 3161 पीपीई किट और 36,764 एन-95 मास्क भी रखे हुए हैं."

स्वास्थ्य कर्मचारियों के लगाए संसाधनों के आरोप के सवाल पर राजस्थान के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री डॉ रघु शर्मा ने बीबीसी को बताया, "अगर उनको कमी है तो कंट्रोल रूम में बताना चाहिए. हमने कंट्रोल रूम बनाया हुआ है. हमारे पास किसी चीज़ की कोई कमी नहीं है."

मंत्री डॉ शर्मा आगे कहते हैं कि, राजस्थान में अब तक 154 मामले हो गए हैं. लोगों को भी हमें सपोर्ट करना चाहिए, खुद आगे आकर जांच कराएं. हमारे पास सभी संसाधन हैं.

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