क्या इसी 'भरोसे' से कोरोना का मुकाबला कर पाएगा भारत

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- Author, तारेंद्र किशोर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कोरोना वायरस के संक्रमण से पैदा हुए डर ने लोगों की सिर्फ न आदतें बल्कि सामाजिक व्यवहार में भी बड़ा बदलाव लाया है. अपने आस-पास कोरोना वायरस के किसी संभावित मरीज की मौजूदगी की आशंका ने लोगों की मनोस्थिति पर बुरा असर डाला है.
हालांकि अभी तक भारत में कम्युनिटी ट्रांसमिशन की पुष्टि नहीं हुई है. कम्युनिटी ट्रांसमिशन कोरोना वायरस के संक्रमण का तीसरा स्टेज होता है जिसके बाद से बड़े पैमाने पर समुदाय में संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है.
लेकिन लोग इतने डरे हुए हैं कि इस जोखिम भरे माहौल में जो डॉक्टर्स और मेडिकल स्टाफ काम कर रहे हैं, उनके साथ भी भेदभाव वाला रवैया अपना रह रहे हैं.
इस पर एम्स के रेसिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (आरडीए) के वाइस प्रेसिडेंट डॉक्टर चंदन बताते हैं कि तेलंगाना के वारंगल में करीब 15 डॉक्टरों को रातोंरात उनके मकान मालिकों ने घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया.
वो कहते हैं, "लोगों को लगता है कि डॉक्टर अस्पताल से कोरोना वायरस घर लेकर आ जाएगा. इस मानसिकता को बदलने का उपाय हमें भी समझ में नहीं आ रहा है. इस तरह के कई और मामले मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल से भी सामने आए हैं."

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दिल्ली सरकार का आदेश
दिल्ली-एनसीआर में भी इस तरह के कई मामले सामने आए हैं. इसके बाद दिल्ली सरकार की ओर से एक आदेश जारी कर कहा गया है कि कोई भी मकान-मालिक अगर इस तरह का व्यवहार करता है तो इसे सरकारी कर्मचारियों को उनके कार्य में बाधा डालने का आरोपी माना जाएगा और उनके ऊपर कार्रवाई की जाएगी.
इस आदेश में पुलिस बल को ऐसे मकान-मालिकों पर सख्त कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया है.
इस पर डॉक्टर चंदन कहते हैं कि इस नोटिस के आने के बाद एम्स के नजदीक गौतम नगर इलाके में पुलिस वालों ने जाकर मकान-मालिकों की काउंसिलिंग की है. लेकिन ये नोटिस सिर्फ दिल्ली के लिए जारी किया गया है जबकि इस तरह की शिकायतें देश के दूसरे कई हिस्सों से भी आ रही हैं. इसलिए इस तरह का नोटिस केंद्र सरकार को पूरे देश भर के लिए जारी किया जाना चाहिए.
डॉक्टर चंदन का कहना है कि डॉक्टर्स को पर्याप्त मात्रा में पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट (पीपीई) नहीं मिल पा रहे हैं, इसके बावजूद हम अपनी जान जोखिम में डाल कर मरीजों के इलाज में लगे हुए हैं. ऐसे वक्त में समाज का रवैया तकलीफदेह है.
वो कहते हैं, "हम लोग अपने-अपने परिवार से दूर यहां आए हैं और अस्पताल में अपनी ड्यूटी करने में लगे हैं. हमारे परिवार वाले भी हमें लेकर काफी चिंतित हैं. इन सब के बावजूद लोगों की ओर से यह रवैया देखने को मिल रहा है. इससे बहुत निराशा होती है. अगर उनसे थोड़ा बेहतर रेस्पॉस मिलता तो अच्छा लगता."

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समाज का संकट
इटली में जहां लोग एक तरफ डॉक्टरों, नर्स और मेडिकल स्टाफ को हीरो बता रहे हैं तो वहीं भारत में अपनी जान-जोखिम में डालने वाले मेडिकल स्टाफ से लोग सामाजिक दूरी बनाने की कोशिश कर रहे हैं. जबकि इटली में कम्युनिटी ट्रांसमिशन का स्तर इतना है कि हर दिन सैकड़ों लोगों की मौत हो रही हैं और कोरोना सक्रमण के मामले एक लाख के करीब पहुँचने वाले हैं.
समाज के इस रवैये पर सोशल साइकोलॉजिस्ट रोहित कुमार कहना है कि लोगों को इस मुश्किल वक्त में सोशल डिस्टेंसिंग और सोशल एक्सक्लूजन के बीच फर्क करना पड़ेगा.
रोहित कुमार कहते हैं, "चार्ल्स डिकेन्स ने अपनी क्लासिक किताब 'ए टेल ऑफ टू सिटीज' की शुरुआत में कहा है कि यह सबसे बुरा वक्त भी है और सबसे अच्छा वक्त भी है. सामाजिक तौर पर अभी कुछ-कुछ ऐसी ही स्थिति दिख रही है. यह बुरा वक्त इसलिए है क्योंकि किसी संदिग्ध मरीज या फिर डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ के प्रति समाज का रवैया बहुत निराश करने वाला है. तो दूसरी ओर यह अच्छा वक्त इसलिए हैं क्योंकि जो मजदूर अपने घरों के लिए पैदल निकल पड़े हैं, उन्हें लोग सड़क किनारे खाना खिलाने के लिए भी निकल रहे हैं."
"हम संकट की घड़ी में वैसा ही व्यवहार करते हैं जैसा अपनी वास्तविक ज़िंदगी में होते हैं. अगर हम मददगार और सहिष्णु हैं तो फिर संकट की घड़ी में भी हमारा यह गुण नहीं जाता है. लेकिन अगर हम निजी जीवन में संदेह और निषेध करने वाले लोग हैं तो फिर संकट की घड़ी में हमसे जो अलग होगा, उसके प्रति असहिष्णु रहेंगे."
"इसमें कोई अचरज की बात नहीं कि लोग संदिग्ध मरीजों या फिर डॉक्टरों के प्रति इस तरह का व्यवहार कर रहे हैं. पिछले कुछ अरसे से समाज में जिस तरह का अविश्वास और नफरत का माहौल बना है उसमें इस तरह का सामाजिक व्यवहार ही देखने को मिलेगा."

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सोशल डिस्टेंसिंग
रोहित कुमार आगे कहते हैं, "भारत में पहले से कई तरह के सामाजिक बंटवारे मौजूद है. मसलन हिंदू-मुस्लिम, सवर्ण-दलित, उत्तर भारतीय -दक्षिण भारतीय, कई तरह के भाषाई समूह और अब उसमें कोरोना और गैर-कोरोना वाले का भी बंटवारा जुड़ा गया है."
रोहित कुमार का कहना है कि इस वक्त हमें दूसरों के प्रति हमदर्दी का भाव छोड़ना नहीं चाहिए. हमें दूसरे के साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए जैसा कि हम खुद के साथ उम्मीद करते हैं. किसे पता आज हम जिन लोगों के साथ संदेह के आधार पर बुरा व्यवहार कर रहे हैं, कहीं कल की तारीख में उस स्थिति में हम खुद ना पहुँच जाए. उस वक्त हम चाहेंगे कि लोग हमारे साथ कम से कम सहानुभूतिपूर्ण रवैया अख्तियार करें. और यहां बात तो संदिग्धों और उन मेडिकल स्टाफ की हो रही है जो इस संकट के समय में भी अपनी जान जोखिम में डाल कर काम पर लगे हुए हैं.
वो आगे कहते हैं, "इस मुश्किल घड़ी में हमें एक समाज के तौर पर एकजुट खड़े होने की जरूरत है. हम दुनिया के दूसरे समाजों से इस बारे में सीख सकते हैं. इस पर ही भारतीय समाज का भविष्य निर्भर करता है. यह सब के लिए आसानी से डिप्रेशन के शिकार होने का वक्त है जो बीमार हैं, जो सिर्फ संदिग्ध हैं या फिर जो पूरी तरह से स्वस्थ हैं. इसलिए एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति इस वक्त की सबसे बड़ी मांग है."
अब तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी 'मन की बात' कार्यक्रम में यह कहना पड़ा है कि सोशल डिस्टेंसिंग बढ़ाइए, इमोशनल डिस्टेंसिंग नहीं.

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