नागरिकता संशोधन क़ानून: यूपी में कई लोगों को फिर से नोटिस जारी

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- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता दिल्ली
कोरोना वायरस के कारण इन दिनों CAA-NRC विरोधी आवाज़ें दब सी गई हैं. प्रदर्शनकारी अब भी मैदान में मौजूद हैं लेकिन वो सुर्ख़ियों में नहीं हैं.
लेकिन उत्तर प्रदेश में अगर उन नागरिकों की मानें जिन्हें उत्तर प्रदेश सरकार ने अच्छे व्यवहार के लिए क़ानूनी तौर पर बाध्य किया है तो उनकी आवाज़ें दबी नहीं हैं बल्कि दबाई जा रही हैं.
इनमें से एक बिजनौर ज़िले में सहसपुर क़स्बे के ज़हीन अख़्तर हैं. वो लगभग 40,000 की आबादी वाले इस मुस्लिम क़स्बे के उन दर्जन भर लोगों में शामिल हैं जिन्हें उत्तर प्रदेश सरकार ने अच्छे व्यवहार के लिए एक बॉन्ड पर हस्ताक्षर कराया है.
उन्हें पुलिस ने स्थानीय प्रशासन ने ये नोटिस 6 मार्च को भेजा. इस 100,000 रुपये वाले मुचलके में उन्हें हर 15 दिनों पर स्थानीय प्रशासन के सामने हाज़िर होने के आदेश दिए गए हैं.
वो सहसपुर नगर पालिका के अध्यक्ष रह चुके हैं और कहते हैं कि वो एक प्रसिद्ध और ज़िम्मेदार नागरिक हैं और उनके ख़िलाफ़ इस नोटिस को जारी करने का कोई मतलब नहीं.

संपत्ति के नुकसान की भरपाई
पिछले दो महीनों से संभल, लखनऊ और सहारनपुर जैसे शहरों में दिल्ली के शाहीन बाग़ के तर्ज़ के महिलाओं द्वारा धरने अब भी जारी हैं.
हाल में जारी किए गए नोटिस उन से अलग हैं जो पिछले साल दिसंबर में राज्य के कई शहरों में नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शन में हुए हिंसा के बाद जारी किए गए थे.
हिंसा में 23 लोग मारे गए थे और करोड़ों रुपये की निजी और सरकारी संपत्ति तबाह हुई थी.
कई लोगों को सीआरपीसी की धारा 107 के तहत 50 लाख रुपये तक का बांड भरना पड़ा था और सरकार को ये आश्वासन देना पड़ा था कि वो आगे किसी प्रदर्शन में भाग नहीं लेंगे.
राज्य सरकार ने उन्हें नोटिस जारी करके उनसे सरकारी संपत्ति के नुकसान की भरपाई की मांग की थी.

प्रशासन की दलील
ज़हीन अख्तर के अनुसार उन्होंने केवल एनआरसी के ख़िलाफ़ भाषण दिया था और प्रशासन को एक मेमोरेंडम दिया था.
उन्होंने कहा, "हम ने केवल अपने मौलिक अधिकार का इस्तेमाल किया है. ये नोटिस हमारी आवाज़ दबाने के लिए जारी किए गए हैं."
स्थानीय एसडीएम धीरेन्द्र सिंह ने कहा कि ये बॉन्ड ऐसे लोगों की शिनाख्त करके जारी किए गए हैं जिन्हें नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध प्रदर्शन में शामिल पाया गया है.
उन्होंने कहा कि प्रशासन ने क़ानून के मुताबिक़ काम किया है ताकि शान्ति स्थापित रहे.
संभल के एक शिक्षक मोहतसिम उन लोगों में से हैं जिन्हें दो नोटिस दिए गए हैं -- एक 100,000 बॉड और दूसरा 50 लाख रुपये वाला.

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मुस्लिम समुदाय में डर
संभल में 70 लोगों से बॉन्ड भराया गया है. इस बॉन्ड से बाध्य किए गए लोगों के अनुसार इसका मक़सद मुस्लिम समुदाय में डर पैदा करना है ताकि वो प्रदर्शन में हिस्सा न लें.
लेकिन मोहतसिम ने बताया कि उनके दो हिंदू साथी, सेवा राम और शिव कुमार बाल्मीकि को भी नोटिस भेजे गए हैं.
संभल के एक वकील फ़ारूक़ जमाल को भी 50 लाख और एक लाख वाले मुचलके मिले हैं.
उनके अनुसार दोनों समुदाय के सदस्यों को नोटिस जारी किए गए हैं लेकिन बहुमत मुसलमानों की है.
राज्य भर में कितने लोगों को ये नोटिस जारी किए गए हैं इसका अंदाज़ा किसी को नहीं है.
राज्य सरकार ने इसकी जानकारी नहीं दी है लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुमान में अलीगढ़ में 2,000 लोगों पर इसी तरह के नोटिस दिए गए हैं, लखनऊ में 100, बिजनौर में 150 और संभल में 70.

सरकारी नोटिस
संभल में जारी प्रदर्शन में शामिल कई महिलाओं को भी ये नोटिस दिए गए हैं. जमाल के अनुसार महिलाओं द्वारा जारी प्रदर्शन का स्थल उनके पड़ोस में है. वो कहते हैं कि इस प्रदर्शन से उनका कोई लेना देना नहीं है.
उनका कहना था कि अगर प्रदर्शन स्थल पर हिंसा हुई तो सरकारी नोटिस के मुताबिक़ उनकी 50 लाख रुपये तक की संपत्ति ज़ब्त कर ली जाएगी. उन्होंने कहा, "हमें परेशान किया जा रहा है और कुछ नहीं. वो चाहते हैं हम झुक जाएँ."
जिन लोगों से बॉन्ड भराया गया है उनमें से कुछ ने दावा किया कि वो किसी भी प्रदर्शन का कभी हिस्सा नहीं रहे हैं. सहसपुर के हाजी सुलतान अहमद कहते हैं वो अपने इलाक़े के एक इज़्ज़तदार परिवार के हैं जो नगरपालिका अध्यक्ष का चुनाव भी लड़ चुके हैं.
वो कहते हैं, "हमारी छह बेटियां हैं और एक बेटा. हम व्यापर के सिलसिले में बाहर के दौरे पर रहते हैं. हम ने कभी किसी प्रदर्शन में हिस्सा नहीं लिया." उनका कहना था कि वो किसी झंझट में नहीं पड़ना चाहते थे इस लिए बांड पर दस्तखत कर दिया.

ज़िलाधिकारी के अधिकार
हाजी सुल्तान अहमद के रिश्तेदार शफ़ीक़ अहमद को भी नोटिस भेजा गया है. वो कहते हैं वो भी कभी प्रदर्शन में शामिल नहीं हुए अपनी ख़राब सेहत के कारण.
नए नोटिस धरा 107 के बजाये धारा 108 के तहत भेजे गए हैं जिसका इस्तेमाल बहुत कम होता है.
स्थानीय वकील गजेंद्र सिंह पिछले 45 साल से वकालत कर रहे हैं. उनका कहना है कि उनके अनुभव में इस धारा का इस्तेमाल कभी-कभार ही होता है.
इस धारा के अंतर्गत डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट हर उस व्यक्ति को एक साल के अरसे के लिए अच्छे व्यवहार के लिए बाध्य कर सकता है जिसके ख़िलाफ़ शांति भांग करने का ख़तरा हो.
गजेंद्र सिंह कहते हैं कि इस धारा का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए था.

इलाहाबाद हाई कोर्ट
कई लोगों ने कहा कि वो अपने ख़िलाफ़ जारी किए बॉन्ड को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती देंगे. लेकिन इसमें भी इन्हें बाधा हो सकती है.
संभल के वकील जमाल के मुताबिक़ वो प्रशासन से अपने खिलाफ जारी नोटिस की एक प्रमाणित कॉपी की कई हफ़्तों से मांग कर रहे हैं ताकि वो इसे अदालत में चैलेंज कर सकें लेकिन प्रशासन ने अब तक उनकी मांग नहीं मानी है.
वो कहते हैं, "अब मैं सोच रहा हूँ इस कॉपी के बग़ैर ही अदालत चला जाऊं."

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