दिल्ली हिंसाः केजरीवाल सरकार सेना बुलाने की माँग कर सकती थी- दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन

इमेज स्रोत, SAJJAD HUSSAIN/AFP via Getty Images
- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ चल रहे प्रदर्शनों को बंद कराने के लिए दिल्ली में दंगे कराए गए और राज्य सरकार को सेना की तैनाती की माँग करनी चाहिए थी."
दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन ज़फ़रुल इस्लाम ख़ान ने बीबीसी हिंदी से बातचीत में ये बात कही.
ज़फ़रुल इस्लाम ख़ान ने ये भी आरोप लगाया है कि नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ हिंसा शुरू करने की योजना पर हफ़्तों से काम किया जा रहा था और 23 फ़रवरी से 26 फ़रवरी के दरमियां जो कुछ भी हुआ वो 'एकतरफ़ा हमला' था.
उन्होंने कहा, "हिंसा प्रभावित इलाक़ों में इसके उदाहरण हैं. जैसे एक लाइन में 50 घर थे, उसमें से पाँच जला दिए गए. ये काफ़ी कुछ कहता है."
ज़फ़रुल इस्लाम ख़ान ने सवाल उठाया, "नहीं तो ऐसा कैसे हो सकता है कि 30 से 40 की उम्र के सैंकड़ों नौजवान लोग उत्तर पूर्वी दिल्ली में अचानक प्रकट हो जाएं और 24 घंटे तक मार-काट और बर्बादी मचाते रहें. उनमें से ज़्यादातर ने चेहरा छुपाने के लिए हेलमेट या कुछ और पहन रखा था."
हिंसा प्रभावित इलाक़े का दौरा
उन्होंने कहा कि ये लोग 24 फ़रवरी की शाम दिल्ली में दाख़िल हुए और 24 घंटे रुके. इस बीच उन्होंने लोगों के घर और दुकान लूटे और जला दिए.
दो मार्च को अल्पसंख्यक आयोग की टीम ने उत्तर पूर्वी दिल्ली के हिंसा प्रभावित इलाक़े का दौरा किया.
इसके बाद एक छोटी सी रिपोर्ट जारी की गई जिसमें कहा गया है कि इस इलाक़े में लगभग दो हज़ार की संख्या में दंगाई उत्पात मचा रहे थे.
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बुधवार को संसद में विपक्ष को बताया कि पड़ोसी उत्तर प्रदेश से लगभग 300 बाहरी लोगों ने दिल्ली आकर दंगों में हिस्सा लिया.
लेकिन गृहमंत्री अपने पूरे भाषण में ये आरोप लगाते रहे कि नागरिकता संशोधन क़ानून विरोधी प्रदर्शनकारियों की वजह से ये दंगा हुआ.
दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के प्रमुख ने इस दलील को ख़ारिज किया और कहा कि गृह मंत्री 'पुराने खिलाड़ी' हैं.

इमेज स्रोत, SAJJAD HUSSAIN/AFP via Getty Images
बुद्धिजीवियों की रिपोर्ट
ज़फ़रुल इस्लाम ख़ान ने दक्षिणपंथी रुझान रखने वाले बुद्धिजीवियों की ओर से जारी की गई रिपोर्ट को 'झूठ और फ़रेब का पुलिंदा' क़रार दिया.
'द शाहीन बाग़ मॉडल इन नॉर्थ ईस्ट दिल्लीः फ़्रॉम धरना दू दंगा' टाइटल से बुद्धिजीवियों और प्रोफ़ेसरों के समूह ने एक रिपोर्ट जारी की थी जिसमें दिल्ली के दंगों को 'क्रांति का वामपंथी और जिहादी मॉडल' बताया गया है और कहा गया है कि दूसरी जगहों पर भी इसे दोहराया जाएगा.
ज़फ़रुल इस्लाम ख़ान ने सवाल किया, "अमित शाह को ये सोचना चाहिए कि जब दिल्ली में 12 से 13 फ़ीसदी मुसलमान रहते हैं तो उन्हें 80 से 90 फ़ीसदी का नुक़सान कैसे और क्यों हुआ?"
उन्होंने कहा कि दिल्ली सरकार शुरू में बहुत कुछ कर सकती थी. इसमें सेनी की तैनाती की माँग भी शामिल है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)


















