दिल्ली दंगों में पुलिस को अमित शाह की क्लीनचीट - कितना सही, कितना ग़लत

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
"25 फ़रवरी की रात 11 बजे के बाद कोई हिंसा नहीं हुई. दिल्ली पुलिस ने दंगे को दिल्ली के चार प्रतिशत क्षेत्र और 13 प्रतिशत आबादी के बीच ही सीमित रखा. दिल्ली पुलिस ने अच्छा काम किया है. दिल्ली पुलिस ने पहली सूचना मिलने के बाद महज़ 36 घंटे में पूरी स्थिति पर काबू पाया."
देश के गृहमंत्री अमित शाह ने दिल्ली दंगों पर चर्चा के दौरान संसद में जवाब देते हुए दिल्ली पुलिस को शाबाशी दी और उनके तारीफ़ में ये बातें कही.
वो यहीं नहीं रुके. उन्होंने आगे कहा, "दिल्ली पुलिस ने अब तक 700 से ज़्यादा एफ़आईआर दर्ज की है. 2647 लोग हिरासत में लिए गए हैं. फ़ोन कॉल के डिटेल निकाले जा रहे हैं. लोगों से दंगों से जुड़ी फुटेज माँगी जा रही है ताकि जाँच बेहतर ढंग से की जा सके. 1100 से ज़्यादा लोगों की पहचान की जा चुकी है, 300 से ज़्यादा लोग यूपी से आए थे. ये दंगा एक बड़ी साज़िश थी. इसे देखते हुए ही हमने दिल्ली-यूपी के बॉर्डर को सील किया था."
लेकिन उनके जवाब से सवाल निकल रहे हैं. अगर 300 से ज्यादा लोग यूपी से आए थे तो क्या ये इंटेलिजेंस की नाकामी नहीं थी? 700 से ज़्यादा एफ़आईआर दर्ज हुए तो शाहरूख़ को पकड़ने में देरी क्यों हुई? साज़िश रचने वाला कौन है, अब तक पुलिस गिरफ़्त से बाहर क्यों है?

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इंटेलिजेंस नाकामी पर चुप्पी
पूर्व आईपीएस ऑफिसर विभूति नारायण राय से हमने यही सवाल किया. उनके मुताबिक़ गृहमंत्री का ये कह कर पीठ थपथपाना कि 36 घंटे के अंदर उन्होंने दंगों पर काबू पा लिया, ये अपने आप में ही शर्मनाक है.
विभूति नारायण कहते हैं, "ये दंगे देश की राजधानी में हो रहे थे. छत्तीसगढ़ या झारखंड में नहीं हो रहे थे. दिल्ली देश की राजधानी है. 12 घंटे भी यहां दंगे चलना अपने आप में शर्मनाक है. वो भी तब जब अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत दौरे पर थे."
वो आगे कहते हैं, "इससे भी ज्यादा शर्मनाक ये था कि दिल्ली पुलिस कमिश्नर तो दंगों में कहीं कुछ काम करते दिखाई ही नहीं दिए. पूरा का पूरा सिस्टम नार्थ ब्लॉक शिफ्ट हो गया था. ये न केवल इंटेलिजेंस फ़ेलियर था बल्कि कमांड फेलियर था."
हालांकि उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी बृजलाल मानते हैं कि गृहमंत्री के दावों में पूरी तरह सच्चाई है. उनके बातों पर विवाद का कोई प्रश्न नहीं है. दिल्ली पुलिस ने जिस तरह से एक पुलिस वाले की जान चली गई, कई पुलिस वाले और सीनियर अफसर घायल हुए, उसके बाद भी संयम बनाए रखते हुए जिस तरह से दंगों पर काबू पाया, ये अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि है.

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संसद में चर्चा के दौरान महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग से शिवसेना के सांसद विनायक बी राउत ने कहा, "सरकार को सोचना चाहिए कि उनके पास कितनी सारी एजेंसियाँ हैं- एनएसए, रॉ, दिल्ली क्राइम ब्रांच, सब कुछ है. फिर भी अमरीका के राष्ट्रपति के सामने देश की राजधानी में इतना हंगामा हुआ. क्या ये देश की बदनामी नहीं है? सवाल उठता है कि क्या देश की एजेंसियाँ फ़ेल हुई? पचास घंटे तक ये एजेंसियाँ देखती क्यों रहीं? एजेंसियाँ क्यों कह रही हैं कि उन्हें ऊपर से आदेश नहीं मिल रहे थे?"
दिल्ली के पूर्व कमिश्नर नीरज कुमार के मुताबिक़, "गृहमंत्री अमित शाह के कहने का मतलब ये था कि बहुत ही लोकल स्तर पर दंगे हुए. दिल्ली के दूसरे इलाके में भी मिक्स पॉपुलेशन है. ऐसी घटना जब भी घटती है तो दूसरे इलाक़ों में फैलने की गुंजाइश रहती है, जिससे तनाव हो सकता था. लेकिन दिल्ली पुलिस ने 36 घंटे के अंदर दूसरे इलाकों में दंगों को फैलने से रोक लिया था."
उनके मुताबिक़ वो जब 300 लोगों के आने का जिक्र कर रहे थे, उसका अर्थ बस इतना था कि ये एक साज़िश थी.
मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के पूर्व एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और वरिष्ठ पत्रकार आकार पटेल के मुताबिक़, जो पुलिस व्यवस्था ब्रिटिश सरकार हमारे लिए छोड़ गई थी, उसमें कोई भी दंगे देश में 24 घंटे से ज्यादा नहीं चलना चाहिए था. लेकिन सच्चाई खुद सरकार ने स्वीकार की कि 36 घंटे तक दिल्ली में दंगे हुए.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "पुलिस को जब काम करना चाहिए उन्होंने नहीं किया और इसकी पूरी ज़िम्मेदारी गृहमंत्री की थी. दुनिया का सबसे ताक़तवर आदमी जब देश में हो तो मैं नहीं मानता कि अमित शाह या फिर प्रधानमंत्री चाहते होंगे कि ऐसा कुछ हो. और ये सब हुआ इसलिए कि जो काम दिल्ली पुलिस को करना था वो नहीं किया."

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ग्राउंड ज़ीरो पर पुलिस और गृहमंत्री
संसद में अपने भाषण के दौरान दिल्ली पुलिस की पीठ थपथपाते हुए अमित शाह ने कहा कि दिल्ली पुलिस ने 40 टीमें बनाई हैं जो दंगे की साज़िश रचने वालों को गिरफ़्तार करने में लगी हैं. सारी जाँच वैज्ञानिक तरीक़ों से हो रही हैं. पुलिस ने 100 से ज़्यादा हथियार बरामद किए हैं. दो बेहद वरिष्ठ अधिकारियों की अगुवाई वाली एसआईटी बनाई गई हैं.
लेकिन दिल्ली पुलिस मौक़े पर कम दिखी, ऐसे आरोप सबसे पहले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ही लगाए थे. विपक्ष ने अमित शाह के ग्राउंड ज़ीरो पर नहीं जाने पर भी आरोप लगाया.

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संसद में चर्चा के दौरान कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि 'सरकार कोशिश करती तो दिल्ली में हिंसा रोकी जा सकती थी. ये देश की राजधानी है. यहाँ की पुलिस को हम मॉर्डन मानते हैं. हथियार की कोई कमी नहीं है. फिर ये घटना क्यों घटी. तीन दिन लगातार ये घटना कैसे घटी. सरकार को जवाब देना होगा. गृह मंत्री अमित शाह तीन दिन तक कहाँ थे. दिल्ली के क़ानून की ज़िम्मेदारी उनके पास है.'
इसके जवाब में अमित शाह ने कहा, "मैंने ही अजीत डोभाल से विनती की थी कि वे हिंसा प्रभावित इलाक़े में जाएँ और स्थिति का जायज़ा लें. मैं वहाँ जाता तो पुलिस साथ जाती और उसकी व्यवस्था करने में दिक्कतें होतीं."
विभूति नारायण राय और नीरज कुमार दोनों का मानना है कि अमित शाह को मौक़े पर जाने की ज़रूरत उस वक्त नहीं थी. ऐसा करके उन्होंने सही क़दम उठाया है.
हालांकि विभूति नारायण राय ने ये ज़रूर कहा कि अब जब सब कुछ शांत हो गया है तो उन्हें ग्राउंड ज़ीरो पर जाना चाहिए.

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दंगाइयों के साथ दिल्ली पुलिस
दिल्ली दंगों में 50 से ज्यादा लोगों की जान गई और 500 से ज्यादा लोग घायल हुए.
लेखक आकार पटेल इतने लोगों को मारे जाने को पुलिस की सबसे बड़ी असफलता मानते हैं.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "यही है दिल्ली पुलिस की नाकामी का सबसे बड़ा सबूत. इतनी जानें चली गई जो आसानी से पुलिस रोक सकती थी. ये भला कैसे हो सकता है. इसके बाद भी हम अपनी पीठ कैसे थपथपा सकते हैं?"
विपक्ष ने सवाल पूछा कि दिल्ली दंगों में 36 घंटे तक पुलिस क्या कर रही थी? पुलिस के वीडियो वायरल हुए जिसमें वो पत्थरबाज़ी करते हुए साफ़ दिख रही थी, आखिर ऐसा क्यों?
अमित शाह ने बुधवार को लोकसभा में दिल्ली दंगों के चर्चा पर जवाब देते हुए कहा, "बसपा के सांसद ने कहा कि पुलिस पत्थरबाज़ी कर रही थी, ओवैसी साहब ने भी कहा. हमने उस वीडियो की पूरी जांच कर ली गई है. पुलिस 300 मीटर दूर खड़ी थी. आंसू गैस चला रहे थे. लेकिन जब पत्थर चारों ओर से आने लगे तो दंगाइयों को भगाने के लिए पत्थरबाजी कर रहे थे, गोली नहीं चला रहे थे."

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सोशल मीडिया पर दंगों के बाद वायरल हुए पुलिस के वीडियोज़ का ज़िक्र करते हुए ओवैसी ने कहा, "पुलिस की बर्बरता के वीडियो सामने आए हैं. क़रीब 60 लोग मरे हैं. और 1100 मुस्लिम लड़कों को हिरासत में ले लिया जाता है. दिल्ली पुलिस खुलेआम रिश्वत ले रही है. क्यों नहीं धर्म को परे हटाकर इन दंगों की निष्पक्ष जाँच की जा सकती."
इसके जवाब में अमित शाह ने कहा कि पुलिस दंगाइयों के साथ नहीं थी. इसका पूरा वैज्ञानिक एनालिसिस कर लिया गया है. उनके साथ होने का कोई सवाल ही नहीं है.
विभूति नायाण का भी मानना है कि इस मामले में पुलिस पर सवाल उठाना तब तक ग़लत है जब तक आप ये साबित ना कर सकें कि दिल्ली पुलिस हिंदू पुलिस की तरह काम कर रही है.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि हमने भी पुलिस में काम किया है. जब 300-500 मीटर की दूरी से पत्थर बरसा रही हो तो पुलिस लाठी से उनका मुकाबला नहीं कर सकती. गोली से उनका मुक़ाबला करने की सलाह तो मैं भी नहीं दूंगा. ऐसे में पत्थर का जवाब पत्थर से देने के अलावा और कोई चारा भी नहीं था.
नीरज कुमार ने कहा कि पुलिस ने कहां रेस्पोंस टाइम ज़्यादा लिया, कहां कुछ ज़्यादा बेहतर तरीक़े से चीजों को हैंडल कर सकती थी, ये एक अलग विषय है जिस पर दूसरी चर्चा हो सकती है. लेकिन बड़े स्तर पर बात करें तो पुलिस ने इस माहौल में ठीक काम किया है.

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हेट स्पीच पर कार्रवाई
यहां ये जानना जरूरी है कि पूरे दंगों के दौरान अमित शाह की भूमिका को लेकर विपक्ष ने कई सवाल उठाए थे और उनका इस्तीफा भी मांगा था. लेकिन अमित शाह ने अपने भाषण में कहा कि दिल्ली दंगे साज़िश का हिस्सा थे और सरकार किसी भी दोषी को बख्शेगी नहीं.
अमित शाह ने संसद में कहा, "इस हिंसा के लिए सीएए के ख़िलाफ़ फैलाई गई ग़लत सूचनाएं ज़िम्मेदार हैं, हमारा ये मानना है. हमारा मानना है कि अल्पसंख्यकों को गुमराह किया जा रहा है.
रामलीला मैदान में 14 दिसंबर को एक पार्टी बड़ी रैली करती है. वहां कहा जाता है- 'घर से निकलो'. इसका नतीजा हुआ कि शाहीन बाग़ मे प्रदर्शन शुरू हो गया. इसके बाद वारिस पठान ने 15 करोड़ वाली बात कही. इन सब बातों ने लोगों में ग़ुस्सा भरा. बीजेपी सांसद मीनाक्षी लेखी ने उमर ख़ालिद के बयान का भी ज़िक्र किया.
हालांकि विपक्ष ने संसद में चर्चा के दौरान बीजेपी नेता कपिल मिश्रा, अनुराग ठाकुर और परवेश वर्मा के भाषणों का जिक्र किया.

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उत्तर प्रदेश के संभल लोकसभा क्षेत्र से समाजवादी पार्टी के सांसद शफ़ीकुर्रहमान बर्क ने कहा, "देश किस दौर से गुज़र रहा है, सबको इसका अहसास है. परवेश वर्मा, अनुराग ठाकुर और कपिल मिश्रा ने जो ज़हर उगला, उनके ख़िलाफ़ अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई, यही काफ़ी कुछ बयां करता है. देश में मुसलमान सुरक्षित महसूस नहीं कर रहा है."
इन सब बयानों पर दिल्ली हाई कोर्ट में जस्टिस एस मुरलीधर को दिल्ली पुलिस के स्पेशल कमिश्नर से यह कहना पड़ा कि 'जब आपके पास भड़काऊ भाषणों के क्लिप मौजूद हैं तो एफ़आईआर दर्ज करने के लिए आप किसका इंतज़ार कर रहे हैं?' कोर्ट में यह भी कहा गया कि 'शहर जल रहा है, तो कार्रवाई का उचित समय कब आयेगा?'
लेकिन नीरज कुमार का मानना है कि हेट स्पीच को पहले से रोका नहीं जा सकता है. और फिलहाल मामला कोर्ट में है. अब इस मामले में जो कुछ होगा, उसके लिए कोर्ट के आदेश का इंतज़ार करना होगा.
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