जनरल सुलेमानी की मौत के बाद क्या ईरान का परमाणु क़रार ख़त्म हो गया है?

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- Author, जोनाथन मार्कस
- पदनाम, कूटनीतिक संवाददाता
सैद्धांतिक तौर पर ईरान का परमाणु क़रार अभी भी अस्तित्व में है. लेकिन केवल सैद्धांतिक तौर पर ही.
ईरान ने कहा है कि वो अब इस क़रार की किसी भी शर्त से बंधा हुआ नहीं है. इस परमाणु क़रार के तहत यूरेनियम के संवर्धन के लिए ईरान पर कुछ शर्तें तय की गई हैं.
लेकिन तेहरान ने ज़ोर देकर कहा है कि परमाणु क़रार को तोड़ने के लिए उसने जो भी क़दम उठाए हैं, उन्हें वापस लिया जा सकता है. लेकिन समझौते की दूसरी पार्टियों को अपनी ज़िम्मेदारियों की क़द्र करनी होगी.
इसका मतलब ये निकाला जा रहा है कि अमरीका को अपने कड़े आर्थिक प्रतिबंध छोड़ने होंगे और परमाणु क़रार को एक बार फिर से मान्यता देनी होगी.
ये समझौता जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ़ ऐक्शन के नाम से भी जाना जाता है.
ईरान की अर्थव्यवस्था
हालांकि इसकी कल्पना करना भी मुश्किल लगता है कि राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ईरान पर अधिकतम दबाव का अपना अभियान छोड़कर प्रतिबंध हटा लेंगे.
तो इसका मतलब ये हुआ कि ईरान की ये शर्त बेमतलब की है.
ज़्यादा से ज़्यादा ये हो सकता है कि यूरोपीय देश ईरान की अर्थव्यवस्था को होने वाले नुक़सान की भरपाई के लिए भुगतान का कोई ज़रिया खोज ले.
यूरोपीय देशों ने इसकी कोशिश तो की थी लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकल पाया.
दुनिया भर की सरकारें ईरान और अमरीका के बीच चल रहे टकराव पर जो भी रुख़ अपनाएं लेकिन तेहरान के साथ कारोबार करना है या नहीं, इसका फ़ैसला तो कंपनियों को ही करना है.
क्योंकि संभावित अमरीकी प्रतिबंधों का जोखिम ईरान के साथ कारोबार का फ़ैसला करने वाली कंपनियों के माथे ही जाएगा.
परमाणु करार
अब तक मिले सबूत तो यही कहते हैं कि कंपनियां ये जोखिम नहीं उठाने वाली हैं.
तो क्या परमाणु क़रार अब ख़त्म हो गया है या दफ़्न हो गया है? या इसके फिर से ज़िंदा होने की कोई उम्मीद बची है?
अगर सचमुच ऐसा हुआ है और ये क़रार पूरी तरह से बेमानी हो गया है तो इस हक़ीक़त को क़बूल लेने में क्या दिक्क़त है?
और इस समझौते की हत्या की असली ज़िम्मेदारी किसके माथे पर जाएगी?
आख़िरी सवाल का जवाब देना सबसे आसान है. समझौते को देखें तो ईरान जब भी अमरीका पर इल्ज़ाम लगाता है, तकनीकी रूप से ईरान की दलील में दम दिखता है.
जबसे ट्रंप प्रशासन ने इस समझौते से किनारा कर लिया था, तब से ही ये समझौता आख़िरी सांसें गिन रहा है.

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यूरोपीय संघ
राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप अपने पूर्ववर्ती राष्ट्रपति बराक ओबामा के इस 'ख़राब सौदे' के ख़िलाफ़ हमेशा से मुखर रहे हैं.
लेकिन ईरान के साथ परमाणु क़रार पर दस्तख़त करने वाले दूसरे देश जैसे ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, चीन, जर्मनी और यूरोपीय संघ अभी भी इस क़रार में ख़ूबियां देखते हैं और इसके पक्ष में खड़े हैं.
ईरान के साथ परमाणु समझौता कोई चोखा सौदा कभी नहीं रहा था. इसका मक़सद एक तयशुदा वक़्त के भीतर ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर नियंत्रण लगाना था.
ये उम्मीद जताई गई थी कि परमाणु समझौते से ईरान को जैसे-जैसे आर्थिक फ़ायदा होगा, उसकी व्यापक विध्वंसात्मक नीतियों में बदलाव आएगा.
औज जब तक समझौते की शर्तें पूरी तरह से ख़त्म होंगी तो शायद हम जिस ईरान को आज जानते हैं, उससे एक पूरी तरह से अलग ईरान हमारे सामने होता.
इस समझौते को वाजिब ठहराने वाली वजहों में से एक कारण ये भी था कि इससे युद्ध टाला जा सकेगा. आज के हालात के लिहाज़ से ये पहलू बेहद अहम कहा जा सकता है.

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ईरान के परमाणु ठिकाने
समझौते पर दस्तख़त से पहले ये आशंकाएं भी जतलाई गईं थी कि इसराइल अमरीकी शह पर ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला भी कर सकता है.
ईरान ने हमेशा ही ये जोर देकर कहा है कि उसकी दिलचस्पी परमाणु बम में नहीं है.
लेकिन इसके साथ ही ये भी सच है कि किसी वक़्त में वो अपने सैन्य परमाणु कार्यक्रम पर काम कर रहा था.
हालांकि कुछ समय पहले ईरान ने अपना सैन्य परमाणु कार्यक्रम रोक दिया था.
लेकिन यूरेनियम संवर्धन की उसकी कोशिशें, हमलों के ख़िलाफ़ परमाणु प्रतिष्ठानों का सुदृढ़ीकरण, मिसाइल कार्यक्रम का विकास, ये वो तमाम कारण हैं जिसकी वजह से सबको ये डर रहा है कि एक न एक दिन ईरान अपना वादा तोड़ देगा और परमाणु बम बनाने की तरफ़ क़दम बढ़ाएगा.
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अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा प्राधिकरण
साल 2015 में हुए इस परमाणु समझौते का सबसे बड़ा मक़सद यही था कि ईरान को अपना वायदा तोड़ने में कम से इतना वक़्त तो ज़रूर लगे कि उसकी किसी भी सैन्य गतिविधि को समय रहते पकड़ा जा सके और उस पर अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई हो.
आख़िरकार ये सौदा अमल में आ गया लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप के आने के साथ ही ये स्पष्ट हो गया है कि वे ये क़रार तोड़ना चाहते हैं.
ईरान पर दोबारा से प्रतिबंध लगाए गए. ईरान ने इसे सौदे का उल्लंघन क़रार दिया और उसने अपने फ़ैसले के लिए मन बना लिया.
ये बात भी ध्यान देने वाली है कि अमरीका के इस समझौते से हटने से पहले अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा प्राधिकरण स्पष्ट रूप से मानता था कि ईरान क़रार के तहत अपनी ज़िम्मेदारियां निभा रहा है.
अमरीका के पीछे हटने के बाद थोड़ी देर से ही सही ईरान ने इस समझौते की कुछ शर्तों का लगातार उल्लंघन किया है.
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यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम
और अब ये लग रहा है कि ईरान एक साथ ही सभी बंधनों से पीछा छुड़ा रहा है. जो बात अब मायने रखती है, वो ये है कि ईरान ने क्या फ़ैसला किया है.
क्या वो अपने यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को 20 फीसदी तक बढ़ाएगा?
अगर ईरान ऐसा करता है तो परमाणु बम और तेहरान के बीच जो फ़ासला है, वो काफ़ी हद तक कम हो जाएगा. यानी बम बनाने के लिए ज़रूरी सामान जुटाने में उसे कम वक़्त लगेगा.
क्या वो अंतरराष्ट्रीय निगरानी की प्रक्रियाओं का पालन करता रहेगा?
ईरान क्षेत्र में कैसा बर्तान करेगा, ये काफ़ी हद तक अमरीका में तय होगा. परमाणु क़रार पर दस्तख़त कर देने से इस हक़ीक़त में कोई बदलाव नहीं आया है.
वास्तव में प्रतिबंधों में शुरुआती ढील से ईरान की बढ़ी कमाई का इस्तेमाल उसने क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए ही किया.
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जनरल क़ासिम सुलेमानी की हत्या
लेकिन ये समझौता ईरान की इस कोशिश पर लगाम लगाने के लिए किया भी नहीं गया था.
ये केवल एक परमाणु क़रार था और समझौते पर दस्तख़त करने वाले ज़्यादातर देशों की राय में अमरीका के पीछे हटने तक ये ठीक से काम कर रहा था.
हम अब ऐसे मुक़ाम पर पहुंच चुके हैं जिसकी ट्रंप प्रशासन ने मई, 2018 में यक़ीनन उम्मीद की होगी.
दूसरी तरफ़, समझौते की शर्तों से ईरान के पीछे हटने से बड़ी ताक़तें नाराज़ हैं लेकिन कुर्द फोर्स के प्रमुख जनरल क़ासिम सुलेमानी की हत्या के ट्रंप के फ़ैसले से भी हतप्रभ हैं.
ये एक ऐसा फ़ैसला है, जिसने अमरीका और ईरान को एक बार फिर से युद्ध के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है.
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परमाणु प्रतिबंध
अमरीका और उसके यूरोपीय साथियों के बीच के तनाव ने भी हालात को इस क़द्र जटिल बना दिया है कि इसके सुलझने के आसार कम ही दिख रहे हैं.
राष्ट्रपति ट्रंप के अलावा और कोई नहीं चाहता कि ये समझौता टूट जाए.
जैसे ही ये समझौता ख़त्म हो जाता है और ईरान क़रार की शर्तों का उल्लंघन करता है, यूरोपीय देशों को परमाणु प्रतिबंधों पर ख़ुद ही अपने फ़ैसले करनें होंगे.
क़रार के ख़त्म हो जाने की बात स्वीकार करने से भले ही हालात और ख़राब हो जाएं लेकिन ईरान को ये समझ में आ रहा है कि इस टूट रहे समझौते के साथ खड़े होने की भी अपनी अहमियत है, क्योंकि कम से कम वो ख़ुद को अमरीका से अलग तो बता ही सकता है.
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