'सबके लिए एनआरसी' ने बढ़ाई पश्चिम बंगाल की चिंता

बशीरहाट

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    • Author, नितिन श्रीवास्तव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत ने उत्तर-पूर्वी राज्य असम के रहने वाले क़रीब 19 लाख लोगों की एक लिस्ट प्रकाशित की है. इन लोगों पर इनकी भारतीय नागरिकता छिनने का ख़तरा मंडरा रहा है.

विवादित राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानी एनआरसी बनाने या फिर बांग्लादेश से अवैध रूप से आकर भारत में रहने वालों की पहचान करने का सिलसिला 1951 में शुरू हुआ था. और हाल ही में जाकर इसकी सबसे ताज़ा लिस्ट प्रकाशित की गई है.

इस दौरान केंद्र सरकार के नुमाइंदों की तरफ़ से पूरे देश के नागरिकों का राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर बनाने के शोर की वजह ने पश्चिम बंगाल के लोगों में खलबली मचा दी है. इसकी वजह ये है कि पश्चिम बंगाल की क़रीब दो हज़ार किलोमीटर लंबी सीमा बांग्लादेश से मिलती है. बीबीसी संवाददाता नितिन श्रीवास्तव की ये रिपोर्ट इसी मसले पर है.

अन्नदा रॉय उस वक़्त केवल 11 महीने के थे, जब उनके माता-पिता ने बांग्लादेश स्थित अपने पुश्तैनी गांव रंगपुर को छोड़ कर हमेशा के लिए भारत में बसने का फ़ैसला किया था.

वो साल था 1981 का, और परिवार का दावा है कि वो बांग्लादेश छोड़ कर भारत में बसने इसलिए आए थे क्योंकि बांग्लादेश में बंगाली हिंदुओं का रहना मुश्कलि हो रहा था. इसकी वजह ये थी कि बांग्लादेश में बंगाली मुसलमानों की आबादी ज़्यादा थी.

अन्नदा के परिवार को बांग्लादेश से आकर पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी ज़िले में बसे हुए 38 साल गुज़र गए हैं. अब अन्नदा के मां-बाप और उनके बड़े भाई उस फ़ैसले पर पछता रहे हैं और उसे अपनी ज़िंदगी का बहुत ग़लत फ़ैसला क़रार दे रहे हैं.

20 सितंबर को अन्नदा का शव उनके घर के ही क़रीब एक रेलवे क्रॉसिंग के खम्भे से लटकती हुई पाई गई. उनके पास भारत में क़रीब चार दशक बिताने के दस्तावेज़ नहीं थे. इससे परेशान और हताश युवा अन्नदा को लगा कि ख़ुदकुशी करने के अलावा उसके लिए और कोई रास्ता नहीं बचा है.

अन्नदा रॉय के बड़े भाई दक्षदा रॉय कहते हैं कि, 'जब से असम में अवैध नागरिकों की पहचान करने का अभियान शुरू हुआ था, तब से हमारा परिवार लगातार डर के साये में जी रहा था. हालांकि भारत में हमारे पास वोटिंग का अधिकार है. लेकिन हमारे पास न तो ज़मीन है और न ही अपनी नागरिकता साबित करने वाले दस्तावेज़ हैं. अन्नदा इसे लेकर ख़ास तौर से इस बात को लेकर परेशान था. वो लगातार ये कहता रहता था कि शायद हमें वापस बांग्लादेश भेज दिया जाए.'

अन्नदा के ख़ुदकुशी करने के कुछ दिनों बाद ही, उसके गांव से क़रीब 590 किलोमीटर दक्षिण में एक और आदमी ने अपनी पत्नी को रात के खाने के वक़्त कहा कि, 'मुझे डर लग रहा है कि शायद मुझे गिरफ़्तार कर के अवैध घुसपैठियों के लिए बनाए गए नज़रबंदी शिविर में डाल दिया जाएगा. क्योंकि अपने पिता की ज़मीन के दस्तावेज़ हासिल करने की हमारी सारी कोशिशें नाकाम हो गई हैं. क्योंकि केवल उन्हीं काग़ज़ात में परिवार के सही नाम बिना किसी ग़लती के दर्ज होंगे.'

कमल हुसैन मंडल

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इमेज कैप्शन, कमल हुसैन मंडल और उनकी 27 बरस की पत्नी कहीरुन नाहर

कमल हुसैन मंडल की उम्र 36 बरस थी. वो उत्तरी 24 परगना ज़िले के सोलादाना गांव में ईंट भट्ठा मज़दूर हैं. उत्तरी 24 परगना ज़िले से पहले 1947 में और फिर 1971 में भी बड़े पैमाने पर हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों ही समुदायों के लोग अप्रवासी बने थे. कमल हुसैन मंडल बड़े गर्व से कहते थे कि उन के पास एक स्मार्टफ़ोन है जिस में वो यू-ट्यूब पर ख़बरें देखते रहते थे.

ये शायद एनआरसी के पश्चिम बंगाल में लागू होने की अटकलों को लेकर लगातार मीडिया कवरेज का ही असर था कि हताश होकर कमल हुसैन ने अगली सुबह ख़ुदकुशी कर ली. पुलिस में उनके परिजनों ने यही रिपोर्ट दर्ज कराई है. कमल हुसैन मंडल के पुरखे उसी गांव में रहते थे. लेकिन, उनके पिता ने ज़मीन का छोटा सा टुकड़ा बेच दिया था.

और अब उनके तीनों बेटों के पास इस बात के कोई दस्तावेज़ी सबूत नहीं थे कि उन्होंने ये ज़मीन बेची थी. सरकारी दफ़्तरों के बार-बार चक्कर लगाने से भी इस बात का कोई फ़ायदा नहीं हुआ कि परिवार का नाम उनके सरकारी पहचान पत्र में सही हो सके.

कमल हुसैन मंडल की 27 बरस की पत्नी कहीरुन नाहर रोते हुए अपने सबसे छोटे बच्चे को निहारती हैं और कहती हैं कि, 'मेरे पति लगातार यहां से वहां चक्कर लगा रहे थे, मगर कोई फ़ायदा नहीं हो रहा था. मैं उन्हें बार-बार शांत रहने के लिए कहती थी और ये समझाती थी कि हम भारत में महफ़ूज़ हैं. लेकिन वो सुनने को तैयार ही नहीं थे. अपने अब्बा को दफ़न करने के बाद से मेरे दोनों बेटों ने न ठीक से खाना खाया है और न ही वो चैन की नींद सोए हैं.'

अवैध घुसपैठियों को निकालने के अभियान की वजह से 19 लाख लोगों को उत्तर-पूर्वी राज्य असम में अपनी भारतीय नागरिकता से हाथ धोना पड़ा है. रिश्तेदारों का कहना है कि इन में से कई लोगों ने देश से निकाले जाने के डर से ख़ुदकुशी कर ली.

ख़ौफ़ और चिंता-

असम के पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल में एनआरसी का ख़ौफ़ साफ़ नज़र आता है.

भारत की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी और इसके गृह मंत्री और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह समेत कमोबेश सभी बड़े नेता पुरज़ोर तरीक़े से पूरे देश में एनआरसी लागू करने की वकालत करते रहे हैं. उन्होंने इसे इस साल हुए आम चुनावों में बड़ा मुद्दा भी बनाया था और उसके बाद भी इस बारे में लगातार बयान देते रहे हैं.

कहीरुन नाहर

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इमेज कैप्शन, 27 बरस की पत्नी कहीरुन नाहर

गृह मंत्री और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को दीमक क़रार दे चुके हैं. उन्होंने संसद में ये एलान भी किया था कि देश की एक-एक इंच से घुसपैठियों की पहचान कर के उन्हें देश से बाहर निकाला जाएगा.

एनआरसी को लेकर केंद्रीय नेताओं के लगातार बयानों से प्रभावित हो कर अब कई बीजेपी शासिता राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश और हरियाणा के मुख्यमंत्री भी अपने-अपने राज्य में एनआरसी लागू करने की बात कहने लगे हैं.

केंद्र सरकार असम के बाद दूसरे राज्यों में एनआरसी लागू करने की बात कहने के अलावा नागरिकता (संशोधन) बिल भी पास कराने की कोशिश में लगी है. ये एक नया क़ानून है, जो पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान के ग़ैर-मुस्लिम शरणार्थियों को भारत की नागरिकता लेने में मददगार होगा.

ये प्रस्तावित क़ानून अभी संसद से पास नहीं हुआ है. फिर भी बहुत से लोग इसे विभाजनकारी कह रहे हैं. क्योंकि इस क़ानून में हिंदू, सिख, जैन, पारसी, बौद्ध और ईसाईयों को तो भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान है, बशर्ते वो वाजिब दस्तावेज़ों के साथ भारत आए हों, या फिर जो लंबे समय से बिना दस्तावेज़ी सबूत के भारत में रह रहे हों.

लेकिन, इस क़ानून में मुसलमान अप्रवासियों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान नहीं है.

इस बिल के समर्थकों का कहना है कि इस से मुसलमानों को इस लिए अलग रखा गया है क्योंकि इस के माध्यम से उन्हीं अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता देने का प्रावधान किया गया है, जो पड़ोसी देशों में ज़ुल्म-ओ-सितम के शिकार हैं.

इस वक़्त पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी तृण मूल कांग्रेस का राज है. जो केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की कट्टर विरोधी रही हैं.

इस बार के आम चुनाव में बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में अच्छी ख़ासी कामयाबी हासिल की थी. प्रचार के दौरान बीजेपी ने धार्मिक झुकाव पर आधारित अभियान चलाया था. साथ ही चुनाव प्रचार में असम में एनआरसी को कामयाबी से लागू करने के दावे भी किए गए थे. इसके अलावा बीजेपी ने बंगाल में विकास का वादा किया था. लेकिन, बीजेपी के ज़बरदस्त प्रचार के बावजूद ममता बनर्जी अपना क़िला बचाने में सफल रही थीं.

बारासात

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ममता बनर्जी ने एलान किया था कि वो अपने राज्य में एनआरसी लागू करने के केंद्र सरकार के किसी भी क़दम का कड़ा विरोध करेंगी. लेकिन, हाल ही में ममता बनर्जी ने अपने कट्टर सियासी दुश्मन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके विश्वासपात्र गृह मंत्री अमित शाह से मुलाक़ात की. इस दौरान उन्होंने अपने राज्य में असम की तरह ही एनआरसी को लागू करने के तौर-तरीक़ों पर भी दोनों नेताओं से चर्चा की.

जब पश्चिम बंगाल में एनआरसी लागू होने की आशंका की मीडिया कवरेज से डरे क़रीब आधा दर्जन लोगों ने ख़ुदकुशी कर ली. तो, ममता बनर्जी ने एक वीडियो संदेश के ज़रिए पिछले हफ़्ते एक अपील जारी की और पश्चिम बंगाल में रह रहे लोगों की चिंताएं दूर करने की कोशिश की.

ममता बनर्जी ने अपने वीडियो संदेश में कहा कि, 'ये अफ़वाहें इसलिए फैलाई जा रही हैं क्योंकि हर राज्य दस साल में एक बार अपने यहां जनगणना कराता है. इसके लिए कई बार राशन कार्ड की भी ज़रूरत होती है. कृपया ये समझने की कोशिश कीजिए कि ये जनगणना है. इस में समय लगता है. क्योंकि इस दौरान राज्य के हर नागरिक की गिनती होती है.'

ममता बनर्जी ने अपने संदेश में आगे कहा कि, 'इस जनगणना का एनआरसी से कोई ताल्लुक़ नहीं है. इसका किसी धर्म से भी कोई वास्ता नहीं है. न ही किसी जाति से कोई संबंध है. ये वोटर लिस्ट तैयार के लिए किया जा रहा है.

इस दौरान हम कई बार ये पूछ सकते हैं कि आख़िर परिवार के सदस्य काम क्या करते हैं. अगर जनगणना अधिकारी आप के घर आते हैं, तो ये समझने की कोशिश कीजिए कि ये राज्य के दस्तावेज़ों के लिए है.'

राज्य की कल्याणकारी योजनाओं का फ़ायदा लेने वाले मतदाताओं और राज्य के नागरिकों से जुड़े आंकड़े जुटाने की प्रक्रिया की वजह से भी नागरिकों की शिनाख़्त का अभियान चलाए जाने की अफ़वाहों ने ज़ोर पकड़ा.

एनआरसी

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पश्चिम बंगाल में हज़ारों लोग दूर-दराज़ के सरकारी दफ़्तरों के बाहर क़तार लगा रहे हैं, ताकि अपने मां-बाप और अपने जन्म से जुड़ी जानकारियां नए सिरे से रजिस्टर करा सकें, या फिर प्रमाणित करा लें.

प्रोफ़ेसर सब्यसाची बसु रॉय चौधरी जैसे राजनीति शास्त्री मानते हैं कि, 'अलग-अलग काम के लिए आंकड़े जुटाने का जो समय चुना गया वो बहुत ग़लत है. उस पर से राजनेताओं ने एनआरसी का जो शोर मचा रखा है, उससे मुश्किलें और भी बढ़ गई हैं.'

प्रोफ़ेसर चौधरी कहते हैं कि, 'बंगाल (यानी पहले का पूर्वी पाकिस्तान और अब का बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल) में बड़े पैमाने पर अप्रवासियों की आवाजाही का लंबा इतिहास रहा है. 1946 से लेकर 1958 तक क़रीब एक करोड़ लोग पूर्वी बंगाल से भारत के हिस्से वाले बंगाल में आए. और इससे थोड़ी ही कम संख्या में पश्चिमी बंगाल से लोग पूर्वी बंगाल में जा कर बसे 1971 के युद्ध के दौरान और फिर बांग्लादेश बनने के बाद फिर शरणार्थियों के आने का सिलसिला शुरू हुआ, जो अगले कई बरस तक चलता रहा. अब इस में से किन लोगों को आप वैध अप्रवासी कहेंगे और कितने लोगों को अवैध ठहराएंगे? अब जबकि पूर्वी बंगाल से आए बहुत से लोगों को वोटिंग का अधिकार भी मिल गया है, तो ये कहना बहुत मुश्किल है कि किस तरीक़े से अवैध घुसपैठियों की पहचान की जा सकेगी.'

नागरिकता साबित करने की चुनौती-

पश्चिम बंगाल में हिंदू और मुसलमान, दोनों ही एनआरसी से ख़ौफ़ज़दा हैं.

62 बरस के प्रताप नाथ एक वरिष्ठ स्कूल टीचर हैं. वो बांग्लादेश की सरहद से लगे हुए बसीरहाट क़स्बे के हिंदू बहुल मोहल्ले में रहते हैं.

प्रताप नाथ

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इमेज कैप्शन, 62 बरस के प्रताप नाथ एक वरिष्ठ स्कूल टीचर हैं.

1968 में प्रताप नाथ का पूरा परिवार बांग्लादेश के खुलना ज़िले से पैदल चल कर भारत में शरणार्थी के तौर पर दाख़िल हुआ था. केवल प्रताप नाथ की बड़ी बहन ने ही खुलना में रहने का फ़ैसला किया था.

वो बड़े ग़ुस्से से कहते हैं कि, 'बांग्लादेश से लगे हुए मुर्शिदाबाद, उत्तरी 24 परगना, नदिया, मालदा या फिर जलपाईगुड़ी ज़िलों में 25 फ़ीसद से ज़्यादा आबादी बांग्लादेश से आकर बसे लोगों की है. ये हिंदू या मुसलमान होने की बात नहीं है. बात ये है कि हम सब के पास वैध दस्तावेज़ हैं. और उनकी हिम्मत कैसे हो सकती है कि मुझे अवैध घुसपैठिया कह कर यहां से निकाल दें. सिर्फ़ इसलिए कि मेरे पास मेरे पड़ोसी से एक काग़ज़ कम है?'

9.1 करोड़ आबादी वाला पश्चिम बंगाल, भारत का चौथा सबसे ज़्यादा जनसंख्या वाला राज्य है. और इसकी कम-ओ-बेश एक तिहाई आबादी मुसलमानों की है.

हालांकि भारत की सत्ताधारी हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी बीजेपी इस बात पर ज़ोर देती रही है कि अवैध मुस्लिम घुसपैठियों को देश से निकाला जाएगा. लेकिन नागरिकता से जुड़ा नया बिल नागरिकता देने के मामले में ग़ैर-मुसलमानों को तरजीह देने वाला है. इसी वजह से पश्चिम बंगाल के अल्पसंख्यक मुसलमानों के बीच डर और फ़िक्र का माहौल है.

इस साल अगस्त महीने में पश्चिम बंगाल के कुछ मुस्लिम संगठनों से पर्चे बांटे थे. उन्होंने राज्य में सेमीनार आयोजित कर के राज्य के लोगों से कहा था कि वो अपनी नागरिकता साबित करने वाले सभी दस्तावेज़ तैयार रखें. क्योंकि उन पर कभी भी एनआरसी के तहत नागरिकता साबित करने का ज़ुल्म ढाया जा सकता है.

बारासात क़स्बे के रहने वाले मोहम्मद नसीरुल्लाह भारी बारिश के बावजूद अपना नया राशन कार्ड बनवाने के लिए लगी लंबी लाइन में डटे हुए हैं. सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का फ़ायदा उठाने के लिए राशन कार्ड का होना ज़रूरी है. राशन कार्ड मिलने के बाद नसीरुल्लाह ने मुझ से कहा कि, 'मुझे लगता है कि आज मैंने हज कर लिया है.'

मोहम्मद नसीरुल्लाह

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इमेज कैप्शन, मोहम्मद नसीरुल्लाह भारी बारिश के बावजूद अपना नया राशन कार्ड बनवाने के लिए लाइन में डटे हुए हैं.

मेरे साथ चाय पीते हुए नसीरुल्लाह ने मुझे बताया कि, 'जब से असम में एक विशाल नज़रबंदी शिविर का निर्माण कार्य शुरू हुआ है, ताकि अंतिम एनआरसी लिस्ट से बाहर रह गए लोगों को रखा जा सके, जिनमें से ज़्यादातर मुसलमान हैं. तब से मेरी ज़िंदगी सामान्य नहीं है. हम ने सोचा कि पहले से ही सारे काग़ज़ात तैयार करा कर रख लें. क्योंकि अक्सर लोग ये मान बैठते हैं कि हम अवैध घुसपैठिए हैं.'

पश्चिम बंगाल में बीजेपी की शरणार्थी सेल के प्रमुख मोहित रॉय ये मानते हैं कि, 'बहुसंख्यक हिंदू समुदाय के लोग भी एनआरसी की वजह से चिंतित हैं.' लेकिन वो इस बात से इनकार करते हैं कि एनआरसी की आड़ में उनकी पार्टी पश्चिम बंगाल में धार्मिक आधार पर सियासी ध्रुवीकरण की कोशिश कर रही है.

मोहित रॉय कहते हैं कि, 'ये मीडिया और नेताओं के एक तबक़े का दुष्प्रचार है, ताकि उनके हित सध सकें. हमारा ये स्पष्ट मत है कि भविष्य में पश्चिम बंगाल या फिर देश के किसी भी और हिस्से में एनआरसी लागू होगा, तो वो असम जैसा नहीं होगा. असम में नागरिकता का रजिस्टर मुख्य तौर पर बांग्लादेश से आए अवैध घुसपैठियों की शिनाख़्त कर के उन्हें देश से बाहर निकालने की मांग करने वाले कई बरस लंबे आंदोलन के बाद बना है.'

मोहित रॉय ज़ोर दे कर कहते हैं कि, 'पश्चिम बंगाल में बड़ी तादाद में बांग्लादेश से आए मुसलमान रहते हैं. और उन के बीच एनआरसी को लेकर ख़ौफ़ है.'

हालांकि, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपने राज्य में किसी भी तरह का एनआरसी लागू करने का विरोध करती रही हैं. लेकिन इस बात की पूरी उम्मीद है कि भारत के गृह मंत्री अमित शाह पश्चिम बंगाल में किसी सियासी आयोजन के दौरान राज्य में एनआरसी लागू करने का एलान कर सकते हैं.

इसी वजह से पूरे पश्चिम बंगाल में लोगों के बीच इस बात की होड़ लगी है कि जल्द से जल्द हर तरह के सरकारी दस्तावेज़ जुटा लिए जाएं, जो उनकी पहचान साबित कर सकें.

प्रोफ़ेसर सब्यसाची बसु रे चौधरी कहते हैं कि, 'नागरिकों की पहचान का ये विचार ही पूरी तरह से वाहियात है.' वो ये मानते हैं कि ज़्यादातर बांग्लादेशी अवैध घुसपैठियों के पास उनके मां-बाप के जन्म प्रमाणपत्र या दूसरे दस्तावेज़ नहीं होंगे. न ही उनके पुरखों की ज़मीन के रिकॉर्ड ही उनके पास होंगे. पश्चिम बंगाल ही नहीं, बांग्लादेश में भी ऐसे लोगों की तादाद लाखों में होगी.

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