क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'बलात्कार और फ़ासी की सज़ा' पर देश से 'झूठ' बोला?

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- Author, फ़ैक्ट चेक टीम
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनके बयान पर आधारित एक ट्वीट के कारण गुरुवार और शुक्रवार को काफ़ी ट्रोल किया गया और लोगों ने उन्हें 'झूठा' भी कहा.
सोशल मीडिया पर हज़ारों बार शेयर किया जा चुका ये ट्वीट समाचार एजेंसी एएनआई का है जिसके अनुसार पीएम मोदी ने बुधवार को गुजरात के सूरत शहर में आयोजित अपनी रैली में कहा:
"देश में रेप की घटनाएं पहले भी होती थीं. ये शर्म की बात है कि हम ऐसी घटनाओं के बारे में अब भी सुनते हैं. लेकिन अब आरोपियों को 3 दिन, 7 दिन, 11 दिन और एक महीने में फांसी पर लटका दिया जाता है. बेटियों को न्याय दिलाने के लिए हमारे सरकार ने लगातार प्रयास किये हैं और इसके नतीजे सबके सामने हैं."

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जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, सिंगर विशाल डडलानी, कांग्रेस नेता शमा मोहम्मद समेत कई अन्य बड़े नेताओं और नामी पत्रकारों ने भी इस ट्वीट को री-ट्वीट किया है और पीएम मोदी की समझ और उनकी जानकारी पर सवाल उठाये हैं.
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कुछ ऐसे सोशल मीडिया ग्रुप्स में जो अपना परिचय 'मोदी-विरोधी' के तौर पर देते हैं, उन्होंने पीएम मोदी के भाषण का छोटा वीडियो भी शेयर किया है जिसमें उन्हें '3 दिन, 7 दिन, 11 दिन और एक महीने में फांसी' कहते सुना जा सकता है.
लेकिन अपनी पड़ताल में हमने पाया कि ये सभी दावे ग़लत हैं क्योंकि समाचार एजेंसी ने पीएम मोदी के हिंदी में दिए भाषण को सुनकर जो ट्वीट किया, उसमें ट्रांसलेशन की ग़लती है.

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पीएम मोदी का बयान
दरअसल, सूरत में जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था:
"इस देश में बलात्कार पहले भी होते थे, समाज की इस बुराई, कलंक ऐसा है कि आज भी उस घटनाओं को सुनने को मिलता है, माथा शर्म से झुक जाता है, दर्द होता है. लेकिन, आज 3 दिन में फांसी, 7 दिन में फांसी, 11 दिन में फांसी, 1 महीने में फांसी. लगातार उन बेटियों को न्याय दिलाने के लिए एक के बाद एक क़दम उठाये जा रहे हैं, और नतीजे नज़र आ रहे हैं, लेकिन देश का दुर्भाग्य है कि बलात्कार की घटना तो सात दिन तक टीवी पर चलाई जाती है, लेकिन फांसी की सज़ा की ख़बर आ करके चली जाती है, फांसी की ख़बर जितनी ज़्यादा फैलेगी, उतनी बलात्कार करने की विकृति लेकर के बैठा हुआ आदमी भी डरेगा, पचास बार सोचेगा."
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उनके भाषण का पूरा वीडियो यू-ट्यूब पर देखा जा सकता है जिसे सुनकर समझ आता है कि पीएम मोदी बलात्कार के आरोपियों को जल्द से जल्द फांसी की सज़ा सुनाए जाने की बात कर रहे थे, उन्हें फांसी पर लटकाए जाने की नहीं.
वैसे भी ये जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है कि बलात्कार के किसी मामले में भारत में आख़िरी बार फांसी साल 2004 में पश्चिम बंगाल के धनंजय चटर्जी को दी गई थी.
कोलकाता में एक 15 वर्षीय स्कूली छात्रा के साथ बलात्कार और उसकी हत्या के मुजरिम धनंजय चटर्जी को 14 अगस्त 2004 को अलीपुर सेंट्रल जेल में तड़के 4:30 बजे फांसी पर लटका दिया गया था.
लेकिन पीएम मोदी का ये कहना कि उनके कार्यकाल में चीज़ें बदली हैं, हालात बदले हैं और 'अब बलात्कार के आरोपियों को 3, 7, 11 दिन और महीने भर में फांसी की सज़ा हो जाती है', कितना सही है?



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उनके दावे की हक़ीक़त
अपनी पड़ताल में जब हमने बलात्कार के मामलों और उनमें हुई सज़ा के बारे में सर्च किया तो कई ऑनलाइन रिपोर्टें सामने आईं.
इनमें महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा और मध्य प्रदेश के इंदौर, मंदसौर व कटनी शहर में नाबालिग लड़कियों के साथ हुए बलात्कार के उन मामलों से जुड़ीं रिपोर्टें शामिल हैं जिनमें आरोपियों को ट्रायल कोर्ट ने महीने भर से भी कम वक़्त की सुनवाई के बाद फांसी की सज़ा सुनाई है.
कानून के जानकार इन मामलों में कोर्ट रूम में हुई तेज़ सुनवाई का सबसे अहम कारण बाल यौन उत्पीड़न संरक्षण कानून 'पोक्सो' में मोदी कैबिनेट द्वारा किये गए संशोधन को मानते हैं.
हालांकि इस संबंध में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ने साल 2016 के बाद कोई डेटा जारी नहीं किया है.
उत्तर प्रदेश के उन्नाव और जम्मू-कश्मीर के कठुआ रेप केस के बाद नरेंद्र मोदी सरकार पर पोक्सो कानून में कड़े प्रावधान जोड़ने का दबाव बनाया गया था और 21 अप्रैल 2018 को केंद्रीय कैबिनेट ने 12 साल तक के बच्चों के साथ बलात्कार के मामले में दोषियों को फांसी की सज़ा दिए जाने संबंधी अध्यादेश को मंज़ूरी दे दी थी.
दिल्ली स्थित 'नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी' द्वारा जारी की गई 'द डेथ पेनल्टी इन इंडिया: 2018' नाम की रिपोर्ट के अनुसार साल 2018 में भारत की निचली अदालतों (ट्रायल कोर्ट) ने कुल 162 लोगों को फांसी की सज़ा सुनाई है जिनमें से अधिकतम मामले 'बाल यौन उत्पीड़न' से जुड़े हुए थे.
इस विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार साल 2018 में ऐसा पहली बार हुआ जब 'बाल यौन उत्पीड़न' के इतने ज़्यादा आरोपियों को एक साल में फांसी की सज़ा सुनाई गई है. लेकिन इनमें से किसी को भी फांसी दी नहीं गई.
रिपोर्ट में लिखा है कि साल 2018 में मध्य प्रदेश में सबसे अधिक, 22 लोगों को नाबालिगों के साथ बलात्कार के आरोप में फांसी की सज़ा सुनाई गई है.



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'सज़ा सुनाया जाना न्याय नहीं'
इस लिहाज़ से पीएम मोदी का ये कहना सही है कि 'बेटियों को इंसाफ़ दिलाने के लिए आरोपियों को जल्द से जल्द फांसी की सज़ा सुनाई जा रही है'. लेकिन क्या इसे 'पीड़िताओं के लिए न्याय' कहना ठीक होगा?
इसे समझने के लिए हमने वरिष्ठ पत्रकार और कानून के जानकार अनूप भटनागर से बात की.
उन्होंने कहा, "ट्रायल कोर्ट सबसे शुरुआती कोर्ट है. अगर निचली अदालत में तेज़ी से सुनवाई के बाद फांसी की सज़ा सुना भी दी जाए, तो उस फ़ैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती दी जा सकती है. फांसी के मामले में उससे आगे भी कई दरवाज़े होते हैं. यानी ये लड़ाई बहुत लंबी होती है."
"नए नियम के अनुसार 12 साल से कम उम्र के बच्चों के साथ यौन दुष्कर्म करने वालों को बेल नहीं मिलती. मगर अन्य अभियुक्तों को वो सुविधा भी है. रही बात ऊपर की अदालतों की तो जजों की भारी कमी के कारण अदालतों में बहुत ज़्यादा मामले विचाराधीन हैं. वहाँ पहुँचकर किसी भी पीड़िता के लिए आरोपी को जल्द सज़ा दिलवाना असंभव है."
निर्भया रेप केस में फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई होने के बावजूद भी 7 साल में किसी आरोपी को फांसी नहीं दी जा सकी है.

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