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कासगंजः चंदन गुप्ता की मौत के एक साल बाद - ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, कासगंज, उत्तर प्रदेश
चंदन गुप्ता को आप भले ही भूल गए हों लेकिन उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ हुकूमत ने कासंगज के युवक की 'स्मृति' को मानस पटल पर क़ायम रखने के लिए शहर के एक चौराहे को उनके नाम पर करने का फ़ैसला किया है.
बी.ए. के छात्र चंदन गुप्ता पिछली 26 जनवरी को दर्जनों मोटरसाइकिल सवारों के साथ मुस्लिम बहुल इलाक़ों में घुसे, और बड्डू नगर निवासियों के मुताबिक़ आगे जाने की ज़िद करने लगे जबकि झंडा फहराने के कार्यक्रम की वजह से वहां रास्ता बाधित था, रोकने पर पहले तो नारेबाज़ी हुई और फिर हिंसा भड़क उठी.
उनके पिता सुशील गुप्ता कहते हैं कि चंदन सालों से तिरंगा यात्रा निकाल रहा था लेकिन 'सुरक्षित' इलाक़ों से ही होकर वापस आ जाता था पर इस बार कुछ लड़कों से उसकी चैटिंग होने लगी जिसमें बात चैलेंज तक पहुंच गई कि 'तुम्हें इधर से गुज़रने नहीं देंगे, और हम आएंगे.'
योगी सरकार के मंत्री का ऐलान
'चंदन गुप्ता चौक' बनाए जाने का ऐलान शनिवार 26 जनवरी को उत्तर प्रदेश के राज्य मंत्री सुरेश पासी ने किया जिन्होंने लोगों को 70 साल पहले भारत द्वारा आज के दिन ही अपना संविधान अपनाने की बात भी याद दिलाई.
सुरेश पासी ने चंदन गुप्ता को 'होनहार बालक' और 'शहीद' के रूप में याद किया और पिता सुशील गुप्ता को एक स्मृति चिन्ह भेंट किया.
पुलिस लाइन में आयोजित परेड में सुशील गुप्ता अपनी पत्नी के साथ बैठे थे जिनकी गोद में मृत बेटे की तस्वीर का फ्रेम रखा था और गर्दन ग़म में झुकी हुई थी.
सुशील गुप्ता ने अपनी पत्नी के बारे में कहा, "वो रातों को सो नहीं पाती, हर वक़्त बेटे की तस्वीर लिए रहती है. रात को भी हाथ से नहीं जाने देती."
कार्यक्रम में जहां गुप्ता परिवार बैठा था वहीं पास में ही ज़िलाधिकारी आरपी सिंह बैठे थे. उनसे पूछा गया कि क्या दंगे में मारे गए किसी व्यक्ति को इस तरह सम्मानित करने पर क्या शासन और प्रशासन की तरफ़ उंगली नहीं उठेगी?
तो ज़िलाधिकारी आरपी सिंह ने कहा कि जिन भी कारणों से चंदन गुप्ता की मौत हुई, वो जांच का विषय है और कोर्ट में मामला लंबित है लेकिन चूंकि उसकी मौत तिरंगा लिए हुई थी इसलिए शासन, प्रशासन और शहर के लोगों की उसके साथ सहानभूति है.
बड्डू नगर के वीर अब्दुल हमीद तिराहे पर 26 जनवरी, 2018 को पूरा हंगामा शुरू हुआ था. यहां 88-साल के अल्लाह रक्खा मियां की स्टेशनरी की दुकान है.
अल्लाह रक्खा उस दिन को याद करते हुए कहते हैं, "क़रीब 60-70 मोटरसाइकिल सवारों का झुंड अचानक से यहां आ धमका और फिर आगे जाने की ज़िद करने लगा. चूंकि अब्दुल हमीद तिराहे पर झंडा फहराने का कार्यक्रम आयोजित था और रास्ता ब्लॉक था तो लोगों ने उनसे थोड़ा रुकने को कहा जिसके बाद भारत में रहना है तो वंदे मातरम कहना है और पाकिस्तान मुर्दाबाद जैसे नारे लगने लगे और बात बहस और फिर तोड़-फोड़ पर पहुंच गई."
पास में ही दवा की दुकान चलाने वाले परवेज़ आलम दावा करते हैं कि मोटरसाइकिल सवारों की उस भीड़ में बहुत सारे लोगों ने हाथों में भगवा झंडे भी ले रखे थे.
अब्दुल हमीद तिराहे पर जहां पिछले चंद सालों से 15 अगस्त और 26 जनवरी पर झंडा फहराया जाता था वहां इस बार सन्नाटा छाया था और लोग मीडिया से भी बात करने से कतरा रहे थे.
कई लोगों ने बार-बार ये भी कहा कि पूरी घटना इधर नहीं हुई है.
शहर का दूसरा कोना
26 जनवरी 2018 को हुई हिंसा के मामले में वसीम, सलीम और नसीम नामक तीनों भाई राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून के तहत पिछले साल भर से अधिक समय से जेल में बंद हैं.
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अशोक कुमार ने बीबीसी को बताया कि लगभग 15 दिन पहले तीनों अभियुक्तों पर राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून की अवधि को तीन माह के लिए और बढ़ा दिया गया है.
ज़मानत होने के बाद तीनों अभियुक्तों पर पहली बार छह माह के लिए रासुका लगाया गया था.
काले गेट वाले वसीम जावेद के घर पर ताला लगा था.
थोड़ा आगे सड़क के दूसरी तरफ़ जूते की दुकान चलाने वाले वसीम के चचेरे भाई दिलशाद कहते हैं कि हमारे भाई को कारोबारी दुश्मनी की वजह से फंसाया गया है.
तीनों अभियुक्त शहर के बड़े कपड़ा व्यापारियों में गिने जाते थे.
दिलशाद के साथ बैठे और आसपास खड़े दूसरे लोग दावा करते हैं कि जब यह पूरी वारदात हुई तब तीन भाइयों में से तो दो उस समय घर में मौजूद भी नहीं थे
पूर्व पुलिस अधिकारी एस.आर. दारापूरी कहते हैं कि प्रथम दृष्टया ये किसी तरह से साबित नहीं होता कि गोली वहां से चलाई गई थी जहां से दावा किया जा रहा है.
दारापुरी ने हिंसा की घटना (26 जनवरी, 2018) के चंद दिनों बाद कासगंज की यात्रा की थी और इस पर एक विस्तृत रिपोर्ट भी दिल्ली और लखनऊ में जारी की गई थी.
उस वक़्त कासगंज का दौरा करने वाले रिहाई मंच के राजीव यादव कहते हैं कि इस मामले में दोनों पक्षों के कुछ लड़कों के बीच सोशल मीडिया पर हुई बहस की बात हमारे सामने भी आई है, लेकिन सवाल ये है कि सिर्फ़ एक ही पक्ष पर रासुका क्यों लगाया गया है?
घटना के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने चंदन गुप्ता के परिवार को मुआवज़े के तौर पर 20 लाख रुपये देने की घोषणा की थी. सुशील गुप्ता बताते हैं कि यह उन्हें मिल चुकी है.
दो दिनों की बढ़ी दाढ़ी के साथ ग्रे जैकेट पहने सुशील गुप्ता कहते हैं कि अगर ये दुखद घटना उनके अलावा किसी और के साथ होती तो समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के नेता हंगामा मचा देते और इस पर राजनीति शुरू हो गई होती.
उनके घर आने वाली गली और शहर में दूसरे कई जगहों पर चंदन गुप्ता के बड़े-बड़े पोस्टर लगे हैं जिस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ की तस्वीर भी मौजूद हैं.
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