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कासगंज की फ़िज़ा में कैसे घुला 'सांप्रदायिकता' का ज़हर!
- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, कासगंज से, बीबीसी हिंदी के लिए
"बेहद शांतिप्रिय शहर है, कभी किसी तरह का विवाद नहीं हुआ है. सांप्रदायिक हिंसा जैसी बात तो सालों से यहां देखने को नहीं मिली."
"हालांकि जितना दिखाया जा रहा है, उतना अभी भी नहीं है. कुछ शरारती तत्व ऐसा कर रहे हैं और बहुत जल्द उन्हें इसकी सज़ा मिलेगी."
सांप्रदायिक हिंसा में झुलस रहे कासगंज के डीएम आरपी सिंह ने ये बात मुझसे तब कही जब वो अपने काफ़िले के साथ सड़कों का दौरा कर रहे थे और हम इस हिंसा की गंभीरता और जड़ों की तलाश में इधर-उधर भटक रहे थे. ऐसा सिर्फ़ डीएम ही नहीं कह रहे थे बल्कि कासगंज के तमाम ऐसे लोग जो दशकों से वहां रह रहे हैं, उनके अनुभव भी कुछ इसी तरह के थे.
कासगंज की भौगोलिक स्थिति को देखें तो ये देश की राजधानी दिल्ली से क़रीब ढाई सौ किमी और राज्य की राजधानी लखनऊ से क़रीब साढ़े तीन सौ किमी की दूरी पर मथुरा और बरेली के लगभग बीचोंबीच स्थित एक ज़िला है. पहले ये एटा ज़िले में आता था लेकिन 2008 में बीएसपी के शासनकाल में इसे अलग ज़िला बना दिया गया. उस वक़्त इसका नाम कांशीराम नगर कर दिया गया था, लेकिन 2012 में समाजवादी पार्टी की सरकार ने इस शहर का पुराना नाम वापस लौटा दिया.
कासगंज का जातीय समीकरण
अन्य पिछड़ा वर्ग बहुल इस इलाक़े में हिन्दुओं और मुसलमानों की आबादी वैसी ही है जैसी कि उत्तर प्रदेश के तमाम दूसरे क़स्बों और छोटे ज़िलों में. अमीर खुसरो की जन्मस्थली पटियाली और मशहूर धार्मिक स्थल सोरों की नज़दीकी यहां की गंगा जमुनी तहज़ीब की वजह बनती है. ग्रामीण इलाक़े में ज़्यादातर लोग खेती करते हैं जबकि क़स्बे में व्यापार. नौकरीपेशा लोगों की संख्या बहुत ज़्यादा नहीं है.
कासगंज एटा लोकसभा सीट के अंतर्गत आता है जबकि इस ज़िले में तीन विधानसभा सीटें- कासगंज, अमांपुर और पटियाली आती हैं. हालांकि पूरा एटा-कासगंज लोकसभा सीट में ही लोध समुदाय की संख्या सबसे ज़्यादा है और इसका असर चुनावी नतीजों में भी दिखता है, लेकिन कासगंज विधानसभा सीट पर इनका असर ख़ासतौर पर है.
कासगंज के वरिष्ठ पत्रकार अशोक शर्मा कहते हैं, "यहां सबसे ज़्यादा संख्या में लोध हैं जबकि उसके बाद शाक्य और यादव आते हैं. ये तीनों जातियां पिछड़ी जाति में आती हैं. इसका असर ये है कि पिछले चालीस साल में एक बार को छोड़कर सभी विधायक लोध जाति के ही हुए हैं, वो चाहे जिस राजनीतिक दल में रहे हों. सिर्फ़ 2007 में यहां से बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर हसरतउल्ला शेरवानी जीते थे."
कासगंज की राजनीति
अशोक शर्मा बताते हैं कि कासगंज में मुसलमानों की आबादी 10-12 प्रतिशत है, लेकिन चुनावी राजनीति में अक़्सर वो निर्णायक भूमिका में नहीं होते हैं. 1977 से लेकर अब तक सभी प्रमुख राजनीतिक दल यानी कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, भारतीय जनता पार्टी और बहुजन समाजपार्टी यहां का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं.
1993 में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और मौजूदा समय में राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह भी यहां से बीजेपी के टिकट पर चुनाव जीत चुके हैं, लेकिन बाद में उन्होंने अतरौली विधान सभा सीट को अपने पास रखा था क्योंकि वो वहां से भी चुनाव जीते थे.
एटा-कासगंज लोकसभा सीट पर भी इन्हीं तीन अन्य पिछड़ी जाति के उम्मीदवारों का दबदबा रहा है. ज़्यादातर लोध समुदाय का ही वर्चस्व रहा है. 2009 में यहां से कल्याण सिंह सांसद थे जबकि मौजूदा समय में उनके बेटे राजवीर सिंह भारतीय जनता पार्टी से सांसद हैं. कासगज ज़िले की तीनों विधान सभा सीटों पर इस वक़्त भारतीय जनता पार्टी का कब्ज़ा है.
जानकार बताते हैं कि अन्य पिछड़ी जातियों का यहां बाहुल्य भले ही हो लेकिन उसके अलावा भी तमाम समुदाय मसलन, दलित, ब्राह्मण, राजपूत और दूसरी जातियां अच्छी ख़ासी संख्या में हैं. लेकिन ख़ास बात ये है कि न तो कभी कोई बड़ा जातीय संघर्ष देखने को मिला और न ही सांप्रदायिक संघर्ष.
कैसे घुला सांप्रदायिकता का ज़हर
अशोक शर्मा बताते हैं, "सिर्फ़ 1993 में कुछ झड़पें हुई थीं और उसका असर ये रहा कि प्रदेश में कई जगह दंगे हुए थे. लेकिन उसके बाद ऐसा कभी नहीं हुआ. हिन्दुओं और मुसलमानों में भाईचारा है और दोनों एक-दूसरे पर काफी हद तक निर्भर भी हैं."
अशोक शर्मा कासगंज विधानसभा सीट के बारे में एक और दिलचस्प बात बताते हैं, "1974 के बाद से यहां रिकॉर्ड है कि जिस भी पार्टी का विधायक जीता है, राज्य में उसी की पार्टी की सरकार बनी है."
लेकिन यहां की ऐसी सूफ़ी फ़िज़ा में सांप्रदायिकता का ज़हर घुला कैसे, इस बात से सभी हैरान हैं. कासगंज से मौजूदा विधायक देवेंद्र सिंह राजपूत का भी कहना है कि वो जब से राजनीति में हैं उन्होंने यहां कभी हिंसा नहीं देखी. ख़ुद को कल्याण सिंह का क़रीबी बताने वाले राजपूत इस समय भारतीय जनता पार्टी में हैं जबकि इससे पहले वो समाजवादी पार्टी में थे.
बहरहाल, लोगों को यकीन है कि फ़िजा में ज़हर घोलने की कोशिश भले ही की गई हो, लेकिन यहां की गंगा जमुनी संस्कृति की जड़ें इतनी गहरी हैं कि ऐसी कोशिशें क़ामयाब नहीं होंगी.
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