अमेठी में विकास की ज़मीनी सच्चाई और विकास की राजनीति

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    • Author, समीरात्मज मिश्र
    • पदनाम, अमेठी से, बीबीसी हिंदी के लिए

संसद में रफ़ाल मुद्दे पर जारी बहस की वजह से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का अमेठी दौरा टल गया और चार जनवरी की तारीख़ अमेठी में राहुल गांधी और स्मृति इरानी के एक ही दिन होने वाले दौरे का कीर्तिमान नहीं गढ़ पाई, लेकिन अमेठी में विकास के द्विपक्षीय दावे और उस पर होने वाली राजनीति में एक बार फिर ताज़गी आ गई.

शुक्रवार यानी चार जनवरी को राहुल गांधी दो दिवसीय दौरे पर अमेठी आने वाले थे और स्मृति इरानी का भी उसी दिन कुछ कार्यक्रमों में भाग लेने का कार्यक्रम था.

स्मृति इरानी अपने तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार अमेठी पहुंचीं लेकिन राहुल गांधी का कार्यक्रम पहले कुछ समय के लिए आगे बढ़ा और फिर निरस्त करके इसकी तारीख़ 22-23 जनवरी कर दी गई.

राहुल गांधी अमेठी से सांसद हैं और हाल ही में तीन राज्यों में हुई कांग्रेस की जीत का श्रेय भी पार्टी के लोग उन्हें ही दे रहे हैं.

अमेठी में इस बात की पुष्टि होती दिखी जब अमेठी की सीमा में प्रवेश करते ही शहर भर में लगी होर्डिंग्स उन्हें 'विजेता' के तौर पर पेश कर रही थीं.

ऐसा माना जा रहा था कि अमेठी में राहुल गांधी और स्मृति इरानी के एक ही दिन शहर में होने से राजनीतिक माहौल गर्म रहेगा, विकास के अपने-अपने दावे किए जाएंगे और आरोप-प्रत्यारोप के व्यंग्य बाण भी चलेंगे.

राहुल गांधी के न आने से उनके समर्थकों में कुछ मायूसी भी देखी गई, लेकिन स्मृति इरानी ने राजनीतिक गर्मी बनाए रखी और कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने भी जुलूस, नारेबाज़ी इत्यादि के ज़रिए इसे कम नहीं होने दिया.

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स्मृति रानी के दावों में कितना दम

स्मृति इरानी ने अपने कार्यक्रमों के दौरान अमेठी की जनता को एक बार फिर ये बताने की कोशिश की कि 'अमेठी को गांधी परिवार और कांग्रेस का गढ़ भले ही कहा जाता हो लेकिन विकास के मामले में यहां वैसे ही कुछ नहीं हुआ है, जैसे कि यूपी के दूसरे शहरों में या फिर पूरे देश में.'

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इरानी ने ये बताने में भी कोई कमी नहीं छोड़ी कि चुनाव हारने के बावजूद उन्होंने यहां 'जितना कुछ किया है, वो पिछले कई दशक में हुए विकास कार्यों पर भारी है.'

अमेठी में एक कार्यक्रम में स्मृति इरानी ने कहा, "साढ़े चार साल में विकास के 80 से अधिक कार्य हुए. इनमें 55 करोड़ रुपये की लागत से स्वच्छता मिशन और 180 गांवों को खुले में शौच से मुक्त करना शामिल है. इससे पता चलता है कि यह क्षेत्र अब तक विकास से कितना वंचित रहा है."

लेकिन अमेठी की आम जनता स्मृति इरानी या फिर भारतीय जनता पार्टी के इस दावे पर पूरी तरह मुहर नहीं लगाती.

अमेठी रेलवे स्टेशन से क़रीब दो सौ मीटर दूर राजर्षि चौराहे पर इस बारे में बात करने पर लोग उन कामों को गिनाने लगते हैं जो कांग्रेसी सरकारों के दौरान किए गए हैं और ये लोग पिछले क़रीब पांच साल के विकास कार्यों का तुलनात्मक लेखा-जोखा भी पेश करने लगते हैं.

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बीडीओ पद से रिटायर हो चुके अस्सी वर्षीय जयचंद्र लाल कहते हैं, "अमेठी में विकास के जो भी काम हुए हैं, वो कांग्रेस शासन में ही हुए हैं. इस छोटे से शहर में एक पूरा औद्योगिक क्षेत्र विकसित कर देना कांग्रेस की ही देन है. लोगों को रोज़गार भी मिला. बीच में विकास ठप भी रहा और अब तो यहां से योजनाओं को हटाने की कोशिश हो रही है."

उत्तर प्रदेश में अमेठी और रायबरेली कांग्रेसी राजनीति के गढ़ माने जाते हैं.

भारतीय जनता पार्टी ने साल 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में अस्सी में से इकहत्तर सीटों पर और उसकी सहयोगी अपना दल एस ने दो सीटों पर जीत दर्ज की थी.

राज्य भर में इस 'मोदी लहर' के बावजूद इन दो सीटों पर उसे बड़े अंतर से हार का सामना करना पड़ा था.

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राहुल गांधी से नाखुश अमेठी वाले?

आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए बीजेपी इन दोनों सीटों पर कांग्रेस के सामने कड़ी चुनौती खड़ी करने की कोशिश कर रही और इसके लिए वो विकास को मुद्दा बनाती है.

जबकि कांग्रेस पार्टी का दावा है कि अमेठी और रायबरेली में काफी विकास हुआ लेकिन जब से बीजेपी सरकार बनी है, विकास की योजनाएं ठप पड़ गई हैं.

अमेठी के एक गांव के रहने वाले राजेंद्र शुक्ल का परिवार कभी कांग्रेस पार्टी का 'कट्टर' समर्थक था लेकिन अब उनकी आस्था कांग्रेस के प्रति वैसी नहीं रही, जैसी पहले थी.

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स्मृति इरानी के लगातार होने वाले अमेठी दौरे और विकास कार्यों के लिए उनकी ओर से किए जाने वाले प्रयासों से राजेंद्र शुक्ल प्रभावित दिखते हैं.

इसके बावजूद अमेठी में अब तक हुए विकास की बात से वो इनकार नहीं करते, "जब तक राजीव जी ने यहां का प्रतिनिधित्व किया, ख़ूब विकास हुआ. सड़कों का जाल बिछा, नहरें आईं, फ़ैक्ट्रियां लगीं, लोगों को रोज़गार मिला और सबसे बढ़कर ये कि यहां के लोगों को इस बात का फ़ख्र था कि वो प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र के हैं. लेकिन राहुल गांधी जब से यहां से सांसद हैं, विकास की धारा जैसे रुक सी गई है."

हालांकि राजेंद्र शुक्ल इसके लिए कांग्रेस के केंद्र और राज्य की सरकार में न होने की बात भी स्वीकार करते हैं लेकिन इस बात से कुछ आहत नज़र आते हैं कि राजीव गांधी और सोनिया गांधी की तरह राहुल गांधी अमेठी की आम जनता से नहीं मिलते हैं.

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विकास के नाम पर वोट

अमेठी को क़रीब से जानने वाली लखनऊ की वरिष्ठ पत्रकार अमिता वर्मा कहती हैं, "अमेठी के लोग इस बात को समझते हैं कि यूपी में क़रीब तीन दशक से कांग्रेस की सरकार नहीं है. इस दौरान जो भी राज्य सरकारें रहीं, वो कांग्रेस की विरोधी ही रहीं. ऐसे में विकास कार्य कितना मुश्किल था, इसे अमेठी के लोग भली-भांति जानते हैं. फिर भी यूपीए सरकार के दौरान जो योजनाएं यहां आईं, उनसे कांग्रेस पार्टी ने यहां के लोगों का भरोसा जीता है."

अमिता वर्मा कहती हैं कि विकास तो अमेठी में हुआ है लेकिन यह भी सही है कि यहां के लोग विकास के नाम पर वोट नहीं देते.

उनके मुताबिक़, "सुनने में बड़ा अजीब लगता है लेकिन है सही कि अमेठी के लोग विकास के नाम पर नहीं बल्कि पहचान के नाम पर वोट देते हैं. ऐसा ख़ुद अमेठी के काफ़ी प्रबुद्ध लोग तक कह चुके हैं. उन्हें लगता है कि अमेठी निवासी के रूप में उन्हें उत्तर प्रदेश के बाहर जो पहचान सम्मान मिलता है, वो कई और मुद्दों पर भारी पड़ जाता है."

अमेठी में स्थानीय लोगों के मुताबिक हिन्दुस्तान एरोनॉटिकल यानी एचएएल की इकाई, इंडोगल्फ़ फ़र्टिलाइज़र्स, बीएचईएल प्लांट, इंडियन ऑयल की यूनिट, पेट्रोलियम प्रौद्योगिकी संस्थान के अलावा तमाम शैक्षणिक और तकनीकी संस्थान हैं.

इसके अलावा अमेठी-रायबरेली जैसे वीआईपी क्षेत्र होने के नाते फ़ुरसतगंज में हवाई पट्टी तो है ही, विमान प्रशिक्षण स्कूल भी है.

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केंद्र में कांग्रेस न होने का नुकसान

जगदीशपुर यहां का औद्योगिक क्षेत्र है और अकेले जगदीशपुर में छोटे-बड़े मिलाकर कम से कम तीन सौ प्लांट हैं. ज़ाहिर है ये सब पिछली कांग्रेस सरकारों के समय में हुआ है.

स्थानीय लोगों की ये शिकायत भी है कि अब उनके इलाक़े को भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है और मौजूदा केंद्र सरकार ने यूपीए सरकार की कई योजनाओं को या तो रद्द कर दिया या फिर आगे नहीं बढ़ाया.

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कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता और अमेठी के शुकुल बाज़ार के निवासी बब्बन द्विवेदी ग़ुस्से में कहते हैं, "मेगा फ़ूड पार्क, हिंदुस्तान पेपर मिल, आईआईआईटी, होटल मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट, गौरीगंज में बनने वाला सैनिक स्कूल जैसे प्रोजेक्ट या तो कहीं और भेज दिए गए या फिर लटके हुए हैं. इन सबसे यहां के लोगों का ही तो फ़ायदा होता. बीजेपी की सरकारों ने ख़ुद तो कुछ किया नहीं है, झूठ अलग बोलते हैं कि सत्तर साल में कुछ नहीं हुआ."

लेकिन अमेठी में बीजेपी के ज़िलाध्यक्ष दयाशंकर पांडेय इन आरोपों को सिरे से नकारते हैं और योजनाओं को यहां से हटाने की बात को 'कोरा झूठ' करार देते हैं.

पांडेय कहते हैं, "राहुल गांधी ने एक काम यहां नहीं किया है और इन योजनाओं के नाम पर सिर्फ़ ज़मीन हड़पने का काम किया है. जहां तक आईआईआईटी का सवाल है तो ये संस्थान अमेठी वालों के किसी काम का नहीं था. यहां बाहर से आकर लोग पढ़ते थे. उसे हटाकर अब आंबेडकर विश्वविद्यालय का सैटेलाइट कैंपस चलाया जा रहा है. मेगा फ़ूड पार्क और पेपर मिल को इन्हीं की सरकार शुरू नहीं कर पाई थी, सिर्फ़ घोषणा कर दी गई थी."

दिलचस्प बात ये है कि ख़ुद बीजेपी के लोग भी कौशल विकास केंद्र के अलावा किसी ऐसी परियोजना को नहीं बता पाते, जिसे मौजूदा एनडीए सरकार ने शुरू किया हो और वो इसी में पूरा हुआ हो.

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अमेठी वालों को याद हैं संजय

दयाशंकर पांडेय के मुताबिक़, "कृषि विज्ञान केंद्र, सेंट्रल स्कूल का निर्माण तेज़ी से चल रहा है. तिलोई में दो सौ बिस्तरों वाला अस्पताल लगभग बनकर तैयार है और रेलवे के दोहरीकरण का काम भी पूरा होने वाला है."

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दयाशंकर पांडेय ये भी स्पष्ट करते हैं कि रेलवे के दोहरीकरण की स्वीकृति यूपीए सरकार ने ही दी थी लेकिन उनकी यानी एनडीए की सरकार ने उसे वित्तीय स्वीकृति दी है.

लेकिन अमेठी में विकास कार्य नहीं हुए, इस बात को दयाशंकर पांडेय भी नकार नहीं पाते हैं. दबे मन से वो ये ज़रूर स्वीकार करते हैं कि राजीव गांधी के समय कुछ काम हुआ था. वो कहते हैं, "अमेठी में जो कुछ भी काम हुआ है वो माननीय सांसद वरुण गांधी के पिता और माननीय मंत्री मेनका गांधी के स्वर्गीय पति संजय गांधी ने शुरू कराए थे. हां, उन्हें पूरा कराने का काम ज़रूर राजीव गांधी ने किया."

अमेठी और रायबरेली के स्थानीय लोग बताते हैं कि भारतीय जनता पार्टी को इस बात का मलाल है कि वो मोदी लहर में भी ये दोनों सीटें क्यों नहीं जीत पाई? इन लोगों के मुताबिक, इसीलिए वो उन तमाम कामों को लोगों की निग़ाह से ग़ायब करना चाहती है जो कि राजीव गांधी, सोनिया गांधी या फिर राहुल गांधी के प्रयासों से किए गए हैं.

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प्रदेश सरकारों का ग़लत व्यवहार

लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र कहते हैं, "बीस साल पहले अमेठी और रायबरेली को जो लोग जानते हैं, उन्हें वहां के विकास के बारे में पता है. तीस साल होने को हैं, राज्य में कांग्रेस सरकार नहीं है. केंद्र में वो दस साल रही भी लेकिन विकास के तमाम कार्यों के लिए राज्य सरकारों का सहयोग ज़रूरी होता है. फिर भी ये कहना कि विकास नहीं हुआ, सिवाए राजनीतिक विद्वेष के और कुछ नहीं है."

हालांकि अमेठी के पत्रकार योगेश श्रीवास्तव की राय इससे अलग है. उनका कहना है, "यूपीए सरकार के समय भी राहुल गांधी अमेठी में उस तरह का काम नहीं कर पाए जैसा कि उनके पिता राजीव गांधी और चाचा संजय गांधी ने किया था. जबकि यूपीए सरकार में वो राजनीतिक रूप से बेहद शक्तिशाली थे."

लेकिन योगेश श्रीवास्तव भी इस बात से इनकार नहीं करते कि एनडीए सरकार में विकास कार्य राजनीति का शिकार हुए हैं.

उनके मुताबिक़, "अमेठी में सड़कों का जाल पहले से ही बिछा हुआ है. ये अलग बात है कि अब बहुत सी ऐसी सड़कें मिलेंगी जिनमें बड़े-बड़े गड्ढे हैं और उन पर चलना आसान नहीं है. लेकिन इसके लिए यहां के सांसदों की बजाय राज्य सरकारें दोषी हैं और राज्य में पिछले क़रीब तीन दशक से कांग्रेस पार्टी सत्ता से बाहर है."

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