अमित शाह की रैली पर क्या बोली रायबरेली?

अमित शाह

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    • Author, समीरात्मज मिश्र
    • पदनाम, रायबरेली से, बीबीसी हिन्दी के लिए

शनिवार को रायबरेली के जीआईसी ग्राउंड में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह जब मंच पर आए तो उनका स्वागत शंख ध्वनि और वेद मंत्रों के पाठ के साथ हुआ.

अमित शाह ने भी कांग्रेस के गढ़ कहे जाने वाले रायबरेली को 'जीत लेने' वाली भाषा में अपना भाषण दिया, कांग्रेस पर जमकर बरसे और घोषणा की कि अब रायबरेली का भी विकास होगा.

इस पूरे कार्यक्रम के संयोजक रहे दिनेश प्रताप सिंह कुछ समय पहले तक कांग्रेस में थे और कांग्रेस पार्टी से ही विधान परिषद के सदस्य थे. उन्होंने बीजेपी में सपरिवार शामिल होने के लिए इस परिवर्तन संकल्प रैली का आयोजन किया था.

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी, बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र नाथ पांडेय और क़रीब दर्जन भर मंत्रियों की मौजूदगी में दिनेश सिंह ने स्पष्ट किया कि उन्हें बीजेपी से बुलावा नहीं आया था बल्कि वो ख़ुद अमित शाह की चौखट पर गए थे.

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हालांकि मंच पर लगातार ये घोषणा होती रही कि रायबरेली की 'पंचवटी' अब कांग्रेस छोड़कर 'भगवामय' यानी बीजेपी में शामिल हो गई है, लेकिन इतनी भारी-भरकम व्यवस्था के बावजूद 'पंचवटी' पूरी तरह से 'भगवामय' नहीं हो पाई और यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में बीजेपी के इस 'विजयी भाव' पर न सिर्फ़ संदेह जताया जा रहा है बल्कि कुछ लोगों द्वारा 'कांग्रेस का क़िला ढह जाने' के दावे की गंभीरता पर भी सवाल उठ रहे हैं.

कांग्रेस के गढ़ में सेंध की कोशिश

दरअसल, दिनेश प्रताप सिंह पांच भाई हैं और रायबरेली में इनका घर पंचवटी के नाम से जाना जाता है. सभी भाई मूल रूप से कई तरह के व्यवसायों में लगे हैं और कुछ लोग व्यवसाय के ज़रिए राजनीति में भी आ गए हैं.

दिनेश सिंह ख़ुद एमएलसी हैं जबकि उनके एक अन्य भाई अवधेश सिंह ज़िला पंचायत अध्यक्ष हैं और एक भाई राकेश सिंह रायबरेली ज़िले की हरचंदपुर विधान सभा सीट से कांग्रेस पार्टी से विधायक हैं.

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राकेश सिंह शनिवार को न तो मंच पर दिखे, न ही बीजेपी के नेताओं के साथ और न ही वो कांग्रेस पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए हैं.

राकेश सिंह इस बारे में कुछ भी बात करने में अनिच्छा दिखाते हैं, लेकिन जानकारों का कहना है कि राकेश सिंह ने इसलिए बीजेपी नहीं ज्वाइन की है ताकि उनकी विधायकी बनी रहे.

रायबरेली ज़िले के पत्रकार माधव सिंह बताते हैं कि विधानसभा सीट छोड़कर दोबारा चुनाव लड़ना और फिर जीतना इनके लिए कितना मुश्किल है, ये पूरा पंचवटी बख़ूबी जानता है.

माधव सिंह बताते हैं, "लोकसभा चुनाव में मोदी लहर में सोनिया गांधी ने भारी बहुमत से ये सीट जीती और विधान सभा चुनाव में भी छह सीटों में से दो कांग्रेस ने और एक सपा ने जीती थी, जबकि कांग्रेस और सपा का गठबंधन था. अन्य दो सीटों पर भी कांग्रेस उम्मीदवार दूसरे नंबर पर थे और बहुत कम अंतर से हार हुई थी. बीजेपी यहां से विधानसभा में भी सिर्फ़ तीन सीट ही जीत पाई थी, जबकि ये दोनों चुनाव यूपी में बीजेपी के अब तक के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन थे."

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इमेज कैप्शन, रायबरेली के ज़िला कांग्रेस अध्यक्ष वीके शुक्ल

रायबरेली में आम लोगों से बातचीत में ये पता चलता है कि दिनेश सिंह सपा और बसपा में भी रह चुके हैं, लेकिन विधानपरिषद वो कांग्रेस पार्टी की बदौलत ही पहुंचे हैं.

रैली में आए एक बुज़ुर्ग राम दयाल बताते हैं, "ये आज भले ही कह रहे हैं कि कांग्रेस पार्टी ने उन्हें कुछ नहीं दिया, बल्कि उन्होंने ही कांग्रेस को दिया है, लेकिन विधायकी तभी पाए हैं जब कांग्रेस में आए. सपा-बसपा में तो नहीं पाए थे. हां, अब भाजपा में ज़रूर कुछ बड़ी उम्मीद लगाए होंगे."

जहां तक रायबरेली को 'कांग्रेस से मुक्त' करने का बीजेपी का दावा है, तो जानकार बताते हैं कि राजनीतिक रूप से रायबरेली या तो गांधी परिवार की वजह से जाना जाता है, या फिर लंबे समय तक सदर विधायक रहे अखिलेश सिंह की वजह से. अखिलेश सिंह की बेटी अदिति सिंह फ़िलहाल सदर सीट से कांग्रेस पार्टी की ही विधायक हैं.

सिविल लाइंस स्थित एक रेस्टोरेंट संचालक बताते हैं, "अखिलेश सिंह या उनकी बेटी को जीतने के लिए न कांग्रेस की ज़रूरत है, न सपा की, न बसपा की और न भाजपा की. लेकिन यदि वो किसी पार्टी में हैं तो कम से कम रायबरेली में तो वो पार्टी मज़बूत रहेगी ही. दूसरे, रायबरेली के लोग कांग्रेस पार्टी के योगदान को इतनी जल्दी भुला देंगे, ऐसा लगता नहीं है."

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सियासत गर्म

रैली में आए एक बीजेपी नेता विनय मिश्र बातचीत में दावा करते हैं, "कांग्रेस पार्टी ने विकास के नाम पर कुछ नहीं किया है. हमेशा इनके बड़े नेता यहां से जीतते रहे हैं लेकिन आज भी यह इलाक़ा पिछड़ा है, इसलिए अब लोग भाजपा की ओर जा रहे हैं."

लेकिन उनकी बात को एक ग्रामीण बुज़ुर्ग ये कहते हुए काटते हैं, "अइसन नहीं है. बहुत कुछ दिया है रायबरेली और अमेठी को इन लोगों ने. अब ई अलग बात है कि कउन कहां जा रहा है."

उत्तर प्रदेश विधान परिषद में कांग्रेस के सिर्फ़ दो सदस्य हैं. एक तो दिनेश सिंह ही थे और दूसरे पड़ोस में अमेठी-सुल्तानपुर क्षेत्र से दीपक सिंह हैं. दीपक सिंह ने दिनेश सिंह को विधान परिषद सदस्यता छोड़ने की चुनौती दी है तो वहीं उनके ख़िलाफ़ दल-बदल क़ानून के तहत कार्रवाई करने की चेतावनी भी दी है.

राजनीतिक हलकों में जहां दिनेश सिंह के परिवार के बीजेपी में शामिल होने पर कांग्रेस और बीजेपी को होने वाले नफ़े-नुक़सान की चर्चा थी, वहीं जीआईसी ग्राउंड से महज़ सौ मीटर की दूरी पर स्थित कांग्रेस के ज़िला कार्यालय में इन नारों के साथ खुशी मनाई जा रही थी- 'कांग्रेस का कचरा साफ़'

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पूछने पर ज़िला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष वीके शुक्ल बताते हैं, "कांग्रेस का तो आम कार्यकर्ता इनके जाने से खुशी में मिठाइयां बांट रहा है. लेकिन आप देखिएगा ये बीजेपी में कितने दिन रहते हैं. बीजेपी में दिनेश सिंह सिर्फ़ इसलिए जा रहे हैं कि इन्हें सीआईएसएफ़ वाली सुरक्षा मिल जाए जिसके भौकाल का फ़ायदा ये अपने व्यवसाय में उठा सकें."

हालांकि दो दिन पहले दिनेश सिंह ने कांग्रेस पार्टी से मोहभंग की वजह ये बताई थी कि प्रियंका गांधी ने उन्हें टिकट नहीं दिया था, लेकिन वीके शुक्ल कहते हैं कि 'रायबरेली में दिनेश सिंह इतने बड़े नेता नहीं हैं जिनसे प्रियंका गांधी का इस तरह का संवाद हो.'

वीके शुक्ल कहते हैं कि दिनेश सिंह को तो एक साल पहले भी कांग्रेस से निलंबित कर दिया गया था, क्योंकि उन्होंने पार्टी के एक ज़िला पंचायत सदस्य के साथ कथित तौर पर मार-पीट की थी, लेकिन बाद में वरिष्ठ नेताओं के हस्तक्षेप से चेतावनी देते हुए निलंबन वापस ले लिया गया था.

वहीं लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र का कहना है कि बीजेपी को लोकसभा चुनाव या फिर आगे विधान सभा चुनाव में दिनेश सिंह के परिवार का कितना चुनावी फ़ायदा मिलता है, ये तो चुनाव में ही पता चलेगा लेकिन इनकी 'ज़रूरतें पूरी करना' बीजेपी के लिए आसान नहीं होगा.

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