मोदी को बनारस में हराना राहुल गांधी का ख़याली पुलाव क्यों है?

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बेंगलुरु में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा था कि अगर विपक्ष एकजुट हो गया तो 2019 में बीजेपी चुनाव नहीं जीत पाएगी.
और तो और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी वाराणसी की सीट भी शायद न बचा पाएँ.
उन्होंने कहा कि कांग्रेस, सपा और बसपा साथ आए तो मोदी की राह काफ़ी मुश्किल हो जाएगी.
फूलपुर और गोरखपुर संसदीय सीट के उप-चुनावों के नतीजों के बाद राहुल गांधी की इस बात में दम तो लगता है.
लेकिन यह क्या वाक़ई ऐसा हो पाएगा, ऐसा दावे से कह पाना काफ़ी कठिन है.

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आंकड़ों में वाराणसी सीट
1991 की हिंदू लहर के बाद से एक चुनाव को छोड़कर, वाराणसी संसदीय सीट हमेशा बीजेपी के पास रही है.
इस सीट को लेकर ख़ासी चर्चा तब शुरू हुई जब 2014 में बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने वडोदरा के साथ-साथ यहां से चुनाव लड़ने का फ़ैसला लिया.
इस सीट पर चुनाव तब ख़ासा रोचक हो गया जब आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेता अरविंद केजरीवाल ने भी इस सीट से चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी थी.
वहीं, समाजवादी पार्टी से कांग्रेस में आए अजय राय को भी उम्मीदवार बनाया गया था.
इसके अलावा समाजवादी पार्टी ने कैलाश चौरसिया और बहुजन समाज पार्टी ने विजय प्रकाश जायसवाल को अपना उम्मीदवार घोषित किया था.

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केजरीवाल की उम्मीदवारी
इस सीट के चुनाव को ख़ास तौर से बीजेपी, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच तिकोना संघर्ष बताया जा रहा था.
अरविंद केजरीवाल ने भ्रष्टाचार विरोधी नारे लगाए, अजय राय लोकप्रिय स्थानीय नेता थे जबकि पूरे देश से आए भाजपा कार्यकर्ताओं के नारे 'हर हर मोदी, घर घर मोदी' से बनारस गूंज रहा था.
16 मई 2014 को आए परिणामों में नरेंद्र मोदी ने अपने प्रतिद्वंद्वी अरविंद केजरीवाल को तीन लाख 71 हज़ार से अधिक वोटों से हरा दिया.
नरेंद्र मोदी को पांच लाख 81 हज़ार और अरविंद केजरीवाल को लगभग दो लाख 10 हज़ार से अधिक वोट मिले थे.
वहीं, तीसरे नंबर पर कांग्रेस के अजय राय रहे थे जिन्हें सिर्फ़ 75 हज़ार वोट मिले थे. सपा को 45 हज़ार तो वहीं बसपा को 60 हज़ार से कुछ अधिक वोट ही मिले थे.

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चुनावी गणित
अगर कांग्रेस-सपा-बसपा के वोटों का कुल जोड़ निकाला जाए तो यह 1 लाख 80 हज़ार के करीब बैठता है यानी नरेंद्र मोदी से लगभग 4 लाख वोट कम.
हालांकि, इस हिसाब में केजरीवाल के लगभग 2 लाख 10 हज़ार वोट शामिल नहीं हैं.
अगर इन वोटों को जोड़ भी लिया जाए तो भी प्रधानमंत्री मोदी को मिले वोटों की बराबरी नहीं की जा सकती है.
सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या 2019 के आम चुनाव में आम आदमी पार्टी बनारस से चुनाव लड़ेगी, अगर लड़ेगी तो उसे इस बार कितने वोट मिलेंगे, अगर नहीं लड़ेगी तो पिछली बार उसे जो वोट मिले थे वे किसकी थैली में जाएँगे.
इसका जवाब किसी के पास नहीं है.

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अगर पीछे नज़र दौड़ाएं
2014 के इन आंकड़ों से अनुमान लगाया जाए तो तीनों पार्टियां मिलकर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नहीं हरा सकती हैं, बशर्ते उनकी लोकप्रियता में भारी गिरावट न आई हो जिसके बारे में पक्के तौर पर कुछ कहना संभव नहीं है.
2014 का चुनाव कांग्रेस विरोध और मोदी लहर के नाम था तब वाराणसी ने नरेंद्र मोदी को तीन लाख से अधिक वोटों से जिताया.
इससे पहले के चुनावों में बीजेपी को इतने बंपर वोट नहीं मिलते रहे हैं.
साल 2009 के लोकसभा चुनावों में जब यूपीए ने अपनी सत्ता बरक़रार रखी थी तब बीजेपी ने कांग्रेस से वाराणसी सीट जीत ली थी.
1991 के बाद केवल 2004 में कोई ग़ैर-बीजेपी प्रत्याशी इस सीट से जीता था.

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बनारस में मुरली मनोहर जोशी
2009 में बीजेपी के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने सिर्फ़ 17 हज़ार वोटों से बसपा के मुख़्तार अंसारी को हराया था.
यहां दिलचस्प बात यह है कि उस समय जोशी को दो लाख तीन हज़ार वोट ही मिले थे.
वहीं, अंसारी को एक लाख 85 हज़ार, सपा के अजय राय को एक लाख 23 हज़ार और कांग्रेस के राजेश कुमार मिश्रा को 66 हज़ार से थोड़े ज़्यादा ही वोट मिले थे.
अब अगर कांग्रेस-सपा-बसपा के वोटों को मिलाया जाए तो इनका कुल जमा तीन लाख 76 हज़ार वोट बैठता है.
इस सूरत में विपक्ष बीजेपी को हरा सकता है लेकिन यह तस्वीर 2009 की है.
नरेंद्र मोदी जैसा उम्मीदवार चुनाव लड़ता है तो सारे समीकरण धरे रह जाते हैं क्योंकि 1991 से 2009 के विजयी उम्मीदवारों को मिले वोटों का प्रतिशत देखा जाए तो वह 45 फ़ीसदी से 31 फ़ीसदी के बीच रहा है.

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बड़े नेताओं के लिए टूटते समीकरण
लेकिन मोदी ने इन बने बनाए आंकड़ों को तोड़ा और 2014 में उनको 56 फ़ीसदी से अधिक वोट मिले थे.
इसका मतलब है कि उम्मीदवार तगड़ा हो तो जातिगत समीकरण कई बार टूट जाते हैं.
वाराणसी में तकरीबन 15 लाख 32 हज़ार मतदाता हैं जिनमें लगभग 82 फ़ीसदी हिंदू, 16 फ़ीसदी मुसलमान और बाकी अन्य हैं.
हिंदुओं में 12 फ़ीसदी अनुसूचित जाति और एक बड़ा तबका पिछड़ी जाति से संबंध रखने वाले मतदाताओं का है.
अगर उम्मीदवार बड़ा राजनेता हो तो समीकरण टूटते हैं. इस बात को एक दूसरे उदाहरण से भी समझा जा सकता है.

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रायबरेली और अमेठी का उदाहरण
साल 2014 के आम चुनावों में उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से 73 पर बीजेपी गठबंधन ने जीत दर्ज की थी.
लेकिन सपा को पांच और कांग्रेस को दो सीटें मिली थीं जबकि बसपा का खाता भी नहीं खुल सका था.
सपा-कांग्रेस ने जो सात सीटें जीती वो दिग्गज नेताओं की थीं. कांग्रेस से सोनिया और राहुल गांधी ने अपनी पारंपरिक रायबरेली और अमेठी सीटों पर जीत दर्ज की थी.
अमेठी में राहुल गांधी को बीजेपी की स्मृति ईरानी और आम आदमी पार्टी के कुमार विश्वास ने कड़ी टक्कर दी थी लेकिन ऐसे में भी उन्होंने अपनी सीट बचा ली.
इस हिसाब से अनुमान लगाया जा सकता है कि कुछ ख़ास मामलों में समीकरण काम नहीं करते हैं.

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देखना अब यह है कि 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों में वाराणसी सीट पर ऊंट किस करवट बैठता है.
उस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की छवि वाराणसी के लोगों के लिए क्या होगी, यह उस पर निर्भर करता है.
साथ ही साथ विपक्ष का गठबंधन होगा या नहीं, ये अभी पक्का नहीं है, राहुल गांधी जो कह रहे हैं अभी तो वो ख़याली पुलाव ही लग रहा है.

















