हिंदू राम मंदिर के लिए अंनत काल तक प्रतीक्षा नहीं कर सकता: विहिप

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- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
विश्व हिंदू परिषद ने कहा है कि राम मंदिर को लेकर हिंदू समाज अनंत काल तक न्यायालय के फ़ैसले का इंतज़ार नहीं कर सकता है और भव्य मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़ करने के लिए क़ानून बनाया जाना चाहिए.
विहिप की ये प्रतिक्रिया प्रधानमंत्री के उस बयान के बाद आई है जिसमें नरेंद्र मोदी ने कहा है कि राम मंदिर निर्माण के लिए अध्यादेश की बात क़ानूनी प्रक्रिया के ख़ात्मे के बाद ही सोची जा सकती है.
समाचार एजेंसी एएनआई को दिए गए एक इंटरव्यू में नरेंद्र मोदी ने कहा है, "क़ानूनी प्रक्रिया समाप्त होने दीजिए. क़ानूनी प्रक्रिया समाप्त होने के बाद सरकार के तौर पर हमारी जो भी ज़िम्मेदारी है, हम उसके लिए पूरी कोशिश करेंगे."
प्रधानमंत्री ने ये बयान एक सवाल के जवाब में दिया था कि क्या राम मंदिर के निर्माण के लिए वो अध्यादेश लाएंगे?

आरएसएस का बयान
नरेंद्र मोदी के साक्षात्कार के ख़त्म होने के कुछ ही देर बार आरएसएस के सह सरकार्यवाहक दत्तात्रेय होसाबले ने बयान जारी कर कहा कि जनता सरकार से उम्मीद करती है कि वो राम मंदिर पर किए गए वायदे को अपने इसी कार्यकाल में पूरा करे.
होसाबले ने मंगलवार को जारी लिखित बयान में कहा है कि 2014 में भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में राम मंदिर निर्माण के लिए संविधान के दायरे के भीतर सभी संभावनाओं को तलाशने का वायदा किया था और जनता ने बीजेपी पर भरोसा कर उसे पूर्ण बहुमत दिया इसलिए सरकार को अपने इसी कार्यकाल में इसे पूरा करना चाहिए.
हालांकि आरएसएस के इस बयान में मंदिर निर्माण के लिए क़ानून की बात नहीं की गई है लेकिन संघ प्रमुख ख़ुद और संगठन के दूसरे बड़े अधिकारी सुरेश सोनी अयोध्या में भव्य मंदिर के निर्माण के लिए अध्यादेश या संसद में क़ानून लाने की बात कहते रहे हैं.
आरएसएस के बयान के कुछ घंटो बाद विहिप ने इस मामले पर दिल्ली में एक प्रेस वार्ता की और क़ानून लाने की बात को फिर से दोहराया.
जब बीबीसी ने विहिप के कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार से पूछा कि बीजेपी-आरएसएस-विहिप इसी मामले पर अलग-अलग तरह की बातें क्यों कर रहे हैं? क्या ये अयोध्या मुद्दे को गर्म रखने की कोशिश है?
आलोक कुमार ने जवाब में कहा कि नहीं ये कोई लिखित सक्रिप्ट का हिस्सा नहीं है और चूंकि वो राम मंदिर आंदोलन से दशकों से जुड़े रहे हैं तो प्रधानमंत्री के बयान पर प्रतिक्रिया देना लाज़िमी है.
उन्होंने फिर दोहराया कि सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई का होना किसी तरह की बाधा नहीं और सरकार को इस मामले पर संसद में क़ानून लाना चाहिए. वो इस मामले को सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससीएसटी उत्पीड़न क़ानून में बदलाव और फिर संसद में लाये गए क़ानून से जोड़ते हैं और कहते हैं कि जब सरकार उस मामले में ऐसा कर सकती है तो फिर राम मंदिर निर्माण के लिए क्यों नहीं.

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सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर मुद्दे पर 4 जनवरी को सुनवाई होनी है.
हालांकि हिंदूत्ववादी संगठन मोदी सरकार से मंदिर पर क़ानून लाने की बात कह रहे हैं लेकिन संविधान के जानकार पहले भी कह चुके हैं कि पहले तो ऐसा कोई भी विधेयक राज्यसभा में पारित नहीं हो पाएगा क्योंकि सरकार को वहां बहुमत नहीं और दूसरे अगर ऐसा हो भी जाता है तो वो सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज हो जाएगा क्योंकि वो संविधान की मूल भावनाओं के विपरीत होगा.
विहिप का, जो राम मंदिर निर्माण को लेकर कुछ महीनों से आंदोलन चला रही है, दावा है कि अगर सरकार संसद में इस मामले पर बिल लाती है तो कोई भी राजनीतिक दल उसका विरोध करने की स्थिति में नहीं होगा. संगठन इस मामले पर 350 सांसदों ने मिलने का दावा भी करती है हालांकि अलोक कुमार ने उन सदस्यों के नाम बताने से इंकार कर दिया जिन्होंने उनसे राम मंदिर पर क़ानून का समर्थन देने का वादा किया है.
पिछले साल दिसंबर में बीजेपी के सहयोगी दल लोकजनशक्ति पार्टी के सांसद चिराग पासवान ने बयान दिया था कि राम मंदिर एनडीए के एजेंडे का हिस्सा नहीं है. यानी मोदी सरकार में शामिल सभी दल इस मामले पर सरकार के साथ नहीं.
इस मामले पर बीजेपी के दो सांसदों ने प्राइवेट मेम्बर बिल की बात की थी लेकिन अबतक उस मामले पर किसी तरह की सुगबुगाहट सामने नहीं आई है.
ये बिल्स लोकसभा में कर्नाटक के धारवाड़ से पार्टी सांसद प्रह्लाद वेंकटेश जोशी और राज्यसभा में मनोनीत सदस्य राकेश सिन्हा की ओर से तैयार की गई थीं.

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अपने साक्षात्कार में प्रधानमंत्री ने ये भी कहा कि कुछ कांग्रेस के नेता जो वकील भी हैं वो सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई में देरी की वजह हैं. प्रधानमंत्री ने ऐसा हाल में एक चुनावी रैली के दौरान भी एक भाषण में कहा था.
उनका इशारा कांग्रेस नेता और सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील कपिल सिब्बल के अदालत के सामने दिए गए तर्क से था कि मामले की सुनवाई 2019 आम चुनावों से पहले नहीं होनी चाहिए क्योंकि बीजेपी उसका राजनीतिक इस्तेमाल कर सकती है.
क्या फ़ैसला मानेगी?
लेकिन यहां सवाल उठता है कि क्या बीजेपी और दूसरे हिंदूत्व संगठन ये कहना चाहते हैं कि देश की सबसे ऊंची अदालत कांग्रेस के प्रभाव में बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि मामले की सुनवाई नहीं कर रही है?
आलोक कुमार कहते हैं कि इन चीज़ों के बारे में पक्के तौर पर कुछ कहना मुमकिन नहीं. लेकिन कांग्रेस के एक नेता जो वकील भी हैं उनका तर्क और फिर चीफ़ जस्टिस पर महाभियोग लाने का दबाव ...
हालांकि महाभियोग का मामला बहुत आगे नहीं बढ़ा था.
बीबीसी ने विहिप कार्याध्यक्ष से पूछा कि अगर सुप्रीम कोर्ट दो दिनों के बाद होनेवाली सुनवाई में बेंच का गठन कर सुनवाई शुरु कर देता है और फ़ैसला राम मंदिर के ख़िलाफ़ आएगा तो हिंदूत्व संगठन उसे मानेंगे तो अलोक कुमार ने कहा कि नहीं फ़ैसला हमारे ही पक्ष में आएगा, हम इस बात को लेकर पूरी तरह आशव्स्त हैं.
मोहन भागवत ने अपने एक भाषण में कहा था कि अदालत को राम मंदिर पर फ़ैसला देते समय हिंदू भावना का घ्यान रखना चाहिए जिसे बहुत सारे लोगों ने कोर्ट पर दबाव बनाने के तौर पर देखा था.
और विहिप हालांकि मोदी सरकार से राम मंदिर निर्माण के लिए क़ानून की बात कह रहा है और उसका दवाब है कि वो उन्हें इस मामले पर राज़ी करने की कोशिश करेगा लेकिन ये पूछने पर कि आख़िर प्रधानमंत्री का मन बदलने के लिए उसके पास क्या रणनीति है, अलोक कुमार कहते हैं कि इसका फ़ैसला जनवरी के अंत में कुंभ में होनेवाली धर्म सभा में लिया जाएगा.
यानी एक माह और तब तक आम चुनाव और पास आ जाएगा.
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